नीतीश कुमार की मजबूरी और निर्दोषों को जेल (डायरी 12 दिसंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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 मनुष्य की सोच पर परिवेश का असर पड़ता ही है। मेरे मामले में यह शतप्रतिशत सत्य है। दरअसल, मैं हमेशा इसका प्रयास करता हूं कि बिहार मेरे विमर्श के केंद्र में ना रहे। इसकी कई वजहें हैं। लेकिन वजहों से कुछ नहीं होता है। गांव में अपने घर रहने पर बिहार महत्वपूर्ण हो जाता है। असल में जिसे हम परिवेश कहते हैं, वह कोई तत्व नहीं, बल्कि यौगिक होता है जिसमें अनेक तत्व होते हैं। मेरे मामले में कई सारे तत्व हैं। घर में अपनी बहनों-भाइयों में सबसे छोटा हूं तो सबकी बात सुननी होती है। कई बार तो मन किसी बात के लिए तैयार नहीं होता, फिर भी उनका कहना सुनना पड़ता है। वैसे ही घर के अन्य सदस्य भी हैं, जिनका कहा मानने से इन्कार करने की कोई खास वजह नहीं होती है मेरे पास। परिवार को यदि कुछ देर के लिए छोड़ भी दूं तो गांव की भी अहम भूमिका है। हालांकि अब दूरी बहुत हो गई है। नयी पीढ़ी के युवा अजनबी लगते हैं। अक्सर ये वे होते हैं, जिन्हें मैंने तब देखा था जब वे छोटे थे। अब वे बड़े हो गए हैं। बाजदफा उनसे उनका परिचय पूछता हूं तब याद आता है कि इस बच्चे को तो मैंने अपनी गोद में खिलाया है और अब यह इतना बड़ा हो गया है। गांव के अधेड़ और वृद्धजन भी मेरी सोच को बहुत प्रभावित करते हैं। अनेक बार तो पड़ोसी गांव के लोग भी बहुत खास होते हैं।
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अब कल की ही बात है। मेरे गांव के दक्षिण में एक गांव है, जिसके एक टोले में दलित रहते हैं। वहां बीते दिनों एक आदमी पुलिस के हत्थे चढ़ गया। पुलिस ने उसे दारू पीने के आरोप में गिरफ्तार किया है।  कल उसके अधेड़ पिता मिल गए। चेहरा जाना-पहचाना था। असल में जब मैं छोटा था तब वे मेरे घर से बिसुकी हुई भैंस को तिहैया (एक तिहाई) और भैंस के मादा बच्चे को बटईया (आधा) ले जाकर पालते थे। तो इस तरह उनका और मेरे घर का संबंध था। कल जब मुलाकत हुई तो मैंने अभिवादन के उपरांत हालचाल पूछा तो उनकी आंखों में आंसू थे। कहने लगे कि उनके एकमात्र कमानेवाले बेटे को पुलिस ने शराबखोरी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है और कोई मदद करनेवाला नहीं है। उनके मुताबिक उनका बेटा दिहाड़ी मजदूर है और उस दिन शाम को अपने काम से लौट रहा था। उस दिन वह छत की ढलाई के काम में लगा था तो वहीं पर अपने मजदूर दोस्तों के साथ उसने एक पौआ देशी दारू पी ली। फिर कुरकुरी मोड़ के पास पुलिस ने उसे धर लिया और जेल भेज दिया है।

आखिर बिहार सरकार के फांस में छोटे अधिकारी ही क्यों होते हैं। जबकि बड़ी मछलियों को जिंदा छोड़ दिया जाता है। बड़ी मछलियां मतलब बड़े नेता ओर बड़े अधिकारी। यह तो विश्वास करने योग्य बात ही नहीं है कि यदि किसी विभाग का कनिष्ठ लिपिक भ्रष्टाचारी है तो उसके सीनियर ईमानदार होंगे। दरअसल, यह शिखर से जड़ की तरफ चलनेवाला मामला है। मतलब यह कि यदि सही तरीके से जांच हो तो समझ आएगा कि बड़ी मछलियां कौन हैं और कौन है।

 

