Saturday, April 13, 2024
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देश का नया राजनीतिक विकल्प बन सकती है ‘नफरत के खिलाफ प्रेम की पाठशाला’

नई राजनीतिक संभावनाओं की जमीन बनती कर्नाटक की जीत-हार, पूरे देश ने फालो किया, यह मॉडल तो  ‘मयाऊँ’ में बदल सकती है मोदी की हुंकार वाराणसी। कर्नाटक चुनाव में भाजपा की बड़ी हार हुई है। भाजपा की यह हार सिर्फ राज्य चुनाव का मामला नहीं है बल्कि इस हार ने सम्पूर्ण विपक्ष को वह चाभी […]

नई राजनीतिक संभावनाओं की जमीन बनती कर्नाटक की जीत-हार, पूरे देश ने फालो किया, यह मॉडल तो  ‘मयाऊँ’ में बदल सकती है मोदी की हुंकार

वाराणसी। कर्नाटक चुनाव में भाजपा की बड़ी हार हुई है। भाजपा की यह हार सिर्फ राज्य चुनाव का मामला नहीं है बल्कि इस हार ने सम्पूर्ण विपक्ष को वह चाभी दे दी है जिससे भाजपा देश की राजनीति से बाहर किया जा सकता है। भाजपा ने इस प्रदेश को पूर्ण बहुमत से जीतने के लिए हर उस टोटके का भरपूर इस्तेमाल  किया था, जिसके दम पर वह अब तक पूरे देश को जीतने का स्वप्न देख रही थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रांड इमेज से सजा सँवारकर खुद को देश के सबसे ताकतवर व्यक्ति के रूप में पेश किया था। इसके साथ धार्मिक ध्रुवीकरण की हर कोशिश भी की थी। चुनाव प्रचार में भाषा और भंगिमा दोनों के साथ उन्होंने कट्टर और उग्र हिन्दुत्व को स्थापित करने का पूरा प्रयास किया था। टीपू सुल्तान के खिलाफ जंग का जिम्मा बजरंग बली को सौंप दिया था। शायद उत्तर प्रदेश या कोई अन्य हिन्दी भाषी पट्टी होती तो मोदी जी के इस कौशल पर बलिहारी हो जाती। वह मंहगाई, बेरोजगारी, सरकारी उपक्रमों के निजी हाथ में बेच दिए जाने को भूलकर घृणा के उस पक्ष के साथ खड़ी होती जो विभाजन के सहारे खुद को आभासी गर्व में भर देता है। कर्नाटक की जनता ने छल, छद्म, पाखंड की राजनीति के खिलाफ राहुल गांधी, सिद्धारमैया और डीके शिव कुमार के मॉडल को चुना और भाजपा की नफरती राजनीति को हाशिये पर कर दिया। भाजपा की इस हार ने अब तक शांत हो चुके विरोध के स्वर को पुनर्जीवित होने का मौका दे दिया। मीडिया और तमाम मैनेजमेंट के सहारे भाजपा ने अब तक अपनी जो अपराजेय छवि का निर्माण किया था, वह पूरी तरह से कांग्रेस की जीत के साथ दरक गई। कर्नाटक की जनता ने नरेंद्र मोदी के सभी दांव को फेल कर बता दिया कि भाजपा भारत और राष्ट्र की प्रतीक नहीं है। भाजपा ना तो इस देश का गौरव बन सकती है न ही उदार हिन्दुत्व की कोई नई रूपरेखा विकसित कर सकती है।

आइए, देखते हैं कि कर्नाटक में कांग्रेस की जीत और भाजपा की हार के मुख्य फैक्टर क्या हैं और उन फैक्टर को भी समझते हैं, जिनकी वजह से कांग्रेस के अलावा दूसरी पार्टियां भी यह महसूस कर रही हैं कि वह भी अब भाजपा को न सिर्फ चुनौती दे सकती हैं बल्कि उसका पराभव भी कर सकती हैं।

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भाजपा की हार का सबसे बड़ा कारण रहा उसका हिंदी पट्टी होना जिसकी वजह से भाजपा के द्वारा भाषिक तौर पर प्रयोग किये गए जहर बुझे शब्द बाण कर्नाटक की जनता के कान में हिन्दी भाषी पट्टी की तरह विभाजन का जहर घोलने में कामयाब नहीं हो सके। कांग्रेस ने शांति के पक्ष में कर्नाटक में बजरंग दल को बैन करने की बात कर मुस्लिम और ईसाई समुदाय को एक झटके में अपने साथ मिला लिया। वहीं भाजपा ने इस बैन के खिलाफ बजरंग दल जैसे उग्र संगठन को हिन्दू आस्था के केंद्र में स्थापित बजरंग बली को बजरंग दल का प्रतीक बताकर जिस तरह उग्र आक्रोश के साथ प्रदर्शन किया। उसने लोगों को भावनात्मक रूप से आस्था के आधार पर भाजपा के साथ जोड़ने के बजाय भाजपा से दूर करने का काम किया। राहुल गांधी और कांग्रेस ने समझदारी दिखाते हुए बजरंग बली पर कोई भी राजनीतिक हमला नहीं किया और लोगों को यह बताने में भी वह कामयाब रहे कि कर्नाटक में भ्रष्टाचार में डूबी भाजपा अपने चेहरे पर जिस तरह से बजरंग बली का मुखौटा लगा रही है। वह हिन्दू आस्था का अपमान है। कर्नाटक ने अपने देवता के राजनीतिक दुरुपयोग पर नाराजगी जताते हुए भाजपा से दूरी बनाकर भाजपा को यह बताने का काम किया कि आस्था को घृणा का जामा पहनाकर हिंदुओं को लंबे समय तक बरगलाया नहीं जा सकता है।  कर्नाटक भाजपा पार्टी के साथ 40% कमीशन खोरी का टैग भी पूरे चुनाव के दौरान ट्रेंड करता रहा इससे भी भाजपा को बड़ा नुकसान हुआ। भाजपा ने अपना जनाधार खुद ही खोया था पर उसे इस तरह से पराजित करने में कांग्रेस ने बड़ा दांव चला जिसके आगे भाजपा का हर प्रयास असफल साबित हुआ।

