सत्राची सम्मान- 2022 प्रो. चौथीराम यादव को

अमन विश्वकर्मा

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हिंदी के सुप्रसिद्ध आलोचक और धुरंधर वक्ता प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव को 2022 का सत्राची सम्मान देने की घोषणा की गई है। प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव सिर्फ किताबी आलोचक नहीं हैं बल्कि वे अनेक आंदोलनों में सड़क पर उतरकर अपनी जनप्रतिबद्धता को अभिव्यक्त भी करते रहे हैं। सत्राची फाउंडेशन के निदेशक डॉ. आनन्द बिहारी ने चयन समिति की सर्वसम्मति से प्राप्त निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि वर्ष 2022 का दूसरा सत्राची सम्मान प्रसिद्ध लोकधर्मी आलोचक और ओजस्वी वक्ता प्रो. चौथीराम यादव को दिया जाएगा।

प्रो. चौथीराम यादव के लेखन और भाषणों के केंद्र में एक ऐसे समाज की परिकल्पना रही है जो न्यायपूर्ण हो। उन्होंने भारत के विभिन्न शहरों में अनेक सभाओं को संबोधित किया है। अकादमिक संगोष्ठियों, जनसभाओं और आन्दोलनों में उन्होंने असंख्य भाषण किए हैं। बुद्ध-कबीर-फुले-आम्बेडकर की वैचारिक परंपरा से प्रतिबद्ध रहते हुए उन्होंने न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया है।

आगामी 20 सितम्बर, 2022 को प्रो. वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में प्रो. चौथीराम यादव को सम्मान-स्वरूप इक्यावन हजार रुपये का चेक, मानपत्र, अंगवस्त्र और स्मृति-चिह्न प्रदान किया जाएगा।

चौथीराम यादव को लोकधर्मी आलोचक की श्रेणी में रखा जाता है। वे हमेशा शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध लिखते और बोलते हैं। उनके सवाल पारंपरिक आलोचना के लीक से हटकर बिल्कुल नए तरह के होते हैं, जिसे तथाकथित बड़े आलोचकों ने गै़रजरूरी मानकर हाशिए पर रख दिया था। वैचारिक स्तर पर 82 की उम्र में भी वे युवा लगते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्होंने नयी लीक तैयार किया है। जिस पर चलकर अस्मिता मूलक समाज की लड़ाई लड़ना आसान हो गया है।

वक्ता, लेखक और एक्टिविस्ट प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव

29 जनवरी, 1941 को कायमगंज, जौनपुर के एक सामान्य किसान परिवार में जन्मे चौथीराम यादव हिन्दी के प्रसिद्ध आलोचक, विचारक और वक्ता हैं। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जौनपुर जिले की शिक्षण संस्थाओं में हुई। उन्होंने स्नातक-स्नातकोत्तर एवं पी-एचडी की उपाधि हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी से प्राप्त की। यहीं 1971 से 2003 तक अध्यापन करते हुए वे प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष के पद से सेवामुक्त हुए।

प्रो. चौथीराम यादव ने हजारी प्रसाद द्विवेदी और छायावाद पर गंभीर अकादमिक काम किए हैं। उनकी पुस्तक हजारी प्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन अपने विषय के सम्यक् मूल्यांकन में सक्षम है। उनकी पुस्तक सांस्कृतिक पुनर्जागरण और छायावादी काव्य शोध और आलोचना का मिश्रित रूप है।

BHU में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव

प्रो. चौथीराम यादव ने भारत के बहुसंख्यक समाज के हितों को ध्यान में रखकर दलित-विमर्श, स्त्री-विमर्श और बहुजन समाज के सामाजिक-साहित्यिक-राजनीतिक मुद्दों पर अपनी स्पष्ट पक्षधरता को प्रकट किया है। भाषणों के अतिरिक्त इन चार पुस्तकों में उनके ऐसे विचारों को पढ़ा जा सकता है- लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा, उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज, लोक और वेद आमने-सामने, आधुनिकता का लोकपक्ष और साहित्य। उत्पीड़ित समुदायों के प्रतिरोध को साहित्य, संस्कृति, धर्म और राजनीति में चिह्नित करती हुई ये पुस्तकें न्यायपूर्ण समाज की स्थापना के प्रति अपनी आस्था को व्यक्त करती हैं।

