दौलत के दम पर कोख खरीदता पूंजीवाद

राकेश कबीर

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 भारतीय समाज के पिछले सौ साल के समय को ध्यान से देखें तो सन्तान पैदा न होने पर दो या तीन शादियाँ करने का प्रचलन रहा है। पौराणिक कथाओं में तो नियोग प्रथा से भी सन्तान प्राप्ति के वर्णन मिलते हैं। पुरुष या महिला कोई भी शारीरिक रूप से संतान उत्पन्न करने में अक्षम हो सकता है लेकिन मेडिकल तकनीकी के अभाव में महिलाओं को ही अक्षम घोषित किया जाता रहा है। पुरुषों द्वारा दूसरी शादियाँ की जाती रही हैं। महिलाओं को बिना गलती के भी बाँझ होने जैसे ताने सुनाकर कलंकित किया गया। हमने अपने गाँव में ही पांच लोगों की दो शादियाँ देखी हैं। दो मामलों में तो ऐसा भी हुआ कि पुरुष की दूसरी शादी होने के बाद पहली पत्नी के भी एक दो बच्चे हुए। अब दूसरी शादी किसे और क्यों करनी होती है? एक आदमी की पहली पत्नी से 6 बेटियां होने के बाद दूसरी शादी की गयी क्योंकि 30 साल पहले तक बेटियों वाले माता-पिता को समाज निःसंतानी कहकर कलंकित करता रहा है। एक लोहार जाति के दम्पति की चार बेटियाँ होने के बाद भी जब भी गाँव में पड़ोसियों से झगड़ा होता तो महिलाएं उन्हें निपूती कहकर अपमानित करने का प्रयास करती। जिन परिवारों के पास दो एकड़ से ज्यादा जमीन है उन्हें अपना खानदान आगे बढ़ाने के लिए पुत्र चाहिए था। हिन्दू धर्म में कई संस्कार विशेषतया व्यक्ति की मृत्यु के बाद किये जाने वाले संस्कार पुत्र द्वारा ही किया जाना अनिवार्य सा रहा है इसलिए भी पुत्र की चाहत में लोग चिंतित रहते हैं।

” सोनाली कुसुम लिखती हैं, ‘किराए पर कोख उपलब्ध कराए जाने के कारण सरोगेसी को वेश्यावृत्ति के समान मानकर ऐसी माँओं को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है”। भारत में स्थित हॉस्पिटल डॉक्टर्स, होटल, दलाल, सरोगेट मदर हर चीज की व्यवस्था करते हैं। सूचना क्रांति के युग में सरोगेसी से जुड़ी सारी सूचनाएं ऑनलाइन पूरी दुनिया में एक क्लिक पर उपलब्ध हैं। सन 1990 के दशक में लागू की गयी एलपीजी व्यवस्था ने भारत में सभी तरह के कामों के लिए पूंजी-बाजार को खोल दिया। सन 1999 में स्थापित डॉ नयना पटेल की आकांक्षा फर्टिलिटी क्लिनिक ने गुजरात के आनंद जनपद को सरोगेसी का हब बना दिया।”

एक औरत के सम्मान का झूठा दंभ और एक औरत की गरीबी का सौदा

संतान प्राप्त करने के लिए जो पुरुष लोग कानून के डर, पत्नी के प्रबल विरोध या नैतिक रूप से पत्नी का सम्मान करने के के नाते दूसरी शादी नही कर सकते वे लोग कुछ नए तरीके ढूंढते हैं। बीसवीं सदी के अंत तक फिल्मों ने रास्ता दिखाया कि कोई प्रोफेशनल औरत (वेश्या) की तलाश करो और उससे बच्चा पैदा करके तय राशि देकर उसे हमेशा के लिए दूर भेज दो। इक्कीसवीं सदी में धीरे-धीरे पश्चिम से चलकर एक और तरीका प्रचलित होने लगा और वह था सरोगेसी।  गुजरात राज्य के आनंद जिले में डॉ नयना पटेल ने अपने फर्टिलिटी क्लिनिक के माध्यम से किराए की कोख यानी सरोगेसी को एक व्यवसायिक रूप दे दिया और वह क्षेत्र सरोगेसी का हब बन गया। रिश्तेदारी के किसी बच्चे को या अनाथ बच्चों को गोंद लेकर भी बहुत से दम्पतियों ने अपनी इच्छाएँ पूरी की। सरोगेसी में माँ-बाप को एक फीलिंग यह होती है कि वह उनके स्पर्म या कोख से पैदा हुआ बच्चा है। गोद लिए गए बच्चे के साथ हमेशा यह भावना जुड़ी रहती है कि वह दूसरे का बच्चा है। इसी कारण सरोगेसी का प्रचलन बढ़ने लगा। जो पुरुष सन्तान पैदा करने में अक्षम (इम्पोटेंट) थे वे डॉक्टर की मदद से एक अनजान स्पर्म डोनर से सेवा लेकर अपनी पत्नियों की कोख से बच्चा पैदा करने लगे तो जहाँ पत्नियाँ अक्षम थीं वहां पति का स्पर्म लेकर आर्टिफीशियल सेमिनेशन करके किराये की कोख (सरोगेट मदर) में स्थापित कर बच्चा प्राप्त किया जाने लगा। पुरुष और महिला की शारीरिक संरचना यहाँ भी मौजूद रहती है लेकिन बच्चा पैदा करने के लिए शारीरिक सम्पर्क जरूरी नहीं रहा। पैसा, बारगेनिंग और लेन-देन ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया। यहाँ भी महिलाओं का शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक शोषण कम होने की जगह बढ़ गया।

