आस्ट्रेलिया में नई रोशनी (डायरी 2 जून, 2022)

नवल किशोर कुमार

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खिड़कियां किसी भी मकान का सबसे खूबसूरत गहना होती हैं। हम चाहें तो कोई और उपमा भी दे सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर यह कि खिड़कियों के बगैर मकान की कल्पना नहीं की जा सकती है। पहले मकानों में रोशनदान भी हुआ करते थे। वे भी मकान को घर बनाने में अहम भूमिका निभाते थे। मुझे वह मकान घर नहीं लगता है, जिसमें खिड़कियां और रोशनदान ना हों। हम चाहें तो उसे कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन मकान तो नहीं ही कह सकते।
दरअसल, खिड़कियां और रोशनदान प्रतीक हैं कि घर में बाहरी हवा और रोशनी पर प्रतिबंध नहीं है। यह प्रगतिशीलता की निशानी भी है। लेकिन जरा सोचिए कि यदि कोई देश ऐसा हो, जिसकी खिड़कियों को बंद किया जा रहा है और रोशनदानों में ईंटें लगा दी जा रही हों तो क्या होगा?
मैं भारत की बात कर रहा हूं और अपनी खिड़कियां खोलकर आस्ट्रेलिया में हो रही नई रोशनी को देख रहा हूं और अभिभूत हूं। वहां नई सरकार का गठन हुआ है। लेबर पार्टी ने वहां जीत हासिल की है और एंथनी अल्बनीज प्रधानमंत्री बने हैं। कल वहां की राजधानी कैनबरा में उनके मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने शपथ ली। खास बात यह कि उनके मंत्रिमंडल में कुल 30 सदस्य हैं और इनमें 13 महिलाएं हैं। ऐसा आस्ट्रेलिया में पहली बार हुआ है। हालांकि इसके पहले भी मंत्रिपरिषद में महिलाओं की हिस्सेदारी ठीक-ठाक रहती ही थी। लेकिन इस बार आस्ट्रेलिया के नये प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इतिहास रचा है। उन्होंने आस्ट्रेलिया की विविधता को ध्यान में रखा है और दो खास तबके की महिलाओं को भी अपने मंत्रिपरिषद में जगह दी है। ये दो खास महिलाएं हैं– एद हुसिक और लिडा बर्नी। एद हुसिक आस्ट्रेलिया की पहली मुस्लिम महिला मंत्री हैं। वहीं लिडा बर्नी वहां की मूलनिवासी समुदाय की। भारतीय परिभाषा के हिसाब से आदिवासी।

इंदिरा गांधी, जिन्हें पता नहीं किसने ‘आयरन लेडी’ की संज्ञा दी, एक नजीर हैं। मेरे लिहाज से तो वह एक बेहद खूबसूरत विचारों वाली और बेहद बुलंद हौसलेवाली महिला थीं। यदि वह साहसी नहीं होतीं तो सोचिए क्या होता? पहली बात तो यही कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ नहीं होता और प्रिवी पर्स जैसी योजनाएं बदस्तूर जारी रहतीं। सरकारी खजानों से राजे-महाराजे--नवाबों के उत्तराधिकारियों को पेंशन जाती रहती। बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं होता। इंदिरा गांधी यह जानती थीं कि इस देश को पूंजीपतियों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। उनके ऊपर नकेल कसने के लिए ही इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था।

आस्ट्रेलिया के लेबर पार्टी के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज
जबकि भारत में यह स्थिति दूर की कौड़ी है। यह इसके बावजूद कि हमारे देश की महिलाओं ने खुद को हर लिहाज से साबित किया है। मसलन, इंदिरा गांधी, जिन्हें पता नहीं किसने ‘आयरन लेडी’ की संज्ञा दी, एक नजीर हैं। मेरे लिहाज से तो वह एक बेहद खूबसूरत विचारों वाली और बेहद बुलंद हौसलेवाली महिला थीं। यदि वह साहसी नहीं होतीं तो सोचिए क्या होता? पहली बात तो यही कि भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘समाजवाद’ नहीं होता और प्रिवी पर्स जैसी योजनाएं बदस्तूर जारी रहतीं। सरकारी खजानों से राजे-महाराजे–नवाबों के उत्तराधिकारियों को पेंशन जाती रहती। बैंकों का राष्ट्रीयकरण नहीं होता। इंदिरा गांधी यह जानती थीं कि इस देश को पूंजीपतियों के हाथों में नहीं छोड़ा जा सकता। उनके ऊपर नकेल कसने के लिए ही इंदिरा गांधी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। यह बात तो दावे के साथ कही जा सकती है। यदि हम उस शानदार महिला को देखें और आज के ब्राह्मणवादी विचारों के रंग में रंगे नरेंद्र मोदी को देखें तो हम पाएंगे कि वह महिला सचमुच में बेमिसाल थीं। आज सरकार बैंकों का निजीकरण कर रही है। सरकार केवल बैंकों का ही नहीं, बल्कि महत्वपूर्ण सरकारी संपत्तियों को बेच रही है और उससे प्राप्त राशि को आय बता रही है। आश्चर्य होता है जब इस देश के कुछ अर्थशास्त्री इसे नरेंद्र मोदी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धि करार दे रहे हैं।

