मुल्क में जहर घोलता आरएसएस (डायरी 13 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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भाजपा अब सियासत करना जान गई है। यह इस वजह से भी संभव हुआ है क्योंकि वह 2014 से सत्ता में है। दरअसल, सियासत करने के लिए सत्ता में होना जरूरी है और जब सत्ता होती है तो यह आवश्यक होता है कि वह तंत्र को अपने हिसाब से बदले। इसके लिए एक टर्म काफी नहीं। लंबे समय तक सत्ता में बने रहने के लिए कुछ तैयारियां करनी होती हैं, और इन तैयारियों को करने में ही पहले पांच साल समाप्त हो जाते हैं। लेकिन आरएसएस की अगुआई में भाजपा ने यह काम आसानी से कर लिया है। हालांकि अब भी पूरा का पूरा तंत्र भाजपामय नहीं हो पाया है, लेकिन यह तो कहा ही जा सकता है कि 99 फीसदी संवैधानिक संस्थाओं को भाजपा ने अपने रंग में रंग दिया है।
दिलचस्प यह भी है कि अखबारों पर भी भाजपा का रंग खूब गहरा हो गया है। अखबारों के संपादकीय पन्ने इसकी गवाही देते हैं। मसलन, आज दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता का संपादकीय पन्ना पढ़कर कोई यह नहीं कह सकता है कि यह एक अखबार का संपादकीय पन्ना है। कहा केवल यह जा सकता है कि संपादकों ने सरकार की दलाली की है।
आज जनसत्ता की मुख्य संपादकीय टिप्पणी इस बात को लेकर है कि मदरसों में राष्ट्रगान क्यों न गवाए जाएं। अखबार लिखता है कि राष्ट्रगान से बच्चों में देशभक्ति की भावना बढ़ेगी। गोया अबतक मदरसे में जो बच्चे पढ़ते रहे हैं, वे देशद्रोही हुए हों। जनसत्ता की यह संपादकीय टिप्पणी उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले के समर्थन में है, जिसमें उसने सभी मदरसों में राष्ट्रगान गाए जाने को अनिवार्य कर दिया है।
मैं तो अपने बचपन को याद कर रहा हूं। मेरी पढ़ाई की शुरुआत एक निजी विद्यालय से हुई जो कि मेरे ही गांव में मेरे घर से करीब 400 मीटर दूर था। तब मैं इतना छोटा था कि कुछ भी याद नहीं है कि स्कूल में क्या गाया जाता था। बस इतना याद है कि मां मेरे लंबे बालों को खूब कसके बांध देती थी और मैं अपनी चोटी खोलने में व्यस्त रहता था। इसके बाद की पढ़ाई एक सरकारी स्कूल में हुई। वहां बोरा लेकर जाना पड़ता थ। हालांकि तब स्कूल में बेंच की व्यवस्था थी, लेकिन छोटे बच्चे कहीं गिर ना जाएं, यही सोचकर स्कूल में हमारे लिए जमीन पर बैठने का निर्देश था। स्कूल में राष्ट्रगान भी होता था और उसके पहले एक प्रिंसिपल सर जो कि ब्राह्मण थे, गायत्री मंत्र का पाठ कराते थे। तो बचपन में ही गायत्री मंत्र याद हो गया था। तब यह सवाल जेहन में नहीं आया था कि आखिर हम स्कूल आए हैं तो हमें भक्ति का पाठ क्यों पढ़ाया जा रहा है?