“भारत सरकार ने सन 2002 में व्यावसायिक सरोगेसी को लीगल बनाया। लेकिन सन 2015 में इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने विदेशी दम्पतियों के लिए भारतीय सरोगेट प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया। गुजरात के आनंद जिले के लगभग पांच हजार परिवार सरोगेसी पर निर्भर हैं।”

डॉक्टर्स, हॉस्पिटल, सरोगेसी और दलाल

सरोगेसी ने परम्परागत परिवार की अवधारणा को चुनौती देने का काम किया है। सरोगेसी ने मातृत्व को किराए पर उपलब्ध एक व्यावसायिक सेवा बना दिया है जिसमे माँ की की कोख किराए पर उपलब्ध है।  सोनाली कुसुम लिखती हैं, ‘किराए पर कोख उपलब्ध कराए जाने के कारण सरोगेसी को वेश्यावृत्ति के समान मानकर ऐसी माँओं को सामाजिक कलंक का सामना करना पड़ता है”। भारत में स्थित हॉस्पिटल डॉक्टर्स, होटल, दलाल, सरोगेट मदर हर चीज की व्यवस्था करते हैं। सूचना क्रांति के युग में सरोगेसी से जुड़ी सारी सूचनाएं ऑनलाइन पूरी दुनिया में एक क्लिक पर उपलब्ध हैं। सन 1990 के दशक में लागू की गयी एलपीजी व्यवस्था ने भारत में सभी तरह के कामों के लिए पूंजी-बाजार को खोल दिया। सन 1999 में स्थापित डॉ नयना पटेल की आकांक्षा फर्टिलिटी क्लिनिक ने गुजरात के आनंद जनपद को सरोगेसी का हब बना दिया। वे किराए पर कोख उपलब्ध कराने को ‘कामर्सिअल सरोगेसी’ के स्थान पर ‘काम्पेंसेटेड सरोगेसी’ शब्द का प्रयोग उचित मानती हैं क्योंकि आईवीएफ तकनीक के माध्यम से निःसंतान दम्पतियों को बच्चे उपलब्ध कराने को डॉ नयना अंगदान जैसा नेक काम मानती हैं। उनके हॉस्पिटल में वर्ष 2015 तक एक हजार से बच्चे में जन्म ले चुके हैं।

जब विदेशी निःसंतान दंपति अपने  बच्चे की चाह में भारत का रुख करते हैं तो उनके सोच में ‘पोस्ट कोलोनियल’ या ‘नव-कोलोनियल’ भावना रहती है कि भारत गरीबों, भिखारियों और गायों और पूजा स्थलों का देश है। गरीब लोग कम पैसे में विदेशियों के बच्चे अपनी कोख में पाल देंगे और बड़े लोगों का फिगर और करियर दोनों खराब नहीं होगा। जर्मनी जैसे देशों में सरोगेसी पर कानूनी रोक है इसलिए भी वहां के पैसे वाले लोग और निः संतान दम्पति भारत आते हैं। सरोगेट मदर उपलब्ध कराने के लिए कई सारे दलाल सर्विस सेण्टर खोलकर बैठे हैं। पैसे के बदले में लोग एक गोरी-चिट्टी और स्वस्थ महिला खोजते हैं ताकि उनका एक सुंदर और स्वस्थ बच्चा पैदा हो। इसलिए सबको उनकी पसंद की सरोगेट मदर मिलना मुश्किल होता है। फिल्म मिमी में अंग्रेज दम्पति को मेडिकल रिपोर्ट से जब यह पता चलता है कि सरोगेट मदर के पेट में पल रहा बच्चा एबनॉर्मल पैदा होगा तो वे दलाल द्वारा ये मैसेज भेजकर, कि मिमी से बोल दो कि वह बच्चे का एबॉर्शन करा दे, खुद चुपके से अपने देश भाग जाते हैं। दो बच्चे पैदा हो जाने पर एक आस्ट्रेलियन दम्पति ने एक बच्चा सरोगेट के पास ही छोड़ने को लेकर विवाद किया था जिसको लेकर भारतीय संसद में इस विषय पर गम्भीरता से कानून बनाने को लेकर चर्चाएँ हुईं। मातृत्व जैसी प्राकृतिक व्यवस्था पर पूरी तरह इन्सान और तकनीक नियन्त्रण स्थापित नहीं कर सकते लेकिन पैसे देकर कोख किराये पर लेने वाले लोग बेहद स्वार्थी ढंग से व्यवहार करते हैं जिसके कारण गरीब महिलाओं का शोषण बढ़ जाता है।

