सियासत, समाज और इश्क, डायरी (24 मई, 2022)

नवल किशोर कुमार

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 सियासत के मामले में मेरी एक राय यथावत है कि सियासत करनेवाले कभी सीधी रेखा का अनुगमन नहीं करते। सियासत ऐसे की भी नहीं जाती है। मैं यह बात केवल बिहार या भारत के संदर्भ में नहीं कह रहा, अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में भी यही बात लागू है। फिर चाहे वह अमरीका की सियासत हो या फिर चीन की। अलबत्ता इन दोनों मुल्कों की सियासत बेहद खास है। वजह यह कि आज पूरा विश्व इन्हीं दो मुल्कों की ओर देख रहा है। पहले अमरीका की दादागिरी थी (वैसे आज भी है, लेकिन कुछ कमी तो आयी ही है), अब चीन भी दादागिरी करने लगा है। इस बीच में भारत कहां है, इसका आकलन करना जटिल काम नहीं। कल ही अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने जापान की राजधानी तोक्यो में हिंद-प्रशांत क्षेत्र के 12 देशों के साथ नये आर्थिक समझौते की शुरुआत की। इस समझौते को इंडो-पैसिफिक इकोनामिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (आईईपीईएफपी) को कहा गया है। इसमें भारत के अलावा जो देश शामिल हुए हैं, इनमें वियतनाम, आस्ट्रेलिया, जापान, इंडोनेशिया, ब्रूनेई, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस और सिंगापुर आदि शामिल हैं।
अब आईईपीएफपी के बारे में कहा जा रहा है कि यह चीन विरोधी मोर्चा है। हालांकि उपर में वर्णित देशों में से एक-दो को छोड़ दें तो कोई भी मुल्क ऐसा नहीं है जो चीन की मुखालफत सीधे तौर पर कर सके। दरअसल, यह दिखावटी सियासत है। यह इसलिए कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के दो प्रभाव हैं। एक तो यह कि उसने इन सभी देशों के बाजार में हिस्सेदारी को जबरदस्त तरीके से बढ़ाया है, और दूसरा चीन की साम्राज्यवादी नीति का प्रभाव। भारत का भी यही हाल है।

दरअसल, चीन ने अपनी दावेदारी मजबूत कर दी है और यह बात अब आरएसएस भी स्वीकारने लगा है। यही वजह है कि आरएसएस ने चीन के मामले में चुप रहना ही बेहतर समझा है। लेकिन चूंकि उसे ब्राह्मण वर्ग का वर्चस्व बनाए रखना है तो नफरत की सियासत तो करनी ही होगी और अमरीका का साथ भी। क्योंकि पूंजी के बगैर यह काम मुमकिन नहीं।

दरअसल, भारत एक ऐसा देश बन चुका है जिसकी अंतररष्ट्रीय ऋण की आवश्यकता रोज-ब-रोज बढती जा रही है। वजह भी बेहद स्पष्ट है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का बुनियादी आधार यानी प्राइमरी सेक्टर जिसमें खेती भी शामिल है, उसकी कुल घरेलू सकल उत्पाद में हिस्सेदारी लगातार घटती जा रही है। अब तो यह चौदह फीसदी तक हो गई है। पूर्व में यह कम से कम 20 फीसदी तक तो रहती ही थी।
अब सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में खेती की हिस्सेदारी घटने के दो परिणाम हुए हैं। पहला तो यह कि सबसे अधिक लोग बेरोजगार हुए हैं। मैं तो अपने बचपन को याद करता हूं। उन दिनों क्लास में भारत पर लेख लिखने को कहा जाता था और हम लिखते थे कि भारत एक कृषि प्रधान राज्य है और इसकी 80 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है। लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल चुके हैं। भारत सरकार की रपटें बताती हैं कि अब कृषि पर आश्रित लोगों की आबादी 60 से 65 फीसदी के बीच है। हालांकि मैं इसे अब भी केवल सरकारी आंकड़ा ही मानता हूं। गांवों में हालात बदल चुके हैं। सुदूर गांवों के लोगों ने भी यह मान लिया है कि कृषि अब मुनाफे का पेशा नहीं है।
खैर, भारत की अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की भूमिका अहम होती जा रही है, लेकिन इस क्षेत्र के साथ परेशानी यह है कि यह न्यूनतम लोगों को रोजगार मुहैया कराता है।
सियासत का अर्थव्यवस्था से सीधा-सीधा कनेक्शन है। जैसी अर्थव्यवस्था होगी, वैसी सियासत होगी। इसको ऐसे समझें कि सत्ता को आउटसोर्स कर दिया गया है। मसलन, भारत के प्रधानमंत्री अब प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि किसी कंपनी के सीईओ लगते हैं और उन्हें यह सत्ता आरएसएस ने आउटसोर्स कर दिया है। वजह यह कि आज यदि नरेंद्र मोदी सत्ता में हैं तो इसके पीछे आरएसएस की ही भूमिका है। आरएसएस इस देश में नफरत के समीकरण बनाता रहा है और पूरी सत्ता उसकी परिक्रमा कर रही है। अब चूंकि ब्राह्मणवाद जो कि आरएसएस का एकमात्र ‘वाद’ है, बिना पूंजी के कभी कारगर नहीं हो सकता, तो उसने नवउदारवाद को अपना साझेदार बना लिया है। नतीजा यह है कि अडाणी जैसे लोग रोज-ब-रोज प्रभावशाली होते जा रहे हैं। आज ही दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता में यह रपट भी प्रकाशित है कि हर 33 घंटे में गरीब दस लाख लोग गरीब हो रहे हैं। यह ऑक्सफैम की रपट के हवाले से कहा जा रहा है। इसे मुताबिक दो साल कोरोना काल के दौरान 573 नये अरबपति बने हैं। साथ ही यह भी कुल वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में अरबपतियों की हिस्सेदारी बढ़कर 13.9 फीसदी हो गयी है।
जाहिर तौर पर जिन देशों में गरीब सबसे अधिक हुए हैं, उनमें भारत निस्संदेह शीर्ष पर होगा। मैं यह अनुमान के आधार पर कह रहा हूं क्योंकि ऑक्सफैम की रपट में इसे साफ तौर पर नहीं कहा गया है। जिन देशों में अमीरी बढ़ी है, उनमें चीन का नाम अहम होगा।
दरअसल, चीन ने अपनी दावेदारी मजबूत कर दी है और यह बात अब आरएसएस भी स्वीकारने लगा है। यही वजह है कि आरएसएस ने चीन के मामले में चुप रहना ही बेहतर समझा है। लेकिन चूंकि उसे ब्राह्मण वर्ग का वर्चस्व बनाए रखना है तो नफरत की सियासत तो करनी ही होगी और अमरीका का साथ भी। क्योंकि पूंजी के बगैर यह काम मुमकिन नहीं।

