वरुणा का हाल-अहवाल संकलित कर रही नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा

दीपक शर्मा

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पाँचवी नदी यात्रा

गाँव के लोग सोशल एंड एजुकेशन ट्रस्ट द्वारा वरुणा नदी किनारे से नदी एवं पर्यावरण संचेतना यात्रा 10 जुलाई, रविवार को सुबह छह बजे शुरु की गई। पिछली चार यात्राओं में गांव के लोग की टीम दानियालपुर घाट से कोरउत पुल तक लगभग 15 गांवों की पैदल यात्रा कर चुकी है। जिनमें हम लोग नदी के किनारे रहने वाले  ग्रामीणों के जीवन और संस्कृति को नजदीक से देखा और उनके अनुभवों को जाना, साथ ही उनसे पर्यावरण और नदी के प्रदूषण को लेकर बातचीत भी की। यह यात्रा अनवरत जारी है। इसी क्रम में 10 जुलाई, रविवार को पांचवी नदी यात्रा की योजना बनायी गई। सुबह नींद खुलने के बाद पर्यावरण की गोद में विचरण करना बहुत ही सुखद अनुभूति होती है। हम लोग चाहते हैं कि इसी तरह से सुबह प्रतिदिन चार-पांच किलोमीटर की यात्रा की जाए। लेकिन नौकरी-पेशा में होने के कारण संभव नहीं है। रविवार छुट्टी का दिन होता है इसलिए इस दिन हम सब लोगों का एक साथ जुटना यह संभव हो पाता है। कोरउत पुल हमारे यहां से अधिक दूर नहीं है इसलिए इस दिन मैं बहुत ही इत्मीनान से तैयार हुआ और नदी के तट पर सबसे पहले पहुंच गया। दस मिनट इंतजार करने के बाद वहां जब हमारी टीम से कोई नहीं आया तो मुझे लगा कि मैं कहीं अन्यत्र तो नहीं है आ गया हूँ। मैंने रामजी सर को फोन किया तो उन्होंने कहा- रास्ते में हूं। कुछ समय बीतने के बाद मुझे आशंका होने लगी कि रामजी सर और पूरी टीम हो ना हो यात्रा कहीं और से आरंभ कर दिए हो और मैं यहां गलत जगह खड़ा होकर उनका इंतजार कर रहा हूँ। पुल पर एक बोर्ड लगा हुआ था। जिस पर स्वर्णिम अक्षरों में पुल के बनने, लोकार्पण करने वाले मंत्री सुरेंद्र पटेल का नाम और लोकार्पण होने की तारीख लिखी गई थी। साथ ही कौरौती बाजार से कोइराजपुर घाट भी लिखा हुआ था। अपने मोबाइल से बोर्ड का फोटो खींचकर सर के मोबाइल पर भेज दिया, फिर फोन करते हुए पूछा कि यही जगह है न?  हाँ, वहीं पर। मैं भी पहुंच रहा हूँ – रामजी सर ने कहा

नदी यात्रा की जानकारी देते हुए लोग

मैं पुल पर पुन: चहलकदमी करने लगा। इस बीच सूरज की पहली किरण के साथ दो-चार सेल्फी ले ली। सेल्फी लेने का कारण पीछे का हरे और पीले रंग का बैकग्राउंड था जो, उझे बहुत आकर्षित कर रहा था। तब तक रामजी सर आ  गए। अब  पूरी तरह से आश्वस्त हो गया कि मैं सही जगह पर हूँ। पीछे से नंदलाल मास्टर और कहानीकार संतोष कुमार भी आ  गए। मैंने रामजी सर के थैले से बैनर निकालकर पुल पर लगे घेराबंदी में बांध दिया‌। ताकि आते-जाते हुए लोगों को लगे कि यहां कुछ होने वाला है और हुआ भी यही। पुल से गुजरने वाले लोग बैनर को देखकर इस अभियान के बारे में जानने को इच्छुक हो रहे थे‌। इसी बीच तीन बुजुर्ग हरीश, सोमू और नंदू लाठी लेकर पुल पर टहलते हुए हम लोगों के पास आ गए। नंदलाल मास्टर से बातें करने लगे। इसी बात में उन्हें मालूम हुआ कि हम लोग नदी यात्रा के द्वारा नदी एवं पर्यावरण बचाने की मुहिम चला रहे हैं। बुजुर्गों ने कहा कि हमने इस तरह का अभियान अपने जीवन में कभी नहीं देखा था। आप लोग प्रयास कर रहे हैं, बहुत अच्छी बात है। वे बता रहे थे कि जब यह पुल नहीं था तब हम लोग बड़ी कठिनाई से नदी पार करते थे। इस पार और उस पार के लोगों को एक साथ  बैठने और मेलमिलाप का मौका ही नहीं मिल पाता था। अब आवागमन बढ़ने के साथ-साथ दोनों पार के लोगों के रिश्ते भी मजबूत हुए हैं।

