जनसंख्या विस्फोट एक और झूठ के सिवा कुछ भी नहीं

सलमान अरशद

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भारत में जनसंख्या विस्फोट को एक बड़ी समस्या के रूप में पेश करते हुए इस पर बहस हो रही है। बहुत से लोगों को भी लगता है कि जनसंख्या का अधिक होना देश और दुनिया के लिए बड़ी समस्या है, लिहाज़ा जनसंख्या नियंत्रण के लिए सख्त कानूनी उपाय किये जाने चाहिए। क्या आप दोस्तों को भी ऐसा लगता है? अगर आपका ज़वाब हाँ है तो आपको ये लेख ध्यान से पढ़ना चाहिए, न सिर्फ़ लेख को ध्यान से पढ़ें बल्कि पढ़ने के बाद यहाँ जो कुछ कहा जा रहा है उसकी पड़ताल भी करें।

जनसंख्या घट रही है या बढ़ रही है, इसे समझने के लिए दो महत्वपूर्ण स्केल हैं जिन्हें आपको समझना होगा, पहला स्केल है जन्मदर, जिसे TFR या टोटल फर्टिलिटी रेट कहते हैं, यानी कि एक स्त्री अपने जीवनकाल में कितने बच्चे पैदा करती है, उसे ही TFR कहा जाता है। 2019 के डाटा के अनुसार भारत का औसत TFR 2.20 है। दूसरा स्केल है प्रतिस्थापन दर, यानी रिप्लेसमेंट रेट, वो जन्मदर जिस पर जनसंख्या स्थिर हो जायेगी, यानी न घटेगी न बढ़ेगी। इसे 2.1 माना गया है, अर्थात हर इन्सान अगर दो बच्चे पैदा करेगा तो जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। इस दर को 2 के बजाय 2.1 इसलिए रखा गया है कि कुछ बच्चे मर भी जाते हैं या अगर कुछ लोग दो के बजाय तीन बच्चे भी कर लेंगे तो कुल संख्या बनी रहेगी।

अब अगर जन्म दर रिप्लेसमेंट रेट से ज़्यादा है तो जनसंख्या बढ़ रही है, कम है तो घट रही है और अगर बराबर है तो जनसंख्या स्थिर है। भारत में जन्मदर फ़िलहाल 2.20 है अमेरिका में 1.88 है और बांग्लादेश में 2.33 है। अगर हम इस डाटा को पिछले सालों से तुलना करें तो पाएंगे कि दुनियाभर में जनसंख्या में गिरावट दर्ज़ की जा रही है। अगर हम देश के भीतर राज्यों का अध्ययन करें तो पाएंगे कि उत्तर प्रदेश और बिहार में जन्मदर ज़रूर अभी रिप्लेसमेंट रेट से थोड़ा ऊपर है वरना दूसरे तमाम राज्य जनसंख्या में लगातार गिरावट दर्ज़ कर रहे हैं। उदहारण के लिए बिहार में जन्म दर 3.0 है तो उत्तर प्रदेश में 2.4, लेकिन केरल में 1.8 है, मध्य प्रदेश में 2.0 और राजस्थान में भी 2.0 है, शेष राज्यों में भी यही स्थिति है, आपको अपने तौर पर इन तथ्यों की जांच करनी चाहिए।

अगर भारत के युवाओं को ये यकीन दिला दिया जाये कि जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि की वजह से उन्हें रोज़गार नहीं मिल पा रहा है तो शासक वर्ग किसी हद तक सुरक्षित हो सकता है, जनसंख्या में विस्फोट के लिए भी मुस्लिम समुदाय को सालों से कुसूरवार ठहराया जा रहा है, इस वक़्त भी ये मुहिम चालू है। ऐसे में साम्प्रदायिक नफ़रत का एंगल भी यहाँ काम कर सकता है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के आकड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह उपलब्ध हैं कि वो आपको एक क्लिक में मिल जाएँगी, ऐसे में नहीं लगता कि शासक वर्ग का ये दांव काम करेगा।