सियासत का अर्थव्यवस्था से सीधा-सीधा कनेक्शन है। जैसी अर्थव्यवस्था होगी, वैसी सियासत होगी। इसको ऐसे समझें कि सत्ता को आउटसोर्स कर दिया गया है। मसलन, भारत के प्रधानमंत्री अब प्रधानमंत्री नहीं, बल्कि किसी कंपनी के सीईओ लगते हैं और उन्हें यह सत्ता आरएसएस ने आउटसोर्स कर दिया है। वजह यह कि आज यदि नरेंद्र मोदी सत्ता में हैं तो इसके पीछे आरएसएस की ही भूमिका है। आरएसएस इस देश में नफरत के समीकरण बनाता रहा है और पूरी सत्ता उसकी परिक्रमा कर रही है।

बहरहाल, मैं अपने गृह राज्य बिहार की सियासत के बारे में सोच रहा हूं। वहां कुछ हलचल दिख रही है। दो संभावनाएं बतायी जा रही हैं। एक तो यह कि नीतीश कुमार की अंतरात्मा जाग रही है और वे राजद के साथ जाएंगे। दूसरी संभावना यह कि भाजपा जदयू के आधे विधायकों को अपने साथ मिला लेगी और सरकार बनाएगी। हालांकि इस संभावना में कोई दम नहीं है। वजह यह कि भाजपा को सरकार बनाने के लिए जदयू के सभी विधायक चाहिए। तीसरी संभावना जो कि मैं सोच रहा हूं, वह यह कि बिहार में ऐसा कुछ भी नहीं होने जा रहा। नीतीश कुमार को सत्ता चाहिए और वह भी हर हाल में। जमीर बेचते हुए उन्हें पहले भी कई बार देखा जा चुका है।
लेकिन, मैं यह भी मानता हूं कि सियासत कभी भी सीधे रास्ते को अख्तियार नहीं करती। जब धुआं दिख रहा है तो आग कहीं ना कहीं जल ही रही है। खैर, कल मेरी प्रेमिका ने एक शब्द दिया– आहट
तुम्हारे आने की आहट हो तो
खोल दूं दरवाजा ताकि
रात आसानी से आ सके
इस कमरे में
जहां मेरे पास हैं
खूब सारे सफेद पन्ने
और एक कलम 
जिसकी रोशनाई का रंग
तुम्हारे सुर्ख लबों का है
और इस कमरे के कोने में
मैंने बुझा रखा है बिजली का लैंप
जिससे निकलती है
तुम्हारे माफिक सरों के दरख्त सी एक रोशनी।
तुम्हारे आने की आहट हो तो
एक धरती संजोऊं मैं
और एक आसमान भी तुम्हारे लिए
ताकि तुम जब चाहो
सूरज उगे और डूबे
और तुम रंग सको धरती
अपने महावर के रंग से।
हां, तुम्हारे आने की आहट हो तो
मैं करूं वक्त का इंतजार
इस साहस के साथ कि
मौत निश्चित है एक दिन
लेकिन उसके पहले
मुझे तुम्हारे संग समंदर की लहरों पर
नंगे पांव चलना है
और सावन जब बरसे तब
एक छाते में
आधे–आधे भीगना है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

सुप्रीम कोर्ट की नीयत में खोट- संदर्भ : बथानी टोला नरसंहार (डायरी 23 मई, 2022)

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