द्रौपदी मुर्मू से पहले भारत में राष्ट्रपतियों की परम्परा को भी देखिए

विद्या भूषण रावत

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आज द्रौपदी मुर्मू ने भारत की 15वीं राष्ट्रपति के रूप में शपथ ग्रहण कर लिया। इस अवसर पर उन्हें शुभकामनाएं। द्रौपदी मुर्मू ने विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को भारी अंतर से हराकर राष्ट्रपति पद का चुनाव जीता है। आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और झारखंड में सत्तारूढ़ दलों के अलावा गैर-एनडीए राजनीतिक दलों के सदस्यों ने बड़ी संख्या में उनका समर्थन किया। वे उनके समर्थन में इसलिए आए क्योंकि वे आदिवासी समुदाय के विरुद्ध खुद को नहीं दिखाना चाहते थे, क्योंकि सांकेतिक ही सही, उनका राष्ट्रपति पद तक पहुंचना बहुत बड़ी बात है और लोग इस बात को समझते हैं। राष्ट्रपति पद से पहले वह एनडीए की उम्मीदवार थीं लेकिन अब हम सबकी राष्ट्रपति और देश की प्रथम नागरिक हैं।

आदिवासी वास्तव में इस देश के हमारे पहले नागरिक हैं और उनका हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार होना चाहिए जिसे उन्होंने संरक्षित किया है। हम सभी जानते हैं कि राष्ट्रपति का पद औपचारिक होता है और उनमें से अधिकांश गैर-राजनीतिक लग सकते हैं, लेकिन वे अक्सर सत्ताधारी राजनीति से ही जुड़े रहते हैं। हम उम्मीद नहीं कर सकते कि द्रौपदी मुर्मू उस सरकार के खिलाफ जा रही हैं जिसने उन्हें राष्ट्रपति बनाया है, लेकिन एक उम्मीद है कि वे उन महत्वपूर्ण मुद्दों पर बोलेंगी, जो जनता, विशेषकर दलित-आदिवासियों के प्रश्नों से वाबस्ता हैं, और जहाँ ऐसा लगता हो कि कानून उनके विरुद्ध काम कर रहा है। इसलिए, कोई नहीं चाहता कि वे परियोजनाओं को रोकें, लेकिन हर कोई उम्मीद करता है कि वे अवैध विस्थापन पर सवाल उठाएंगी और विशेष रूप से आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करेंगी।

उड़ीसा के मयूरभंज जिले की एक संथाल आदिवासी द्रौपदी मुर्मू ने देश की राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले लिया। अब भाजपा के नेता कह रहे है कि एक दलित को राष्ट्रपति बनाने के बाद देश के सर्वोच्च पद पर एक आदिवासी महिला को बैठाना पार्टी की इन वर्गों के प्रति सम्मान और सद्भावना की नीति के कारण ही है। चाहे हम इसे पसंद करें या नहीं लेकिन भाजपा को इसका चुनावी लाभ अवश्य मिलने वाला है।

चुनाव प्रक्रिया में विपक्षी दल क्यों विफल रहे?

