सिनेमा का सफरनामा – 1

रामजी यादव/ अपर्णा

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सिनेमा का सफरनामा  सीरीज को मैंने सबसे पहले एक वृत्तचित्र के रूप में बनाने के बारे में सोचा था। चूंकि दिल्ली में मैंने वृत्तचित्र पर बहुत सारा काम किया और साहित्यिक व्यक्तियों और सामाजिक मुद्दों पर दर्जनों वृत्तचित्र बनाया था इसलिए मेरी यह हार्दिक इच्छा थी कि शताब्दी वर्ष में सिनेमा की यात्रा और अतीत को एक बार फिर से देखने की कोशिश करूँ और यह भी समझने का प्रयास करूँ कि वह कहाँ से शुरू हुआ और किन-किन रस्तों से होते हुये कहाँ तक पहुंचा? भारत विविधतापूर्ण देश है । यहाँ एक ही समय में कई तरह की जलवायु विद्यमान होती है और इसकी सांस्कृतिक महत्ता का तो कोई परावर नहीं है। यह महादेश अनेक राष्ट्रीयताओं का समुच्चय है। इसलिए मेरी दिलचस्पी हमेशा इस बात में रही है कि सिनेमा ने इसे किस रूप में दर्ज किया। उसका केंद्रीय स्वर क्या रहा है और यहाँ के उत्पीड़ित समाजों, जातियों और समुदायों को उसने किस रूप में देखा और दिखाया। इस प्रक्रिया में मैंने यथासंभव उपलब्ध किताबों, जीवनियों और आत्मवृत्तों को पढ़ा। अलग-अलग दृष्टि से सिनेमा के किए जानेवाले मूल्यांकनों को देखा और यह आश्चर्यचकित करनेवाला सत्य था कि सिनेमा अपने आप में एक समुंदर है। इसमें जितना कुछ जाना-पहचाना है उससे कई गुना अधिक अनजाना है क्योंकि यहाँ ग्लैमर तथ्यों को बिखेर देता है।

दिल्ली से शुरू हुये इस सफर का अंत मुंबई में हो गया। दिल्ली-मुंबई में सौ से अधिक लोगों के पास मैं गया और जिसने भी सुना सबको रोमांच था कि इतना अच्छा कार्यक्रम बन सकता है लेकिन वह मुझसे ही पूछता कि इसे देखेगा कौन? अब भला मैं इसका क्या जवाब देता। कुछेक लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि इसके चक्कर में पड़े तो भूखों रह जाओगे। और फिर हतोत्साहित करने का एक सिलसिला चला। उन्हीं दिनों मुझे लगा शायद फारुख शेख इसमें इंटेरेस्टेड हों। उनका नंबर ढूंढकर मैंने उनको फोन मिलाया। उस समय वे बाहर बताए गए । एक संक्षिप्त मुलाक़ात दिल्ली में थी और इसके हवाले से वे क्या ही बात करते , क्योंकि तब तक मैं समझ गया था कि सिनेमा में जिसे मिलना या बात करना नहीं होता वह अक्सर बाहर गया होता है। लेकिन दूसरे दिन ही अप्रत्याशित रूप से फारुख साहब का फोन आया और उसी दिन उन्होंने अपने घर बुला लिया। हमारी मुलाक़ात अच्छी रही। उन्होंने कहा कि मैं इसको करने को इच्छुक हूँ। फिर हमारी इसको लेकर अनेक मुलाकातें हुईं। लेकिन फारुख साहब अचानक चल बसे।

कुछ दिनों बाद मेरी मुलाक़ात मनोज मौर्या से हुई। मनोज गाजीपुर के रहनेवाले हैं और बनारस में रहकर बच्चे से जवान हुये। यहीं से सारी यात्रा शुरू हुई। मनोज भी सिनेमा के सौ वर्ष पर अच्छा-खासा काम कर चुके थे लेकिन सीरीज नहीं बना पाये। हमलोग आपस में बात करने लगे लेकिन सीरीज नहीं बन सकी। उसके बाद मैं बनारस आया और पत्रिका शुरू की। पाँच साल काम करने के बाद मुझे लगा सिनेमा के सफरनामे पर कम से कम एक सीरीज वेबसाइट पर प्रकाशित करनी चाहिए । इसलिए यह शुरू हो रही है और कोशिश रहेगी कि हर सप्ताह शनिवार को प्रकाशित होती रहे। शायद यह आपको रुचिकर लगे।

इस शृंखला के बारे में आपको बता दूँ कि यह तीन हिस्सों में विभाजित है। पहले हिस्से में हम सिनेमा के इतिहास और उसके विकास तथा उसमें आने वाली तब्दीलियों के बारे में बात करेंगे। दूसरे हिस्से में सिनेमा से जुड़ी शख्सियात पर सामग्री होगी। इसके अतिरिक्त एक अनौपचारिक हिस्सा पाठकों की भागीदारी का होगा। इसमें उन विषयों पर बात होगी जो किन्हीं कारण से अनदेखी-अनसुनी रह गई थीं लेकिन जिनके बगैर सिनेमा का इतिहास अधूरा ही रह जाता है। तो फिर आइये शुरू करते हैं।रामजी यादव

 

डोलती छवियों का जादू

हम जिस इतिहास या अतीत की बात करने जा रहे हैं यह अतीत महज़ सिनेमा का नहीं है। यह अतीत भारतीय समाज का है और इसमें उसकी संस्कृति के तमाम पहलू शामिल हैं। यह अतीत केवल सिनेमा बनानेवालों से नहीं बनता बल्कि यह उस जनता से भी बनता है जिसके लिए सिनेमा बनाया जाता है । बल्कि यह एक दिलचस्प पहलू है कि सिनेमा बनानेवालों के मानस पर किस कदर देखनेवालों की इच्छाओं और पसंद-नापसंद का असर रहा है और सिनेमा का सारा सरमाया इसी पर निर्भर रहता आया है । इसलिए दरअसल यह रचनेवालों और देखनेवालों के रिश्तों और उनके मनोविज्ञान का अतीत है ।

सिनेमा हमेशा एक घटना की तरह जनमानस में शामिल होता रहा है और वह समाज और देश में होनेवाली घटनाओं को भी अपने भीतर समेट लेता है। एक सौ वर्ष के सिनेमा के अतीत के साथ ही भारत और दुनिया के अतीत की अनगिनत घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। विश्वयुद्ध, क्रांतियाँ, भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, स्वतन्त्रता, विभाजन, राष्ट्रीयकरण और हरितक्रांति से लेकर भूमंडलीकरण और सरमायेदारी के नए दौर के बीच की असंख्य छोटी-बड़ी घटनाएँ। और स्वयं सिनेमा ने समाज पर जो असर डाला है वह अनेक घटनाओं के होने की प्रेरणा भी बना। सिनेमा ने समाज की सोच को बदला है और अनेक जड़ताओं को तोड़कर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है।

