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ग्वालियर के भाजपाई सांसद बनाम सिंधिया : अपने ही गिरा रहे हैं नशेमन पे बिजलियाँ

ग्वालियर के सांसद भरत सिंह कुशवाह की शिकायत है कि ग्वालियर का सांसद होते हुए भी उन्हें एक सांसद की तरह काम नहीं करने दिया जा रहा है, सांसद के रूप में सम्मान की तो बात ही अलग है। वे केंद्र की जिन तमाम योजनाओं के लिए भागदौड़ करते हैं, उनके स्वीकृत होते ही उन सब योजनाओं को लाने का श्रेय युवराज लूट लेते हैं और प्रशासन भी उनकी मदद करता है।

क्या आरएसएस भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का असर पुलिस पर भी पड़ने लगा है?

आज ही मैंने एक वीडियो देखा, जिसमें एक यात्री यू पी के रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर शायद चादर ओढ़कर रात में अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा है और वहीं वर्दी में एक पुलिसकर्मी अपने जूते से उसके पैर को रगड़कर जगा रहा है। क्या यह अमानवीयता शरीर पर वर्दी पहनने के बाद आती है? या फिर पुलिस की ट्रेनिंग भी इसी तरह दी जाती है? क्या आरएसएस की गतिविधियों के प्रति उदार हो चुकी पुलिस भी नफ़रत की भावना से भर चुकी है?

आखिर इतने तमतमे वाले नरेंद्र मोदी को क्यों संघ मुख्यालय जाना पड़ा

प्रधानमन्त्री बनने के लगभग 12 साल बाद नागपुर के संघ कार्यालय में मोदी पहुंचना, ताक़त का प्रदर्शन तो नहीं है? जबकि भाजपा ने स्वयं को सक्षम  घोषित कर दिया था, फिर ऐसा क्या हुआ कि पहले नड्डा और अब मोदी खुद नागपुर पहुंच गए।

भाजपा की आगामी इतिहास परियोजना : तुगलक.. तुगलक.. तुगलक.. तुगलक….

जिस पार्टी के पास आम जनता के असली मुद्दों से टकराने का साहस नहीं होता, वह ऐसे ही मुद्दों पर सुर्खियां बटोरने के काम में लगी रहती है, चाहे उसके परिणाम देश के लिए कितने ही खतरनाक क्यों न हो! औरंगजेब के बाद अकबर, बाबर और अब तुगलक को निशाने पर साधा है, क्योंकि संघ की स्थापना हिंदुत्व और सांप्रदायिकता को आगे बढ़ाने के लिए हुई थी, इसमें अब इनका राजनैतिक दल भाजपा बढ़ चढ़कर काम कर इतिहास बदलने का काम कर रहा है।

क्या छावा के बहाने तथ्यहीन इतिहास लिख रही है भाजपा

क्या औरंगजेब हिंदू विरोधी था? कोई यह कह सकता है कि औरंगजेब न तो अकबर था और न ही दारा शिकोह। वह रूढ़िवादी था और एक स्तर पर हिंदुओं और इस्लाम के गैर सुन्नी संप्रदायों का स्वागत नहीं करता था। दूसरे स्तर पर वह गठबंधनों का मास्टर था क्योंकि उसके प्रशासन में कई हिंदू अधिकारी थे।

संघ की राजनीति ने देश में सांप्रदायिक ताकतों को मुसलमानों पर हमले की दी  छूट 

वर्ष 2014 के बाद भारत की धर्ननिरपेक्षता पर लगातार हमला हुआ है। देश में हिंदुत्ववादी विचारधारा ने लगातार सांप्रदायिकता फैलाने की कोशिश की है। रोजाना एक-दो खबरें सुनाई दे रही हैं। केवल पुलिस-प्रशासन ही नहीं बल्कि जनप्रतिनिधि भी गैर जिम्मेदाराना बयान दे आग भड़का रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूछे गए सवालों से क्यों बच रही है मोदी सरकार

संविधान के विरुद्ध किए गए फैसलों के लिए 12 दिसंबर को सुनवाई हुई और सुनवाई के दौरान CJI संजीव खन्ना को आदेश दिया गया कि जब तक मोदी सरकार की तरफ से कोई जवाब नहीं आता, तब तक कोई सुनवाई नहीं होगी, कोई कार्रवाई नहीं होगी, कोई नई याचिका नहीं डाली जाएगी। लेकिन केंद्र सरकार ने संविधान को ताक में रखते हुए आज तक कोई जवाब नहीं दिया। सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार न्यायपालिका से ऊपर है?