“विकी डोनर फिल्म आने के बाद समाज में एक नयी बहस शुरू हुई। इन्टरनेट पर इस संबन्ध में सवालों और जानकारियों की बाढ़ आ गयी। तीस साल से कम उम्र के स्टूडेंट और नौजवान पुरुष स्पर्म डोनेट कर पैसा कमाने के लिए ऐसी क्लिनिक को काल करके जानकारी करने लगे। ऐसा कई डॉक्टर्स ने बताया। परन्तु रुढ़िवादी भारतीय समाज में लोगों ने स्पर्म लेने से पहले डोनर का जाति और धर्म पूछना भी आरम्भ किया।”

पुस्तकें और कानून

सरोगेट मदर्स और उनके जीवन और समस्याओं से जुड़े विषयों पर मीरा स्याल ने अपनी पुस्तक मानसून बेबी: द हाउस ऑफ़ हिडन मदर्स (2015) लिखी। अमूल्य मल्लादी का उपन्यास अ हाउस फॉर हैप्पी मदर्स (2016), पत्रकार और लेखिका गीता अर्वामुदन द्वारा सरोगेट मदर्स के आत्मकथात्मक लेखों का संग्रह अ स्टोरी ऑफ़ इंडियन सरोगेसी (2014) एवं अमृता पांडे द्वारा विमेंस इन लेबर (2014) किताबें लिखी गईं। भारत सरकार ने सन 2002 में व्यावसायिक सरोगेसी को लीगल बनाया। लेकिन सन 2015 में इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च ने विदेशी दम्पतियों के लिए भारतीय सरोगेट प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगा दिया। गुजरात के आनंद जिले के लगभग पांच हजार परिवार सरोगेसी पर निर्भर हैं। इस आदेश से आनंद जिले की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ने की सम्भावना से वहां के निवासी चिंतित हो गए। सन 2008 में एक और कानून बनाकर सरोगेसी को क़ानूनी संरक्षण देने की कोशिश की गयी है।

स्पर्म डोनर तो किसी भी देश में बहुतेरे मिल जाते हैं लेकिन सरोगेट मदर का मिलना सामाजिक, कानूनी और स्वास्थ्य की दृष्टियों से उपलब्ध होना आसान नही होता। भारतीय संसद ने सरोगेसी को नियंत्रित करने के लिए विधेयक का जो मसौदा पेश किया है उसमे विदेशी लोग भारत में सरोगेट मदर की सर्विस नहीं ले सकेंगे। एक महिया केवल एक बार सरोगेट मदर बन सकती है।  जर्मनी आस्ट्रिया स्विट्ज़रलैंड जैसे दुनिया के तमाम देशों में सरोगेसी पर क़ानूनी रोक है। भारत में यह कानून पास होने पर तमाम विदेशी निःसंतान दम्पतियों के लिए अपना बच्चा पाने की इच्छा अधूरी रह जाएगी।  हालाँकि इस कानून में प्रावधान किया जा रहा है कि भारतीय मूल के लोगों को सहूलियत मिल सके।

विकी डोनर से मिमी तक : नैतिकता मर्यादा और बच्चों की जरूरत

दूसरी दुल्हन (1983), चोरी चोरी चुपके चुपके (2001), फ़िलहाल (2002), जननी (2006), गूगल बेबी (2009), विकी डोनर (2012), आई एम आफिया (2011), मानसून बेबी (2014), मिमी (2021)