मैंने कहा कि मैं इस मामले में कोई मदद नहीं कर सकता। तब उन्होंने कहा कि कोई तो उपाय होगा जिससे उनके बच्चे को जमानत मिल सके। मुझे उनकी बात वाजिब लगी। मैंने अपने एक वकील दोस्त को फोन किया तो उसने कहा कि तीन महीने तक तो जमानत बिहार सरकार नहीं ही देगी। यदि जेल भेजे जाने से पहले कोशिश की गयी होती तो यह मुमकिन था कि उसे कोई राहत मिल जाती। मतलब यह कि थानेदार को रिश्वत देकर मामला रफा-दफा कराया जा सकता था। अब तो यह भी मुमकिन नहीं है।
मैंने यही बात उस अधेड़ पिता को कह दिया जिसकी आंखों में अबतक मेरे प्रति एक विश्वास था। उसे लग रहा था कि मैं कोई न कोई उपाय जरूर कर दूंगा। लेकिन मैं तो कोई भी मदद करने की स्थिति में ही नहीं हूं। यही सोचकर मैं आगे निकल गया। लेकिन यहीं से मेरे सवाल शुरू होते हैं।
आखिर क्या वजह है कि बिहार सरकार इन दिनों शराबबंदी कानून को लेकर सख्तियां अधिक बरत रही है? इन दिनों बिहार में भ्रष्टाचार के आरोपों के मामले भी सुर्खियों में हैं। कल ही हाजीपुर के श्रम प्रवर्तन अधिकारी दीपक शर्मा के घर में छापेमारी की गयी और उसके घर से करीब सवा दो करोड़ रुपए की चल-अचल संपत्ति प्राप्त हुई। उसके बारे में बताया जा रहा है कि उसने 1999 में नौकरी ज्वॉयन की थी और तबसे लेकर उसने भ्रष्टाचार के जरिए अकूत संपत्ति हासिल की। आए दिन अखबारों में इस तरह की खबरें आती रहती हैं। जब कभी ऐसी खबरें मेरे सामने होती हैं तब मैं यह सोचने लगता हूं कि आखिर बिहार सरकार के फांस में छोटे अधिकारी ही क्यों होते हैं। जबकि बड़ी मछलियों को जिंदा छोड़ दिया जाता है। बड़ी मछलियां मतलब बड़े नेता ओर बड़े अधिकारी। यह तो विश्वास करने योग्य बात ही नहीं है कि यदि किसी विभाग का  कनिष्ठ लिपिक भ्रष्टाचारी है तो उसके सीनियर ईमानदार होंगे। दरअसल, यह शिखर से जड़ की तरफ चलनेवाला मामला है। मतलब यह कि यदि सही तरीके से जांच हो तो समझ आएगा कि बड़ी मछलियां कौन हैं और कौन है। इसमें सीएम शामिल हैं या नहीं, इसकी पुष्टि तो तभी मुमकिन है, जब इसकी मुकम्मिल जांच हो।
फिर सवाल यह कि सरकार ऐसा कर क्यों रही है? ऐसा कहने का मतलब यह कि बिहार में सबकुछ सकारात्मक नहीं है। यदि सब सकारात्मक होता तो सरकार कठोर कानूनों का आसरा नहीं लेती। दरअसल, कोई सरकार काम कर रही है या नहीं, यह साबित करने के लिए काम पड़ेगा। लेकिन अन्य लोग जो बिहार की सामाजिक, और सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेशों से वाकिफ हैं, वे यह जानते हैं कि बिहार सबसे अधिक कुशासित प्रदेश है। अभी हाल ही में नीति आयोग की रपट में इसका खुलासा भी हुआ है कि 52 फीसदी बिहारी गरीब हैं। जिन्हें गरीब की संज्ञा दी गई है, वे दरअसल दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। इनके पास रोजगार के साधन नहीं हैं। भारत सरकार की कौशल विकास योजना बिहार में फेल हो चुकी है।
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तो ऐसे में सरकार ने यह साबित करने का नुस्खा खोज निकाला है कि बिना कोई काम किए सरकार का संचालन कैसे कर सकती है। दरअसल, छोटी मछलियों पर हमले कर सरकार साफ संदेश देना चाहती है कि वह काम कर रही है।
तो सरकारें ऐसे ही काम करती हैं। सरकार के पास कोई ठोस योजना न पहले थी और ना ही अब है। अब सरकार ऐसा करने को लेकर बाध्य क्यों है, इसको आसानी से समझा जा सकता है। दरअसल भाजपा नेतृत्व ने साफ कर दिया है कि वह जातिगत जनगणना के पक्ष में नहीं है। यदि सरकार ने अपने बूते कराया तो वह गठबंधन पर विचार करेगी। वहीं बिहार को विशेष राज्य के दर्जे के सवाल पर भी भाजपा कोटे की उपमुख्यमंत्री रेणु देवी ने नीतीश कुमार को यह कहते हुए आंख दिखाया है कि बिहार को पहले की तुलना में भारत सरकार द्वारा अधिकतम धनराशियां बिहार को दी गई हैं। वहीं जदयू के वरिष्ठ नेता व कद्दावर मंत्री बिजेंद्र यादव ने एक बार फिर कहा है कि बिहार के बेहतर विकास के लिए विशेष राज्य का दर्जा आवश्यक है।

अन्य लोग जो बिहार की सामाजिक, और सांस्कृतिक और आर्थिक परिवेशों से वाकिफ हैं, वे यह जानते हैं कि बिहार सबसे अधिक कुशासित प्रदेश है। अभी हाल ही में नीति आयोग की रपट में इसका खुलासा भी हुआ है कि 52 फीसदी बिहारी गरीब हैं। जिन्हें गरीब की संज्ञा दी गई है, वे दरअसल दलित और पिछड़े वर्ग के लोग हैं। इनके पास रोजगार के साधन नहीं हैं।

मतलब यह कि बिहार में सत्ता साझा कर रही दोनों पार्टियां आपस में लड़ रही हैं। भाजपा के लोग नीतीश कुमार को खुलेआम आंखें दिखा रहे हैं और नीतीश कुमार की मजबूरी यह है कि वे पलटकर जवाब भी नहीं दे सकते। उन्हें तेजस्वी यादव ने तीसरी बड़ी पार्टी बनाकर रख छोड़ा है। इससे भी महत्वपूर्ण यह कि नीतीश कुमार को अपनी छवि की चिंता है। वे चाहते हैं कि वे चर्चा में बने रहें और इसके लिए निरपराध लोगों को जेल भेजा जाना और छोटी मछलियाें का शिकार बहुत जरूरी है।
नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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