आइए चर्चा करते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव की पूरी प्रक्रिया में विपक्षी दल कैसे विफल रहे? विपक्षी नेताओं द्वारा की गई कुछ टिप्पणियां बेहद परेशान करने वाली हैं। यशवंत सिन्हा ने कहा कि राष्ट्रपति भवन में कोई ‘रबड़ की मुहर’ नहीं होनी चाहिए, जबकि तेजस्वी यादव ने कहा कि हमें अपने राष्ट्रपति के रूप में ‘ एक मूर्ति की आवश्यकता नहीं है।’ जैसे ही द्रौपदी मुर्मू को निर्वाचित घोषित किया गया था, इंडिया टुडे पत्रिका के कोलकाता स्थित उप महाप्रबंधक इंद्रनील चटर्जी ने एक अत्यंत घृणित जातिवादी पोस्ट लिखा जिसमें कहा गया था कि वह पुराने जमाने के हैं, जो नहीं चाहते कि कोई आदिवासी हम पर शासन करें। उनके ट्विटर पोस्ट में कहा गया है, ‘कुछ कुर्सियाँ सभी के लिए नहीं होती हैं और उनसे एक गरिमा जुड़ी होती है। क्या हम एक सफाईकर्मी को दुर्गा पूजा करने की अनुमति देते हैं? क्या मदरसे में कोई हिंदू पढ़ा सकता है? एक रबड़ स्टैंप को संवैधानिक प्रमुख बनाने में सत्तारूढ़ दल की सस्ती सामाजिक-राजनीतिक चाल के अलावा और कुछ नहीं हैं, ताकि विपक्षी दलों को उंगली दिखाते हुए कानून आसानी से पारित किया जा सके।’ इंद्रनील को बाद में इंडिया टुडे समूह ने अपने संस्थान से बर्खास्त  कर दिया था। अब ये बयान और पोस्ट वास्तव में पूरी तरह से गंदी जातिवादी मानसिकता का संकेत देते हैं, जो दलित-आदिवासियों को सत्ता के ढांचे में शामिल होने का मौका नहीं देना चाहती और उन्हें राज करने लायक नहीं समझती। जब ‘धर्मनिरपेक्ष’ ‘उदार’ स्थानों पर सामंती ब्राह्मणवादी मानसिकता का वर्चस्व बना रहता है तो दलित-आदिवासियों के प्रति हिंदुत्व के किसी भी प्रयास का समुदायों द्वारा स्वागत किया जाएगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसने कितने अंतर से जीत हासिल की। जाहिर तौर पर यह कई अन्य दिग्गजों की जीत से कम हो सकता है लेकिन इस बार हालात अलग थे। अगर विपक्ष ने कड़ी मेहनत की होती तो बेहतर समन्वय के साथ वह कठिन टक्कर दे सकता था।

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वास्तव में, यह कोई प्रतियोगिता नहीं थी ही नहीं। विपक्षी दलों ने इस मौके को पहले ही खो दिया था, जब उन्होंने भाजपा के एक आयातक यशवंत सिन्हा को मैदान में उतारा था। जो यह समझते थे कि वह देश के वित्तमंत्री के रूप में सबसे उपयुक्त व्यक्ति थे उनको यह याद रखना चाहिए कि उनके वित्तमंत्री के कार्यकाल को आज कोई याद भी नहीं करता। सिन्हा और उनके जैसे कई अन्य लोगों ने मोदी की आलोचना तब की जब उन्होंने महसूस किया कि उन्होंने कैबिनेट में वापस आने के सभी अवसरों को खो दिया है। ऐसे ही एक अन्य ‘महान’ अरुण शौरी हैं जो लुटियन मीडिया के पसंदीदा हैं क्योंकि उनके किसी भी प्रशंसक पत्रकार ने उनके अंतर्विरोधों और दलित-मुस्लिम आरक्षण विरोधी उनके लेखन के बारे में कभी नहीं पूछा। शायद इसलिए कि आरक्षण विरोध में वे सभी साथ-साथ हैं। अरुण शौरी आरक्षण नीति के खुले आलोचक हैं और यशवंत सिन्हा उस समय विपक्षी खेमे में थे, जब मंडल की रिपोर्ट को तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह द्वारा संसद में स्वीकार किया जा रहा था। रणवीर सेना के साथ सिन्हा की दोस्ती भी चर्चा में आई थी।