साबुन लगाकर नहान आज भी जारी है

वहीं से तय किया गया कि अब यात्रा आरंभ किया जाए। तब तक श्यामजी भी आ गए। उन्होंने पुल से बैनर की रस्सियाँ  खोलीं और लेकर बगल वाले अखाड़े की तरफ चले, वहां कई पुराने पहलवान सुबह-सुबह कसरत करते हुए मिले। वे लोग निगोटा पहनकर पूरे शरीर में मिट्टी लगाकर रियाज मार रहे थे। रामजी सर ने मुझे संकेत किया कि यहीं से कुछ छड़ के लिए फेसबुक लाइक करो। मैं फेसबुक लाइव करके अखाड़े की तरफ बढ़ने लगा। राम जी सर पहलवानों का हाथ पकड़कर उनका परिचय करा रहे थे। बता रहे थे कि ये लोग अखाड़े के पुराने पहलवान है। फिर मैंने बारी-बारी से सबसे नदियों के हाल, स्थिति- परिस्थिति पर चर्चा किया। जीतू पहलवान ने बताया कि नदी आज भी अपने उसी दशा में हैं लेकिन यहां पर एक पुल बन जाने से क्षेत्र में रौनक आ गई है। इसके बाद मोहन पहलवान से मैंने बात करने की कोशिश की। ऊंचा सुनने के कारण वे मेरे सवालों का जवाब नहीं दे पा रहे थे। फिर मैंने कैमरा घुमाते हुए बाबा यादव के पास गया जो सिर्फ और सिर्फ एक निगोटे में खड़े थे। उन्होंने बताया कि नदी पहले से काफी गंदी हो चुकी है। नदी का पानी अब घिड़यिल हो चुका है। उन्होंने बताया कि पहले हम लोग नदी का पानी पीते थे किंतु इस दशा में नहीं पी सकते। सुबह-सुबह की ताजी हवा लेने निकले शंकर यादव से जब  मैंने नदी के बारे में पूछा उन्होंने बताया कि अब तो पहले की अपेक्षा पानी और हवा दोनों में परिवर्तन हो चुका है। नदियों में अब सेवार नहीं मिलते हैं। इसी बीच गोकुल दलित और सुरेंद्रजी भी आ चुके थे। आसपास से भी कुछ युवा साथी यात्रा के साथ जुड़ चुके थे। सबसे परिचय कराने के बाद यात्रा वहां से खेतों से होते हुए नदी किनारे किनारे निकल गई। नदी के उस पार का किनारा इस बार की अपेक्षा अधिक स्वच्छ और खाली दिखाई दे रहा था तो मैंने रामजी सर से कहा कि हम लोग उस पार से चले होते तो अच्छा रहता। उन्होंने कहा कि चलिए अभी इस पार से यात्रा कर लेते हैं लौटते समय हम लोग उस पार से आ जाएंगे। अमनजी के ना होने से राम जी सर ने फोटो खींचने का दायित्व मुझे दे दिया था। मैं रात में मोबाइल चार्ज नहीं कर सका था। मुझे डर था कि कहीं मेरी मोबाइल स्विच ऑफ ना हो जाए और फोटो खींचने का मेरे पास ज्यादा अनुभव भी न था। बीच-बीच में रामजी को स्वयं करना पड़ता था कि दीपक इस चीज का फोटो खींच लो! इधर बीच बारिश हो जाने के बाद खेतों में बुवाई आरंभ हो चुकी थी। लोग अपने खेतों में उड़द, मक्का, बाजरा और तमाम प्रकार की जायद फसलें बो रहे थे। खेतों में जगह-जगह ट्रैक्टर से जुताई हो रही थी। मन में ख्याल आया कि पहले जब बारिश होती थी तो लोग खेतों में बैल लेकर निकलते थे लेकिन अब उसका जमाना नहीं रहा। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं पहला कि मशीनीकरण में तेजी आने से मानव समुदाय थोड़ा आलसी हो गया है। वह कम शारीरिक मेहनत के द्वारा अधिक काम कर लेना चाहता है। दूसरी बात कि अब लोग कृषि पर निर्भर नहीं है कृषि कार्य करते हुए भी किसान व्यवसाय के अन्य काम भी करता है। बैलों से खेती करने में समय अधिक लगता है जिसके कारण उनके दिनचर्या पर काफी असर पड़ता है। नदी किनारे मेड़ों पर कूश का जंगल था। बाँध पर चलने लायक लीक बनी हुई थी,  इसके सहारे हम लोग बैनर लेकर आगे बढ़ते जा रहे थे। इस बीच शंकर नामक एक बुजुर्ग आदमी हाथ में आटा के कुछ गोली और बांस के कईन में धागा और कटिया लगाकर नदी किनारे जाते हुए दिखाई दिए। गोकुल दलित में पूछा-

