Saturday, March 2, 2024
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बुनाई उद्योग को प्रभावित कर रहा है पूर्वांचल का साम्प्रदायिक विभाजन

वाराणसी। महामारी कोविड-19 के समय आर्थिक और सामाजिक अलगाव की विशेष परिस्थिति में भारत के मजदूर वर्ग में बढ़ते अनियमितीकरण से तीन तरफा मार पड़ी। वे भेदभाव के शिकार हुए। उन्हें आर्थिक रूप से हाशिये पर धकेलकर काम से बाहर कर दिया गया। यह सभी स्तर पर काम करने वाले कारीगर और मजदूरों के साथ […]

वाराणसी। महामारी कोविड-19 के समय आर्थिक और सामाजिक अलगाव की विशेष परिस्थिति में भारत के मजदूर वर्ग में बढ़ते अनियमितीकरण से तीन तरफा मार पड़ी। वे भेदभाव के शिकार हुए। उन्हें आर्थिक रूप से हाशिये पर धकेलकर काम से बाहर कर दिया गया। यह सभी स्तर पर काम करने वाले कारीगर और मजदूरों के साथ हुआ। इसका सबसे ज्यादा असर महिला कामगारों पर हुआ। बुनाई उद्योग में बड़ी मात्रा में सामाजिक और आर्थिक रूप से हाशिये पर रहने वाले मुसलमान, दलित और अन्य पिछड़े वर्ग के काम करने का भी अपना महत्व है। इस क्षेत्र के मजदूरों पर आने वाले संकट के समय सरकार की नीति संबंधी निष्क्रियता, अस्पष्टता या दुश्मना बर्ताव, इन तबकों का राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक पटल पर इनके बेजुबां होने का लक्षण है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जिलों को अलग-अलग तरह के बुनाई के काम के लिए जाना और माना जाता है। जनसंख्या में भारत के सबसे बड़े राज्य में इस क्षेत्र के अंतर-समुदाय और अंतर-जातिय संघर्षों में भी हिस्सेदारी है। इनमें कुछ संघर्ष अंग्रेजी राज में हुए थे। उन्हें औपनिवेशिक चश्मे से देखा गया। इस चश्मे से इसे देखा जाना, सच्चे इतिहास से परे समझ का निर्माण करने का औज़ार बना। इतिहास की इस समझ को 1970 के दशक से चुनौती मिलनी शुरु हुई (ज्ञानेंद्र पांडे, 1990, कंस्ट्रक्शन ऑफ कम्यूनलिज्म इन कोलोनियल नॉर्थ इंडिया, पॉल ब्रास्स, 2004, द प्रोडक्शन ऑफ हिन्दू- मुस्लिम वायलेंस इन कंटेम्पररी इंडिया)।

1980 के दशक में मुसलमान समुदाय से कारोबारी, व्यापारी और कारीगरों के मजबूती से उभरने के कारण भी सघर्ष पैदा हुआ (1970, जुयाल बीएन, रफीक खान कम्युनल रायट एंड कम्यूनल पॉलिटिक्स: केस स्टडी ऑफ ए टाउन)।

इसके एक दशक बाद 1980 के दशक से 1990 के दशक की शुरुआत में बहुसंख्यकवादी सांप्रदायिक राजनीति का उभार हुआ, जो भारतीय राज्य के चरित्र को ही मूलभूत रूप से बदलना चाहता है। मऊ और बनारस जैसे शहरी केंद्र सांप्रदायिक दंगों का गवाह बने (1984, रफीक खान एंड एस मित्तल, कम्युनल वायलेंस एंड रोल ऑफ पुलिस)। ये दंगे न सिर्फ पहले के दंगों से ज्यादा क्रूर थे, बल्कि इन दंगों में वर्दीधारी राज्य की प्रतिनिधि पुलिस और पीएसी ने ज्यादा आक्रामक एवं हिंसक भूमिका निभाई (डॉक्टर मुनीज़ा खान, 1991, ए रिपोर्ट ऑन द  कम्युनल रायट इन वाराणसी)

