Saturday, July 13, 2024
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वर्चस्ववादी जातियां यथास्थिति को ही बनाए रखना चाहती हैं।

जाति व्यवस्था के बारे में यह कहना प्रासंगिक नहीं होगा कि जाति से मुक्ति अथवा जाति उन्मूलन किसी प्रकार की परियोजना के तहत संभव है। जाति से मुक्ति के मार्ग का प्रशस्त होना सवर्ण और अवर्ण दोनों ही जातियों के मनोविज्ञान पर भी निर्भर करता है। दरअसल यह एक ऐसा सवाल है जो हमेशा से […]

जाति व्यवस्था के बारे में यह कहना प्रासंगिक नहीं होगा कि जाति से मुक्ति अथवा जाति उन्मूलन किसी प्रकार की परियोजना के तहत संभव है। जाति से मुक्ति के मार्ग का प्रशस्त होना सवर्ण और अवर्ण दोनों ही जातियों के मनोविज्ञान पर भी निर्भर करता है। दरअसल यह एक ऐसा सवाल है जो हमेशा से ही निरुत्तर रहा है। ज्यों-ज्यों और जब-जब जाति-रूपी साँप ने जोर से फुफकारना शुरू किया है, जाति के उन्मूलन हेतु नाना प्रकार के आन्दोलनों का आह्वान भी हुआ है किंतु जाति का मर्ज घटने के बदले/एवज और बड़ा ही है। हाँ, यह सही है कि जातिगत मर्ज की प्रकृति जरूर बदलती रही है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि जाति आधारित उउत्पीड़न के सवाल पर हुए आंदोलनों ने निश्चित रूप से असर किया है, जो कम से कम शहरों में तो देखने को मिलता ही है। गांवों की सामाजिक संरचना के साथ-साथ उत्पीड़न के तौर-तरीकों में भी खासा परिवर्तन देखने को मिलता है। किंतु वह परिवर्तन भूमंडलीकरण के इस दौर में सामाजिक परिवर्तन की प्रतिछाया पर ही प्रतीत होती है। इस प्रकार का परिवर्तन केवल भारत में ही हुआ हो, ऐसा नहीं है। कहना अतिशयोक्ति न होगा कि केन्द्र में भाजपा की सरकार के आने के पहले जो भी, जितना भी सामाजिक सौहार्द परिलक्षित हो रहा था, भाजपा की सरकार आने के बाद वह सब रसातल में इसलिए चला गया क्योंकि भाजपा के समर्थक घटकों की दुष्टकारी प्रवृत्तियां किसी न किसी बहाने उत्पात करने पर उतर आई हैं। मामला गौ-रक्षा का हो या फिर किसी भी धार्मिक मान्यता का, हर मामले में दलितों और अल्पसंख्यकों पर जुल्म की तलवार लटकती है। दादरी और ऊना के मामले तो बेशक रोशनी में आ गए किंतु अत्याचार के ऐसे कितने ही मामले हैं, जो प्रकाश में ही नहीं आप पाते। मोदी  के प्रधानमंत्री रहते दलितों और अल्पसंख्यकों पर जिस तेजी से अत्याचार बढ़े हैं, वैसे 2002 की गोधरा काण्ड के अलावा कभी नहीं घटे। गोधरा कांड भी भाजपा की मोदी के शासन काल में ही घटी थी। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सब भाजपा सरकारों के इशारों पर ही हो रहा है क्योंकि अत्याचार के ज्यादातर मामले भाजपा शासित राज्यों में ही हो रहे हैं। पुलिस हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती है।

कोई माने न माने ब्राहम्णवादी व्यवस्था के वर्चस्व में किसी प्रकार की कमी के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं। हाँ, प्रकृति में बदलाव जरूर झलकता है। जिसका मूल कारण समूचे विश्व में शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे प्रचार-प्रसार में निहित है। इस प्रकार का बदलाव केवल भारत में ही हैं, ऐसा नहीं है। शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर हो रहे प्रचार-प्रसार से यह तो माना जा सकता है कि समाज के दलित और दमित वर्ग में जागरूकता का ज्वार आया है। इस आधार पर यह मान लेना कि जाति समाप्त होती नजर आ रही है, एक भ्रमजाल में फंसना ही माना जाएगा।