‘कहो चच्चा मच्छरिया काम भर क मिल जाता है न?’

‘हां-हां, मिल जाता है।’

‘खाने भर का या इसे आप बेचतें भी हैं?’

‘नहीं खाने भर का?’

‘कौन-कौन से मछली मिलती है नदी में?’

तो उन्होंने मछलियों के बारे में विस्तार से समझाया। इस प्रकार हम लोग एक दूसरे बात करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे। नदी उस पार बहुत सुंदर सीढ़ी दिखाई दे रही थी। जहां पर कुछ महिलाएं कपड़ा कचार रही थी। कुछ बच्चे नहा रहे थे। बगल से एक नाला बहता हुआ नदी में गिर रहा था तो रामजी सर ने बताया कि यह नाला कोरउत बाजार से होकर आ रहा है। वहां से नवनिर्मित रिंग रोड का पुल स्पष्ट दिखाई दे रहा था। लगा कि चंद कदम में ही पहुंच जाएंगे किंतु पहुंचने में आधे घंटे लग गए। पुल के नीचे कहीं से नहर का पानी आता हुआ सुनाई दे रहा था पानी की कल-कल आवाज मन को तरंगित कर रही थी। पुल के नीचे बड़े-बड़े पत्थर थे। पत्थर इस प्रकार से थे कि उस पर आसानी से चला जा सकता था। कुछ इस प्रकार के पत्थर मैंने मुंबई के बैंड स्टैंड में देखा था। मैंने कहा कि मुंबई का बैंडस्टैंड है। रामजी सर ने कहा इसकी भी तस्वीरें ले लीजिए। मैंने तस्वीर खींची। इसके बाद मेरी मोबाइल की बैटरी बिल्कुल खत्म हो गई। मुझे चिंता थी कि आगे के दृश्य का फोटो कैसे लिया जाए। मैंने गोकुल जी का मोबाइल अपने कब्जे में ले लिया। खेतों में सुबह-सुबह क्षेत्र में काम करने निकले हुए व्यक्ति इस मिशन से बहुत प्रभावित हो रहे थे और आगे बढ़ कर अपनी हिस्सेदारी भी दे रहे थे। ताकि यह भी इस यात्रा के साक्षी बन सके। खेत में काम करते हुए एक व्यक्ति से सुरेंद्र जी ने पूछा है कि चाचा भक्तूपु  यहां से कितना दूर है?