प्रो. चौथीराम यादव ने बढ़ती हुई उम्र के बावजूद अपनी वैचारिकी के लिए सड़कों पर उतरकर आन्दोलनों में सक्रियता दिखायी है। वक्ता, लेखक और एक्टिविस्ट के त्रिकोण को उनका व्यक्तित्व बखूबी समेटता है। चौथीरामजी के लेख हिन्दी की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं और वे कई पुरस्कारों से समादृत हो चुके हैं।

संपूर्ण लेखकीय योगदान को ध्यान में रखकर प्रो. चौथीराम यादव को ‘सत्राची सम्मान’ – 2022 से सम्मानित किए जाने के निर्णय से सत्राची फाउंडेशन स्वयं को सम्मानित महसूस कर रहा है।

न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन के लिए सत्राची सम्मान

सत्राची फाउंडेशन, पटना के द्वारा ‘सत्राची सम्मान’ की शुरुआत 2021 से की गई है। न्यायपूर्ण सामाजिक सरोकारों से जुड़े लेखन को रेखांकित करना ‘सत्राची सम्मान’ का उद्देश्य है। पहला सत्राची सम्मान जाने-माने कथाकार प्रेम कुमार मणि को दिया गया था।

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‘सत्राची सम्मान’ – 2022 के लिए प्रो. वीर भारत तलवार की अध्यक्षता में चयन समिति गठित की गयी थी। इस समिति के सदस्य पटना विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रो. तरुण कुमार और सत्राची के प्रधान संपादक प्रो. कमलेश वर्मा हैं।

देशभर से साहित्यकारों ने ख़ुशी ज़ाहिर की

प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव को सम्मानित किये जाने से देशभर के साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों ने ख़ुशी जाहिर की है। सुप्रसिद्ध आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा है कि ‘डॉ. चौथीराम यादव को सत्राची सम्मान से समानित किया जाना हाशिये के समाज के पक्ष में किए जाने वाले चिंतन व लेखन का सम्मान है। भारतीय समाज में प्रतिरोधी चिंतन व साहित्य के ब्राह्मणवाद द्वारा अधिग्रहण की लंबे समय से दुरभिसंधि रही है। डॉ. चौथीरामजी ने  मध्यकालीन संत साहित्य की जनोन्मुखी व्याख्या द्वारा इसे धारदार ढंग से विश्लेषित किया है। अकादमिक होते हुए भी उन्होंने अपने लेखन, वक्तव्यों व व्याख्यानों के माध्यम से पिछले कुछ वर्षों में जन बुद्धिजीवी की हस्तक्षेपकारी भूमिका कि निर्वहन किया है। यह पुरस्कार उनके इस समूचे अवदान  का सम्मान है। उन्हें हार्दिक बधाई और अभिनंदन।’

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ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दी दलित साहित्य के पुरोधा और शिखर लेखक हैं

सुप्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति लिखते हैं कि – ‘चौथीरामजी न केवल संत साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं बल्कि खुद भी संत हैं। उन्हें सत्राची पुरस्कार के लिए बहुत-बहुत बधाई।’

समाजवादी जन परिषद के महामंत्री अफलातून कहते हैं- ‘भक्ति आंदोलन के मूर्धन्य विद्वान के नाते प्रोफेसर चौथीराम यादव अस्सी के दशक से सक्रिय सहयोग मिलता रहा। तब मैं छात्र राजनीति में सक्रिय था। इसी दौर में प्रोफेसर चौथीरामजी प्रगतिशील लेखक संघ की धारा से पृथक मौलिक चिंतन सामने आया जो लोहिया, अम्बेडकर से प्रभावित था। सामाजिक न्याय, धर्म निरपेक्षता तथा प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय आबादी के हक के मसलों वे स्पष्ट तौर पर, सक्रिय भागीदारी द्वारा युवा आंदोलन को ताकत देते हैं।’