‘दूसरी दुल्हन’ फिल्म में अनिल और रेणु (विक्टर बनर्जी और शर्मीला टैगोर) एक निःसंतान दम्पति हैं। वे बच्चा प्राप्त करने के लिए एक वेश्या चन्दा (शबाना आजमी) की मदद लेते हैं। यह फिल्म बंगाली में उत्तरायण (2006) नाम से बनी। सन 2001 में बनी फिल्म चोरी चोरी चुपके चुपके राज और प्रिया (सलमान खान और रानी) एक बड़े व्यावसायिक परिवार के अमीर दंपति हैं। प्रिया एक बार गर्भवती होती है लेकिन उसका मिसकेरिज होने के बाद डॉक्टर्स बताते हैं कि वह फिर से माँ नहीं बन सकती है। यह दम्पति अपने रुढ़िवादी परिवार के लोगों को बिना बताये एक वेश्या युवती मधुबाला (प्रीटी जिंटा) को सरोगेट मदर बनाने के लिए तैयार कर लेते हैं। इस फिल्म में आर्टिफीशियल इन्सेमिनेशन कराने को राज और मधुबाला के बीच सेक्सुअल सम्बन्धों से बच्चा प्राप्त करने की बात पर केन्द्रित किया गया है। इसके लिए पति-पत्नी और सरोगेट मदर तीनों स्विटज़रलैंड चले जाते हैं और वहीं से फिल्म का हीरो अपनी पत्नी यानी कि नायिका के प्रेग्नेंट होने की झूठी खबर देता है। लेकिन अचानक जब परिवार के लोग राज और प्रिया के पास स्विटज़रलैंड पहुँचते हैं तो वहां प्रेग्नेंट मधुबाला को वे दोनों अपने दोस्त की पत्नी बताकर सच को छुपाते हैं। आगे सभी लोग इंडिया लौटते हैं। अपने पेट में बच्चे को पालने वाली माँ को उससे प्यार होना स्वाभाविक है। मधुबाला चुपचाप भागने का प्रयास करती है और रेलवे स्टेशन पर उसे किसी तरह रोक लिया जाता है। वह राज और प्रिया के बच्चे को जन्म देकर हमेशा के लिए इस वादे के साथ चली जाती है कि वह भविष्य में अब वेश्यावृति का काम नहीं करेगी। पैसे वाले लोग किस तरह एक महिला का मानसिक और भावनात्मक शोषण करते हैं बॉलीवुड की यह नाच-गाने वाली मसाला फिल्म अच्छे से प्रस्तुत करती है।

फिलहाल, मेघना गुलज़ार निर्देशित पहली फिल्म थी जो दो महिला दोस्तों के बीच सरोगेट मदर से जुड़ी कहानी कहती है। रेवा सिंह (तब्बू) और सिया सेठ (सुष्मिता सेन) अच्छी दोस्त हैं लेकिन शादी, बच्चे और घर परिवार को लेकर दोनों के विचार बहुत भिन्न हैं। रेवा सिंह शादी करके घर बसाने और सामान्य जीवन जीने की आग्रही है और ध्रुव (संजय सूरी) से शादी कर लेती है। परन्तु उन दोनों के बच्चे न होने से रेवा डिप्रेशन में चली जाती है। सिया अपने दोस्त को परेशान देख उसके बच्चे के लिए सरोगेट मदर बनने के लिए तैयार हो जाती है। सिया सेठ अपने दोस्त साहिल (पलाश सेन) के शादी के प्रस्ताव को कई बार मना कर देती है क्योंकि वह स्वतंत्र और बिंदास जीवन जीना चाहती है। लेकिन जब वह सरोगेट मदर बनने के लिए तैयार हो जाती है तो उसका दोस्त साहिल नाराज होकर उससे रिश्ता तोड़ लेता है। सिया की प्रेगनेंसी के दौरान जब ध्रुव उसके ज्यादा करीब आता है तो बचपन की दोस्त रेवा और सिया की दोस्ती में भी शक के कारण दरार पड जाती है। बाद में हैपी एंडिंग होती है। सिया और साहिल शादी करके नयी ज़िन्दगी शुरू करते हैं और उनके दोस्त रेवा और ध्रुव अपना बच्चा लेकर बहुत दूर रहने चले जाते हैं।

“सरोगेट मदर/स्पर्म डोनर की तलाश में निकला व्यक्ति/दम्पति अपने बजट के बदले महिला/पुरुष की जाति, धर्म, स्वास्थ्य, फिजिकल संरचना, काला या गोरा रंग सब कुछ अपनी पसंद का पाना चाहता है। इस काम से जुड़े सामाजिक कलंक और ताने सहकर दूसरे का बच्चा अपने पेट में पालना दुरूह ज़िम्मेदारी है जिसने महिलाओं की आय बढाने के साथ उनकी मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। इन सारे पहलुओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जा रहा है. सरोगेसी के सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं एवं प्रभाव और गहराई से अध्ययन होना चाहिए।”