बस्तर में लोकतन्त्र कुचलने के लिए कांग्रेस और भाजपा दोनों एक हैं : रघु मीडियामी की गिरफ़्तारी से उठते सवाल

रघु मीडियामी की वकील शालिनी गेरा का कहना है कि बस्तर के जन आंदोलनों को कुचलने के लिए ही रघु की फर्जी केस में गिरफ्तारी की गई है, क्योंकि जिन प्रतिबंधित 2000 रूपये के नोटों को रखने और प्रतिबंधित माओवादी संगठनों को धन वितरित करने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया है, संबंधित एफआईआर में भी उसका कोई जिक्र नहीं है। उल्लेखनीय है कि इसके पहले भी सरजू टेकाम और सुनीता पोटाई नामक मंच के दो कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया जा चुका है, जो बस्तर में संसाधनों की लूट के खिलाफ जारी आंदोलनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे।

महाकुंभ 2025 : गंगा की गंदगी से ऊपर राजनीतिक अवसरवाद के आँकड़े

महाकुंभ को लेकर सरकार का यह दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है कि अब तक 35 करोड़ लोग पहुंचे हैं। लेकिन इतना तो सही है कि इस कुंभ का भी जिस प्रकार नफरत फैलाने और ध्रुवीकरण करने की राजनीति के लिए उपयोग किया गया है, यदि सरकारी दावे के आधा, 15 करोड़ भी इस कुंभ में पहुंचे हों, तो सरकारी खर्च प्रति व्यक्ति औसतन 500 रूपये बैठता है और किसी भी तीर्थ यात्री को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराने के लिए यह राशि कम नहीं होती। कहीं ऐसा तो नहीं कि महाकुंभ में 50 करोड़ तीर्थयात्रियों के पहुंचने का दावा, जिसकी किसी भी तरह से पुष्टि नहीं होती, इस भारी भरकम आबंटन में सेंधमारी करने की सुनियोजित साजिश है?

आदिवासी हमेशा से ही सरकार और कॉरपोरेट के निशाने पर रहे हैं

पूरे देश के आदिवासी आज कॉरपोरेट के निशाने पर है और इन्हें भाजपा सरकार का पूरा समर्थन-संरक्षण हासिल हैं। सरकारों की इस कॉर्पोरेटपरस्ती के खिलाफ आम जनता के सभी तबकों की लामबंदी सुनिश्चित करनी होगी और आदिवासी अधिकारों की रक्षा के लिए एक व्यापक संघर्ष छेड़ना होगा।

क्या राष्ट्र की जिम्मेदारी केवल हिन्दू समाज के कंधों पर है?

स्वतंत्रता आंदोलन के मूल्य हमारे संविधान का हिस्सा हैं; जहां धर्मों और भाषाओं से परे बहुलता और विविधता है। मोहन भागवत हिंदू समाज के भीतर विविधता की बात कर रहे हैं और सोचते हैं कि केवल हिंदू ही इस राष्ट्र के लिए जिम्मेदार हैं! भागवत की 'केवल हिंदू' की विचारधारा देश की प्रगति में एक बड़ी बाधा है। वे वसुधैव कुटुंबकम का पालन करने का दावा करते हैं, लेकिन इन पर कोई अमल नहीं होता। देश के लिए हिंदू ही जिम्मेदार हैं, यह कहना विभाजनकारी होने के साथ गैर जिम्मेदाराना बयान है।