‘बस आप लोग पहुंचने ही वाले हैं।’

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इस बीच नंदलाल मास्टर और गोकुल दलित बैनर लेकर बहुत आगे निकल चुके थे। उनके दस कदम पीछे श्यामजी और हम लोग काफी पीछे रह गए थे। संतोषजी ने कहा कि लगता है कि वे लोग अग्निवीर हो चुके हैं। इसके बाद ठहाके की हंसी हुई। तब मैं तेज चलना शुरू किया। संतोषजी ने कहा कि धीमे चलिए, उन लोगों को चलने दीजिए जैसे चल रहे हैं। मैंने कहा- मैं आगे बढ़कर उन लोगों का फोटो खींचूँगा। इससे उन लोगों की चाल धीमी हो जाएगी और सब साथ में हो जाएंगे। हुआ ऐसा ही। जब मैं तस्वीर खींचने लगा तो वे लोग बिल्कुल रुक गए और सब लोग साथ हो गए। भक्तूपुर घाट हम सब लोग एक साथ पहुंचे। वहां पीपल, महुआ, आम के बड़े-बड़े वृक्ष थे। प्यास सबको जोरों पर लगी हुई थी। घाट के ऊपर एक मंदिर और अखाड़ा था। अखाड़े पर कुछ नौजवान लड़के देह में माटी पोतकर कसरत कर रहे थे।

संतोषजी ने एक नौजवान लड़के को बुलाकर पूछा कि बेटा यहां कोई हैंडपंप है?

‘हां है अखाड़ा के पास।’

‘तो बाल्टी लोटा भी होगी?’

‘हां है।’

जरा पानी पिला देते तो बड़ी कृपा होगी। मिनट भर की देरी में उस लड़के ने बाल्टी में ठंडा पानी और लोटा लेकर हाजिर हो गया।

सुरेंद्रजी ने पूछा-

‘आपका नाम क्या है?’

‘अभिषेक?’

‘क्या करते हैं बेटा?’

‘पढ़ाई करता हूं !’

‘किस क्लास में ?’

‘दसवीं में‌’

‘क्या पहलवानी और पढ़ाई दोनों साथ कर लेते हो?’

‘बहुत आराम से कर लेता हूँ।’

‘आगे क्या बनने का इरादा है?’

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी…

वह चुप रहा। तभी उनका सगा भाई भी हम लोगों के बीच याद आ गया। दोनों बच्चे मिलकर हमारी पूरी टीम को ठंडा जल पिलाकर तृप्त किए। रामजी सर ने कहा चलो अखाड़े पर चलते हैं, कुछ लोग वहां बैठे हुए हैं। थोड़ी देर आराम करते हुए उन लोगों से बातचीत भी कर लिया जाए।

वरुणा नदी यात्रा में गिरता सीवर

जब हम लोग अखाड़े के पास पहुंचे हैं तो वहां पर नाल, जोड़ी, गदा डमरु, रस्सी, पेड़ की डाली से रस्सी के सहारे लटका हुआ बांस। ये तमाम चीजें थी। वहां पहुंचते ही सब लोग अपनी जोर आजमाइश करने लगे। कोई गदा उठाया तो कोई नाल। कोई रस्सी खींचने चाह तो कोई सपाट मारनाचाहा। लेकिन सफल कोई नहीं हो पा रहा था। सुरेंद्र जी रस्सी चढ़ने का कई प्रयास किए। एक हाथ के बाद दूसरा हाथ नहीं बड़ा पा रहे थे। गोकुलजी लटके हुए बांस से सपाट खींचना चाहे लेकिन नहीं खींच सके। मैंने भी रस्सी पर जोर आजमाइश किया, वहां असफल होने के बाद गदा फेरने लगा। कुछ लोग  कह रहे थे कि आप युवा हैं यह काम आप ही से हो सकता है लेकिन उन्हें क्या पता है कि मास्टरी की नौकरी पाने के बाद अब मैं भी उन लोगों की ही कैटेगरी में पहुंच चुका हूँ। हम लोग अपना बैनर एक झोपड़ी के किनारे टांग दिए थे। इस बैनर को देखकर वहां मौजूद सभी लोग नदी यात्रा के बारे में जानने की कोशिश कर रहे थें। निक्खे नामक एक व्यक्ति से बात होने लगी तो उन्होंने अपने जीवन और अनुभव की तमाम किस्से सुनाए। नदियों के बारे में, अखाड़े, पहलवानी और बिरहा गायन के बारे में उनसे सुनकर काफी अच्छा लगा। फिर श्यामजी ने कहा कि अगली बार से हम लोग यहीं से यात्रा आरंभ करेंगे। यहां पर मोटरसाइकिल खड़ा करने में कोई दिक्कत तो नहीं होगी? गांव के लोगों ने आश्वस्त किया कि यहां से आपकी किसी भी सामान को पंछी भी पर नहीं मार सकते हैं, आप लोग निश्चिंत होकर आइए।