भारतीय सिनेमा की शताब्दी से अधिक समय को, 1913 से 2021 के बीच के समय को हम बेशक कथचित्रों के व्यवस्थित शुरुआत के कारण रेखांकित कर रहे हैं लेकिन हम सभी जानते हैं कि 1896 में अपने जन्म के तुरंत बाद ही यह एक कुतूहल और जिज्ञासा का विषय हो गया था। डोलती हुई तसवीरों के जादू ने देखनेवालों को अपने आकर्षण में जकड़ लिया और तत्कालीन समाज की तमामतर मान्यताओं और मर्यादाओं से बंधे समाज ने इस नई विधा के लिए अपने मन में जगह बनानी शुरू कर दी।

सिनेमा हमेशा एक घटना की तरह जनमानस में शामिल होता रहा है और वह समाज और देश में होनेवाली घटनाओं को भी अपने भीतर समेट लेता है। एक सौ वर्ष के सिनेमा के अतीत के साथ ही भारत और दुनिया के अतीत की अनगिनत घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। विश्वयुद्ध, क्रांतियाँ, भारतीय राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन, स्वतन्त्रता, विभाजन, राष्ट्रीयकरण और हरितक्रांति से लेकर भूमंडलीकरण और सरमायेदारी के नए दौर के बीच की असंख्य छोटी-बड़ी घटनाएँ। और स्वयं सिनेमा ने समाज पर जो असर डाला है वह अनेक घटनाओं के होने की प्रेरणा भी बना। सिनेमा ने समाज की सोच को बदला है और अनेक जड़ताओं को तोड़कर उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा भी दी है।

सिनेमा के इतिहास में 7 जुलाई 1896 का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। वैज्ञानिकों ने जब पहली बार कैमरे का आविष्कार किया होगा तब शायद उन्हें पता नहीं रहा होगा कि आनेवाले दिनों में यह औज़ार क्या करने जा रहा है। हालांकि दुनिया हमेशा आगे बढ़ती है और कल्पनाएं एक नए आकाश को देखती हैं लेकिन स्थिर कैमरे के आविष्कारक ने इस जादुई माध्यम से चलती-फिरती तस्वीरों को हूबहू पकड़ लेने की बात पर शायद ही सोचा हो। लेकिन वह दौर दुनिया को अपने काबू में कर लेने का दौर था। राजनीतिक और आर्थिक ताकत को चारों दिशाओं में फैलाने और सबकुछ अपनी मुट्ठी में कर लेने का दौर था। विज्ञान और तकनीक ने इस मुहिम को सफल बनाने में अपना सर्वोत्तम योगदान किया । इसी कड़ी में एक और आयाम जोड़ते हुये उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में तकनीक ने एक ऐसे जादुई हथियार को बनाने में कामयाबी पा ली जो डोलती तस्वीरों को साक्षात पर्दे पर दिखा सकता था। वास्तव में यह एक ऐसे युग की शुरुआत थी जिसने हमारी जिंदगी के समान और समानान्तर एक नयी जिंदगी को साकार कर दिया।

1907 में निर्मित प्रथम कैमरा

सात जुलाई 1896 को मुंबई के वाट्सन होटल में फ्रांस के रहने वाले लुमिएर भाइयों ने पहली बार फिल्म दिखा । बाकायदा एक बड़ा आयोजन हुआ और उसका खूब प्रचार हुआ कि ये वही लुमिएर बंधु हैं जिन्होंने छह महीने पहले पेरिस के सभा भवन में फिल्म दिखाई थी। फिल्म! यह आश्चर्य और कुतूहल का विषय।

आप सोच सकते हैं कि 125 साल पहले उस समय मुंबई में क्या माहौल रहा होगा? मुंबई में विक्टोरिया टर्मिनस से ठाणे तक रेल चल चुकी थी लेकिन चर्चगेट रेलवे स्टेशन तब नहीं था। आज तो उत्तर में सुदूर विरार तक चारों ओर जन अरण्य दिखाई देता है लेकिन उन दिनों महालक्ष्मी स्टेशन के आगे वाले इलाके में न आबादी थी और न लोग जाना पसंद करते थे। आज भी जुहू-अंधेरी-गोरेगांव के पुराने रहवासी मस्जिद से विक्टोरिया टर्मिनस और महालक्ष्मी से चर्चगेट और उसके आस-पास समुद्री तट से लगे हुये इलाके को टाउन बोलते हैं। बोरीवली या विरार तो उन दिनों जंगल ही था। जब दादा साहब फाल्के की राजा रवि वर्मा के साथ साझेदारी टूट गई और उन्हें आर्थिक रूप से भारी चपत लग गई तो वे टाउन से दादर रहने आए। उनके जाने को लेकर पड़ोसियों ने ताना मारा – कहाँ जंगल में जा रहे हो। दादर में सेंट्रल लाइन के समानान्तर परेल की ओर जानेवाली सड़क का नाम दादा साहब फाल्के मार्ग है।

जब यह जादू आया था

एक छोटे भूगोल में भारत की आर्थिक राजधानी के नियंता और उनके कारकुन अँग्रेजी राज में एक सम्मानजनक जीवन जीते थे। और जब सिनेमा के बारे में उन्होंने सुना तो विस्मय से उनकी आँखें फैल गईं। लोग उसे देखने के लिए टूट पड़े। इसका सबूत यह है कि उस समय एक टिकट का दाम एक रुपया रखा गया था जो आज के छः सौ रुपये के बराबर था। एक दिन में चार शो दिखाये जाने थे जिनका समय 6, 7 ,9 और 10 बजे शाम का था।

भारत की राजनीतिक ताकत राजधानी कलकत्ता में इससे भी चालीस साल पहले कंपनी से ब्रिटिश सत्ता बन चुके शासन के वायसराय के हाथ में केन्द्रित थी जिसके नीचे दर्जनों श्रेणियाँ थीं जो जमकर भारत को लूट रही थीं। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा आधार बन चुका था जिसके कमजोर होने का मतलब अँग्रेजी राज का खात्मा था। इसलिए उसपर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन सभी ताकतों की सांस्कृतिक रुचियों और इच्छाओं का परिसीमन करना था जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए सहायक थीं। 1854 से वहाँ अँग्रेजी नाटकों के मंचन की परंपरा शुरू हुई तो उस समय के पढे-लिखे भारतीयों ने अपना रंगमंच बनाने का सोचा।