अक्सर कहा जाता है कि मुसलमान एक धार्मिक समूह के रूप में जनसंख्या बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हैं, अफवाह फैलाई जाती है कि ये तो चार शादियाँ करते हैं और 40 बच्चे पैदा करते हैं। हालांकि, स्त्री एवं पुरुष अनुपात मुसलमानों में भी ऐसा नहीं है कि हर मुस्लिम पुरुष को एक ही स्त्री मिल जाए, बावजूद इसके ये अफवाह फैलाई जाती है। आप पाठकों से मेरा अनुरोध है कि अपने आसपास के मुसलमान परिवारों में ज़रूर देखिये कि ऐसे कितने हैं जिनके एक से ज़्यादा पत्नियाँ हैं, साथ ही ये भी देखिएगा कि सामान आर्थिक स्थिति के हिन्दू एवं मुसलमान परिवारों में बच्चों की संख्या कितनी है।

फ़िलहाल मुसलमानों में जन्म दर 2.3 है जो 1992 में 4.4 थी, इस दौरान मुसलमानों के जन्म दर में 46% की गिरावट आयी है इसी अवधि में हिन्दुओं के जन्मदर में 41.2% की गिरावट आयी है। हिन्दुओं में जन्म दर अभी 1.9 है इस लिहाज़ से मुसलमानों में जन्मदर अभी भी हिन्दुओं की तुलना में ज़्यादा है, लेकिन जिस तेज़ी से मुसलमानों के जन्म दर में गिरावट आयी है, उससे ये उम्मीद की जा सकती है कि मुसलमानों के जन्म दर में भी और गिरावट आयेगी। इसके बावजूद यहाँ ये भी देखना होगा कि रिप्लेसमेंट रेट की तुलना में मुसलमानों में भी जन्मदर बहुत ज़्यादा नहीं है। अब इतने विवरण के आधार पर क्या आप कह सकते हैं कि भारत में जनसंख्या विस्फोट जैसी कोई स्थिति है?

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आकड़ों की मानें तो भारत में जनसंख्या लगभग स्थिर हो गयी है, अगर जनसंख्या में गिरावट का यही हाल रहा तो अगले कुछ सालों में भारत की आबादी कम होनी शुरू हो जाएगी। अब यहाँ दो बातों पर विचार करने की ज़रुरत है, एक तो ये कि जनसंख्या विस्फ़ोट जैसी कोई स्थिति नहीं है इसके बावजूद जनसंख्या विस्फ़ोट का हौव्वा क्यों खड़ा किया जा रहा है, दूसरे क्या भारत की आबादी का कम होना ज़रूरी है और अगर हाँ तो कितना। इन दोनों सवालों में पहले विचार कर लेते हैं फिर हम इस सवाल पर विचार करेंगे कि जनसंख्या का घटना या बढ़ना किन कारकों पर निर्भर करता है!

भारत की आर्थिक स्थिति बेहद ख़राब है, नई नोकरियां पैदा नहीं हो रही हैं और पुरानी ख़त्म हो रही हैं, निजीकरण लगातार हो ही रहा है, ये एक तथ्य है कि प्राइवेट सेक्टर में जहाँ ज़्यादा नौकरियां नहीं होतीं वहीं काम करने की परिस्थितियाँ भी बहुत अच्छी नहीं होती, श्रम कानूनों में लगातार हो रहे बदलावों ने कामगारों के अधिकारों पर कैंची चलाई है, ऐसे में प्राइवेट सेक्टर में कामगार अपने अधिकारों के लिए ज़्यादा लड़ नहीं पाएंगे। इस बात की भी पूरी संभावना है कि स्थाई नौकरी के बजाय ठेके पर काम करने के हालात जल्दी ही निर्मित किये जाएँगे, कई क्षेत्रों में ऐसा किया भी जा चुका है। सेना में अग्निवीर योजना को इसी नज़रिए से देखा जाना चाहिए।