विकी डोनर (2012) सुजीत सरकार द्वारा नए विषय पर बनाई गयी फिल्म थीइस फिल्म का विषय शुक्राणु दान (स्पर्म डोनेशन) तथा बांझपन था। यह फिल्म कनेडियन-फ़्रेच फिल्म स्टारबक पर आधारित थी। दरियागंज दिल्ली में डॉक्टर बलदेव चड्डा (अन्नू कपूर) का एक स्पर्म डोनेशन और बांझपन निवारण का क्लीनिक है। बलदेव अपने ग्राहकों को अपने इलाज की पूरी गारंटी देता है। यामी गौतम और आयुष्मान खुराना लीड रोल में हैं। बॉलीवुड की फिल्मों ने धीरे धीरे ही सही गे रिलेशनशिप, सेक्स सिम्बल्स और जाति आधारित आरक्षण, ऑनर किलिंग्स, और यौन शोषण और हिंसा पर फिल्में बनाकर दर्शकों की सोच को बदलने का कम किया है। विकी डोनर फिल्म आने के बाद समाज में एक नयी बहस शुरू हुई। इन्टरनेट पर इस संबन्ध में सवालों और जानकारियों की बाढ़ आ गयी। तीस साल से कम उम्र के स्टूडेंट और नौजवान पुरुष स्पर्म डोनेट कर पैसा कमाने के लिए ऐसी क्लिनिक को काल करके जानकारी करने लगे। ऐसा कई डॉक्टर्स ने बताया। परन्तु रुढ़िवादी भारतीय समाज में लोगों ने स्पर्म लेने से पहले डोनर का जाति और धर्म पूछना भी आरम्भ किया। आई एम आफिया (2010) ओनिर द्वारा निर्देशित फिल्म है। इसमें नंदिता दास ने एक सिंगल महिला का लीड रोल किया है। वह स्पर्म डोनर के माध्यम से माँ बनना चाहती है। वह अपने पति से बच्चे के लिए कहती है लेकिन वह किसी और लड़की से प्रेम करता है और एक दिन आफिया को छोडकर चला जाता है। आफिया को इसीलिए टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक के सहयोग से माँ बनने का निर्णय लेना पड़ता है। आफिया डॉक्टर बासु के क्लिनिक पर पहुंचकर डोनर के बारे में पता करती है। वह सूरज (पूरब कोहली) नाम के एक आदमी से मिलती है और ढेर सारे मुश्किल सवाल करती है। सूरज उसे अपना फोन नम्बर नोट करके दे देता है। आफिया स्पर्म डोनेशन और आईवीएफ तकनीक के माध्यम से बच्चा प्राप्त करती है। फिल्म के अंतिम दृश्य में बच्चे के पैदा होने पर आफिया की आँखों में ख़ुशी के आंसू हैं और उसके आंसू फोन नम्बर लिखे कागज को भिगो रहे हैं। यह फिल्म का क्लाईमैक्स है। यह फिल्म पुरुषवादी समाज को चुनौती देती है कि औरत को अपना बच्चा पाने के लिए पति का होना जरूरी नहीं है। बच्चे ईश्वर, गॉड या खुदा नहीं, डॉक्टर की मदद से आईवीएफ तकनीक भी दे सकती है।