तो आखिरश एक इंतज़ार के बाद सिनेमा दिखाये जाने का दिन आ ही गया। उस जमाने के हिसाब से काफी महंगा टिकट होने के बावजूद वाट्सन होटल का गलियारा लोगों से खचाखच भरा हुआ था। वे एक दूसरे की ओर सवालिया निगाहों से देख रहे थे कि आगे क्या होनेवाला है ? लेकिन जवाब के लिए तो सभी को होटल के मेन हॉल तक जाना ज़रूरी था जहां अभी तो नीम उजाला था लेकिन जल्दी ही सारी बत्तियाँ बुझाई जाने वाली थीं।

आखिर सभी लोग मेन हॉल में जमा हो गए और थोड़ी ही देर में चारों ओर घुप्प अंधेरा छा गया। अचानक दीवार के सहारे टंगे सफ़ेद पर्दे पर रोशनी झलकी और सांस रोके लोगों ने देखा एक रेलगाड़ी चली आ रही है । अरे ! बाप रे !! यह तो जादू है। अंधेरे में बैठे सभी लोग एकटक देखते रहे और आश्चर्य से भरते रहे।

डोलती छवि के जनक लुमिएर बंधु

उस दिन लुमिएर बंधुओं ने तीन फिल्में दिखाई –एराइवल ऑफ ए ट्रेन , द सी बाथ और लेडीज एंड सोल्जर्स ऑन ह्वील्स। जैसा कि नाम से ही लगता है कि पहली फिल्म ट्रेन के आने पर थी यानी कैमरा जितनी दूर देख सकता था उतनी दूर से एक आती हुई ट्रेन। दूसरी फिल्म समुद्र में नहाते हुये लोगों पर थी और तीसरी में एक ट्रेन के डिब्बों में बैठी औरतें और सैनिक थे। सबसे बड़ी बात यही थी कि पहले की तसवीरों की तरह ये स्थिर नहीं थीं बल्कि बाकायदा डोलती हुई तस्वीरें थीं और यह बात किसी जादू से कम नहीं थी।

देखने वालों की जोशीली प्रतिक्रियाओं ने दिखानेवालों को इतने उत्साह से भर दिया कि जल्दी ही इसे नावेल्टी थियेटर में फिर से दिखाया गया। और इस बार देखनेवालों की भीड़ अधिक थी। थियेटर के अंधेरे में एक तरफ घड़घड़ाता प्रोजेक्टर था और दूसरी ओर पर्दा। बीच में दृश्य-दर-दृश्य रोमांचित होते और करतल ध्वनि करते दर्शक थे।

औरतें कहाँ बैठें ?

बेशक सिनेमा एक आधुनिक विधा था और विज्ञान और टेक्नॉलॉजी का महान प्रतिफल था लेकिन भारतीय समाज में उसकी स्वीकार्यता के रास्ते में समाज और पैसे के चलते कुछ रोड़े भी शुरुआती दिनों में ही दिख गए थे । मसलन महिलाएं और चवन्नी छाप दर्शक। अभिजात वर्गीय या कहिए भद्र समाज में सिर्फ पुरुष ही नहीं महिलाओं में भी सिनेमा को लेकर गहरा उत्साह था और पहले शो के दिन ही महिलाओं की अच्छी-ख़ासी उपस्थिति थी लेकिन उन्हें बिठाया कहाँ जाय यह चुनौती खड़ी हो गई। बेशक प्रायः लोगों के रहन-सहन का एक ही स्तर था लेकिन महिलायें एक ही घर की तो थीं नहीं। सिनेमा और वह भी पर-पुरुष के साथ बैठकर देखना! बहुत नाइंसाफी थी। इसलिए इस विषय पर तुरंत ही कुछ सोचना था, और इसका उपाय खोज लिया गया—पुरुषों के लिए एक अलग कतार बनाई गई और पर्दे की ओट देकर महिलाओं के लिए अलग कतार।

यही चवन्नी छाप दर्शक वास्तव में सिनेमा का भाग्यविधाता था और यह कहना बड़ी बात न होगी कि सिनेमा के इतिहास में यही एक बुनियादी घटक है। चवन्नी छाप दर्शक मतलब आगे वाली सीटों की दस कतारों पर बैठे लोग, जिनके लिए लगाया गया पंखा हवा कम फेंकता था लेकिन खड़खड़ाता कई गुना अधिक था। आज बेशक करोड़ों की लागत से बननेवाली फिल्मों से लागत और मुनाफा रिलीज के पहले ही निर्माता की तिजोरी में आ जाता हो लेकिन इतिहास में केवल वे ही फिल्में दर्ज होती रही हैं जो या तो धुआँधार चलीं या जिनके शो में कुर्सियाँ बिलकुल खाली थीं और निर्माताओं की ज़िंदगी पर चारों ओर से मँडराते खतरे।

और अब शुरू हुई असली परीक्षा

अब एक मुसीबत से तो छुटकारा मिल गया लेकिन दूसरी तुरंत ही सामने थी। दर्शक ही कम हो गए।  अब क्या हो ? दरअसल यह आज से एक सौ पचीस साल पुरानी बात है। बॉक्स ऑफिस  जैसी चीज की कल्पना नहीं थी और न ही शुक्रवार और सिनेमा का कोई संबंध ही अस्तित्व में आया था। फिल्में तो भारत में बनी ही नहीं थीं। और उस समय जो टिकट का दाम था एक रुपया, उसे देकर देखने वालों की एक सीमा थी। एक तो ऐसे लोग बहुत कम थे और जो थे वे भी एक या हद से हद दो-तीन बार ही रुपया खर्च करके ट्रेन का आना, समुंदर में नहाना और स्त्रियों और सैनिकों की ट्रेन पर सवारी देख सकते थे। इसलिए दिखानेवालों के सामने चुनौती आ गई कि अब सिनेमा किसे दिखाया जाय ? क्योंकि बिना दिखाये तो आगे कुछ करना संभव ही नहीं था।

लेकिन हर समस्या की तरह इसका भी समाधान निकल गया। दिखानेवालों ने देखा कि अति साधारण लोग यानी गोदी या बंदरगाहों में काम करने वाले श्रमिक, छोटे-मोटे दुकानदार और छोटे-मोटे सरकारी कर्मचारी भी वाट्सन होटल और नावेल्टी थियेटर की गतिविधियों के बारे में न सिर्फ जानते थे बल्कि वहाँ जाने की भी उत्कंठा रखते थे लेकिन सबसे बड़ी अड़ंगा थी जेब। महीने भर की जी-तोड़ मशक्कत के बाद तो मुश्किल से दो-चार रुपये हाथ आते थे और उसमें से भी एक रुपय्ये का सिनेमा देखना सिर्फ अय्याशी नहीं बल्कि घर फूँक कर तमाशा देखना था। ज़ाहिर है ऐसा एक आदमी के साथ नहीं था। ऐसे लोगों से पूरा देश ही भरा पड़ा था।