आज जनसत्ता की मुख्य संपादकीय टिप्पणी इस बात को लेकर है कि मदरसों में राष्ट्रगान क्यों न गवाए जाएं। अखबार लिखता है कि राष्ट्रगान से बच्चों में देशभक्ति की भावना बढ़ेगी। गोया अबतक मदरसे में जो बच्चे पढ़ते रहे हैं, वे देशद्रोही हुए हों। जनसत्ता की यह संपादकीय टिप्पणी उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले के समर्थन में है

 

खैर, स्कूल और मदरसे में फर्क है। मदरसे धार्मिक शिक्षा के केंद्र माने जाते रहे हैं। हालांकि मदरसों ने अपने आपको बदला है। वहां भी अब मजहबी शिक्षा के अलावा अन्य विषयों की पढ़ाई करायी जाती है। एक बार रिपोर्टिंग के दौरान पश्चिमी यूपी के एक मदरसे में गया था। हालांकि दृश्य बहुत अच्छा नहीं था। कई बच्चों के पोशाक गंदे थे। गुसलखाने की स्थािति अच्छी नहीं थी। पानी पीने की व्यवस्था मदरसे की दुर्दशा को बयां कर रही थी। मैं जिस मदरसे में गया था, उसे यूपी सरकार द्वारा अनुदान मिलता है और यह बात उसके साइन बोर्ड पर लिखा मिला। एक जिम्मेदार अधिकारी से पूछा तो जवाब मिला कि सरकार जो अनुदान देती है, वह ऊंट के मुंह में जीरा के समान है।
फिर यह मदरसा चलता कैसे है? कैसे आप अपने शिक्षकों को तनख्वाह दे पाते हैं? सवाल कई थे और जवाब केवल इतना ही कि सब हो जाता है। गोया सब अल्लाह कर देता हो।
बाद में मैंने अपनी एक रिपोर्ट में सच्चर कमीशन की रपट के हवाले से और अपनी खुद की रिपोर्टिंग के आधार पर मदरसों के हालात के बारे में लिखा। कुल मिलाकर निष्कर्ष यह था कि मदरसों में अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों के होते हैं। जातिगत पृष्ठभूमि की बात करूं तो अजलाफ और अरजाल समुदाय के बच्चे। अजलाफ और अरजाल को ऐसे समझिए कि ओबीसी और दलित वर्ग के बच्चे। अरजाल समुदाय मुसलमानों की वह जमात है जिसे छूना भी अशराफ यानी मुसलमानों की उच्च जातियां अपनी तौहीन समझते हैं। अजलाफों को भी वे हीन मानते हैं, लेकिन चूंकि सैयद, शेख और पठान आदि जातियां खुद को श्रेष्ठ मानती हैं तथा इसी अहंकार में बहुत सारे काम वे खुद नहीं करता चाहते हैं तो अजलाफों की मदद लेते हैं।
तो मामला यह था कि मदरसे केवल उनके लिए है जो वंचित तबकों के हैं। अशराफ बहुत कम ही होते हैं जो अपने बच्चों को अब मदरसों में भेजते हैं। हालांकि मदरसों के संचालन के लिए जकात (अपनी आय का एक छोटा सा हिस्सा) वे जरूर देते हैं और वह भी इस उम्मीद में कि उन्हें पुण्य की प्राप्ति होगी।
खैर, मैं मदरसों के बारे में लिख इसलिए रहा हूं क्योंकि यह उन बच्चों से संबंधित है जो मेरे जैसे रहे हैं। मेरा जन्म बहुत गरीब परिवार में नहीं हुआ कि खाने की समस्या हो। लेकिन हर दिन खाने में दाल मिले, यह स्थिति भी नहीं थी। अरहर और चने की दाल तो तभी नसीब होती थी जब कोई मेहमान आता था।
तो मतलब यह कि मदरसों का आधुनिकीकरण हो। मुसलमान समाज के लोगों को लगता है कि उनके बच्चे मजहबी ज्ञान पाएं तो वे अपने मदरसे को इसी रूप में रखें। उसे सामान्य शिक्षा का हिस्सा न बनाएं। रही बात राष्ट्रगान की तो मुझे नहीं लगता है कि राष्ट्रगान गाने से कोई देशभक्त हो जाता है।
मुझे तो बारह साल हो गए राष्ट्रगान गुनगुनाए हुए। इच्छा भी नहीं होती। आखिर क्यों गाया जाय जब इस देश में इतनी विषमताएं हैं? यह दिखावा क्यों? शिक्षा केंद्रों का विकास हो। बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण करेंगे तो वे स्वयं ही देशभक्त बनेंगे।