खैर, यह सवाल हो सकता है कि केवल एक इंदिरा गांधी का उदाहरण बताना काफी नहीं है। भारतीय महिलाओं को अभी बहुत कुछ साबित करना ही होगा। मैं तो निर्मला सीतारमण के बारे में सोच रहा हूं, जिनके पास इस समय वित्त मंत्रालय की जिम्मेदारी है। लेकिन हो यह रहा है कि वह केवल प्रेस कांफ्रेंस के लिए कैबिनेट मंत्री हैं। नीतियों का निर्माण प्रधानमंत्री कार्यालय करता है और निर्मला सीतारमण उसे मीडिया के सामने प्रस्तुत करती हैं। ऐसे ही पूर्व में सुषमा स्वराज की स्थिति थी। कागजी तौर पर वह विदेश मंत्री थीं, लेकिन केवल मुखौटा। मुझे कई बार लगता है कि वह कुढ़न यानी डिप्रेशन की शिकार रही होंगी। एक बार उन्होंने अपनी पीड़ा सार्वजनिक भी की थी। लेकिन पितृसत्ता को यथावत बनाए रखने को प्रतिबद्ध नरेंद्र मोदी सरकार ने उनकी उपेक्षा की और सुषमा स्वराज का निधन असमय हो गया।

आस्ट्रेलिया के नये प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने इतिहास रचा है। उन्होंने आस्ट्रेलिया की विविधता को ध्यान में रखा है और दो खास तबके की महिलाओं को भी अपने मंत्रिपरिषद में जगह दी है। ये दो खास महिलाएं हैं– एद हुसिक और लिडा बर्नी। एद हुसिक आस्ट्रेलिया की पहली मुस्लिम महिला मंत्री हैं। वहीं लिडा बर्नी वहां की मूलनिवासी समुदाय की। भारतीय परिभाषा के हिसाब से आदिवासी।

मैं तो यह भी सोच रहा हूं कि आखिर क्या कारण है कि संसद में महिलाओं के लिए 33 फीसदी आरक्षण का सवाल आज भी सवाल क्यों है। जबकि राज्यसभा में इसे पारित किया जा चुका है और केवल लोकसभा द्वारा इसकी मंजूरी शेष है। हालांकि बड़ा सवाल यह भी अनुत्तरित है कि इसमें आरक्षण के अंदर आरक्ष्ण पर विरोध क्यों है। जबकि आज लगभग सभी पार्टियां यह मानती हैं कि इस देश के दलित, आदिवासी और ओबीसी उपेक्षित हैं और उनकी समुचित भागीदारी आवश्यक है।
तो क्या यह भारतीय राजनीति के पुरुषों का अहंकार है, जिसने उन्हें संसद में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने से रोक रखा है?
मुझे लगता है कि यह अहंकार नहीं, एक प्रकार का भय है। और यह भय केवल राजनीतिज्ञों के अंदर ही नहीं है, बल्कि भारत के हर घर में है। महिलाएं सशक्त बनें, इसकी बात करनेवाले भी अपने घर की महिलाओं को इससे अलग रखना चाहते हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे बेगूसराय के भूमिहार वामपंथी जमीन के समुचित वितरण के मामले में कहते थे– सबकी जमीन बंटनी चाहिए, लेकिन हमारी छोड़कर।
तो मूल बात यही है कि हम भारत के पुरुष अपने घर की खिड़कियों और रोशनदानों को बंद कर देना चाहते हैं। एक दरवाजा रखना चाहते हैं जो हमारे घरों की महिलाओं के लिए दहलीज के समान हो। या फिर कारागार का द्वार।
बहरहाल, मैं ऐसा नहीं हूं। कल ही मैंने अपनी प्रेमिका को कहा–
सुनो,
तुम जो मुस्कुराओ 
तो खींच सकता हूं
तीन सौ साठ डिग्री वाला वृत
इस धरती पर
और हम चाहें तो
मिटा सकते हैं
धरती  से 
नस्ल, धर्म, जाति, लिंग और गोत्र की माफिक 
आरे की तरह चीरनेवाली  रेखाएं । 

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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