नीट में ओबीसी आरक्षण का खत्म और ओबीसी बुद्धिजीवियों का फेसबुकीय अरण्यरोदन !

एच. एल. दुसाध

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आज ओबीसी की क्या स्थिति है ? प्रायः लोग उसे अल्लाह मियां की बकरी समझते हैं लेकिन वास्तविकता कुछ और है । ओबीसी का नेतृत्व ब्राह्मणवादी , चापलूस , लालची और अपने समुदाय की संख्या दिखाकर सत्ता से सौदेबाजी करनेवाले षड्यंत्रकरियों के हाथ में है। मध्यवर्गीय ओबीसी का अधिकांश हिस्सा विचारहीन मेमने की तरह है जो वास्तव में सांस्कृतिक रूप से अपने को मजबूत करने के मनोरोग का शिकार है और अपने पुरखों की जड़ें खोदते हुये जब इतिहास-पुराण की डुबकियाँ लगाता है तो उसे क्षत्रियत्व का पत्थर हाथ लगता है । ओबीसी बुद्धिजीवी प्रायः ज़मीन से कटा हुआ और यहाँ-वहाँ आधार तलाश करता फेसबुकिया वीर है । उसमें अभी तक अपनी पहचान को ही लेकर भारी उहापोह है । सबसे दयनीय स्थिति ओबीसी के असंख्य विद्यार्थियों , किसानों , मजदूरों और पेटी बुर्जुआ की है जिनको संसदीय राजनीति के गिरोहबाजों ने अपने झांसे में ले रखा है । वे उनसे काँवड़ ढुलाने, दंगा और माबलिंचिंग कराने का काम आसानी से लेते रहते हैं। वास्तव में ओबीसी का यही हिस्सा दक्षिणपंथ की राजनीतिक ज़मीन के लिए उपयोगी खाद है । हाल ही में मोदी सरकार ने NEET में ओबीसी का आरक्षण खत्म कर दिया और ग्यारह हज़ार विद्यार्थियों का हिस्सा हड़प लिया लेकिन ओबीसी के किसी भी हिस्से में सुगबुगाहट नहीं हुई । जो कालीदास की डाल काट रहा हो उसे क्या समझाया जा सकता है ? एच एल दुसाध ने अपने लेख में इन हालात का बड़ा मार्मिक खाका खींचा है —

केंद्र सरकार ने आगामी सितम्बर में आयोजित होने वाली मेडिकल परीक्षा ‘नीट’ में ओबीसी को रिजर्वेशन  न देने का फैसला करके बहुजनों, खासकर ओबीसी बुद्धिजीवियों को स्तब्ध कर दिया है। नीट (मेडिकल इंट्रेंस) परीक्षा में भारतीय संविधान के आर्टिकल 340,15(4),16(4) को फालो न करने को लेकर 13 जुलाई को फेसबुक पर ओबीसी विद्वानों के आक्रोश का खासा जोरदार प्रकटीकरण हुआ। इस मामले में सबसे पहले मेरी नज़र  अधिवक्ता धर्मवीर यादव के पोस्ट पर पड़ी। उन्होंने लिखा था ‘NEET मेडिकल एंट्रेंस में ओबीसी कोटा खत्म। मरी हुई कौम को मारना सबसे आसान होता है।’ प्रख्यात पत्रकार महेंद्र यादव की  पोस्ट थी, ‘मेडिकल एंट्रेंस टेस्ट नीट में ऑल इंडिया कोटे में ओबीसी आरक्षण खत्म होने के बाद अब भाजपा से सवर्ण वोटों का विमुख होना बहुत कठिन हो गया है। अब एक ही उपाय बचता है अखिलेश यादव के पास कि ईडब्ल्यूएस कोटे को 10 से बढाकर 20 फीसदी करने का वादा कर दें, साथ ही आमदनी की सीमा 25 लाख तक करने का भी वादा कर दें। ओबीसी नेताओं में सवर्ण वोटों की लालसा इतनी प्रबल है कि नीट में ओबीसी आरक्षण खत्म होते जाने के मुद्दे पर वो चाहकर भी नहीं बोल पा रहे हैं!’ अहिर एसके यादव ने लिखा था, ‘जियो ओबीसी, दलित, तेली, छोटी जाति, दूसरों के घर बर्तन माँजने वाली माँ का बेटा, गरीब चायवाला प्रौढ़ावस्था तक भीख माँगने वाला और भी न जाने क्या क्या। OBC reservation in NEET finished !’ डॉ यशवीर ने आहत होकर लिखा था, ‘ दक्षिण भारतीय सुपरस्टार सूर्या शिवकुमार पिछले दिनों NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेंस टेस्ट) की परीक्षा में ओबीसी आरक्षण खत्म करने के खिलाफ बयान देने के बाद खूब सुर्खियों में थे। केंद्र सरकार ने उनके खिलाफ कोर्ट का रास्ता भी अख्तियार किया था। खबर है कि NEET में ओबीसी आरक्षण खत्म कर दिया गया है। पिछले सात सालों में सबसे ज्यादा ‘चपेट’ ओबीसी को ही मारी गई है। इससे पहले उत्तर प्रदेश में 69000 शिक्षक भर्ती में भी ओबीसी सीटों के हेर-फेर मामला खूब उछला था। वैसे भी ये पिछड़े डाक्टर-मास्टर बनकर क्या करेंगे? उनके ऊपर तो ‘धर्म रक्षा’ की विराट जिम्मेदारी लदी हुई है। सब इसी में रमे हैं. खैर..इन ‘धर्म लठैतों’ के बच्चे एक दिन इन्हें ही गरियाएँगे काहे कि पकौड़े बनाना भी हर किसी के वश की बात नहीं !!’