द्रौपदी मुर्मू की विजय का निष्कर्ष पहले से ही था लेकिन अंतर दिखाता है कि कैसे उनकी उम्मीदवारी ने विपक्षी खेमे के बीच विभाजन पैदा किया। यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि भाजपा द्वारा अपना उम्मीदवार घोषित करने के बाद विपक्षी एक मजबूत उम्मीदवार नहीं खड़ा कर सके। यहाँ तक कि इस पर स्पष्ट सर्वसम्मति भी नहीं बना सके कि कैसे उम्मीदवार का चयन करना चाहिए था। लेकिन विपक्ष वास्तव में एक अंक हासिल करना चाहता था और भाजपा को शर्मिंदा करना चाहता था। सिन्हा एक समय भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता थे लेकिन मीडिया हेडलाइन से परे थे। इसने राजनीति के मामले में कुछ नहीं किया, क्योंकि सिन्हा के उत्थान से किसी को मदद नहीं मिली होगी, जबकि द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति भवन में प्रवेश ने भाजपा और संघ परिवार को आदिवासी समुदाय की बहुत बड़ी ताकत और सद्भावना दे दी। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि पिछले 20 वर्षों में आदिवासियों ने ‘राष्ट्रवाद’ और ‘विकास’ के नाम पर अपने अस्तित्व, प्राकृतिक संसाधनों, जंगल और पानी के लिए सबसे बड़ा खतरा झेला है। कांग्रेस ने तथाकथित ‘विकासात्मक’ प्रक्रिया शुरू की और भाजपा ने इसे और तेज किया है।

द्रौपदी मुर्मू के पूर्ववर्तियों में से कुछ के ट्रैक रिकॉर्ड देखना भी जरूरी है

आइए, राष्ट्रपति भवन में आने वाले द्रौपदी मुर्मू के पूर्ववर्तियों में से कुछ के ट्रैक रिकॉर्ड देखें और उस समय के नेता के साथ उनके सम्बंधों को समझने के प्रयास भी करें। पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के विभिन्न मुद्दों पर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ गंभीर मतभेद थे, हालांकि स्वतंत्रता आंदोलन में संघर्ष के दिनों से ही उनके बहुत स्वस्थ संबंध थे। तथ्य यह है कि डॉ. राजेंद्र प्रसाद सत्ताधारी दल के कई अन्य सदस्यों और जनसंघ के साथ-साथ हिंदू कोड बिल के कट्टर विरोधी थे। बाबासाहेब अम्बेडकर ने इस बिल पर दिन-रात काम किया था और एक बिल का मसौदा तैयार किया था जिसने वास्तव में भारत में महिलाओं को उनकी पसंद और स्वतंत्रता का अधिकार दिया था। ‘दक्षिणपंथ’ के कई दिग्गजों और कांग्रेस के अंदर मौजूद दक्षिणपंथियों ने इस विधेयक को हमारी संस्कृति के खिलाफ बताया और कहा कि यह हमारे ‘पारिवारिक मूल्यों’ को नष्ट कर देगा। राजेंद्र प्रसाद ने प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सलाह के खिलाफ सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में भाग लिया क्योंकि नेहरू का मानना था एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख के रूप में इस तरह के किसी धर्म विशेष के धार्मिक समारोह में भाग लेना उनकी ओर से गलत होगा।

इंदिरा गाँधी के दौर में राष्ट्रपति 

नेहरू के निधन के बाद, इंदिरा गांधी को 1969 में पार्टी के भीतर सबसे बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा, जब नीलम संजीव रेड्डी को मैदान में उतारकर उनके नेतृत्व को धमकी दी गई। शायद स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी प्रधानमंत्री ने अपनी पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार का विरोध किया और एक निर्दलीय उम्मीदवार को समर्थन दिया। उपराष्ट्रपति वीवी गिरि ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और काँग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार  नीलम संजीव रेड्डी को हराया।