फिल्म दूसरी दुल्हन

मिमी (2021) जुलाई में रिलीज हुई हिंदी फिल्म है जो एक दशक पहले बनी मराठी फिल्म मला आई व्ह़ायचय की रिमेक कही जा सकती है। के डी सत्यम की फिल्म बॉलीवुड डायरीज में हमने देखा था कि कैसे एक छोटे शहर की लड़की मुंबई जाकर हीरोइन बनने के लिए ठगी का शिकार हो जाती है जिसे डॉ सागर अपने गीत में कुछ इस तरह बयान करते हैं कि ‘सपनों को सच करने के लिए तितली ने सारे रंग बेच दिए’। मिमी फिल्म की नायिका जो राजस्थान के एक शहर में टूरिस्ट पॉइंट पर डांस प्रस्तुति देकर पैसे कमाती है और पर्यटकों का मनोरंजन करती है।  उसे लगता है कि वह बहुत बड़ी कलाकार है और वह मुंबई जाकर हीरोइन बनने का ख्वाब पालती है। उसने अपने कमरे में गोलियों की रासलीला : रामलीला के हीरो रणवीर सिंह का टापलेस फोटो लगा रखा है। राजस्थान की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म का राजस्थानी दिखने वाला हीरो मिमी (कृति सैनन) का प्रेरणास्रोत है। बरेली की बर्फी फिल्म में नायिका (कृति) के पिता की भूमिका वाले पंकज त्रिपाठी यहाँ भानु ड्राइवर की भूमिका में हैं जिनकी सोच है कि ड्राइवर को चाहे जितनी मुश्किल आये सवारी को उसकी मंजिल तक छोड़कर आना उनकी ज़िम्मेदारी है। अगर भारतीय समाज में चलती-फिरती सूचनाओं का भंडार खोजना हो तो गूगल नहीं, नाई की दुकान और ‘ड्राइवर पहलवान’ के पास जाना होता है। नाई की दूकान पर पूरे मुहल्ले की सूचनाएं दिन भर चूरन की तरह जुटती और बंटती रहती हैं। यह एक स्थायी सूचना केंद्र होता है। फिल्मी हीरो और हीरोइन के पोस्टर और फिल्मी पत्रिकाएं भी यहाँ हमेशा उपलब्ध रहती हैं। राहुल सांस्कृत्यायन के घुमक्कड़शास्त्र के हवाले से कहें तो ड्राइवर साहब लोग एक बड़े रेंज में सूचनाओं के चलते-फिरते भण्डार होते हैं।  जिन टूरिस्ट केन्द्रों पर विदेशी लोग आते हैं वहां के ड्राइवर साहबान अंग्रेजी भी बोल समझ लेते हैं। मिमी फिल्म के ड्राइवर भानु (पंकज त्रिपाठी)एक आदर्श ड्राइवर के सारे गुणों से भरपूर ड्राइवर हैं जो केवल गाड़ी ही नहीं चलाते बल्कि पीछे की सीट पर बैठी सवारियों की सारी बातें भी ध्यान से सुनते हैं। इतना ही नहीं, बिना मांगी सलाह भी देते रहते हैं। इन्ही ड्राइवर साहब की गाड़ी से जॉन और उसकी पत्नी समर, जो अमेरिका से एक सरोगेट मदर की तलाश में राजस्थान आये हैं, यात्रा कर रहे हैं। समर माँ नही बन सकती है और इण्डिया में आसानी से सरोगेट मदर मिल सकती हैं इसलिए वे इधर आए हैं। भानु सरोगेसी का काम करने वाली कई महिलाओं से अमेरिकी दम्पति को मिलाता है लेकिन वे उन्हें पसंद नही आते। रात के हेरिटेज होटल के ग्राउंड पर नाचती हुई ‘परम सुन्दरी’ (मिमी) को देखकर अंग्रेज निःसंतान दम्पति उसे अपने बच्चे की सरोगेट मदर बनाना चाहते हैं। यह काम भी ड्राइवर भानु को सौंपा जाता है। दो-तीन मुलाकातों और मान-मनौवल और बीस लाख रुपये मिलने के लालच में मिमी तैयार हो जाती है।

सरोगेसी में पैसे के लिए यदि कोई गरीब महिला अपनी मर्जी से भी तैयार होती है तब भी उसके शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। कभी कभी तो विकलांग बच्चे पैदा होने या सरोगेट मदर को प्रेग्नेंसी के दौरान कोई गम्भीर बीमारी होने पर जान जाने का भी खतरा रहता है। डिलीवरी के दौरान भी मुश्किलें आती है। मिमी फ़िल्म में तो अमेरिकन दम्पति को डॉक्टर द्वारा मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर जब यह पता चलता है कि बच्चा एब्नॉर्मल पैदा होगा तो वे बिना बताए वापस अपने देश भाग जाते हैं। मिमी अपने माँ-बाप से छुपाकर अपने दोस्त के घर मे रहकर उस बच्चे की प्रेग्नेंसी पीरियड पूरा कर रही होती है।  उसको बच्चे का अबॉर्शन करने की सलाह दी जाती है जो कि सम्भव नही होता। मिमी अपने घर लौटती है तो यह सवाल खड़ा होता है कि उसके पेट में बिना शादी के बच्चा किसका है तो वह अपने को बचाने के लिए ड्राइवर भानु को लपेट लेती है क्योंकि वही इस जाल में उसे फँसाता है। अब खुद शादीशुदा ड्राइवर इस झमेले में फंस जाता है। दिल्ली में उसकी पत्नी और माँ इंतज़ार करते फोन करते हैं लेकिन वह वापस नही जाता। एक दिन उसकी पत्नी ही भानु की फोटो लेकर उसको खोजने पहुंच जाती है। जब वह एक दुकानदार से भानु के बारे में फोटो दिखाकर पूछती है तो वह बताता है ‘यह तो मिमी का पति है’। हंगामा खड़ा होने पर सच सामने आता है। ब्राउन मदर का सफेद बच्चा पैदा होने पर वह माँ-बाप दोनो से मेल नहीं खाता तो शक के दायरे और बढ़ते हैं।