दिखानेवाले भी चक्कर में आ गए कि कितनी बड़ी आबादी है जिसने सिनेमा का नाम तो सुन लिया लेकिन देखने का सौभाग्य नहीं पा सकी है। आखिर मसौदा बनने लगा और जल्दी ही फैसला ले लिया गया कि चार आने में सिनेमा दिखाया जाय। और इस तरह चवन्नी छाप दर्शकों का जन्म हुआ जिनकी संख्या का पारावार न था।

यही चवन्नी छाप दर्शक वास्तव में सिनेमा का भाग्यविधाता था और यह कहना बड़ी बात न होगी कि सिनेमा के इतिहास में यही एक बुनियादी घटक है। चवन्नी छाप दर्शक मतलब आगे वाली सीटों की दस कतारों पर बैठे लोग, जिनके लिए लगाया गया पंखा हवा कम फेंकता था लेकिन  खड़खड़ाता कई गुना अधिक था। आज बेशक करोड़ों की लागत से बननेवाली फिल्मों से लागत और मुनाफा रिलीज के पहले ही निर्माता की तिजोरी में आ जाता हो लेकिन इतिहास में केवल वे ही फिल्में दर्ज होती रही हैं जो या तो धुआँधार चलीं या जिनके शो में कुर्सियाँ बिलकुल खाली थीं और निर्माताओं की ज़िंदगी पर चारों ओर से मँडराते खतरे। बेशक उनके भाग्यविधाता चवन्नीछाप दर्शक ही थे ।

फिर शुरू हुई भारत की ओर यात्रा  

इन बुनियादी चीजों को आरंभ में ही तय करने वाले सिनेमा का सफर शुरू हो चला। लुमिएर बंधुओं के लिए भारत एक विशाल आबादी वाला वरदान साबित होने वाला था लेकिन जैसा कि हम जानते हैं कि उस समय आज की तरह के संचार माध्यम नहीं थे और किसी भी बात को साधारण लोगों तक पहुँचने में लंबा समय बीत जाता था। मसलन इन्हीं फिल्मों को तत्कालीन भारत की राजधानी कलकत्ता पहुँचने में ही पाँच महीने से अधिक समय लग गया ।

आप कल्पना कीजिये कि सवा सौ साल पहले वहाँ का माहौल कैसा रहा होगा? भारत की राजनीतिक ताकत राजधानी कलकत्ता में इससे भी चालीस साल पहले कंपनी से ब्रिटिश सत्ता बन चुके शासन के वायसराय के हाथ में केन्द्रित थी जिसके नीचे दर्जनों श्रेणियाँ थीं जो जमकर भारत को लूट रही थीं। भारत ब्रिटिश साम्राज्य का सबसे बड़ा आधार बन चुका था जिसके कमजोर होने का मतलब अँग्रेजी राज का खात्मा था। इसलिए उसपर मजबूत पकड़ बनाए रखने के लिए उन सभी ताकतों की सांस्कृतिक रुचियों और इच्छाओं का परिसीमन करना था जो ब्रिटिश हुकूमत के लिए सहायक थीं। 1854 से वहाँ अँग्रेजी नाटकों के मंचन की परंपरा शुरू हुई तो उस समय के पढे-लिखे भारतीयों ने अपना रंगमंच बनाने का सोचा। लेकिन साधारण जनता का मनोरंजन मंदिरों में होनेवाले नाच-गाने से होता था या फिर रामलीला-रासलीला अथवा दूसरे लोकनाटकों से  इसलिए जब जनवरी 1897 में वहाँ सिनेमा पहुंचा तो उसका भव्य स्वागत हुआ।

सावेदादा भी एक दीवाने थे

लेकिन मुंबई में कुछ लोग ऐसे थे जिनमें सिनेमा ने एक बेचैनी भर दी। इन्हीं में से एक थे हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर उर्फ सावेदादा। यूं तो सावेदादा फोटोग्राफी का सामान बेचते थे और उन्हें खुद भी फोटो खींचने में बहुत आनंद आता था लेकिन जबसे उन्होंने लुमिएर बंधुओं का सिनेमा देखा तब से उनमें सिर्फ़ एक ही ललक, एक ही नशा परवान चढ़ता रहा कि वे खुद का सिनेमा कैसे बनाएं? दिन-रात यही बात उनके दिमाग में घूमती रहती लेकिन उनके पास कैमरा तो था ही नहीं ।

हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर उर्फ सावेदादा जिन्होंने दादा साहब फाल्के से 14 वर्ष पहले ही फिल्म बना ली थी

आखिर उन्होंने उस समय लंदन से एक कैमरा मंगवाया जिसकी कीमत 21 गिन्नी थी। और बतर्ज लुमिएर बंधु उन्होंने भी फिल्म बना ही डाली जो कि सही मायने में पहली भारतीय फिल्म थी जिसका नाम था – कुश्ती। उस समय के दो पहलवानों – कृष्ण वहाबी और पुंडलीक दादा के मल्लयुद्ध का चित्रण किया गया था। जाहिर है लोगों ने इसे भी पसंद किया जिससे उत्साहित होकर सावेदादा ने दूसरी फिल्म भी बना डाली – बंदर का तमाशा। उन्हीं दिनों तब के प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफेसर परांजपे मुंबई आए जिनका भव्य स्वागत किया गया। सावेदादा ने इस आगमन पर भी फिल्म बनाई और यह फिल्म पहली वास्तविक समाचार फिल्म थी । सही मायने में दादा भाटवाडेकर पहले भारतीय फ़िल्मकार थे।

सिनेमा बनाना पापड़ बेलने की तरह श्रमसाध्य था

लुमियर बंधुओं की सफलता ने अमेरिका और लंदन में फिल्म बनानेवालों को आकृष्ट किया और बहुत जल्दी ही उनकी फिल्मों की खेप भारत में आने लगी। यहाँ तक कि ज़्यादातर फिल्में और वृत्तचित्र आयातित ही थे जिनके नयेपन ने दर्शकों का ध्यान खींचा लेकिन जल्दी ही यह आकर्षण दम भी तोड़ने लगा। थियेटर खाली होने लगते। फिल्म व्यवसाय सुस्त पड़ गया, जिसमें गर्मजोशी पैदा करने के लिए दिखानेवालों को मंच पर नर्तकियों, करतबबाजों और पहलवानों को लाना पड़ा जो तरह-तरह से दर्शकों का मनोरंजन करते। लेकिन यह सिनेमा का विकल्प नहीं था।