इन परिस्थितियों में बेरोज़गार युवाओं के आक्रोश का सामना शासक वर्ग को करना ही पड़ेगा। हालांकि, मुस्लिम विरोधी नफ़रत को अबतक शासक वर्ग एक ढाल के रूप में इस्तेमाल करता रहा है और अभी तक ये ढाल पूरी तरह काम कर रहा है, लेकिन लम्बे समय तक काम करता रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इस बीच श्रीलंका में जो कुछ हुआ, उससे भारत का शासक वर्ग अछूता रहेगा, ऐसा मानना सही नहीं होगा। श्रीलंका के शासक वर्ग ने भी बौद्धों को मुस्लिम और हिन्दू जनता के विरुद्ध इस्तेमाल किया था, खासतौर पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत को सियासी टूल के रूप में इस्तेमाल को पिछले कुछ सालों में बढ़ावा मिला था, शासक वर्ग ने बहुत तरह से जनता को बांटा था और मीडिया को भी सत्ता पक्ष में ही काम करने के लिए मैनेज कर लिया गया था, बावजूद इसके देश बर्बाद है, जनता सड़कों पर है और शासक वर्ग भागा भागा फिर रहा है।

अगर भारत के युवाओं को ये यकीन दिला दिया जाये कि जनसंख्या में बेतहाशा वृद्धि की वजह से उन्हें रोज़गार नहीं मिल पा रहा है तो शासक वर्ग किसी हद तक सुरक्षित हो सकता है, जनसंख्या में विस्फोट के लिए भी मुस्लिम समुदाय को सालों से कुसूरवार ठहराया जा रहा है, इस वक़्त भी ये मुहिम चालू है। ऐसे में साम्प्रदायिक नफ़रत का एंगल भी यहाँ काम कर सकता है। लेकिन जनसंख्या वृद्धि के आकड़े राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह उपलब्ध हैं कि वो आपको एक क्लिक में मिल जाएँगी, ऐसे में नहीं लगता कि शासक वर्ग का ये दांव काम करेगा।

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जनसंख्या के घटने या बढ़ने के क्या कारण हो सकते हैं, सरसरी तौर पर इसे देख लेते हैं, अफ़्रीकी देशों में आज भी ऐसे कई देश हैं जिनके यहाँ जन्म दर 5 या इससे ऊपर है। ये सभी देश ग़रीब हैं, शिक्षा और सेहत की बुनियादी सुविधाएँ इन्हें हासिल नहीं हैं, आर्थिक सुरक्षा के मुद्दे पर तो इनकी हालत बहुत ही ख़राब है। इसके विपरीत यूरोप के देशों में तो जन्म दर रिप्लेसमेंट रेट से भी नीचे जा चुका है। यूरोप के नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक स्थिति अफ्रीका और एशिया के देशों से बहुत बेहतर है। अतः एक बात तो बिलकुल साफ़ है कि जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए सख्त कानून की नहीं बल्कि ऐसी व्यवस्था की ज़रुरत है जिसमें सभी को सेहत, शिक्षा और रोज़गार के ज़रूरी अवसर मिल सकें, अफ़सोस, इस मामले में भारत का प्रदर्शन लगातार कमज़ोर हो रहा है और वर्तमान आर्थिक हालात को देखते हुए फ़िलहाल इन सविधाओं के सन्दर्भ में बेहतरी की उम्मीद नहीं की जा सकती।

अब एक-दूसरे पहलु पर भी विचार किया जाना चाहिए, भले ही भारत की जनसंख्या रिप्लेसमेंट रेट के क़रीब है फिर भी क्या जनसंख्या कम करने की ज़रुरत है? इस सवाल पर सोचने के लिए हमें जनसंख्या घनत्व पर विचार करना चाहिए, भारत में पर स्क्वायर किलोमीटर में 464.15 लोग रहते हैं, जबकि अमेरिका में 36.2 लोग, रूस में 9 लोग, चीन में 153 लोग और हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान में 287 लोग। ज़ाहिर-सी बात है कि अमेरिका और रूस के लोगों के पास प्राकृतिक संसाधन के इस्तेमाल की सहूलियत हमसे ज़्यादा होगी। उनके पास खेती के लिए ज़मीन ज़्यादा होगी, जंगल ज़्यादा होंगे, प्रदूषण कम होगा, और भी बहुत कुछ। …तो भले ही हमारी जनसंख्या स्थिरता के करीब है या स्थिर हो ही गयी है, हमें जनसंख्या वृद्धि पर अभी सावधान रहने की ज़रुरत तो है।