महाराष्ट्र में गोंडी बोलने और पिज़्ज़ा खाने की कीमत कैसे चुका रहे हैं आदिवासी

सरकार लगातार आदिवासियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए बड़ी बड़ी योजनाएं और वादे कर रही है लेकिन महाराष्ट्र में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चों के लिए जिस तरह के निर्णय लिए जा रहे हैं, उससे सरकार की मंशा पर सवाल उठना वाजिब है। जबकि संविधान में सभी समुदायों को सभी स्तरों पर, अपनी प्राचीन भाषा हो या आधुनिक खानपान, सबको समान न्याय और अधिकार मिले हुए हैं। महाराष्ट्र के एक आदिवासी गाँव में गोंडी भाषा पढ़ने वाले स्कूल को प्रतिदिन दस हज़ार रुपये जुर्माना भरने की सज़ा सुनाई गई है। इसी तरह नासिक क्षेत्र में पिछड़े वर्ग के छात्रावास में रहने वाली एक लड़की को पिज़्ज़ा खाने के कारण निलंबित कर दिया गया है। क्या ऐसा करना संविधान के खिलाफ नहीं है? लेखक प्रमोद मुनघाटे ने अपने इस लेख में इन्हीं सवालों को उठाया है।

दिल्ली चुनाव : एक मिथक का अंत और एक त्रासदी का और बड़ा होना

लोकसभा चुनाव के राज्यवार नतीजों के विश्लेषण से यह भी स्पष्ट था कि भाजपा को हराने के लिए राज्यों के स्तर पर संगठित विपक्ष को एकजुट रणनीति बनानी होगी। लोकसभा चुनाव के बाद जहां ऐसा कर पाए, वहां भाजपा को सत्ता से दूर रखने में सफल रहे। दिल्ली चुनाव के नतीजों से फिर साफ हो गया है कि जहां कहीं इस समझदारी का उल्लंघन होगा, भाजपा की राह आसान होगी।

दिल्ली चुनाव : क्यों हारे अरविंद केजरीवाल…

दिल्ली विधानसभा में हुई करारी शिकस्त ने आम आदमी पार्टी के भविष्य पर अनेक सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं। अरविंद केजरीवाल की विचारहीन राजनीति और सामाजिक मुद्दों से परहेज ने पहले ही आम आदमी पार्टी की छवि भाजपा की बी टीम के रूप में बना दी थी। रही-सही कसर शराब घोटाले ने निकाल दी जिसके कारण अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह को लंबे समय जेल में रहना पड़ा और आप का संगठन बिखराव तथा दिशाहीनता का शिकार होता गया। राजनीतिक विश्लेषक इन सभी हालात को लेकर कहने लगे हैं कि अरविंद केजरीवाल स्वयं अपने ही ताने-बाने में उलझकर रह गए। दिल्ली चुनाव के बहाने आम आदमी पार्टी और उसकी राजनीतिक संस्कृति का जायजा ले रहे हैं मनीष शर्मा।

मिल्कीपुर रेप काण्ड  : राजनीतिक अश्लीलता के बीच दलित की बेटी को न्याय कैसे मिलेगा?

योगी सरकार लगातार प्रचार कर रही है कि उत्तर प्रदेश में महिलाएं पूर्णत: सुरक्षित हैं, लेकिन यहाँ रोज ही बलात्कार की अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों से पता चलता है कि 2015 से 2020 तक दलित महिलाओं के खिलाफ बलात्कार के मामलों में 45 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। आंकड़ों से पता चलता है कि भारत में दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ बलात्कार की 10 घटनाएं प्रतिदिन रिपोर्ट की जाती हैं। उत्तर प्रदेश राज्य लगातार उन राज्यों की एनसीआरबी सूची में शीर्ष पर है जहां दलित विरोधी घटनाएं प्रचलित हैं। उसके खिलाफ कानून जरूर बने हुए हैं लेकिन वे पर्याप्त नहीं है क्योंकि पुलिस-प्रशासन अक्सर ही अपराधी के खिलाफ मामला दर्ज करने की बजाए उन्हें संरक्षित करने का काम करती है। संविधान में भले ही समानता व धर्मनिरपेक्षता की बात कही गई है लेकिन यहाँ रहने वाले अधिकतर आज भी जातिवादी आधार पर काम कर रहे हैं। ।