“बनारसी साड़ी की चकाचौंध और हथकरघा तथा पावरलूम के आकर्षण के पीछे एक समुदाय का हुनर और मेहनत है। ये लोग मुसलमान अंसारी समाज, दलित समाज, अन्य पिछड़े वर्ग और मुसलमानों की कुछ उच्च जातियों से आते हैं। आज यह पूरा बुनकर समाज पूरी तरह से गरीबी के शिकंजे में आ गया है और नजरों से ओझल हो चुका है (2019, वर्ल्ड ऑफ बनारस वीवर, रमन )”

इस अध्ययन के पात्रों (समुदाय) पर होने वाले संस्थानिक भेदभाव और हिंसा का समय-समय पर दस्तावेजीकरण किया गया है। यह भेदभाव बुनियादी सुविधाओं की पहुंच से दूर रखने, सरकारी और निजी क्षेत्र में नौकरी नहीं देने एवं शिक्षा तथा स्वास्थ्य सेवा से वंचित रखने में दिखता है। व्यवस्था और संस्थानिक पूर्वाग्रहों के साये में किसी भी तरह से अपनी जिंदगी की गाड़ी चलाने वालों को क्रूर हिंसा का शिकार बनाया जाता है। यह उन्हें सबसे ज्यादा असुरक्षित बना देता है।

इन इलाकों और यहां के लोगों के प्रति शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच (सरकारी स्कूल और अस्पताल खोलने ) के मामले में भेदभाव किया जाता है। इसके कारण यहां के लोगों के हाशिये की स्थिति हमेशा बनी रहती है और सामान्यतः सरकारी सेवा उनकी पहुंच से बाहर रह जाती है। अल्पसंख्यक बहुल शहरी और यहां तक कि ग्रामीण इलाके में साफ-सफाई और शौचालय को नज़रंदाज किया जाता है, जिससे इन इलाकों में गंदगी का ढेर लगा रहता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों की स्थिति भी बदतर है। एक नागरिक होने के नाते लोग सरकार से सम्मानजनक और सुरक्षित जिंदगी को सुनिश्चित करने के लिये बुनियादी एवं मूलभूत सुविधा मुहैया कराने की उम्मीद करते हैं। सरकार द्वारा इस उम्मीद को पूरा नहीं करने की स्थिति में इस समुदाय की सरकार पर भरोसे की चोट पहुंची है और वे इसके साथ अपनापन महसूस नहीं करते हैं।

2020 और उसके बाद तालाबंदी के कारण बुनकर समुदाय को काम मिलना बहुत कम हो गया और फांकाकशी की नौबत आ गई। इस स्थिति में कुछ लोगों ने बुनाई का काम छोड़कर चाय की दुकान या अन्य दिहाड़ी के काम करने लगे। कुछ लोगों ने ना-उम्मीदी में आत्महत्या कर ली। इस त्रासद और तकलीफदेह स्थिति में मुसलमान समुदाय के प्रति उत्तर प्रदेश पुलिस का भेदभाव खुलकर सामने आया। बहुसंख्यक समुदाय की दुकानों को खोलने दिया गया, लेकिन अल्पसंख्यक समुदाय की दुकानों को जबरन बंद किया गया।

“दो साल बाद, नवम्बर 2016 में भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और खासकर बनारस के बुनाई उद्योग को नोटबंदी के रूप में पहला बड़ा झटका लगा। नीति बनाने वाले बनारस के बुनाई के आकर्षक पहलू को देश के दूसरे भागों में ले जाने की तैयारी कर रहे थे।”