उस शुरुआती दौर में केवल सिनेमा ही जादू नहीं था बल्कि आज देखने पर लगता है कि वह पूरा माहौल ही जादुई था जिसमें इस विधा को साधने की तरह-तरह की हिकमतें थीं। आप कल्पना कीजिये कि प्रोजेक्टर की घर्र-घर्र के बीच चलती तसवीरों के बारे में बताने के लिए दीवार से सटा एक कमेंटेटर खड़ा होता और वह लोगों को अपने वर्णन से बात का मर्म समझाता। संगीत के लिए पियानो और हारमोनियम बजाने वाले पर्दे की ओट में बजाते रहते और कभी-कभी तो ऐसा कर्कश और बेसिर-पैर का संगीत गूंजने लगता जिसका फिल्म से कोई ताल्लुक ही न होता लेकिन इसके अलावा कोई और रास्ता भी नहीं था। एक नई विधा अपना मार्ग तलाश रही थी। इस विधा में एक आकर्षण था और यह हूबहू रोज़मर्रा की गतिविधियों को पर्दे पर रख देती थी। भले ही सिनेमा का वह दौर एक जटिल दौर रहा हो लेकिन उसमें परेशानियों से विजय पाने की अद्भुत शक्ति थी और वह बहुत तेजी से आगे बढ़ गया। उसकी यात्रा की सफलता तो असंदिग्ध थी लेकिन अपना वास्तविक व्यक्तिव पाने में उसे एक कठिन यात्रा करनी थी। बेशक यह सिनेमा के इतिहास की महान यात्रा थी जिसे एक इतिहास के रूप में हम देख रहे हैं।

सिनेमा का सफरनामा इस विधा से जुड़े उन लोगों के बेमिसाल संघर्ष से आगे बढ़ा जिन्होंने अपनी प्रतिभा, परिश्रम, धैर्य और सूझबूझ से भारतीय सिनेमा का एक चेहरा गढ़ा। उन स्वनामधन्य व्यक्तियों मसलन निर्माता, निर्देशक, लेखक, अभिनेता, अभिनेत्री, गीतकार, संगीतकार, पार्श्वगायक, ड्रेस डिजाइनर, कैमरामन, संपादक और वितरक आदि विभिन्न विधाओं से जुड़े लोगों का जीवन संघर्ष तथा हिन्दी सिनेमा को उनकी देन आज के दौर में इतिहास के तथ्य हैं। और सही बात कहूँ तो यह इतिहास आज धूल फांक रहा है। हजारों शुरुआती फिल्में नष्ट हो चुकी हैं। हजारों लोगों के बारे में संतोषजनक रूप से कोई सूचना ही दर्ज नहीं की गई। सैकड़ों लोग पर्दे के पीछे काम करते हुये गरीबी और गुमनामी में मर गए। अगर आज सिनेमा के वर्तमान को देखा जाय तो यही कहा जा सकता है कि देशी-विदेशी पूंजी पर चौकड़ी मारता यह संसार निहायत कमजर्फ, सामंती और प्रतिभाहीन लोगों के हाथ में छटपटा रहा है। उन्हें सिनेमा के अतीत से कोई लेना-देना ही नहीं है बल्कि वे तमाम तरह की साँठ-गाँठ से इस पर अपना और अपने वंशजों का कब्जा बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन सिनेमा भारतीय जनता से जुड़ी हुई एक ताकतवर विधा है। जो भी नया और सचेत व्यक्ति इसे देखता है उसके मन में स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि इस सवा सौ साल की यात्रा में वह और उसका समाज कहाँ है? वास्तव में यह सवाल ही सिनेमा को जीवन देगा और उसका विकास अवरुद्ध नहीं होगा। सिनेमा का अधिक जीवंत इतिहास जानने के लिए हम सिनेमा से जुड़े व्यक्तियों, उनके परिवारी जनों, मित्रों, सहकर्मियों, सिनेमा विशेषज्ञों और वरिष्ठ तथा विशिष्ट सिनेमा-रसिकों के अलावा जन सामान्य की बातचीत को भी इस लेख शृंखला में शामिल करेंगे। हम उन लोगों से जुड़े तथ्य और इतिहास को पेश करने की कोशिश करेंगे जिन्होंने सिनेमा को गढ़ा। इस संदर्भ  में भारतीय सिनेमा के दो ऐसे पूर्वजों के बारे में जान लेना बहुत जरूरी है, जिन्होंने अपने प्रयासों से इसे एक अखिल भारतीय विस्तार दिया। वे थे श्री हीरालाल सेन और श्री जे एफ मदन

हीरालाल सेन

बंबई से कलकत्ता के बीच यात्रा के दौरान सिनेमा ने ऐसे लोगों को सोचने का एक सूत्र दे दिया जो करते तो व्यापार या व्यवसाय थे लेकिन उनको अपने ही काम में सिमटे रहने से तसल्ली नहीं थी। वे कुछ ऐसा कर गुजरने की ख्वाहिशात से भरे हुये थे जिससे कुछ फायदा तो हो ही देश और समाज में उनका नाम भी हो। और जिस तरह के हालात थे उसमें ऐसे लोगों के सामने सिनेमा एक बड़ा माध्यम था। सिनेमा लोगों के आकर्षण का केंद्र था। ज़ाहिर है ऐसे लोगों की दूरदृष्टि में सिनेमा आनेवाले समय का सबसे बड़ा माध्यम होने जा रहा था जो बच्चे-बूढ़े जवान ,शहरी और देहाती सभी लोगों को समान रूप से अपनी ओर खींच सकने की कूवत रखता था।

बंबई के हरिश्चंद्र सखाराम भाटवाडेकर उर्फ सावेदादा ने तो अपनी शुरुआत करके पहले भारतीय सिनेमाकार होने का गौरव हासिल कर ही लिया था लेकिन कलकत्ता के श्री हीरालाल सेन के मन में कम उथल-पुथल नहीं मची थी। 7 जुलाई 1896 के छः महीने बाद कलकत्ता में सिनेमा के प्रदर्शन के बाद तो वे बहुत बेचैन हो उठे। इस बेचैनी के पीछे केवल लुमिएर बंधुओं की ही फिल्में नहीं थीं बल्कि पहले प्रदर्शन के तत्काल बाद यूरोप और अमेरिका की कई फिल्म कंपनियों ने बंबई और कलकत्ता को एक बड़े बाज़ार के रूप में देखा और अपने यहाँ के प्राकृतिक और औद्योगिक दृश्यों वाली न्यूज रीलों तथा वृत्तचित्रों से उसे पाट दिया। लेकिन यह बुखार लंबा नहीं चला। भाटवाडेकर द्वारा बनाई गई भारतीय थीम और न्यूज रीलों ने अलबत्ता अपना आकर्षण बनाए रखा। उन दिनों हीरालाल सेन अपने भाई मोतीलाल सेन के साथ फोटोग्राफी का सामान बेचते थे। हीरालाल जी को लगा कि इस विधा में वे कुछ अच्छा कर सकते हैं, लेकिन कहाँ से शुरू करें यह सोचते-सोचते पूरा एक साल गुजर गया। 1898 में उन्होंने एक कंपनी बनाई– रॉयल बाइस्कोप कंपनी। इस कंपनी के माध्यम से सेन बंधुओं ने चलचित्रों के अधिकार खरीदे और उनका प्रदर्शन शुरू किया। इस काम से उनके पास पैसा भी अच्छा-खासा आने लगा। दो साल में रॉयल बाइस्कोप कंपनी ने अपनी एक ऐसी जगह बना ली थी कि दुनिया का कोई फिल्म निर्माता या वितरक उनके बगैर भारत की राजधानी में अपनी फिल्म नहीं दिखा सकता था, लेकिन हीरालाल की बेचैनी कुछ और थी!