जाने-माने कथाकार और इतिहासकार सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने अपने सन्देश में लिखा है- ‘बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, प्रो. चौथीराम, लोकचेतना के प्रमुख आलोचक और विचारक हैं। हिंदी साहित्य की भक्तिधारा के संबंध में विश्वविद्यालयी संकृणतावादी विचारों का पोस्टमार्टम करने वाले प्रगतिशील और वंचित धारा के प्रमुख आलोचक, चौथीरामजी सूर, कबीर और रैदास के वैचारिक और सामाजिक आन्दोलनों की सही पड़ताल करते हैं। वह मानते हैं कि भक्तिकाल में केवल एक वर्ग विशेष के लेखकों को सिरमाथे चढ़ाया गया जबकि वंचित वर्ग के संतों ने हाशिए के समाज को वर्णवादी पाखंडों से मुक्त कर, समतामूलक समाज की स्थापना का आह्वान किया। वह कहते हैं कि रामराज्य को आदर्श बनाकर पेश करने वाली चेतना ने दलित संत कवि रैदास की कल्याणकारी राज्य की संकल्पना, बेगमपुरा को तवज्जो तक नहीं दी, जबकि रैदास कहते हैं : ऐसा चाहूं राज मैं जहं मिलै सबन को अन्न, छोट-बड़े सब सम बसै रैदास रहे प्रसन्न। यानी समाज में समानता हो, सभी को अन्न मिले, सभी प्रसन्न रहें, यह कुलिनतावादी वैचारिकी को पसंद नहीं क्योंकि समानता की स्थिति में कुलिनतावादी दर्शन नहीं रह सकता। दरअसल, चौथीराम, साहित्य में जहाँ खड़े होकर दहाड़ते हैं,  वह साहित्य की धारा, ओबीसी, दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासियों के हकमारी, उपेक्षा और शोषण के विरुद्ध ज्यादा मुखर है और ऐसी धारा को आज का कुलिनतावादी समाज, जो अकादमियों, साहित्य और सांस्कृति की संस्थाओं पर काबिज है, पुरष्कृत नहीं होने देता। ऐसे में चौथीरामजी को मिला सत्राची पुरस्कार का स्वागत किया जाना चाहिए।

हिंदी साहित्य के क्षेत्र में चौथीरामजी ने उत्तरशती के विमर्श और हाशिए का समाज, हजारीप्रसाद द्विवेदी समग्र पुनरावलोकन और लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा, लोक और वेद: आमने सामने जैसी मुख्य कृतियों के सहारे लोक चेतना को साहित्य में स्थान दिया है और कुलिनतावादी वैदिक विचारों को लोक के प्रतिकूल बताया है। इसलिए वह वंचितों के लेखक और विचारक हैं। यह वंचितों का सम्मान है।

जाने-माने कवि मदन कश्यप ने व्हाट्सएप से संदेश भेजा है- ‘चौथीराम यादवजी हिंदी के अपनी तरह के अकेले आलोचक हैं, जिनके पास शास्त्रीय परंपरा के बरअक्स लोक परंपरा की गहरी समझ है। वे वर्चस्वशाली ब्राह्मणवादी संस्कृति के विरुद्ध निरंतर संघर्षरत जो जनधारा रही है, जिसे हम सहज रूप से लोक परंपरा कहते हैं, उस परंपरा में निहित प्रतिरोध वे अपनी तरह से रेखांकित करते हैं। वे परंपरागत अर्थों में वामपंथी नहीं हैं, तो परंपरागत अर्थों में लोकवादी भी नहीं। बल्कि, इन दोनों विचारधाराओं के गहरे अध्ययन और संतुलन से उन्होंने आज के समाज को समझने और जो उत्पीड़ित जन हैं, दलित पिछड़े अल्पसंख्यक आदि, उनके संघर्षों को, उनकी संस्कृति को रेखांकित करने की एक सैद्धांतिकी तैयार की है। उन्होंने लिखा बहुत कम है, विशेषकर समकालीन साहित्य पर तो बहुत ही कम लिखा है, लेकिन सिद्धांत ज़रूर ऐसे गढ़ें हैं, जिनके आधार पर अगर हम 1960 के बाद के साहित्य का मूल्यांकन करें, तो उस मूल्यांकन के क्रम में काफी कुछ, जिसे गैर महत्वपूर्ण मान लिया गया है, वह महत्वपूर्ण रूप से पुनर्स्थापित हो सकता है और जिसे हम महत्वपूर्ण मान रहे हैं, उसके भीतर के ब्राह्मणवादी छद्म को उद्घाटित किया जा सकता है। एक ऐसी सैद्धांतिकी रचने वाले वरिष्ठ आलोचक को पुरस्कृत किया जाना, निश्चित रूप से हम सबके लिए बहुत हर्ष की बात है। मैं उन्हें बधाई देने के साथ-साथ निर्णायकों  के प्रति भी आभार प्रकट करता हूँ।’

