Saturday, July 13, 2024
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दलित समाज के कर्मकांड और त्रासदियों की कहानी

नई दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की कहानी वाचन, परिचर्चा एवं काव्य पाठ गोष्ठी दिल्ली के मयूर विहार फेस टू में संपन्न हुई। गोष्ठी डॉ. संजीत कुमार की कहानी इक्कीस पोस्ट पर केंद्रित रही। यह कहानी दलित समाज के सफाई कर्मियों की इक्कीस पोस्ट में हुई धांधलेबाजी और न्यायिक प्रक्रिया को आधार बनाकर लिखी गई […]

नई दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की कहानी वाचन, परिचर्चा एवं काव्य पाठ गोष्ठी दिल्ली के मयूर विहार फेस टू में संपन्न हुई। गोष्ठी डॉ. संजीत कुमार की कहानी इक्कीस पोस्ट पर केंद्रित रही। यह कहानी दलित समाज के सफाई कर्मियों की इक्कीस पोस्ट में हुई धांधलेबाजी और न्यायिक प्रक्रिया को आधार बनाकर लिखी गई है। इक्कीस पोस्ट के बहाने, इस एक कहानी में संबंधित दलित समाज की त्रासदियों से जुड़ी और भी कई कहानी आ समाई हैं। गोष्ठी की अध्यक्षता बंशीधर नाहरवाल ने की और संचालन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया। गोष्ठी में प्रमुख रूप से डॉ. संजीत कुमार, डॉ. पूनम, रायल, ममता अंबेडकर, नीशू सिंह, डॉ. पूनम तुषामड, मामचंद सागर, जोगेंद्र सिंह, बृजपाल सहज, डॉ. घनश्याम दास, डॉ. अमित धर्मसिंह, हुमा खातून, पुष्पा विवेक, डॉ. मनोरमा गौतम, डॉ. गीता कृष्णांगी और बंशीधर नाहरवाल आदि रचनाकार उपस्थित रहे। गोष्ठी के आरंभ में, डॉ. संजीत कुमार द्वारा कहानी इक्कीस पोस्ट का प्रभावी वाचन किया गया। इसके उपरांत कहानी पर उपस्थित रचनाकारों ने सारगर्भित विचार प्रस्तुत किए। डॉ. पूनम तुषामाड ने कहा कि कहानी अपने कथ्य और शिल्प में एक सफल कहानी है। कहानी में जिस तरह से कल्पना तत्त्व को समाहित किया गया है उससे लगता ही नहीं कि कहानी में कल्पना तत्त्व भी है। कहानी दलित समाज के कटु यथार्थ की कहानी बन पड़ी है। मामचंद सागर ने कहानी को मार्मिक कहानी बताया। उन्होंने कहा कि कहानी पाठक को बांधने में सफल कहानी है लेकिन कहानी में अपेक्षाकृत पात्रों की संख्या अधिक होने से कहानी अनावश्यक रूप से लेंथी भी हो गई है। जोगेंद्र सिंह ने कहा कि कहानी में मार्मिक पक्ष वाकई बहुत प्रबल है। मैं कहानी को सुनते हुए, उसमें खो सा गया। लेकिन कहानी दलित समाज की सच्चाई को जिस तरह पाठकों के सामने प्रस्तुत करती है, उस तरह पाठक को कोई दिशा या कुछ नया करने की प्रेरणा देने में सफल नहीं हुई है। ममता अंबेडकर ने कहा कि कहानी बहुत अच्छी लगी। कहानी में दलित समाज के कर्मकांड को जिस तरह से दर्शाया गया है, ठीक वैसा ही होते हुए हमने समाज में देखा है इसलिए कहानी दलित समाज के वास्तविक हालात पर लिखी गई सच्ची कहानी है। बृजपाल सहज ने कहा कि कहानी में कहानीकार ने काफी मेहनत की है, तभी तो वह शादी में मिलाए जाने वाले गणों और गुणों को उनके नाम के साथ दर्ज कर पाए हैं। इस कहानी को सुनने के बाद पता चलता है कि कहानीकार डॉ. संजीतजी एक मंजे हुए कहानीकार हैं जो कहानी का कच्चा माल अच्छे से जुटाकर कहानी लिखते हैं। डॉ. घनश्याम दास ने कहा कि कहानी के भाव और शिल्प दो पक्ष होते हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि कहानी दोनों पक्षों में एक मजबूत कहानी बन पड़ी है। कहानी को सुनते हुए लगा कि जैसे कहानी का एक-एक पात्र सजीव हो उठा और सभी घटनाएं आंखों के सामने किसी फिल्म की तरह घटित हो रही हो।