हमें सरकार की बहुप्रचारित योजनाओं में बड़े स्तर पर आंकड़ों में घालमेल करने का पता चला। उदाहरण के  लिये 2017 में महात्मा गांधी बुनकर बीमा योजना को कमज़ोर करने से बुनकर समुदाय की सामाजिक सुरक्षा पर घातक मार पड़ी। इस रिपोर्ट में प्रस्तुत किए गए विश्लेषण और आंकड़े चिंता का सबब हैं। राज्य सरकार तथा प्रशासन के प्रति बुनकर समाज का भरोसा इतना कम है कि कुछ विश्लेषणों में  इसे पूरी तरह से नदारद पाया गया। सर्वे में हिस्सा लेने वालों में से 89 प्रतिशत सरकार की राहत योजनाओं जैसे राशन, जनधन खाते में सरकार द्वारा दी जाने वाली आर्थिक मदद, बिजली का गलत बिल या बिजली में रियायती दर लेने, नाला निकासी की समस्या के लिए सरकार और प्रशासन के पास नहीं गए या नहीं जा पाये। शेष छोटा हिस्सा जिसने सरकार को गुहार लगाई, उन्हें कोई राहत नहीं मिली और वे प्रशासन के रवैये से संतुष्ट नहीं हुए।

पहली मई, 2016 को केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना न सिर्फ सरकार की प्रमुख योजना है, बल्कि इस योजना के प्रचार-प्रसार में सरकारी कोष से करोड़ों रुपये खर्च किए गए। इस योजना के व्यापक प्रचार-प्रसार के बावजूद हमारे विस्तृत सैम्पल में सिर्फ 21 महिलाओं यानी सैम्पल की सिर्फ 10 प्रतिशत महिलाओं की इस योजना में पंजीकृत होने की बात सामने आयी। शेष 90 प्रतिशत महिलाओं का पंजीकरण नहीं हो पाया। इन महिलाओं ने पंजीकरण कराने की पूरी कोशिश की। पिछले 1-2 साल में इन महिलाओं ने 4-5 बार पंजीकरण फॉर्म भी भरा, लेकिन इनके हाथ कुछ नहीं लगा। यही हाल बहुप्रचारित प्रधानमंत्री जनधन योजना का हुआ। इस योजना के तहत सरकार द्वारा जरूरतमंदों के खाते में पैसा डालकर आर्थिक मदद के लिए बैंक खाता खोला गया। सर्वे में हिस्सा लेने वाले सभी लोगों ने बताया कि उन्होनें खाता खोलने के लिए लाइन में इंतजार किया, लेकिन उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ। 52 प्रतिशत लोग तो बैंक खाता भी नहीं खोल पाये। खाता खोलने वालों में 58 प्रतिशत लोग ही ऐसे थे, जिनके खाते में दुबारा पैसा आया यानी एक बार से अधिक पैसा आया।

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आखिर कब तक बुनकर सामान्य नागरिक सुविधाओं से वंचित किए जाते रहेंगे?

बनारसी साड़ी की चकाचौंध और हथकरघा तथा पावरलूम के आकर्षण के पीछे एक समुदाय का हुनर और मेहनत है। ये लोग मुसलमान अंसारी समाज, दलित समाज, अन्य पिछड़े वर्ग और मुसलमानों की कुछ उच्च जातियों से आते हैं। आज यह पूरा बुनकर समाज पूरी तरह से गरीबी के शिकंजे में आ गया है और नजरों से ओझल हो चुका है (2019, वर्ल्ड ऑफ बनारस वीवर, रमन)। इनकी राजनीतिक, आर्थिक नीति तथा निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए मुखर और जानकारी से लैस जनसंवाद की जरूरत है।

व्यापारिक मीडिया खासकर टेलीविजन चैनलों की विभाजनकारी विमर्श को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका रही। इन चैनलों की खबरें न सिर्फ झूठी थीं, बल्कि इनका मकसद संविधानविरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना था। परिणामस्वरूप बुनकर समुदाय सहित अल्पसंख्यकों को जिल्लत और तकलीफ़ों का सामना करना पड़ा। बड़ी संख्या में सर्वे में हिस्सा लेने वाले लोगों ने अपने पड़ोस में आर्थिक बहिष्कार का सामना करने के बारे में बताया। टेलीविजन में जान-बूझकर महामारी के पैर पसारने के कुछ दिन और सप्ताह के अंदर इसे एक समुदाय के साथ जोड़ दिया और ऐसा करने के लिए ‘कोरोना जिहाद’ और ‘महामारी का सुपर स्प्रेडर’ जैसे शब्दों का उपयोग किया गया।