रॉयल बाइस्कोप कंपनी के संस्थापक हीरालाल सेन

वे दरअसल स्वयं फिल्म बनाना चाहते थे। फिल्म बनाने के लिए मूवी कैमरा चाहिए था। सन 1900 तक वे इस बारे में प्रयास करते रहे। उसी वर्ष यानी सन 1900 में फ्रांस की पाथे कंपनी के कुछ कैमरामैन कलकत्ता आए। हीरालाल सेन ने उनसे संपर्क किया और कैमरे के बारे में ढेरों जानकारी हासिल की। फिर उन्होंने कैमरा खरीदने का प्रयत्न किया लेकिन उन्हें इसमें सफलता न मिली। हालांकि यह एक निराश करने वाली बात थी लेकिन हीरालाल सेन किसी और मिट्टी के बने थे। हार मानने की जगह उन्होंने अब स्वयं कैमरा बनाने का निश्चय किया और कई महीने की जद्दोजहद के बाद उन्होंने एक कैमरा बना लिया। आप उनकी खुशी का अंदाज़ा लगा सकते हैं कि जब वे आस-पास की गतिविधियों के शॉट लेने लगे तो थमने का नाम न लिया। लोग तो जिज्ञासा से भरे उनके पास जमा होते ही थे लेकिन हीरालालजी के उत्साह का भी पारावार न था। कलकत्ता भर में आग की तरह खबर फैल गई लेकिन हीरालाल सेन जल्दी ही उकता गए क्योंकि इन छोटी और संदर्भहीन तस्वीरों को उतारना और लोगों की वाहवाही लूटना उनका लक्ष्य नहीं था। वे तो फिल्म बनाना चाहते थे।

क्या किया जाय? आखिर सेन को एक रास्ता सूझा। उन्होंने उस समय के प्रसिद्ध बांग्ला नाटककार और रंगकर्मी अमरदत्त के नाटकों का फिल्मांकन शुरू किया और 1901 से सन 1905 तक उनके बारह नाटकों का फिल्मांकन कर डाला। क्लासिक थियेटर में मंचित इन नाटकों में अलीबाबा, बुद्ध और सीताराम आदि नाटकों का फिल्मांकन बहुत चर्चित हुआ था। सेन एक प्रयोगशील कलाकार थे। वे अनेक तरह से और विभिन्न कोणों से छायांकन करते थे। अपनी फिल्मों में वे क्लोज़-अप और शीर्षक आदि का उपयोग करने वाले ऐसे पहले भारतीय थे जिसने फिल्मों के “पुरायुग” में तकनीक और कला में सामंजस्य की शुरुआत की।

हीरालाल सेन डेढ़ दशक तक सक्रिय थे और इस दौरान अमरदत्त के नाटकों के अलावा अनेक संवादचित्र तो उन्होंने बनाया ही 1903 में कलकत्ता और दिल्ली के कोरनेशन दरबार पर भी फिल्म बनाया। सन 1905 में कलकत्ता के टाउनहॉल में बंगाल विभाजन के मसले में हुई सभा का फिल्मांकन किया और उसी वर्ष उन्होंने कॉंग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सर सुरेन्द्रनाथ बनर्जी की शोभायात्रा को भी फिल्माया। सन 1911 में सेन ने सम्राट जॉर्ज पंचम और साम्राज्ञी मेरी के आगमन का फिल्मांकन किया।

हीरालाल सेन को ही भारत के पहले विज्ञापन फिल्मकार होने का श्रेय हासिल है। उन्होंने एडवर्ड एंटीपैलेरियल स्पेसिफ़, जवाकुसुम तेल तथा सार्सोपेरीला आदि पर विज्ञापन फिल्में बनाई। ये विज्ञापन फिल्में कथात्मक होती थीं। अपने कामों से वे अपने समय के सबसे चमकीले सितारे बन गए थे। 5 अप्रेल 1898 अमृत बाज़ार पत्रिका ने उनके कामों की प्रशंसा करते हुये विशेष सामग्री प्रकाशित की थी। प्रसिद्ध बांग्ला पत्रिका बंगवासी ने भी 21 अगस्त 1903 को रॉयल बाइस्कोप कंपनी के कार्यों की सराहना में लेख छापा था।

दुर्भाग्य यह है कि आज हीरालाल सेन की बनाई कोई भी फिल्म उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि उनके स्टूडियो में आग लग गई थी, जिससे पूरा स्टूडियो जलकर ख़ाक हो गया था।

हीरालाल सेन ने भारतीय सिनेमा के इतिहास में बहुत महत्वपूर्ण और मूल्यवान योगदान किया है। जब यहाँ कुछ भी नहीं था तब भी उन्होंने एक ऐसे माध्यम का विकास किया जिसमें एक से एक शाहकार आनेवाले थे। निश्चय ही वे भारतीय सिनेमा के महान पूर्वज हैं।

  जे एफ मदन

सावेदादा के कामों ने भारत के पश्चिम और हीरालाल सेन के कामों ने पूरब के अनेक लोगों को फिल्म की ओर मुड़ने की प्रेरणा दे दी। अनेक दिमाग बेचैन हो उठे। जिन दिनों सेन कलकत्ता में अपनी उपलब्धियों से जादुई समा बांधे हुये थे उन दिनों और भी अनेक लोग सक्रिय होने लगे थे। इनमें बंबई के थानावाला और प्रो. एंडरसन और कलकत्ता के प्रो.स्टीवेंसन और जमशेद जी मदन उर्फ जे एफ मदन प्रमुख थे। इन लोगों ने 1897 से 1912 के बीच कई लघु फिल्में बनाई। मुंबई में  प्रो. एंडरसन ने सन 1898 में ए ट्रेन एरायविंग एट बॉम्बे स्टेशन और पूना रेसेस नामक दो चित्र बनाए तो कलकत्ता के प्रो. स्टीवेंसन ने भी उन्हीं दिनों अ डांसिंग सीन फ्राम द फ्लावर ऑफ पर्सिया और अ पेनोरमा ऑफ इंडियन सीन एंड प्रोसेशन नामक लघु फिल्में बनाकर प्रदर्शित किया और पर्याप्त ख्याति बटोरी। इसी बीच थानावाला ने भी स्प्लेंडिड न्यू व्यूज़ ऑफ बॉम्बे” और ताबूत प्रोसेशन को फिल्माया।

