पेंटागन के बिल्ले यहीं शिवाले में बनते हैं

रामजी यादव

5 2,004

शिवाले की गली में घुसते ही एक पुरानी, सीलन भरी और पुराने सामानों से अंटी पड़ी कोठरी में दो कारचोब पर दो लोग झुके हुए बिल्ले पर कढ़ाई कर रहे थे। यह कोठरी वास्तव में एक कारख़ाना है। यहाँ कपड़े पर बैज की कढ़ाई की जाती है। हमारे साथ बनारस के गली-कूँचों के जानकार और बनारस की चौहद्दी में प्रसिद्ध शायर अलकबीर थे। उन्होंने आगे बढ़कर हालचाल पूछा। दरवाजे के पास वाले कारचोब पर एक बैज की कढ़ाई में लीन पचास वर्षीय कासिम अली ने नज़र उठाकर कुछ देर उन्हें देखा फिर पहचान गए। बोले ‘बहुत दिन बाद दिखे हो।’ फिर कासिम अली ने फर्श पर सो रहे एक बुजुर्ग और एक अधेड़ व्यक्ति को जगाया। बुजुर्गवार इतने दुबले और जर्जरप्राय थे कि उनके मुंह से साफ आवाज भी नहीं निकल रही थी। फिर भी एक चीज यह थी कि अलकबीर से उन्होंने बड़ी ही गर्मजोशी से बात करना शुरू किया। मैंने देखा कि अलकबीर उनकी बात का जवाब देते हुये भी कुछ बोरियत प्रकट कर रहे हैं गोया वे उनको ठीक से पहचान नहीं रहे हों। मुझे लगा शायद वे इस जगह के मालिक के अब्बा हों और बेखुदी में आलम में हों। परिचय सबसे जताते हों लेकिन सचमुच पहचानते कम ही लोगों को हों। थोड़ी देर में वे कमरे से बाहर निकल गए। तुरंत ही हुई बूँदाबाँदी से गली में कीचड़ था लेकिन वे बेपरवाह आगे बढ़ गए।

अधेड़ सज्जन का नाम सैयद माजिद अली है। वे ही इस कारखाने के मालिक हैं। वे साठ साल के करीब हैं और पूछने पर तसदीक में गर्दन हिलाते हैं। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में इंब्रायडरी का यह काम उनके दादा के जमाने से होता चला आ रहा है। तकरीबन सौ साल हो गए हैं। लगता है कि यह कारख़ाना काफी पुराना है। मैंने कारखाने का नाम पूछा तो उन्होंने कहा कि सामने बोर्ड लगा है – न्यू गोल्डेन इंब्रायडरी वर्क्स, शिवाला वाराणसी। पहले तो बोर्ड कहाँ है यह समझ में नहीं आया लेकिन उनके इशारे के अनुसार मैंने दरवाजे के ऊपर दीवार पर टांगा गया बोर्ड देखा। कई कोणों से मुड़ा हुआ टीन का बोर्ड था और किसी सूरत में बहुत ध्यान से देखने पर भी उसकी लिखावट समझ में नहीं आ रही थी। अलकबीर ने धीरे से टिप्पणी की –‘देखा आपने। बोर्ड बता रहा है कि कारख़ाना बहुत पुराना है।’

न्यू गोल्डेन इंब्रायडरी वर्क्स, शिवाला वाराणसी का कई कोणों से मुड़ा हुआ टीन का बोर्ड, उसकी लिखावट अब दिखाई नहीं दे रही है

कारखाने में दो कारचोब थे जिनपर बैज और कार पर लगाए जाने वाले झंडे पर कढ़ाई चल रही थी। एक पर वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर के कुलपति की कार के लिए तथा दूसरे पर सुहेलदेव विश्वविद्यालय के कुलपति की कार के लिए लगाए जाने वाले झंडे की कढ़ाई का काम चल रहा था।

सैयद माजिद अली ने बताया कि ‘अब इस काम का मामला ठंडा होता जा रहा है। हमें यह विरासत में मिला था तो इसी से हमारा जीवन और मुस्तकबिल बंधा था लेकिन अब लगता है कि यह रिश्ता खत्म हो जाएगा। मेरे बच्चे अब दूसरा काम कर रहे हैं।’ उनके पाँच बच्चे हैं।