सन 2014-2022 के दौरान पूर्वांचल के चार जिलों के बुनकर/ कारीगरों पर सीजेपी की तथ्य अनुसंधान रिपोर्ट 2020 में आई। यह रिपोर्ट  पूर्वांचल की राजनीति के मानचित्र में महत्वपूर्ण बदलाव होने के पूरे साढ़े छह साल बाद आई। हालांकि भारतीय जनता पार्टी राज्य में पहली बार 1991 में सत्ता में आई थी। बीजेपी की सत्ता में आने के पीछे जातीय समीकरण को सफल रूप में साधने का अभियान और 1991 में क्रूर सांप्रदायिक दंगों का होना है। सांप्रदायिक दंगों का यह सिलसिला 6 दिसम्बर, 1992 में बाबरी मस्जिद को तोड़ने के बाद फिर शुरू हुआ। भेदभावपूर्ण शासन को एक तरफ मुसलमानों को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिदृश्य से अदृश्य कर देने और दूसरी तरफ खुल्लमखुल्ला बहुसंख्यकवाद से स्वीकृति मिली। यह रुझान 2014 के बाद और स्पष्ट रूप से दिखने लगा, क्योंकि कुछ अन्य पहलुओं के साथ भारतीय प्रजातंत्र को हिन्दू राष्ट्र बनाने का सांस्कृतिक बिगुल भी फूंका गया। बनारस से नरेंद्र मोदी का लोकसभा सदस्य बनने और उनके द्वारा विश्वनाथ मंदिर में जीत का धार्मिक-सांस्कृतिक प्रदर्शन भारतीय राजनीति के परिवर्तन चक्र की शुरुआत है।

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अब यह सांस्कृतिक वर्चस्व अयोध्या (फैज़ाबाद) के राम मंदिर पर कार्यक्रम के लिए राज्य के वित्तीय पोषण में दिखता है। इसे आगे बढ़ाते हुए अब वाराणसी के विश्वनाथ मंदिर को वर्चस्व के नए प्रतीक के रूप में स्थापित किया जा चुका है। नए सिरे से गढ़े जाने वाले कथन को स्थापित करने की कोशिश में पिछले दो सालों में पारंपरिक रूप से बनारस के घर-घर में चलने वाला बुनाई उद्योग, व्यापार, गली और मंदिर तोड़ दिए गए हैं, तोड़े जा रहे हैं। विरासत खत्म की जा रही है।

दो साल बाद, नवम्बर 2016 में भारत की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और खासकर बनारस के बुनाई उद्योग को नोटबंदी के रूप में पहला बड़ा झटका लगा। नीति बनाने वाले बनारस के बुनाई के आकर्षक पहलू को देश के दूसरे भागों में ले जाने की तैयारी कर रहे थे।

इन सभी कारकों को समझने और विश्लेषण करने की ज़रूरत है। ऐसा करके हम लंबे अरसे से सामाजिक-राजनीतिक बहिष्कार का सामना करते आ रहे बुनकर समाज पर होने वाले प्रभाव को समझ पाएंगे।

सावधानी से डाटा जुटाने के बाद तैयार की गई इस रिपोर्ट (पूर्वांचल बुनकरों का संकट-करघों की खामोशी) की तफ़सीली और तटस्थ ब्योरा 21वीं सदी के भारत की धूमिल तस्वीर को सामने लाता है। बुनकर समाज की मांग और सिफ़ारिशों को सरकार और अन्य लोगों के ध्यान में लाना सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक रूप से बहुत कुछ करने की जरूरत है।

(आंकड़ें और तथ्य पूर्वांचल : बुनकरों का संकट-करघों की खामोशी  नामक रिपोर्ट से संगृहित)।
डॉ मुनीज़ा रफ़ीक़ खान
डॉ मुनीज़ा रफ़ीक़ खान जानी-मानी समाजशास्त्री और गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ता हैं। बुनकरों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की आजीविका तथा उत्पीड़न पर उनका उल्लेखनीय काम है।

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