ध्यान देने की बात यह है कि उपरोक्त तीनों लोगों ने छोटी-छोटी घटनाओं को कैमरे में उतारा और उसे प्रदर्शित किया क्योंकि उन दिनों इस बात की कल्पना ही नहीं की जा सकती थी कि फिल्मों के अनेक दृश्य हों, उनका सम्पादन आदि हो। बाकी बातों का तो खैर कहना ही क्या था, लेकिन एक बात ऐसी थी जो सिनेमा का रास्ता साफ कर रही थी। वह थी फिल्मों का निरंतर और व्यापक प्रदर्शन। फिल्में तो गिनी-चुनी बन रही थीं लेकिन उनको दिखाने वाली कंपनियों की बाढ़ आ गई थी। टिकट की कम दरों ने सिनेमा देखने वालों का दायरा बहुत बढ़ा दिया था। इसी चीज ने हीरालाल सेन के कामों को विस्तार दिया था और इसी ने बाकी लोगों के सपनों को भी पंख लगाए। लेकिन इन सभी में जे एफ मदन ने इतनी सूझबूझ और मेहनत से अपने काम को आगे बढ़ाया कि बाकी लोग बहुत पीछे छूट गए।

मदन की पारखी नज़रों ने यह स्पष्ट देख लिया था कि इस विधा का भविष्य उज्ज्वल है और यदि इसे ढंग से आगे बढ़ाया जाय पैसों की झमाझम बारिश होने लगेगी। अभी तक जो लोग फिल्में दिखाते थे वे आज यहाँ कल वहाँ यानी जगह-जगह घूमकर फिल्में दिखाते थे लेकिन जे एफ मदन और अब्दुल अली युसुफ अली ने तम्बू गाड़कर सिनेमा दिखाना शुरू किया। एक हफ्ते वे किसी एक जगह तम्बू गाड़ते तो दूसरे हफ्ते किसी और जगह। जिन जगहों पर तम्बू गड़ने वाला होता वहाँ सुनियोजित ढंग से प्रचार किया जाता और इसका असर यह होता कि प्रदर्शन के दिन से लेकर विदाई के दिन तक चारों शो तंबूफुल रहता । पैसे इतने ज्यादा हो जाते कि बैलगाड़ियों पर लादकर प्रदर्शकों के घर पहुंचाया जाता।

जे एफ मदन दूरदर्शी व्यक्ति थे । उस युग में वे सबसे लंबे समय तक निर्माण और प्रदर्शन के क्षेत्र में डटे रहे और लगभग एकछत्र राज किया तो इसके पीछे उनकी संतुलित समझ और प्रबंधन का कौशल ही था। उन्होंने 1904-05 में कलकत्ता के विभिन्न स्थानों पर तंबूवाला सिनेमा दिखाना शुरू किया। दो-तीन साल के काम से उन्होंने पर्याप्त धन ही नहीं कमाया बल्कि जनता की रुचियों से भी बहुत अच्छी तरह रूबरू हो गए। यह देखते हुये उन्होंने 1907 में कलकत्ता के न्यू मार्केट के पास एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस का निर्माण किया। यह भारत का पहला स्थायी छविगृह था। बाद में यह सिनेमा गृह चैपलिन के नाम से जाना जाने लगा। मदन साहब ने बाद में विदेशी फिल्मों के वितरण का काम हाथ में ले लिया और सारे भारत के अलावा बर्मा और श्रीलंका तक में फिल्में दिखाने लगे और एक समय तो ऐसा भी आया कि उनकी कंपनी के पास सौ से अधिक सिनेमाहॉलों का स्वामित्व था।

1907 में कलकत्ता में स्थापित प्रथम सिनेमागृह

जे एफ मदन ने केवल वितरण और प्रदर्शन में ही महारत नहीं हासिल की थी बल्कि वे एक रचनात्मक मन-मिजाज के मालिक भी थे। वे अपने रचनात्मक शौक को पूरा करने के लिए कलकत्ता में एक थियेटर कंपनी चलाते थे जहां पारसी नाटक खेले जाते थे। उस समय के प्रसिद्ध कैमरामैन ज्योतिषचन्द्र सरकार के साथ मिलकर मदन साहब ने अपने फारसी नाटकों का फिल्मांकन शुरू किया। उन्होंने उस समय कलकत्ता में होनेवाले कई सम्मेलनों और रोज़मर्रा के अनेक दृश्यों का भी फिल्मांकन किया। मदन ने सिनेमा के विस्तार में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे अपने दौर के ऐसे व्यक्ति थे जिनसे प्रेरणा लेकर अनेक लोग इस क्षेत्र में आगे आए और इसे आगे बढ़ाने में अप्रतिम भूमिका अदा की ।

जब कोई काम चल निकलता है तो सरकारों के कान खड़े होने लगते हैं

एक सौ पचीस साल पहले शुरू हुई एक कहानी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी और उसमें अनेक ऐसे चरित्र आते जा रहे थे जो इस कहानी के वितान को अपनी-अपनी भूमिकाओं से आगे बढ़ा रहे थे। वह समय भारत में अंग्रेज़ी शासन का था और उसके पदाधिकारी देश में होनेवाली हर गतिविधि पर कड़ी नज़र रखे हुये थे। अठारह सौ सत्तावन के स्वतन्त्रता संग्राम ने उनकी नींद हराम कर दी थी और इसके चलते अँग्रेजी सरकार को दो ऐसे निर्णय लेने पड़े जो आगे चलकर अभिव्यक्ति के सभी माध्यमों पर भारी पड़ने वाले थे। इन निर्णयों में एक था एक सौ दस साल पुराने कंपनीराज अर्थात ईस्ट इंडिया कंपनी को समाप्त करके हर हाइनेस ब्रिटिश शासन को स्थापित कर दिया गया। यह भारत में आधुनिक साम्राज्यवाद था। सारा राजनीतिक निर्णय ब्रिटिश शासन को ही लेने का हक था। दूसरे कदम को उठाते हुये ब्रिटिश शासन ने 1858 में एक ऐसा अधिनियम बनाया जिसके तहत भारत में होनेवाली किसी भी सामाजिक या सांस्कृतिक गतिविधि का विवरण और लेखा-जोखा सरकार को देना था और इस बात का सबूत भी कि संस्था की गतिविधियाँ गैर-राजनीतिक हैं। आज के भारत का संस्था पंजीकरण अधिनियन 1858 का ही है। इससे भारत में होनेवाली हर गतिविधि को संदेह की नज़र से देखा जाने लगा था। बेशक अभी सिनेमा इस दायरे से बाहर था लेकिन इसकी स्वीकार्यता ने सरकार के कान तो खड़े करना शुरू कर ही दिया था। हालांकि अभी कुछ चरण शेष था।

  क्रमशः…..