लेकिन राष्ट्रपति पद का वास्तविक अपमान और ह्रास वास्तव में बाद के वर्षों मे शुरू हुआ, विशेषकर आपातकाल के बाद। अगस्त 1974 में, इंदिरा गांधी रायसीना पहाड़ियों पर एक मजबूत वफादार व्यक्ति चाहती थीं और उन्होंने असम से अपनी कैबिनेट में मंत्री फखरुद्दीन अली अहमद को भारत का राष्ट्रपति बनवाया। इंदिरा इज़ इंडिया के दौर में श्रीमती गांधी के प्रस्ताव का पार्टी ने खुशी-खुशी अनुमोदन कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि जब श्रीमती गांधी ने 25 जून की रात को आपातकाल लगाया, तो राष्ट्रपति ने बिना किसी पूछताछ के दस्तावजों पर हस्ताक्षर किए, क्योंकि जो प्रस्ताव उनके पास गया वह बिना कैबिनेट की बैठक के था। एक अत्यंत प्रभावशाली राजनीतिक जीवन के बावजूद, फखरुद्दीन अली अहमद भारत के इतिहास में एक पूर्ण ‘रबर स्टैम्प’ राष्ट्रपति के रूप में जाने गए जिन्होंने आपातकाल जैसी घटना पर सरकार से कोई सवाल नहीं किया। राष्ट्रपति पद पर रहने के दौरान उनका निधन हो गया जिसके बाद नीलम संजीव रेड्डी भारत के अगले राष्ट्रपति के रूप में निर्विरोध निर्वाचित हुए।

सन 1977-1982 के बीच, संजीव रेड्डी को प्रधानमंत्री के रूप में मोरारजी देसाई, चरण सिंह और इंदिरा गांधी से निपटना पड़ा। 1982 में इंदिरा गांधी ने नए राष्ट्रपति के रूप में कांग्रेस की ओर से ज्ञानी जैल सिंह के नाम का प्रस्ताव रखा जो उस समय केंद्रीय गृहमंत्री थे। इस प्रकार केंद्र में मौजूद कांग्रेस पार्टी और अनेक राज्यों उसकी सरकारों के कारण वह भारी बहुमत से भारत के राष्ट्रपति बने। कई मीडिया संगठनों ने जैल सिंह के हवाले से कहा कि अगर इंदिराजी मुझसे फर्श पर झाडू लगाने को कहेंगी तो मैं कर दूंगा। हम नहीं जानते कि जैल सिंह ने कभी कहा या नहीं, लेकिन यह हकीकत है कि उन्हें इंदिराजी का  बेहद वफादार माना जाता था।

राजीव गाँधी बनाम ज्ञानी जैल सिंह 

जैल सिंह पिछड़े वर्ग से आते थे और देश के इतिहास में पहली बार विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग या जातियों ने वास्तव में राष्ट्रपति पद के लिए उनके उत्थान से आहत महसूस किया, क्योंकि ज्ञानीजी एक अत्यंत विनम्र पृष्ठभूमि से आए थे और अंग्रेजी बोलने वाले नहीं थे। 31 अक्टूबर, 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई थी। ज्ञानीजी उस समय विदेश में थे और अपनी यात्रा को समाप्त कर भारत लौट आए। इसके बाद उन्होंने राजीव गांधी को भारत का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। किसी ने इस पर सवाल नहीं उठाया लेकिन तथ्य यह है कि उस समय राजीव गांधी की पदोन्नति कैबिनेट या कांग्रेस संसदीय दल की औपचारिक बैठक के बिना हुई थी। राष्ट्रवाद के शोरगुल में किसी के पास इस पर सवाल उठाने का समय नहीं था। वही राजीव गांधी 1985 में भारी जनादेश के साथ सत्ता में लौटने के बाद भारत के राष्ट्रपति की अनदेखी करने लगे और ज्ञानीजी को विदेश तक जाने की अनुमति नहीं दी। ज्ञानीजी की कई विदेश यात्राओं को प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा अवरुद्ध कर दिया गया था। विदेश यात्रा के बाद प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति से मिलने की जहमत नहीं उठाई। यह एक परिपाटी है कि प्रधानमंत्री जब भी विदेश से लौटते हैं तो राष्ट्रपति से औपचारिक भेंट कर उन्हें अपनी यात्रा की उपलब्धियों की जानकारी देते हैं लेकिन राजीव गांधी ने लगातार राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को उससे अनभिज्ञ रखा। इसका ज्ञानी जी को गहरा दुख हुआ लेकिन वे कुछ नहीं कर सके।