युवा आलोचक प्रकाश चंद्र पटेल ने उन्हें बधाई देते हुए लिखा है कि ‘अपने अध्यापन जीवन से ही आदरणीय प्रो. चौथीराम यादवजी समय से विभाग में एवं अपनी कक्षाओं में जाते रहे हैं। नियमित रहना उनकी हमेशा से विशेषता रही है। आप शैक्षणिक जीवन जगत में परंपरित आचार्य शैली के अब तक जीवित मेरे संज्ञान में सबसे आकर्षक व्यक्तित्व के धनी गुरु हैं।उनका लम्बा कद व्यंजना में भी महत्वपूर्ण है। एक विद्यार्थी के रूप में मैंने अनुभव किया है कि लोक उनके लिए केवल एक शब्द भर नहीं, वह निकष है जो साहित्य और साहित्यकार को उसके भीतरी बाहरी तहों की जाँच कर प्रस्तुत कर देता है। लोक दृष्टि उनकी आंच है जो हर आभा मंडल पिघलाकर द्रव कर देता है। हर पीढ़ी में लोकप्रिय होना सबके लिए संभव नहीं होता मगर प्रो चौथीराम यादवजी को यह सिद्ध हुआ है। पुराने अपने आप इनके साथ हैं, जबकि नए को साथ लेना इनकी बौद्धिक जिजीविषा के कारण है। बहुजन को जमात बनाने का स्वप्न इन्हें बार बार सड़कों पर उतारा करता है। हम आदरणीय प्रो. चौथीराम यादवजी की उज्ज्वल जीवन की कद्र करते हैं।’

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी…

युवा पत्रकार शिवदास कहते हैं कि ‘प्रो. चौथीराम यादव हिंदी साहित्य के जाने-माने आलोचक और विद्वान हैं। सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर भी उनकी आलोचना एक नई दृष्टि और आयाम लिए रहती है। वर्तमान परिवेश में वह हिंदी साहित्य की आलोचना की तरह सामाजिक और राजनैतिक आलोचना भी करते हैं जो एक चुनौती भरा कदम है। ऐसे में उन्हें यह सम्मान मिलना उनके कार्यों को रेखांकित करने जैसा है। वह इसके हकदार भी हैं। उन्हें इसके लिए बहुत बहुत बधाई।’

इतिहास और साहित्य के गम्भीर अध्येता और अध्यापक आज़मगढ़ निवासी रमेश कुमार मौर्य ने लिखा- ‘कबीर की बानी और बुद्ध के वचन को पढ़ना है तो आपको चौथीरामजी के पास जाना होगा। आपको सूर का ममत्व और जायसी की सूफी कलाम को सुनना है तो चौथीराम तलक कदम बढ़ाने होंगे। तीखी और स्पष्ट आवाज़ के मालिक के पास आपको अक्सर ग़रीब शोषित वंचित की आवाज़ सुनाई देगी। सत्ता के खिलाफ़, व्यवस्था के खिलाफ़ स्वर देना आज के दौर में जुर्म और काफिराना हरकत तो है ही, ब्लासफेमी है। ऐसे दौर में चौथीरामजी का होना सुकून और विश्वास देता है। सत्राची पुरस्कार खुद पुरुस्कृत होगा पुरस्कार देकर। विद्वान लेखक, विचारक को हार्दिक बधाई।’

वक्ता, लेखक और एक्टिविस्ट प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव

फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक और युवा लेखक नवल किशोर कुमार लिखते हैं – ‘खासकर हिंदी प्रदेशों में चौथीराम यादव सर का बहुजन चिंतन के विस्तार में अहम योगदान रहा है। उनसे व्यक्तिगत कभी मुलाकात नहीं हुई। लेकिन दो किताबें मैंने पढ़ी हैं। एक तो ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण और छायावादी काव्य’ और ‘लोकधर्मी साहित्य की दूसरी धारा’। इन दोनों किताबों के जरिए ही मैंने चौथीराम यादव सर को समझा है। उनका सम्मान किया जाना एक बहुजन चिंतन की विरासत का सम्मान है।’