फेसबुक पर मां-बच्चे का एक वीडियो देखकर अमेरिकन दम्पति अपने बच्चे को पाने के लिए फिर मिमी के घर पहुंचता है। गुस्से से पागल मिमी, भानु और उसका परिवार उन्हें भला बुरा और धोखेबाज कहता है। मिमी ने हंसी-खेल में इस सौदे को स्वीकार किया था लेकिन अब वह एक समझदार माँ और इंसान है। बहुत सोच-समझ के बाद और कोर्ट-कचहरी से बचने के लिए जब वह अपने बेटे को विदेशी दम्पति को सौंपने को तैयार हो जाती है तो पता चलता है कि उन दोनों ने एक अनाथालय से एक अनाथ बच्ची को गोद ले लिया है। हीरोइन बनने का सपना संजोये छोटे कस्बे की एक सुंदर लड़की गलतफहमी में गम्भीर समस्या में फंस जाती है। भानु ड्राइवर भी मसखरे चरित्र से एक ज़िम्मेदार इन्सान में बदलते हुए दिखता है। जमाना क्या कहेगा के भय में जीने वाले रुढ़िवादी माँ-बाप (मनोज पाहवा-सुप्रिया पाठक) भी साहस के साथ अपनी अपनी बेटी और नाती के साथ रहना स्वीकार करते हैं। सागर सरहदी की फिल्म बाजार की नायिका रह चुकी सुप्रिया पाठक रामप्रसाद की तेहरवीं के चार बेटों की विधवा माँ के रोल के बाद एक बार फिर बिन ब्याही सरोगेट माँ ‘मिमी’ की भावप्रवण माँ की भूमिका में इतनी सहज लगती हैं कि ओटीटी प्लेटफार्म के फिल्मों की जरूरत बनती जा रही हैं।

कल्चरल लैग बनाम समाज और तकनीक

अब परिवार की परिभाषा में माता-पिता और उनके बच्चों का शामिल होना जरुरी नहीं रह गया है। सरोगेसी ने सिंगल महिला, गे और लेस्बियन कपल्स के लिए बच्चे उपलब्ध कराकर परिवार की परिवार की अवधारणा को विस्तार दे दिया है। विवाह परिवार और नातेदारी जैसी व्यवस्थाओं में भारी परिवर्तन होने लगे हैं। आज से सात साल पहले मैंने एक सच्ची घटना पर आधारित सरोगेट मौसी शीर्षक से कहानी लिखी थी। सरोगेसी के सामाजिक पहलू को देखें तो इसने स्त्री देह का ‘वस्तुकरण’ (कमोडिफिकेश, ओब्जेक्टीफिकेशन) किया है। भारतीय समाज पुरुष-स्त्री के बीच सम्पन्न वैध विवाह के माध्यम से संतान उत्पत्ति को स्वीकार करता है। अपने किसी रिश्तेदार के बच्चे को मौखिक या क़ानूनी रूप से गोद लेना या अनाथालय से किसी बच्चे को क़ानूनी तौर पर गोद लेने तक की परम्परा तो प्रचलित रही ही लेकिन किराए पर किसी स्त्री की कोख लेकर संतान प्राप्त करना नयी अवधारणा या प्रघटना है। आइवीएफ तकनीक के माध्यम से जब अक्षम स्त्री के अंदर भ्रूण प्रत्यारोपण करना विज्ञान ने सम्भव बना दिया तो निःसंतान दम्पतियों को आशा की एक नयी किरन दिखी। धनाढ्य और हॉलीवुड आदि की सेलिब्रिटीज ने सरोगेसी के माध्यम से अपना फिगर और कैरियर बिना प्रभावित किये बच्चे पाना शुरू कर दिया। परन्तु परम्परागत समाजों और रुढ़िवादी परिवारों द्वारा सदियों से चली आ रही पवित्र परम्पराओं को एकदम छोड़ देना आसान नहीं था। इसलिए तकनीक  और सामाजिक मान्यताओं में टकराहट होना स्वाभाविक है। स्पर्म डोनेशन और सरोगेसी जैसे विषयों पर आधारित सभी फिल्मों ने इन मुश्किलों और  चुनौतियाँ को प्रमुखता से उठाया भी है। पारिवारिक सम्बन्ध जैसे पति-पत्नी, माँ-बाप, सरोगेट मदर और उसके होने वाले बच्चे के प्रति मोह यह सब कुछ तनाव और संघर्ष पैदा करता है। परिवार टूट जाते हैं। बिन ब्याही माँ बनकर समाज का सामना करना भयानक अनुभव होता है। पैसे के लिए किसी अंजान पुरुष के सीमन या वीर्य से बने बच्चे को अपने पेट में पालना एक माँ के लिए असहज कर देने वाला कार्य है। पैदा होने के बाद एक बच्चे को दूसरे को दे देने का डर केवल ‘मिमी’ जैसी एक माँ ही समझ सकती है। सरोगेट मदर/स्पर्म डोनर की तलाश में निकला व्यक्ति/दम्पति अपने बजट के बदले महिला/पुरुष की जाति, धर्म, स्वास्थ्य, फिजिकल संरचना, काला या गोरा रंग सब कुछ अपनी पसंद का पाना चाहता है। इस काम से जुड़े सामाजिक कलंक और ताने सहकर दूसरे का बच्चा अपने पेट में पालना दुरूह ज़िम्मेदारी है जिसने महिलाओं की आय बढाने के साथ उनकी मुश्किलें भी बढ़ा दी हैं। इन सारे पहलुओं का समाजशास्त्रीय अध्ययन किया जा रहा है. सरोगेसी के सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक पहलुओं एवं प्रभाव और गहराई से अध्ययन होना चाहिए।