माजिद अली के साथ काम कर रहे कासिम अली ने अपनी उम्र पचास साल बताई। उन्होंने दस साल की उम्र से यह काम सीखना शुरू किया। उनके गुरु फारूक भाई थे। कासिम बताते हैं कि ‘काम बहुत खराब स्थिति में हो गया है। अब एक्सपोर्ट नहीं रहा। बस जो लोकल काम मिलता है उसी को करके परिवार चला रहे हैं।’

मो. रिज़वान कहते हैं कि एक दिन में अगर दो-ढाई सौ रुपए का काम हो जाय तो हम अपने को सम्पन्न समझते हैं

यही हाल हर कहीं है। इसी कारखाने में काम कर रहे मोहम्मद रिजवान कहते हैं कि ‘अब बहुत मेहनत के बाद भी अगर दो-ढाई सौ रुपए का काम हो जाय तो हम अपने को सम्पन्न समझते हैं। यह और बात है कि हारी-बीमारी जैसा कोई खर्चा सिर पर आ जाय तो कलेजा मुंह को आने लगता है। उम्मीद भले कम नज़र आती हो लेकिन बेबसी हर कहीं पसरी हुई मिल जाएगी।’

शायद यही कारण है कि पहले जहां इस मुहल्ले में तीन सौ लोग जरदोजी का काम करते थे वहीं अब मुश्किल से दस-पंद्रह आदमी बचे हैं।

पेंटागन के बिल्ले और मरहूम मकसूद अंसारी

कई साल पहले 2016 में जब बनारस लौटा तब मेरी दिलचस्पी बनारस के हस्तशिल्प में हुई कि एक बार देखा जाय कि अभी शिल्पकारों के क्या हालात हैं? मैंने इस विषय में समाजवादी नेता अफलातून से कुछ लोगों का संपर्क मांगा। उन्होंने तब मक़सूद अंसारी, डॉ अब्दुल्ला अंसारी और शायर सलीम शिवालवी का नंबर दिया। डॉ अब्दुल्ला अंसारी से उन दिनों मुलाक़ात नहीं हो पाई क्योंकि वे कहीं बाहर गए थे लेकिन शिवाले पर मनाऊ टी स्टाल पर मक़सूद अंसारी और सलीम शिवालवी से मुलाक़ात हुई। मकसूद साहब मुझे अपने कारखाने में ले गए, जहां पाँच-छह लोग बिल्ले बना रहे थे। मकसूद अंसारी साहब ने बताया कि वे कई पीढ़ियों से इस काम में हैं। यहाँ पेंटागन के बिल्ले भी बनते हैं। पेंटागन यानी अमेरिकी सेना। हालांकि उन्होंने कहा कि अब काम में कोई दम नहीं है। बाहर के ऑर्डर लगातार कम होते जा रहे हैं। एक्सपोर्ट आदि को लेकर भी कई परेशानियाँ खड़ी होने लगी हैं। लेकिन हम काम इसलिए चला रहे हैं क्योंकि इसके अलावा पेट के लिए और कोई धंधा नहीं कर सकते।

पचास वर्षीय कासिम अली बताते हैं कि अब लोकल काम भी मुश्किल से मिल पाता है

पेंटागन के बिल्ले के बारे में सुनकर लगा कि इस काम में अच्छा-खासा मुनाफा होता होगा लेकिन मकसूद साहब ने बताया कि जो भी मुनाफ़ा है वह एक्सपोर्टर को है। हमें तो सिर्फ पीस के हिसाब से मजूरी मिलती है। उनके पास सात कारचोब थे। घर अपना होने के कारण कमरे का किराया नहीं देना पड़ता था जिससे थोड़ा अतिरिक्त पैसा बच जाता था लेकिन जिन हालात से अभी वे दो-चार हो रहे थे उनमें अच्छे दिनों की संभावनाएं कम से कमतर होती जा रही हैं। आज जब छः साल बाद शिवाले के इलाके में घूम रहा हूँ तो पता चल रहा है कि मकसूद साहब इस दुनिया में नहीं रहे और उनके यहाँ इंब्रायडरी का काम बंद हो चुका है।

शिवाले में और भी कई कारखाने बंद हो गए हैं। जरदोज़ी के अब बमुश्किल दस-बारह कारखाने बचे हैं।