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डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहानीकार के विषय में एक शेर कोट किया- मसअलो से मसलहत से हूं भरा मैं, दिख रहा तन्हा मगर तन्हा नहीं हूं। असल में डॉ. संजीव कुमार दलित समाज की पीड़ाओं से भरे हुए हैं। उनके जेहन में एक नहीं अनेक दलित पात्र विचरण करते रहते हैं इसलिए जब वे कहानी लिखते हैं तो अनायास ही बहुत से पात्र उनसे अपनी कहानी लिखवाने आ जाते हैं। फिर चाहे बात प्रीतम और पूजा के प्रेम की हो, सफाईकर्मियों की इक्कीस पोस्ट की हो, शंकर और मंगली की हो, धोखेबाज बिज्जू और बैंक के फर्जी लोन की हो, कमली की हो, गटर में डूबकर मरने वाले राजू और बाबू की हो, दलित समाज के धार्मिक आडंबर और स्टेट्स सिंबल की हो अथवा न्याय प्रक्रिया की जटिलता की हो, सबकुछ कहानी में आ समाया है। हुमा खातून ने कहा कि कहानी में दलित समाज की जो सच्चाई सामने रखी गई है, सही में वैसा ही होते हुए हम देखते हैं। लेकिन यह भी सही है कि अगर परिवार में आर्थिक तंगी का माहोल होता है तो ऐसे हालात में परिवार की एक स्त्री भी बहुत सरवाइव करती है और कहानी में प्रीतम की पत्नी पूजा के विषय में उतना सामने नहीं आया, जितना कि आना चाहिए था। फिर भी, कहानी लंबी होने के बावजूद बांधकर रखने में बिलकुल सफल कहानी है। पुष्पा विवेक ने कहा कि कहानी अत्यंत मार्मिक है जो पाठक को आखिर तक बांधे रखती है। आज भी दलितों के प्रति समाज उतना जिम्मेदार और जागरूक नहीं है, जितना होना चाहिए। यह हमें ही समझना है कि इस त्रासदी से कैसे उबरे। इस तरह की कहानी अधिक से अधिक लिखी व छपवाई जानी चाहिए और उन पर इस तरह की चर्चाएं भी होती रहनी चाहिए, जिससे कि समाज को अधिक से अधिक जागरूक किया जा सके। डॉ. मनोरमा गौतम ने कहा कि कहानी इक्कीस पोस्ट दलित समाज की समस्याओं को आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक और न्यायिक, कई संदर्भों में प्रस्तुत करती है। कहानी की भाषा और भाव एक दूसरे के अनुरूप है इसलिए कहानी कहीं भी बोझिल नहीं लगती है। कह सकते हैं कि कहानी में भाषा पात्रों के अनुरूप अपनाई गई है जो कहानी की सफलता का एक पर्याय बन गई है।

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डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहा कि कहानी हमें बताती है कि दलित समाज की सामाजिक परेशानियों के जिम्मेदार सिर्फ दूसरे लोग ही नहीं होते, हमारे अपने लोग भी होते हैं। कहानी में शंकर और मंगली के नाम पर बैंक से लोन लेने वाला कोई और नहीं उनका अपना भतीजा विजय ऊर्फ बिज्जू ही होता है। कहानी दलित समाज के धार्मिक आडंबर और गैर जिम्मेदाराना स्वभाव को भी उजागर करती है। तत्पश्चात कहानीकार डॉ. संजीत कुमार ने अपनी बात रखते हुए कहा कि सबसे पहले तो मैं नदलेस की पूरी टीम का आभारी हूं कि उन्होंने मेरी कहानी पर परिचर्चा रखी तथा ऐसी सर्दी में मेरे आवास पर आना मंजूर किया। जहां तक बात कहानी की है तो यह पूरी तरह से सच्ची घटना पर आधारित है। कहानी को कहानी बनाने के लिए बहुत कम सहारा कल्पना का लिया गया है। गोष्ठी के अध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि कहानी अपने प्रमुख तत्वों को साथ लेकर चलती है। देश, काल और वातावरण का कहानी में पूरा ध्यान रखा गया है। कोई संदेह नहीं कि इक्कीस पोस्ट कहानी एक मजबूत और बेजोड़ कहानी बन पड़ी है। तभी उस पर इतनी बातचीत हो पाई है। इसके लिए कहानीकार को भी नदलेस की ओर से हार्दिक बधाई। कहानी परिचर्चा के बाद कुछ कवियों ने काव्य पाठ भी किया। काव्य पाठ करने वालों में डॉ. पूनम तुषामड, ममता अंबेडकर, डॉ. संजीत कुमार, मामचंद सागर और जोगेंद्र सिंह रहे। गोष्ठी के अंत में डॉ. संजीत कुमार को नदलेस की वार्षिकी सोच और पैन भेंटस्वरूप दिया गया। मामचंद सागर और डॉ. पूनम तुषामड को नदलेस के आजीवन सदस्यता पत्र और पैन भेंट किए गए। उपस्थित रचनाकारों का अनौपचारिक धन्यवाद ज्ञापन हुमा खातून ने किया।

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