युवा कहानीकार दीपक शर्मा का कहना है कि ‘चौथीराम यादव सर को मैंने बीएचयू के कला संकाय के मंचों पर तथा छात्रों के साथ बीएचयू के गेट पर प्रतिरोध की आवाज बुलंद करते हुए कई बार देखा है। उनके बोलने के तेवर बहुत नुकीले और धारदार होते हैं। सामंतवाद, पूँजीवाद और ब्राह्मणवाद के विरुद्ध वैचारिक लड़ाई लड़ते हुए वे अस्मितामुलक साहित्य पर बहस छेड़ते हैं। वे साहित्य में वैचारिक बहस को नये सिरे से उद्घाटित करते हैं। सड़क पर भी वे पिछड़े, दलितों व आदिवासियों के हक, अधिकार और अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हैं। पसमांदा समाज उनके आलोचना व बहस के केन्द्र में रहा है। पसमांदा का अर्थ है जो पीछे छूट गए हैं। स्त्री विमर्श को भी वे साथ लेकर चलते हैं। उनका मानना है कि अगर मुख्यधारा के समाज के लोग उनके मुक्ति पर ध्यान दिए होते तो आज वे दीन-हीन स्थिति में न होते। चौथीराम यादव को लोकधर्मी आलोचक की श्रेणी में रखा जाता है। वे हमेशा शोषण और उत्पीड़न के विरुद्ध लिखते और बोलते हैं। उनके सवाल पारंपरिक आलोचना के लीक से हटकर बिल्कुल नए तरह के होते हैं, जिसे तथाकथित बड़े आलोचकों ने गै़रजरूरी मानकर हाशिए पर रख दिया था। वैचारिक स्तर पर 82 की उम्र में भी वे युवा लगते हैं। आने वाली पीढ़ियों के लिए उन्होंने नयी लीक तैयार किया है। जिस पर चलकर अस्मिता मूलक समाज की लड़ाई लड़ना आसान हो गया है। उन्होंने बुद्ध, फूले और अम्बेडकर की परंपरा को आगे ले जाने का काम किया है। उनके साहित्यिक अवदान बहुमूल्य हैं। जिसे देखते हुए उन्हें सत्राची सम्मान देने की घोषणा हुई है। चौथी सर को इसके लिए बहुत बहुत बधाई‌‌।’

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एक छात्र की याद्दाश्त में चौथीराम यादव 

प्रोफ़ेसर चौथीराम यादव के छात्र रहे प्रोफ़ेसर दिनेश कुशवाह हिंदी के वरिष्ठ कवि और विद्वान वक्ता हैं। अपने गुरु के सम्मानित होने पर बधाई के साथ उन्होंने उनके अध्यापकीय कौशल का उल्लेख करते हुए लिखा है – ‘सम्मानित यादव गुरुजी हम लोगों को सूरदास और बिहारी पढ़ाते थे। किसी-किसी वर्ष विशेष प्रश्न पत्र के रूप में उन्हें समकालीन कवियों को भी पढ़ाना पड़ता था। एक बार मैंने ‘टाइम टेबुल’ पर प्रश्न उठाया। ‘गुरुजी आपको कबीर पढ़ाने के लिए क्यों नहीं दिए जाते?’ उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, ‘वरदान में चुनाव का विकल्प नहीं होता।’ अपने पूरे सेवाकाल में शायद ही उन्हें कबीर पढ़ाने को मिले हों। जब वे हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ आचार्य एवं अध्यक्ष हुए तब की बात मैं नहीं जानता! लेकिन उनकी कोई भी कक्षा कबीर के बिना नहीं शुरू होती थी। चाहे जो पढ़ा रहे हों आगे-पीछे-बीच में कहीं न कहीं, कबीर आ ही जाते। एक बार बिहारी का यह दोहा पढ़ा रहे थे –