जरदोज़ी के काम पर लॉकडाउन का असर

बनारस की समाजशास्त्री डॉ मुनीजा रफीक खान ने लॉकडाउन के दौरान सीजेपी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण ‘करघों की खामोशी’ की रिपोर्ट उपलब्ध कराई। इसके तहत सीजेपी की टीम ने बुनकरी और जरदोजी के काम में लगे विभिन्न शहरों के दो सौ आठ लोगों से बातचीत की। पता चला कि जरदोज़ी का काम करनेवाले लोगों के पास लॉकडाउन से पहले और बाद में कारचोब की संख्या 24 थी। इसका मतलब किसी ने कारचोब नहीं बेचा, क्योंकि वह बहुत सस्ता है। सिर्फ 500 रुपए का, जिसे बेचने पर कुछ भी हाथ नहीं लगेगा। लेकिन लॉकडाउन के बाद सिर्फ 3 कारचोब चल रहे हैं। काम का ऑर्डर नहीं होने के कारण 21 यानी साढ़े सत्तासी प्रतिशत (87.5%) कारचोब बंद हैं ।

जलालीपुरा के अब्दुल्ला कहते हैं कि उनके पास लॉकडाउन से पहले 20 कारचोब थे, लेकिन आज 8  महीने बाद 19 बंद है और कुछ दिनों से सिर्फ एक कारचोब चल रहा है।

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चौहट्टा के आफ़ताब के पास एक कारचोब है। आफताब  और उनके साथ कुछ कारीगर जरदोज़ी का काम कर रहे थे। लेकिन लॉकडाउन के कारण सभी काम अचानक ठप्प हो गया। कारचोब के मालिक और दूसरों के कारचोब पर काम करने वाले कारीगरों के पास कोई काम नहीं है।

कोयला बाजार के शाहिद जमाल बैनर का डिज़ाइन बनाते हैं। ये डिज़ाइन वह जरदोजी का काम करने वालों को देते हैं। कारीगर इस पर जरदोजी का काम करते हैं। जमाल को ऑर्डर विदेशी ग्राहकों से मिलता है। उनके अधिकांश ग्राहक इंग्लैंड, जर्मनी और बेल्जियम के हैं। लॉकडाउन  से पहले वे महीने में 10000-15000 रुपए कमाते थे। अब वे मुश्किल से 2000-4000 रुपए कमा पाते हैं क्योंकि उन्हें पर्याप्त ऑर्डर नहीं मिल रहा है।

गनी ने कहा कि हम जिस काम में हैं वह लगातार संकट में पड़ता जा रहा है। नए-नए ढर्रे चल रहे हैं। कब यह भी बंद हो जाय पता नहीं। लॉकडाउन के दौरान हम कैसे जिये इसे क्या बताएं। कोई सरकारी योजना नहीं है। यहाँ तक कि बाज़ार में इसकी डिमांड भी घट रही है। अभी दो-ढाई से ज्यादा काम नहीं हो पाता। कोई पूंजी नहीं है। यह कारचोब और कमरा है। अपना हुनर है लेकिन उसकी कीमत लगातार घट रही है।’

शाहिद समझाते हैं ‘काम पूरा करके भेज देते हैं लेकिन पेमेंट दो या तीन महीने बाद ही होता है। उनका काम 10- 15 दिन में पूरा हो जाता है, उसके बाद सामान को ग्राहक तक पहुँचने में और 10-15 दिन का समय लगता है और उसके बाद पेमेंट होता है। इसके कारण उन्हें आर्थिक परेशानी होती है। शाहिद को लगता है कि सरकार को हमारी कोई फिक्र नहीं है।

‘अंतर्राष्ट्रीय कूरियर चार्ज वैसे ही ज्यादा है। अब इसके  साथ 12 प्रतिशत जीएसटी भी देना है। ऊपर से भेजे जाने वाले सामान की कीमत को भी पहले जमा करना होता है। यह रकम बाद में वापस की जाती है। शाहिद कहते  हैं ‘कानून ठीक नहीं है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह  काम बंद हो जाएगा।’

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शिवाले की गलियों में अभी भी कुछ लोग काम करते हैं

हमलोग पिछले महीने शिवाला के इलाके में घूमते हुये कई ऐसे छोटे-छोटे कारखानों में गए जहां अभी भी कुछ काम चल रहा था। आमतौर पर इन गलियों में कैमरा लटकाए कोई दिखता है तो कुछ लोग पूछने लगते हैं कि होटल चाहिए या नाव से उस पार चलेंगे। मना करने या महटियाने पर भी वे पिछियाए रहते हैं कि साब बहुत कम बजट में हो जाएगा। हमारे साथ भी कुछ लोग आ लगे और नाव पर बैठने का आग्रह करने लगे। कई इन्कार के बाद भी न मानने पर बनारसी में डांटते ही वे खिसिया कर पीछे हट गए फिर हिकारत से देखते हुये दूर हो गए। लॉकडाउन के बाद यात्रियों का आवागमन अब सामान्य हो रहा है। सब काम रेंगते-रांगते पटरी पर आ रहे हैं।