[bs-quote quote=”सिद्धारमैया ने इस पूरे समाज को बताया कि भाजपा का हिन्दुत्व मनुवाद का ही संस्करण है जो किसी दूसरे धर्म से ज्यादा उन हिन्दू जातियों के खिलाफ है जो हिन्दू समाज में शूद्र के रूप में दर्ज की गई हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”#1e73be” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

राहुल गांधी ने अपनी भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से कांग्रेस को हाशिये से लाकर सेंटर में वापस खड़ा कर दिया था। डीके शिवकुमार ने कर्नाटक को अच्छे स्टेडियम में पहले से ही तब्दील किया हुआ था। राहुल गांधी ने उस स्टेडियम में लोगों को किसी तरह का तमाशा दिखाने के बजाय बहुत ही शालीन तौर पर लोगों से भावनात्मक जुड़ाव का प्रयास किया। राहुल ने धर्म और जातीय विभाजन जैसी राजनीति से इतनी दूरी बरती की राहुल गांधी और नरेंद्र मोदी समकाल की राजनीति में 180 डिग्री पर दो अलग ध्रुव के तौर पर दिखने लगे। नरेंद्र मोदी गरीबी और फकीरी की बात करते हुए भी कभी गरीब समाज से जुड़ नहीं पाये वहीं राहुल गांधी सहज तौर पर आम आदमी से कनेक्ट होते गए वजह साफ थी कि राहुल गांधी किसी भी तरह से खुद को महामानव के रूप में दिखाने का प्रयास नहीं  किया था जबकि नरेंद्र मोदी लगातार खुद को शक्ति का केंद्र दिखाने में जुटे हुए थे।

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अब बात करते हैं कांग्रेस के उस मॉडल की, जिसने पूरे विपक्ष को भाजपा के खिलाफ ताकत देने का काम किया है और  बहुत हद तक उस मॉडल के पैरोकार अब कर्नाटक के मुख्यमंत्री बन चुके सिद्धारमैया हैं।  सिद्धारमैया ने सामाजिक न्याय की लड़ाई में पिछड़े, अति पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के हित को न सिर्फ केंद्र में रखा बल्कि लंबे समय से उनके अधिकारों के लिए आंदोलन चलाते हुए खुद को विश्वसनीय चेहरे में बदला और उन्हे यह भी समझाने में सफलता अर्जित की कि यह समाज धर्म के सहारे आगे नहीं बढ़ सकता बल्कि भाजपा के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद में इस पूरे समाज के आगे बढ़ने की कोई संभावना नहीं है। सिद्धारमैया ने इस पूरे समाज को बताया कि भाजपा का हिन्दुत्व मनुवाद का ही संस्करण है जो किसी दूसरे धर्म से ज्यादा उन हिन्दू जातियों के खिलाफ है जो हिन्दू समाज में शूद्र के रूप में दर्ज की गई हैं। कभी कांशीराम और मुलायम सिंह यादव ने उत्तर प्रदेश में शूद्र समाज की राजनीति को फ्रंट पर लाकर ब्राह्मण वर्चस्व की राजनीति को पूरी तरह से हाशिये पर धकेल दिया था पर बाद में मायावती ने सत्ता की महत्वाकांक्षा में उस आंदोलन को नष्ट कर कर दिया था पर अंब सिद्धारमैया ने उस आंदोलन को दुबारा कर्नाटक की राजनीति में वापस स्थापित कर यह साबित कर दिया है कि सामाजिक न्याय की लड़ाई ही भाजपा की विभाजनकारी सोच को हाशिये पर धकेल सकती है। फिलहाल अब तमाम पार्टियां सामाजिक न्याय के इस मॉडल को अपने एजेंडे में सबसे आगे रखने को लेकर उत्साहित दिख रही हैं वहीं इस माडल की अब तक सफलता यह बताती रही है कि अगर विपक्ष ने इस दांव को सही तरीके से लागू करने में सफलता अर्जित की तो नि:*सन्देह तमाम हुंकारे मिमियाहट और मयाऊँ में बदल सकती हैं।

कांग्रेस की इस जीत से भारतीय राजनीति में नई संभावनाएं जन्मती दिख रही हैं। अगर ये संभावनाए पूरे देश में एकीकृत हुई तो पूरे देश की राजनीति में बड़ा उलट-फेर हो सकता है।

कुमार विजय गाँव के लोग डॉट कॉम के मुख्य संवाददाता हैं।

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