दूसरे, भारत की संवैधानिक व्यवस्था से भारतीय राजनीति में जातियों को एकजुट और तो और, और पुष्ट होने का प्रभाव बढ़ा है। चुनावी व्यवस्था में दलित जातियों के आरक्षण के चलते विधा‍यिका में दलित-पिछड़े और आदिवासियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन भारतीय समाज के दलित-दमित वर्ग में जातीय अलगाव भी तेजी से बढ़ा है। जिसके चलते अनुसूचित/अनुसूचित जनजातियों का ध्रुवीकरण होने के बदले बिखराव ज्यादा उत्पन्न हुआ है, प्रत्येक दलित राजनेता में सत्ता में कुर्सी पाने का लालच इस कदर शीर्ष हुआ है कि वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों की चाटुकारिता करके सत्ता में कुर्सी तो हासिल कर लेता है किंतु निजी स्वार्थों के चलते उसके लिए सामाजिक-स्वार्थ गर्क में चले जाते हैं। इस तरह राजनीतिक-सत्ता दलित और दमितों के बिखराव के कारण बाबा साहेब अम्बेडकर के सपनों वाली दलितों और पिछड़ों के लिए सभी तालों की चाबी नहीं रह गयी है। सत्ता-रूपी ‘मास्टर चाबी’ न केवल ब्राहम्णवादी शक्तियों के हाथों में बल्कि अब तो कॉरपोरेट घरानों के हाथों में चली गई है। इस प्रकार राजनीति में अनुसूचित/अनुसूचित जन जातियों और पिछड़े वर्ग का समुचित प्रतिनिधित्व तो है किंतु उसका सत्ता के संचालन में कोई हस्तक्षेप नहीं के बराबर ही है।

जहाँ तक इतिहास में जाति से मुक्ति के लिए चले आंदोलनों का सवाल है तो यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि जाति से मुक्ति के लिए सदियों से अनेक आन्दोलन चलते रहे हैं किंतु समय के साथ-साथ सारे आन्दोलन साम, दाम, दण्ड और भेद वाली नीतियों के शिकार होते रहे हैं। हाँ, भारतीय समाज में लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व बौद्ध दर्शन ने ब्राह्मणवाद और जातियों से मुक्ति का मार्ग जरूर प्रशस्त किया था जिसकी छाया/प्रतिछाया आज भी देखने को मिलती है। किंतु बुद्ध के निर्वाण के बाद केवल 300/400 वर्षों में ही बौद्ध संस्थाएं जातिवाद और ब्राह्मणों द्वारा अपनी श्रेष्ठता कायम रखने के लिए रचे गए सामाजिक-आर्थिक कुचक्रों के जाल में फंसकर मृतप्राय: हो गईं थीं। यह कहना अतार्किक न होगा कि भारतीय समाज के कुटिल, बौद्धिक रूप से संभ्रांत  ब्राहम्णवादी शाक्तियाँ जाति से मुक्ति के प्रत्येक आन्दोलन के ताप को ठंडा करके अपने प्रभाव में ले लेती हैं।

जाति और धर्म से मुक्ति के सवालों को कबीर, रैदास, दादू, चोखामेला जैसे संत कवियों ने जिस शिद्दत से समाज के सामने रखा, वैसी मिसाल अन्य जगह कम ही देखने को मिलती है। उनके साहित्य को किसी न किसी रूप में जाति से मुक्ति के लिए एक परियोजना माना जा सकता है किंतु अन्य विभिन्न साहित्यिकारों/लेखकों के लेखन में जाति से मुक्ति की लिए आवाज उठाने का सवाल है तो मुझे नहीं लगता कि उनके इस हेतु काम को किसी परियोजना का हिस्सा माना जा सकता है। आमजन की रुचि के साहित्यिक कर्म को साहित्यकार/लेखक/कवि विशेष की रुचि के रूप में भी देखा जा सकता है। उसकी अपनी रुचि के अनुसार उपजे साहित्य में यदि जाति मुक्ति के लिए कोई विशेष संदर्भ देखने को मिलते हैं तो यह एक संयोग ही माना जाएगा। हाँ, इतना अवश्य माना जा सकता है कि तथाकथित दलित साहित्य में ऐसे प्रकरण मिलते तो जरूर हैं किंतु वो समाज की दशा को ही ज्यादा दिखाते हैं, लेकिन उस दशा से उबरने या जाति से मुक्ति के सवाल या तो केवल कटाक्ष के रूप में या फिर केवल आलोचना के रूप में ही ज्यादा उभर हैं।