एक कमरे में लगे तीन कारचोब पर नौजवान कारीगर कढ़ाई कर रहे थे। यह सलवार का कपड़ा था और इसमें साधारण धागे से कढ़ाई हो रही थी। रियाज नामक कारीगर ने बताया कि वह बीस साल से यह काम कर रहे हैं। उनके साथ दूसरे कारचोब पर काम कर रहे सनी को यह काम करते पंद्रह साल हो चुके हैं। दोनों ने बताया कि यह हल्का काम है। इसमें ही गुजारा हो जाता है। भारी काम नहीं आता है। काम से जुड़ी बहुत सी बातों पर उन्होंने कोई तवज्जो नहीं दी बल्कि यह बताया कि अधिक बारीक जानकारी के लिए हमें शिवाला के बड़े कारीगरों से मिलना पड़ेगा।

दूसरे के कारचोब पर सनी पंद्रह साल से इसी काम में लगे हुए हैं

उसी घर के दूसरे कमरे में राबिया और सोनम नाम की दो युवतियाँ मिलीं। दोनों को काम करते हुये 7-8 साल हो चुके हैं। वे अधिक मेहनत करने पर भी कम मजदूरी मिलने की बात से दुखी तो थीं लेकिन अपने हुनर से कमाए पैसे ने उन्हें आत्मनिर्भर बना दिया है। राबिया ने कहा कि ‘हमारे पास काम पहुंचा दिया जाता है और पीस के हिसाब से मजदूरी मिलती है।’ उन्होंने कहा कि ‘मजदूरी अच्छी मिले तो हमारा भी जीवन बेहतर हो सकता है लेकिन आप तो देख ही रहे हैं कि इस कमरे में कारख़ाना है और उस कमरे में गृहस्थी है। यह गली ही हमारा शहर है।’

सोनम कहती हैं कि ‘हम मेहनत तो बहुत करते हैं लेकिन इससे ज्यादा पैसा नहीं कमा सकते। बल्कि जरूरतों को इसके हिसाब से बना लिया है। अब तो बहुत जगहों पर इंब्रायडरी का काम मशीन से होने लगा है। इसमें बारीक काम हम सीख नहीं पाये हैं। लेकिन अगर सारा काम मशीन से होने लगेगा तो हमारी रोजी-रोटी मुश्किल में पड़ जाएगी।’

इस काम में मेहनत के हिसाब से पैसा नहीं है – सोनम

दो गलियों को पार कर हम एक और कारखाने में पहुंचे जहां तीन लोग काम कर रहे थे। उनमें से एक गनी थे, जो इस कारखाने के मालिक हैं। नसीरुद्दीन खान और प्रदीप विश्वकर्मा उनके साथ काम करते हैं। ये लोग पिछले तीस साल से जरदोज़ी का काम कर रहे हैं।

हमारे कुछ भी पूछने पर जवाब से पहले उन्होंने हमें सशंकित नज़रों से देखा और पूछा कि आप लोग किस बात का सर्वे कर रहे हैं। असल में सरकारी-गैरसरकारी सर्वे करनेवाले अनेक लोग उनके यहाँ आते हैं। कई तो उन्हें संभावित सरकारी सुविधाओं की बात भी करते हैं। शायद इसीलिए प्रदीप विश्वकर्मा ने तल्खी से कहा कि ‘बहुत से सर्वे वाले आते हैं लेकिन हमको आजतक कुछ नहीं मिला। आप लोग तो अपना काम कर रहे हैं लेकिन हमको परेशान करने आ गए हैं।’ उन्होंने फोटो खींचने से भी मना कर दिया। नसीरुद्दीन ने कहा ‘कई लोग आधार कार्ड के बारे में पूछते हैं लेकिन हम उनको अपना आधार कार्ड क्यों दिखाएँ।’