संदर्भ

कुसुम, सोनाली (2014)सोशियोलॉजिकल अंडरस्टैंडिंग एंड इम्प्लिकेशन ऑफ़ सरोगेट मदरहुड इन इंडियन सोसाइटीज, इन इंटरनेशनल रिसर्च जर्नल आर्ट्स एंड एजुकेशन, वोलुम 1, इशू 2, आइएसएसएन नम्बर. 2349-1353, नवम्बर-2014।
मैएरहोफेर, वाल्त्रुद (2014) इंडियन वोम्ब –जर्मन बेबी: ट्रांसनेशनल जेस्टटेश्नल सरोगेसी इन द फिल्म मानसून बेबी, इन एशियाई जर्नल ऑफ़ जर्मन एंड यूरोपियन स्टडीज, ओन 23 दिसम्बर 2019।
राजिमवाले, राजेश्वरी (2012) आफ्टर ‘विकी डोनर’’, स्पर्म डोनेशन नों लोंगर टैबू इन इंडिया, इन वन्कुवर आब्जर्वर आन मई 12, 2012।
थोम्प्सन, कार्ल (2018) सोशियोलॉजिकल पर्सपेक्टिव आँन ‘रेंटिंग अ वोम्ब’ इन रिवाइजसोशियोलॉजी.कॉम।

 

5 Comments
  1. Yogesh Nath Yadav says

    बेहतरीन शोध परक तरीके से विषय के हर पहलू पर प्रकाश डाला गया है।एक शानदार विवेचना।

  2. Ghanshyam kushwaha says

    मातृत्व का व्यापार। बहुत बढ़िया और सारगर्भित लेख। बधाई सर।

  3. Anuj Patel says

    चलचित्र पट कथाएं और साहित्य समाज में घट रही घटनाओं को प्रस्तुत करने में भूमिका वैसे ही निभाती हैं इस क्रम में आपके द्वारा समाजशास्त्रीय अध्ययन और डायरस्पोरा पर की गई रिसर्च समाज और समाजशास्त्री की दृष्टि से सटीक विश्लेषण
    आपके इस तरह के आर्टिकल भारतीय सिविल सर्विस सेवाओं और राज्य सर्विस सेवाओं में भारतीय समाज, सामाजिक समस्याओं और सामाजिक न्याय पर सामान्य अध्ययन के पेपर और समाजशास्त्र के विषय पर एक अभ्यार्थी , रिसर्च कर रहे छात्र के लिए लाभकारी है

  4. Tarkeshwar Patel says

    बहत बेहतरीन लेख आदरणीय,सरोगेसी के प्रत्येक पहुलुओ पे प्रकाश डाला गया ,बहुत ही असहज स्थिति है कि पैसे के लिए दूसरों के बच्चो को एक मां को अपने कोख में पालना ,जिसमे रूढ़िवादी समाज, समाज के द्वारा एक अलग नजरिए से देखना,जान की खतरा ,और तो और पैदा होने के बाद किसी दूसरे व्यक्ति को सौप देना ,एक तरफ जहां पे इच्छुक व्यक्ति को संतान की प्राप्ति हो जाती है वही दूसरी तरफ उस औरत को सामाजिक उत्पीड़न और अत्याचार का सामना करना पड़ता है

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