कर ले, सूँघि, सराहि के, रहे गहे सब मौन
गंधी गंध गुलाब को, गँवई गाहक कौन।

गुरुजी बिहारी को छोड़कर ‘गँवई’ पर शुरू हो गए- ‘जाहिर है कि रक्त-गोत्र की शुद्धता से लेकर भाषा, साहित्य और कला संस्कृति तक में शुद्धता की तलाश करने वाले वर्चस्ववादी बुद्धिजीवियों की दृष्टि में गाँव का आदमी गँवार और उसकी भाषा गँवारू मानी जाती है। भाषा और साहित्य में आभिजात्य के इसी वर्चस्व का प्रतिरोध करते हुए कबीर ने भाषा के महत्व को रेखांकित किया था- ‘संसकीरत है कूपजल, भाषा बहता नीर’; लेकिन अब इसका क्या कीजिएगा कि आलोचक रामचंद्र शुक्ल को कबीर की लोकधर्मी भाषा-दृष्टि रास नहीं आई और उन्होंने संस्कृत काव्यशास्त्रियों का अनुसरण करते हुए रचनाकारों पर ‘संस्कृत-बुद्धि’, ‘संस्कृत-हृदय’, ‘संस्कृत-वाणी’ का अपना आलोचकीय निर्णय लाद दिया। यह एक विडंबना ही है कि हिंदी साहित्य जितना लोकतांत्रिक है, हिंदी आलोचना उतनी ही अलोकतांत्रिक। ऐसा न होता तो मध्यकाल के सबसे विद्रोही और लोकधर्मी कवि कबीर और मीरा आचार्य शुक्ल की आलोचना के हाशिए पर न होते।’

इसी तरह एक बार बिहारी की ही कक्षा थी। गुरुवर दोहों का अर्थ बता रहे थे। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में सबसे अधिक भीड़ यादवजी की कक्षा में होती थी। साथ ही वह सबसे अधिक अनुशासित और संयमित कक्षा भी होती थी। वे जितने मनोयोग से पढ़ाते; विद्यार्थी उतने ही मनोयोग से सुनते और गुनते थे। लेकिन आज अचानक नज़ारा बदला हुआ था। जब वे एक दोहा पढ़ा रहे थे कि छात्रों में खुसुर-फुसुर होने लगी। यादवजी का ध्यान भंग हो गया। उन्होंने देखा कि कक्षा के कुछ शरारती तत्व सिर नीचे कर मुस्करा रहे हैं। उनकी तरफ देखने के बाद उन्होंने किताब देखी तो माजरा समझ में आ गया। आगे जो दोहा पढ़ाना था वह कुछ इस प्रकार का था कि अगर उसका भाष्य सांकेतिक रूप से भी अश्लील हो जाता तो कक्षा हाथ से बाहर चली जाती। यादवजी उन अध्यापकों में नहीं थे जो यह कहकर अपनी बला टाल देते हैं कि ‘इसे आप लोग घर पर खुद पढ़ लीजिएगा’। ऐसे प्रसंगों में उन्हें आँख मूँदकर या खिड़की से बाहर देखते हुए झटपट शब्दार्थ बताकर, झंझट छुड़ाने की आदत भी नहीं थी। लड़के मुस्कराए जा रहे थे। कुहनियों से एक-दूसरे को टोहका मार रहे थे कि देखें गुरु अब इसे कैसे पढ़ाते हैं? यादवजी ने बाकायदा गंभीरतापूर्वक उस दोहे का पाठ किया –

अपने तनुके जानिके, यौवन नृपति प्रवीन।
स्तन, मन, नैन, नितंब को, बड़ो इजाफा कीन।।

मैंने देखा, मैंने सुना; गुरु के श्रीमुख से निकला- ‘भाइयो! राजा के गद्दी छोड़ने पर युवराज का राज्याभिषेक होता है। वह अपने उन मित्रों की पदवी में इजाफा कर देता है जो अपने संग-साथ से उसका रुतबा बढ़ाते हैं। इसी प्रकार जब नायिका के शरीर पर यौवन नृपति का शासन हुआ तो वे अंग जो उनकी सुंदरता में चार चाँद लगाते थे, उन्होंने उनकी पदवी में बढ़ोत्तरी कर दी। उन्हें उनके मनचाहे स्थान पर सुशोभित कर दिया। कक्षा के मनचले छात्र अवाक हो गए। आज सोचता हूँ कि अगर यह दोहा मुझे पढ़ाना होता तो कैसे पढ़ाता? अपनी आदत के अनुसार मैं उसमें रम जाता। व्याख्या, भावसाम्य और अलंकार के लिए, प्रसाद, शमशेर, निराला, कालिदास को तो उद्धृत करता ही, लगे हाथ दो चार शेर भी जड़ देता।’

अमन विश्वकर्मा गाँव के लोग से सम्बद्ध हैं।

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