संदर्भ

1 सदी का सिनेमा , वर्तमान साहित्य , संपादक –मृत्युंजय । अगस्त-दिसंबर 2002 (संयुक्तांक)

2 गूंगा नहीं था वह दौर – अश्विनी चौधरी , वर्तमान साहित्य , सदी का सिनेमा , उपरोक्त ।

3 डार्लिंगजी – किश्वर देसाई , हार्पर कॉलिन्स पब्लिशर्स इंडिया , नई दिल्ली , संस्करण –2009 ।

4 आज का भारत – रजनी पामदत्त , ग्रंथशिल्पी इंडिया प्राइवेट लिमिटेड , दिल्ली । संस्करण—2000।

5 सिनेमा मेरी तीसरी आँख – राधू करमाकर , राजकमल प्रकाशन । संस्करण—2010 ।

 6 समस्त चित्र- फिल्म आर्काइव इन इंडिया, विकिपीडिया और गूगल से साभार।

 

रामजी यादव गाँव के लोग के संपादक हैं  और अपर्णा गाँव के लोग की कार्यकारी संपादक हैं ।

2 Comments
  1. सुजीत कुमार सिंह says

    रोचक। अगले किश्त की प्रतीक्षा।?

  2. Gulabchand Yadav says

    रामजी यादव और अपर्णा द्वारा लिखित “सिनेमा का सफरनामा” की पहली कड़ी पढ़ा। बहुत रोचक और सिलसिलेवार तरीके से लिखा गया है यह सिनेमाई सफरनामा जिसे हर सिनेमाप्रेमी को पढ़ना चाहिए ताकि वह इस जादुई संसार के इतिहास (विषेशरूप से भारतीय परिप्रेक्ष्य में) और इस इतिहास के निर्माताओं और उनकी अदम्य कल्पनाशक्ति, जीवटता और लगन से परिचित हो सके।

    मनुष्य आदिकाल से सामाजिक, चिंतनशील और बौद्धिक रूप से विकसित प्राणी रहा है और वह अपनी सुविधा, ज्ञान और मनोरंजन के लिए नित नए-नए आविष्कार करने और नई-नई प्रविधियों को आजमाने की जुगत में लगा रहता है। लोक नाट्य, लोकगीत, साहित्य सृजन, गीत-संगीत के विभिन्न सोपानों से गुजरते हुए उन्नीसवीं सदी में फोटोग्राफी और कैमरे की सहायता से चलती-फिरती और बोलती फिल्मों का सपना साकार हुआ और मनुष्य की हर कल्पना सिनेमा के पर्दे पर आकर सजीव, आभासी और मूर्तमान होने लगी। सिनेमा हमारी जिंदगी से बहुत करीबी रिश्ता बना चुका है। इसे हम-आप चाहकर भी तोड़ नहीं सकते हैं। सिनेमा हमें हँसाता है, रुलाता है, गुदगुदाता है, झूमाता है, बहकाता है, कभी-कभी सिखाता भी है और बाज मौकों पर ठगता और लूटता भी है। किंतु जो भी हो इससे बचना लगभग नामुमकिन है।

    रामजी भाई और अपर्णा जी ने बहुत मेहनत और शिद्दत से सिनेमा के इतिहास को प्रस्तुत करने का सराहनीय उपक्रम किया है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। पहली कड़ी में शामिल कई नई जानकारियां सिनेमा के इतिहास के तमाम ऐसे अनछुए और अंजान पन्नों को खोलकर हमारे सामने रखती हैं जिसे पढ़ने के बाद चकित हुए बिना नहीं रह सकते हैं। इस कड़ी में 7 जुलाई 1896 को मुंबई के वाट्सन होटल में फ्रांस के रहनेवाले लुमिएर भाइयों द्वारा पहली बार चलती-फिरती फिल्मों को प्रदर्शित करने की घटना का बड़ा ही रोचक और विस्तृत वर्णन किया गया है। हरिश्चंद्र सखाराम भाटवडेकर उर्फ सावेदादा के योगदान की जानकारी बेहद रोचक है जिन्होने दादा साहब फालके से 14 वर्ष पहले ही फिल्म (“कुश्ती”) बनाई थी। उतनी ही दिलचस्प कहानी है कोलकाता के हीरालाल सेन और उनके भाई मोतीलाल सेन तथा उनकी “रॉयल बाइस्कोप कंपनी” की और जे एफ मदन, थानावाला, प्रो. एंडरसन तथा प्रो. स्टीवेंसन की। तथापि, इस शोधपरक शृंखला की पहली कड़ी में वर्णित निम्नलिखित जानकारियों/ टिप्पणियों/सम्मतियों ने विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है:

    – “….. यह आश्चर्यचकित करनेवाला सत्य था की सिनेमा अपने आप में एक समुंदर है।“

    – “…यह अतीत महज सिनेमा का नहीं है….दरअसल यह रचनेवालों और देखनेवालों के रिश्तों और उनके मनोविज्ञान का अतीत है।“

    – “… जाहिर है ऐसा एक आदमी के साथ नहीं था। ऐसे लोगों (अत्यंत कम आय वाले) से पूरा देश ही भरा पड़ा था। ….इस तरह चवन्नी छाप दर्शकों का जन्म हुआ जिनकी संख्या का कोई पारावार न था। यही चवन्नी छाप दर्शक वास्तव में सिनेमा का भाग्यविधाता था और …. सिनेमा के इतिहास में यही एक बुनियादी घटक है।“

    – “… एक नई विधा अपना मार्ग तलाश रही थी। इस विधा में एक आकर्षण था और यह हूबहू रोज़मर्रा की गतिविधियों को पर्दे पर रख देती थी।“

    – “…जे एफ़ मदन और अब्दुल अली युसुफ अली ने तम्बू गाड़कर सिनेमा दिखाना शुरू किया।….. जे एफ़ मदन ने 1907 में कोलकाता के न्यू मार्केट के पास एल्फिंस्टन पिक्चर पैलेस का निर्माण किया। यह भारत का पहला स्थायी छविगृह (सिनेमा हाल) था।“

    ये तो कुछ बानगी मात्र हैं। मेरा मानना है कि आलेख का असली रस और पूरा आनंद लेना हो तो इसे दो बार पढ़ना चाहिए। बहरहाल, इस शोधपरक प्रस्तुति के लिए रामजी यादव और अपर्णा बधाई के हकदार हैं। अलग-अलग किंतु सामयिक, प्रतिबद्ध और समाज सापेक्ष विषयों पर उम्दा और पठनीय सामग्री पेश करते हुए “गाँव के लोग” वेबसाइट बहुत तेजी से प्रबुद्ध पाठक वर्ग में अपनी जगह बना रही है इसमें संदेह नहीं है।

    – डॉ गुलाबचन्द यादव

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