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जब राजीव इस नीति पर कायम रहे, तो ज्ञानी जी ने उन्हें एक पारंपरिक राजनेता की ताकत दिखाई। उनके पास शब्दों की ‘सुसंस्कृत’ या चालाकी वाली भाषा तो नहीं हो सकती थी, लेकिन एक सक्रिय जमीनी स्तर के राजनेता होने के कारण प्रचुर  ज्ञान था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहली बार था कि एक डाउन टू अर्थ राजनेता ने वास्तव में सरकार में भारी संकट पैदा कर दिया था और अगर ऐसा होता तो भारत के प्रधानमंत्री अपने पद के लिए राष्ट्रपति पर मोहताज रहते। ज्ञानीजी ने कानूनी दिग्गजों और राजनीतिक नेताओं से अपने ‘प्रधानमंत्री को बर्खास्त करने के अधिकार’ के बारे में परामर्श करना शुरू किया। राष्ट्रपति अपने अधिकार को परिभाषित कर रहे थे कि प्रधानमंत्री और उनकी कैबिनेट तब तक काम करती है जब तक उन्हें राष्ट्रपति का भरोसा है। चूंकि राजीव गांधी राष्ट्रपति को कुछ भी रिपोर्ट नहीं कर रहे थे, इसलिए ज्ञानीजी को लगा कि प्रधानमंत्री ने राष्ट्रपति का विश्वास खो दिया है।

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वीपी सिंह जैसे नेताओं की दूरदर्शिता बेशक आज उल्लेखनीय है। ज्ञानीजी ने उनसे संपर्क किया था, लेकिन वीपी सिंह ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार करने से इनकार कर दिया और भविष्य में अराजकता के लिए मॉडल बन जाने वाला कुछ भी न करने का सुझाव दिया। दोनों में अच्छी समझ बनी और राजीव गांधी को भी आखिरकार अपनी गलती का एहसास हुआ और किसी तरह रिश्ता और नहीं बिगड़ा। इसका मतलब है कि भारत के राष्ट्रपति के रूप में एक राजनीतिक व्यक्ति उस समय तक ही लॉयल रह सकता है जब तक वह आत्मसम्मान की सीमासे बाहर न  हो।

राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में राष्ट्रपति 

ज्ञानीजी के बाद पुनः तमिलनाडु से पूर्व वित्तमंत्री आर वेंकटरामण को राष्ट्रपति बनाया गया, जिनका कार्यकाल भी कठिन था क्योंकि 1989 में केंद्र की राजीव गांधी के नेतृत्ववाली कांग्रेस की सरकार गिर गई और फिर वीपी सिंह की सरकार आई जो 11 महीने चली। उसके बाद चंद्रशेखर की अल्पकालिक सरकार भी आई जो तुरंत ही गिर गईं। दरअसल, भारत में सही मायनों में साझा सरकारों का युग उस समय से ही शुरू हुआ और ऐसी स्थिति मे राष्ट्रपति की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। वेंकटरमण को कॉपीबुक राष्ट्रपति माना जाता था। कांग्रेस पार्टी ने तमिल ब्राह्मण आर वेंकटरमण के बाद उत्तर भारत के एक और कांग्रेसी ब्राह्मण नेता शंकर दयाल शर्मा को राष्ट्रपति पद के लिए मनोनीत किया और वह आसानी से जीत भी गए। 1997 मे केंद्र मे इंदर कुमार गुजराल के नेतृत्व में यूनाइटेड फ्रन्ट की सरकार थी और भारत नए राष्ट्रपति की तलाश में था।

पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह इस दौर मे एक प्रभावकारी भूमिका निभा रहे थे और उनकी बातों को सरकार नजरंदाज नहीं कर सकती थी। अचानक वीपी सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया और भारत के राष्ट्रपति के रूप में डॉ. केआर नारायणन के नाम को आगे बढ़ाया। नारायणन तब उपराष्ट्रपति थे लेकिन किसी ने उनके नाम पर विचार करने का सोचा भी नहीं था लेकिन विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राष्ट्रपति पद के लिए उनका नाम आगे कर राजनैतिक दलों को सर्वसम्मति बनाने पर मजबूर कर दिया। जुलाई 1997 में नारायणन ने कुल 95% मत प्राप्त कर अपने प्रतिद्वंदी पूर्व चुनाव आयुक्त टीएन शेषन को हराया, जिन्होंने उनके खिलाफ चुनाव लड़ा था। नारायणन भारत के उन बेहतरीन राष्ट्रपतियों में से एक थे जिन्होंने राष्ट्रपति पद को फिर से परिभाषित किया। उन्होंने बेहद समझदारी से बात की और सरकार को उसकी जिम्मेदारियों के बारे में बार-बार याद दिलाया। उन्होंने बिंदीदार रेखाओं पर हस्ताक्षर नहीं किए और कई बिलों को फिर से विचार के लिए लौटा दिया। केआर नारायणन संविधान के सच्चे संरक्षक थे और पूरे देश के लोगों ने उन पर गर्व महसूस किया।

राष्ट्रपति चुनाव के बहाने रणनीतिक व्यूहरचना का दौर

नारायणन ने अपने कार्यकाल में पद की गरिमा को इतना ऊंचा कर दिया कि उनके बाद बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को भी एक ऐसा नाम ढूँढना पड़ा, जिससे उसकी छवि भी बन जाए और राजनैतिक एजेंडा भी चल जाए। इस प्रकार उसने  एपीजे अब्दुल कलाम के पक्ष में आम सहमति बना ली, जिन्हें वह एक ‘आदर्श’ मुस्लिम और साथ ही एक संपूर्ण राष्ट्रवादी के रूप में देखता था। कलाम युवाओं में, विशेष रूप से उन छात्रों के बीच बेहद लोकप्रिय हो गए, जो उनकी सलाह सुनना पसंद करते थे। कलाम की लोकप्रियता के  माध्यम से  भाजपा ने शहरी मध्य वर्गों के बीच पैठ बनाई और वह अपने प्रयासों में धीरे-धीरे सफल हुई। 2007 में जब यूपीए सत्ता में थी तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने परिवार की वफादार और बेहद हल्के वजन वाली प्रतिभा पाटिल को वरीयता दी। इस प्रकार भारत को  ‘पहली’ महिला राष्ट्रपति मिलीं।

2012 में यूपीए ने आंतरिक राजनीतिक मजबूरियों के कारण प्रणब मुखर्जी को मैदान में उतारा। मुखर्जी हमेशा भारत के प्रधानमंत्री बनने की इच्छा रखते थे। वे संसदीय नियमों और प्रक्रियाओं के ‘विशेषज्ञ’ थे और वह मोदी सरकार के साथ भी इस उम्मीद में अच्छे रिश्ते बनाने में कामयाब हो गए। उन्हें दूसरे टर्म की उम्मीद थी लेकिन 2017 में, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार बनाया। उनकी कोली-दलित पहचान का इस्तेमाल भाजपा ने गुजरात चुनाव के दौरान किया था। अब, उड़ीसा के मयूरभंज जिले की एक संथाल आदिवासी द्रौपदी मुर्मू ने देश की राष्ट्रपति के रूप में शपथ ले लिया। अब भाजपा के नेता कह रहे है कि एक दलित को राष्ट्रपति बनाने के बाद देश के सर्वोच्च पद पर एक आदिवासी महिला को बैठाना पार्टी की इन वर्गों के प्रति सम्मान और सद्भावना की नीति के कारण ही है। चाहे हम इसे पसंद करें या नहीं लेकिन भाजपा को इसका चुनावी लाभ अवश्य मिलने वाला है।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

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