तथाकथित दलित साहित्य के रचनाकारों की तो सबसे बड़ी त्रासदी  यह रही है कि वे ‘दलित’’शब्द को इतनी जोर से जकड़कर पकड़े हुए हैं कि यदि दलित शब्द को कहीं छोड़ दिया तो उनका साहित्यिक अस्तित्व व सामाजिक अस्मिता का ही ह्रास हो जाएगा। यदि यह कहा जाए कि ज्यादातर दलित साहित्यकार ‘दलित’ शब्द के प्रयोग को ही अपनी मुक्ति का मार्ग मानते हैं। बड़े दुख से कहना पड़ रहा है कि ‘दलित’ सामाजिक/धार्मिक/आर्थिक बराबरी के लिए जिस मैली-कुचैली जातीय चादर को उतार कर फेंक देना चाहते हैं, उसी मैली-कुचैली जातीय चादर को अपने साहित्य पर डालकर साहित्यिक क्षेत्र में शिखर पुरुष होने का मार्ग तलाशने में संघर्षरत हैं। जबकि बाबा साहेब अम्बेडकर ने भी ‘दलित’ शब्द को लम्बे समय तक न ढोने का सन्देश दिया था।

इतना ही नहीं दलित साहित्यकार आजकल जातिगत खेमों में विघटित हो रहा है जिससे जातियों के और पुष्ट होने के प्रमाण ही मिलते हैं। इस खेमेबाजी के चलते ‘दलित लेखक संघ’ में भी टूट पड़ गई और ‘दलित लेखक संघ’ की स्थापना का मूलभाव तमाशा बनकर रह गया है। ऐसे साहित्यकारों के इतर आजकल कुछ ऐसे दलित साहित्यकार भी सामने आए हैं जो दलितों के साहित्य को ‘दलित साहित्य’ के रूप में स्वीकार न करके इसे ‘अम्बेडकरवादी साहित्य’ के रूप में स्वीकार करते हैं। कहने को सामान्यत: ‘दलित-साहित्य’ और ‘अम्बेडकरवादी साहित्य’ के प्रेरणा स्त्रोत केवल और केवल बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ही हैं। कहना न होगा कि आज दलित-समाज का बुद्धिजीवी वर्ग ही अपने समाज की अनदेखी करने में देखा जा रहा है। दलितों द्वारा जाति को पुष्ट करने का ताजा-ताजा उदाहरण ये मिला है कि एनडीटीवी चैनल के अनुसार (30.06.2016) दलित समाज के प्रवक्ता कहे जाने वाले चन्द्रभान प्रसाद ने ‘दलित फूडस’ के नाम से अनेक खाद्य उत्पाद बाजार में उतारे हैं। इतना तो मैं नहीं जानता कि इस उपक्रम के पीछे चन्द्रभान जी का क्या मूल प्रयोजन रहा होगा, किंतु इतना अवश्य दिखता है कि उनका यह उपक्रम से केवल और केवल ‘जाति’ पुख्ता होगी और अपितु व्यापारिक दृष्टि से चन्द्रभान जी के उत्पादों का बाजार दलित वर्ग तक ही सिमट कर रह जाएगा। इस मामले में विस्तृत बाजार का स्वप्न पालना महज एक महत्वाकांक्षा का हिस्सा ही सिद्ध होगा।