मदरसों में अधिकांश बच्चे गरीब परिवारों के होते हैं। जातिगत पृष्ठभूमि की बात करूं तो अजलाफ और अरजाल समुदाय के बच्चे। अजलाफ और अरजाल को ऐसे समझिए कि ओबीसी और दलित वर्ग के बच्चे। अरजाल समुदाय मुसलमानों की वह जमात है जिसे छूना भी अशराफ यानी मुसलमानों की उच्च जातियां अपनी तौहीन समझते हैं। अजलाफों को भी वे हीन मानते हैं, लेकिन चूंकि सैयद, शेख और पठान आदि जातियां खुद को श्रेष्ठ मानती हैं

 

और रही बात उत्तर प्रदेश सरकार के फैसले की तो यह सब आजकल भाजपा की आक्रामक राजनीति का हिस्सा है। उसने सुप्रीम कोर्ट से लेकर देश की निचली अदालतों तक को उलझाकर रखा है कि वे हिंदू-मुसलमानों वाले सवालों को तवज्जो दें। इसी क्रम में कहीं कोई अदालत ज्ञानवापी मस्जिद में वीडियोग्राफी का आदेश जारी कर रहा है तो कोई ताजमहल के संबंध में। आप ध्यान से देखेंगे तो आरएसएस ने इस देश के हर तंत्र को हाइजैक कर लिया है।
कल की ही बात है। दफ्तर जाने के लिए निर्माण विहार मेट्रो स्टेशन पहुंचा तो वहां दिल्ली मेट्रो के सौजन्य से एक होर्डिंग पर एक कश्मीरी ब्राह्मण की बात लिखी थी। उसमें बताया गया है कि वह आदमी पहले स्वतंत्रता सेनानी था और लड़कियों की शादी करवाता था। 1990 में आतंकियों ने उसकी और उसके एक बेटे की हत्या कर दी।
Two Eye witnesses claim that Long pillar stones artifacts and lotus on the wall found in Gyanvapi Mosque premises- ज्ञानवापी मस्जिद के दो गवाहों की आंखों देखी: तहखाने में लंबे-लंबे खंभे के
ज्ञानवापी मस्जिद,वाराणसी
तो अब सोचा जा सकता है कि किस तरह की सूचनाओं से आरएसएस इस देश को भर देना चाहता है। यह बहुत खतरनाक स्थिति के संकेत हैं।
कल मेरी प्रेमिका ने कहा पलायन पर सोचो। और सोचा तो कविता कुछ ऐसी बनी।
जो शूद्र हैं
भूमिहीन हैं
उन्हें भूमिहार-ब्राह्मण के लौंडे
राह चलते 
गालियां देते हैं
खटिया तो खटिया
जमीन पर बैठने की
इजाजत नहीं देते
कुछ कहने पर
कभी दो-चार थप्पड़ लगा देते हैं
तो कभी
मां-बहन की गंदी गाली देते हैं
और विरोध करने पर तो
घर में घुस आते हैं
मारते-पीटते हैं
बहन-बेटी के साथ
जबदरस्ती करते हैं।
आखिर कोई कितना सहे?
जो शूद्र हैं
जो भूमिहीन हैं
मुल्क का ख्वाब देखते हैं
शहरों में आते हैं
दो पैसा कमाते हैं
फिर दो से चार पैसा
कमाने की जुगत लगाते हैं
और फिर
बच्चों को पढ़ाते हैं
सब जीवन को 
जीवन बनाते हैं।
इसलिए–
जो शूद्र हैं
जो भूमिहीन हैं
जानते हैं पलायन
समझते हैं पलायन
करते हैं पलायन
पलायन कर जीते हैं
और फिर बेशक
मरने पर अपनी मिट्टी 
मिले ना मिले। 

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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