नसीरुद्दीन खान और गनी कारचोब पर काम करते हुए

गनी ने कहा कि हम जिस काम में हैं वह लगातार संकट में पड़ता जा रहा है। नए-नए ढर्रे चल रहे हैं। कब यह भी बंद हो जाय पता नहीं। लॉकडाउन के दौरान हम कैसे जिये इसे क्या बताएं। कोई सरकारी योजना नहीं है। यहाँ तक कि बाज़ार में इसकी डिमांड भी घट रही है। अभी दो-ढाई से ज्यादा काम नहीं हो पाता। कोई पूंजी नहीं है। यह कारचोब और कमरा है। अपना हुनर है लेकिन उसकी कीमत लगातार घट रही है।’

प्रदीप विश्वकर्मा, जिन्होंने उनके काम की जानकारी मांगने पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए कहा- बहुत से सर्वे वाले आते हैं लेकिन हमको आजतक कुछ नहीं मिला।

जरदोज़ी के काम में मजदूरी

तमाम दूसरे हस्तशिल्पों की तरह जरदोज़ी का काम भी उतार पर जा रहा है। पहले जहां इस कुटीर उद्योग से सैकड़ों परिवारों का भरण-पोषण होता था वहीं अब इस काम में लगे लोगों की संख्या लगातार घटी है। कहा जा सकता है कि यह काम बुरी तरह मंदी और बदहाली का शिकार हो गया है। मजदूरी ही नहीं घटी बल्कि काम ही खत्म होता जा रहा है।

बनारसी हस्तशिल्प पर लगातार काम कर रही समाजशास्त्री डॉ मुनीजा रफीक खान कहती हैं ‘जरदोज़ी का काम अब हस्तकला नहीं सिर्फ मजदूरी की तरह काम बनकर रह गया है। लोग इस काम के अंतिम रूप को देखते हैं और अक्सर इसमें लगी मेहनत को देख नहीं पाते। जिन लोगों को लॉकडाउन  के पहले रोजाना 12 घंटे काम मिलता था। अब रोजाना सिर्फ 8 घंटे काम मिलता है। कई सारे कारखाने बंद हो रहे हैं। लोगों को जैसा भी काम मिल रहा है वह करने लगे हैं। उदाहरण के लिए साड़ी, सूट, कुर्ती, कुर्ता, शेरवानी, बैज, मुकुट या पर्स जो भी काम हो डिज़ाइन के आधार पर रेट तय होता है। लोगों को 12 घंटे काम के लिए 200 रुपया मजदूरी मिलती है।’

समाजशास्त्री डॉ मुनीजा रफीक खान बताया कि जरदोज़ी का काम अब हस्तकला नहीं सिर्फ मजदूरी की तरह काम बनकर रह गया है

काम सिकुड़ रहा है लेकिन लगातार हताशा बढ़ती जा रही है। पूंजी ने मुनाफ़े के लिए मशीनीकरण को तेज कर दिया है। कासिम अली कहते हैं अब बनारस का काम और जगहों पर चला गया है। मसलन पहले यहाँ मिलिट्री का काम होता था लेकिन अब वह मालेरकोटला, पंजाब में होने लगा है।

क्या सरकार कोई सपोर्ट कर रही है? इस सवाल का जवाब ज्यादातर यह मिलता है कि कभी-कभी राशन मिल जाता है लेकिन जो काम जानते हैं वे चाहते हैं कि उनके काम को प्रोत्साहन मिले। उन्हें बाज़ार मिले और बाहर के ग्राहकों से सीधे काम लेने की सहूलियत दी जाय। जीएसटी के उलझाऊ चक्करों से बचाया जाय। लेकिन ऐसा कब होगा पता नहीं। न्यू गोल्डेन इंब्रायडरी वर्क्स के माजिद अली कहते हैं कि हमको गवर्नमेंट की किसी योजना का कोई लाभ नहीं मिलता है।

जिस तेजी से जरदोज़ी का काम खत्म हो रहा है उसका संकेत भी तो यही है!

रामजी यादव गाँव के लोग के संपादक और कथाकार हैं।

 

 

5 Comments
  1. Sarwat Jamal says

    पूरी सरकारी मशीनरी लघु उद्योग, कुटीर उद्योग, फेरी, फुटपाथ, रेहड़ी व्यवसाय को ख़त्म करने की जी तोड़ कोशिश में लगी हुई है। 90% काम तमाम भी हो चुका है। विदेशी आक़ाओं पर निर्भर कर देने की पॉलिसी पर अमल हो रहा है। यह काम हर पार्टी की सरकार ने किया है।

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