समाज सुधारक नारायण गुरु : असमानता पर आधारित धर्म का विरोध करने पर आरएसएस ने उठाए सवाल

मंदिर हमारे सामुदायिक जीवन का भाग हैं। सामाजिक प्रतिमानों में परिवर्तन के साथ मंदिरों में वस्त्र-संबंधी मर्यादाओं में भी बदलाव आवश्यक है। इनका विरोध करना घड़ी की सुइयों को विपरीत दिशा में घुमाने जैसा होगा। धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति में प्रायः हमेशा सामाजिक बदलावों और राजनैतिक मूल्यों में परिवर्तन का विरोध होता है।

मुकेश चंद्राकर : एक और युवा पत्रकार भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलने पर मारा गया

गोदी मीडिया काल में ग्रामीण पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ मुकेश चंद्राकर की हत्या सचमुच कष्टप्रद और चिंताजनक है। वर्ष 2014 के बाद अभिव्यक्ति को लेकर जिस तरह से पत्रकारों पर हमले बढ़े  हैं, वह सभी के सामने है। पत्रकारों पर हमले करवाना और उनकी हत्या करवा देना सत्ताधीशों के लिए बहुत सामान्य बात है। बस्तर जंक्शन के मुकेश चंद्राकर की हत्या निडर पत्रकारिता करने वालों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़ा करती है। इस देश में अब विधायिका, कार्यपालिका न्यायपालिका और चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया पूरी तरह से फासीवाद के चपेट में है और इनका अस्तित्व नाममात्र का रह गया है। 

सौ साल से अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ नफरत फैलाने की संघी कोशिशें अब फूल-फल रही हैं

अल्पसंख्यक समुदायों पर संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के हमले तेज हो चुके हैं जिसके शिकार हजारों लोग हुये हैं। आरएसएस द्वारा तैयार हिंदुवादी संगठनों को एक ही लक्ष्य दिया जाता है, कि वे अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हमला करें। आरएसएस के ट्रेनिंग संस्थानों में तैयार किए जा रहे युवक-युवतियों का ब्रेनवाश कर अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहर भरने का काम अच्छी तरह से किया जा रहा है, जिसके बाद वे अपना दिमाग चलाना बंद कर देते हैं। आरएसएस के संस्थापकों में एक डॉ बी एस मुंजे की डायरी के हवाले से इस लेख में बताया गया है कि सौ साल पहले इसकी प्रेरणा आरएसएस को मुसोलिनी से मिली जब वे इटली गए थे।

देश में फैलाया जा रहा सांप्रदायिक जहर आने वाली पीढ़ियों को बर्बाद कर देगा – राम पुनियानी

इतिहासकार प्रो. राम पुनियानी ने छत्तीसगढ़ के सामाजिक संगठनों द्वारा आयोजित 'साम्प्रदायिक सद्भाव की विरासत और देश की वर्तमान परिस्थितियाँ'  विषय पर आयोजित व्याख्यान व सम्मान समारोह में शामिल हुए। पुनियानी जी साहस के साथ सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ बोल और लिख रहे हैं। इनके लेख आरएसएस द्वारा अल्पसंख्यकों के खिलाफ फैलाई जा रही नफरती ताकतों और इतिहास बदलने की कार्यवाही पर केंद्रित होते हैं। रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में भी उन्होंने अपना वक्तव्य इसी बिन्दु को ध्यान में रखते हुए दिया।

डॉ आंबेडकर के प्रति हिकारत के पीछे संघ-भाजपा की राजनीति क्या है

एक तरफ डॉ अंबेडकर ने जहां संविधान में समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता को शामिल किया, वहीं आरएसएस ने देश में हिंदुत्व को बढ़ावा देते हुए फासीवाद और ब्रह्मणवाद मार्का पर काम कर रहा है, जिसके बाद अम्बेडकरवादी विचारधारा पर लगातार हमला हो रहा है। 

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