इस कड़ी में विभिन्न सामाजिक नायकों, नामचीन लेखकों और चिंतकों के स्वतंत्र लेखन और उनके द्वारा नाना प्रकार से किए गए कामों को निश्चित रूप से जाति से मुक्ति के लिए स्वतंत्र परियोजना का नाम दिया सकता है। इस संबंध में संत परंपरा से लेकर जोतिबा फुले, डा. अम्बेडकर, स्वामी अछूतानंद, पेरियार जैसे महानायकों की एक बड़ी जमात है जिसका उल्लेख करना जरूरी जान पड़ता है। किंतु डा. अम्बेडकर ने जिस व्यवस्थित व व्यापक रूप से सामाजिक परिवर्तन के जो मानदंड और आदर्श प्रस्तुत किए, वैसे उदाहरण कहीं और मिलना असंभव जान पड़ता है। इनके द्वारा किए गए कामों में जाति से मुक्ति के लिए किया गया प्रत्येक संघर्ष मिलता है।

उपरोक्त के आलोक में मेरे लिए तो यह कहना अति कठिन कार्य है कि मौजूदा कालखण्ड की राजनीतिक/ साहित्यिक गतिविधियों में समाहित जातिगत उठा-पटक से भारतीय समाज में जाति व्यास्था कमजोर हो रही है, उलटे और मजबूत हो रही है। कारण है कि मौजूदा राजनीति केवल और केवल धर्म और जातियों की गुटबन्दी/जुगलबन्दी पर आधारित है। इस प्रकार ब्राह्मणवाद का उद्देश्य आज भी स्थाई बना हुआ है। केवल उसका वर्चस्व और उसकी रणनीति समय के साथ बदलती रहती है। साम, दाम, दण्ड और भेद वाली नीतियां आज भी जिन्दा हैं।

जाति से मुक्ति की परियोजना क्या हो? इसके संबन्ध में, मान्यवर काशीराम डा. अम्बेडकर के माध्यम से बताते हैं, ‘राजनीतिक सत्ता वह मास्टर चाबी है जिससे आप अपनी तरक्की और सम्मान के सभी दरवाजे खोल सकते हैं।’ कांशीराम कहते हैं, ‘मैं आपसे यही कहूंगा कि आप शासक बनकर जातिविहीन समाज की स्थापना कर सकते हैं। शासक ही नए समाज का निर्माण कर सकते हैं।’ किंतु अफसोस कि आज दलित समाज ही इन मूल्यों से दूर खड़ा नजर आता है। दलित समाज के जितने भी तथाकथित बड़े राजनेता हैं, वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों की चाटुकारिता में न केवल जुटे हैं अपितु दलित समाज के हितों को तिलांजली देकर वर्चस्वशाली राजनीतिक दलों की चमचागिरी में लगे हैं। बाबा साहेब के नाम की माला जपकर वो कुर्सी तो प्राप्त कर लेते हैं लेकिन काम करते हैं गैर-दलित वर्गों के लिए जो पहले से ही वर्चस्वशाली हैं। कुर्सी पर बने रहने के लिए उन्हें पालतू कुत्तों की भूमिका भी सहर्ष मंजूर है। ऐसे में जाति-तोड़क मुहिम कितनी लागू होगी, कहना एक भ्रामक स्थिति है।

यहाँ यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं कि जैसे-जैसे अनुसूचित जातियाँ/जन-जातियां कुछ-कुछ खुशहाली की ओर बढ़ती दिख रही हैं, वैसे-वैसे समाज की वर्चस्वशाली जातियां या यूं  कहें कि तथाकथित सवर्ण जातियों के सीने पर साँप लेटने लगा है, उनमें अब भेदभाव के साथ-साथ ईर्ष्या का भाव भी जागने लगा है, जिसके चलते जातिगत हिंसा के मामलों में निरंतर बढ़ोत्तरी होने लगी हैं। गुजरात, हरियाणा, राजस्थान आदि राज्यों में घटित घटनाएं इसी सोच का परिणाम लगती हैं। परिणामत: अनुसूचित जातियों का जातिगत आधार पर लामबन्द होना अपरिहार्य (अनएवोयडेबिल) हो गया है। जिसे येन-केन-प्रकारेण जाति के पुख्ता होने का संकेत ही कहा जाएगा। इसके अलावा कोई और रास्ता भी तो नजर नहीं आ रहा क्योंकि वर्चस्वशाली जातियां यथास्थिति को ही बनाए रखना चाहती हैं। ऊपरी तौर पर चाहे जो भी बयानबाजी करें।

 

गाँव के लोग
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