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अब एक अन्य प्रश्न पर विचार कर लेना चाहिए। क्या जनसंख्या वृद्धि को रोकने के लिए कोई सख्त उपाय करने की ज़रुरत है? 1960 में भारत में जन्मदर 5.91 था और आज 2.2 है। क्या ये किसी कानून या सख्त कार्यवाही से संभव हुआ है? इसका उत्तर है नहीं, अगर अभी तक शिक्षा, सेहत, रोज़गार और जागरुकता के ज़रिये जनसंख्या इस तरह नियंत्रित हुई है कि लगभग स्थिर ही हो गयी है तो अब सख्ती क्यूँ और किसके लिए ज़रूरी है? इस प्रश्न में आप ज़रूर विचार करें और ये भी सोचें कि जो लोग इस मकसद के लिए सख्त कार्यवाही की मांग कर रहे हैं, खुद उनका मकसद क्या है!

अब एक-दूसरे पहलू पर विचार कीजिये, जिस तरह से भारत और दुनिया के बहुत से देशों की जनसंख्या कम हो रही है क्या ये अपने आप में ख़तरे का संकेत नहीं है? क्या दस साल बाद जब देश की आबादी नकारात्मक बढ़त की ओर होगी, तब क्या लोग फिर से ज़्यादा बच्चे पैदा करने लगेंगे? दरअसल, ऐसा होता नहीं है। जनसंख्या सिर्फ़ इसलिए कम नहीं हो रही है कि लोग आबादी कम करना चाहते हैं, बल्कि इसलिए भी कम हो रही है कि लोग परिवार बढ़ाने लायक आर्थिक स्थिति में नहीं है और ये कोई भारत का ही मामला नहीं है, दुनिया के विकसित कहे जाने वाले देशों में भी ये सूरत है। फ़िलहाल 80 से ज़्यादा देश अपनी घटती आबादी से परेशान हैं और लोगों को ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं। अगर भारत का शासक वर्ग इस तरफ से बेख़बर रहा तो 2040 तक भारत में काम करने लायक पर्याप्त युवा नहीं होंगे, दूसरी तरफ भारत सियासी तौर पर जिस तरफ जा रहा है, देश में धार्मिक समुदायों के बीच वैमनस्य बढ़ेगी, ऐसी सूरत में दूसरे देश भारत के कामगारों को अपनी ओर आकर्षित करने में सफल होंगे। दरअसल, ख़तरा जनसंख्या में वृद्धि का नहीं है बल्कि भविष्य को देखा जाए तो देश में युवा शक्ति की कमी होने वाली है, लेकिन चूंकि ये ख़तरा फ़िलहाल सामने नहीं है इसलिए इस पर सोचा नहीं जा रहा है।

पूँजीवादी आर्थिक विकास में सम्पदा कुछ हाथों में केन्द्रित होती जाती है और आबादी के बड़े हिस्से में इतना भी नहीं आता कि वो जीवन की बुनियादी ज़रुरतों को भी पूरा कर पाएँ, ऐसे में लोग न तो परिवार बना पाते हैं और परिवार बना लिया तो उसे बड़ा नहीं कर पाते। अफ़सोस जनसंख्या वृद्धि के इस पहलू पर फिलहाल विचार नहीं हो रहा है।

आपको ऐसे में सोचना चाहिए कि जब जनसंख्या तेज़ी से स्थिरता की ओर बढ़ रही है, जब दुनिया के 80 से ज़्यादा देश, अपनी आबादी के घटने से चिंतित हैं, जब दुनिया के कुछ देश ज़्यादा बच्चे पैदा करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित कर हैं, तब भारत में पूरी तरह झूठ की बुनियाद पर लोग जनसंख्या वृद्धि का राग क्यों अलाप रहे हैं? इस सवाल पर सोचना आपको आर्थिक एवं राजनीतिक भूल-भुलैया में पक्का उलझाएगी, लेकिन ये उलझना भविष्य को सुलझाने के लिए ज़रूरी है।

 

सलमान अरशद स्वतंत्र पत्रकार हैं।

3 Comments
  1. pramod says

    इस पोस्ट में जनसंख्या से जुडे़ जितनें भी राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय आकड़े आपने बताए हैं क्या उन आकड़ों को देखने कि link मिल सकती हैं

  2. […] जनसंख्या विस्फोट एक और झूठ के सिवा कुछ… […]

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