गाँव में पुरनिये पहलवानों के साथ यात्रा की टीम

फिर सबको नमस्कार करके हम लोग वहां से वापस होने लिए। लौटते समय पैरों की जलन थोड़ी तेज थी क्योंकि सर पर धूप भी आने लगी थी। संतोष कुमारजी बार-बार पीछे हो जा रहे थे तो थोड़ी देर हम लोग रुक जाते थे। पूरी यात्रा करके हम लोग पुन: कोरउत अखाड़े पर आ गए। इस प्रकार से हम लोगों की यात्रा पूरी हुई।

अखाड़े पर बहुत से छायादार वृक्ष थे। उससे लटकी एक डाली पर हम लोगों ने बैनर टांग दिया ताकि यहां आने वाले लोगों को पता चल सके कि हम लोग किस प्रयोजन से यहां आए हैं लेकिन पेड़ के नीचे आती हुई हवा काफी अनुकूल थी। जहां बैठकर घंटों समय बिताया जा सकता था। भोला यादव नामक व्यक्ति से रामजी सर बात कर रहे थे। ऐसा लग रहा था उनके पुराने मित्र हों। रामजी सर के कार्य को उन्होंने खूब सराहा।

लालजी यादव और उनके साथ चिन्नू गांव के लोग टीम के लिए चने की घुघरी और जलेबी का नाश्ता लेकर आ चुके थे। वहां पानी की सुविधा न थी तो तो श्यामजी और नंदलाल मास्टर नदी को पार करते हुए बड़ी सी टाकी में ठंडा पानी भर लायें।  लालजी के घर पर बना हुआ घुघरी काफी स्वादिष्ट थी। उसके चटपटे स्वाद के साथ गोष्ठी के क्रम में नदी एवं पर्यावरण संचेतना विषय पर चर्चा-परिचर्चा आरंभ हुई। सभी विद्वानों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं ने अपने अपने विचार व्यक्ति किए तथा इस आयोजन में ग्रामीण लोगों ने भी हिस्सा लेकर अपने अनुभवों को साझा किया। इस परिचर्चा से आशय निकाला जा सकता है कि नदी की वर्तमान स्थिति ठीक नहीं है, इसकी स्थिति लगातार खराब हो रही है। इसके साथ जंगल और पर्यावरण भी नष्ट हो रहे हैं जो कि एक चिंता का विषय बना हुआ है। इसके सुधार की योजना जब तक नहीं बनाई जाएगी विकास संभव नहीं है और ये काम सरकारें नहीं कर सकती। हम लोगों के साथ साथ क्षेत्र के आम जनता को भी आगे बढ़कर हमारे साथ आना होगा। नदियों के किनारे अधिक से अधिक पेड़ लगा कर उसे जिलाने की भी योजना बनाई गई। 10 जुलाई भिखारी ठाकुर की पुण्यतिथि दिवस भी था। उनके साहित्यिक अवदान घर चर्चा करने के बाद  उन्हें श्रद्धांजलि दी गई है और आपस में एक-दूसरे को बकरीद की शुभकामनाएं देते हुए गोष्ठी का समापन किया गया। गोष्ठी का संचालन गाँव के लोग पत्रिका के संपादक और वरिष्ठ लेखक रामजी यादव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन श्याम जी यादव ने दिया।

दीपक शर्मा युवा कहानीकार हैं।

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