“पत्रकार सत्येंद्र पीएस, जिन्होंने लिखा था, ‘केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय स्तर पर होने वाली मेडिकल परीक्षा नीट में ओबीसी रिजर्वेशन  नहीं देने का फैसला किया। इसके लिए तमिलनाडु सरकार आवाज उठा रही थी। वह सुप्रीम कोर्ट गई, प्रधानमंत्री के सामने भी यह मसला रखा। लेकिन एमबीबीएस की 10 हजार ओबीसी सीटें  जनरल में रहेंगी। यह मोदी सरकार का फैसला है। उत्तर प्रदेश और बिहार में तमाम जाति के अपने अपने दल हैं। उनका मुख्य लक्ष्य अपने बाल बच्चों, बीवी, भाई आदि को सांसद, विधायक, मंत्री बनाने तक सिमट गया है। उसी को वह अपनी पूरी जाति का हित बताते हैं और अपनी जाति वालों को समझाने में सफल भी होते हैं कि वह उनके लिए काम कर रहे हैं। पता नहीं कब यह दौर आएगा जब जनता अपने नेता की कॉलर पकड़कर पूछेगी कि हमारे बाल बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है तो आपका क्या रुख है? क्या सत्ता, क्या विपक्ष। इस लूट पर कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है। मुद्दा आधारित राजनीतिक दल न होने के ये साइड इफेक्ट हैं। भारत में समतामूलक समाज अभी बहुत दूर की कौड़ी है।”

‘भाईसाहब गजब दोगलाई है जब फॉर्म भरना हो तो ओबीसी, जब ओबीसी रिजर्वेशन कटे तो चुप्पी। अपना स्टैंड क्लियर करो नहीं तो ओबीसी सीट खाली करो’। लिखा था जेएनयू के चर्चित छात्र नेता दिलीप यादव ने। बहुजन चिन्तक शंकर प्रलामी का कहना था, ‘राजद और डीएमके को छोड़ पिछड़ों की राजनीति करनेवाले किसी दल ने संसद में  ‘सवर्ण आरक्षण’ का प्रतिवाद नहीं किया। परिणाम आज–‘NEET मेडिकल एंट्रेंस में ओबीसी कोटा खत्म।” मरी हुई कौम को मारना सबसे आसान होता है! नीतीश और अखिलेश की पार्टी ने मुंह तक नही खोला था।’

‘मेडिकल एंट्रेंस NEET के ऑल इंडिया कोटा में SC और ST ने अपना 22.5% हिस्सा ले लिया। ओबीसी अपना 27% नहीं ले पाए। बदले में उन्हें 27 ओबीसी मंत्री दिए गए हैं। चाटिए उनको। SC/ST के आरक्षण पर हाथ डालते तो 2 अप्रैल हो जाता। सरकार समझती है सबकी औक़ात’। कहना था  चर्चित बहुजन पत्रकार दिलीप मंडल का।  दिलीप मंडल के बाद जिनके पोस्ट पर सर्वाधिक कमेंट आये, वह रहे पत्रकार सत्येंद्र पीएस, जिन्होंने लिखा था, ‘केंद्र सरकार ने अखिल भारतीय स्तर पर होने वाली मेडिकल परीक्षा नीट में ओबीसी रिजर्वेशन  नहीं देने का फैसला किया। इसके लिए तमिलनाडु सरकार आवाज उठा रही थी। वह सुप्रीम कोर्ट गई, प्रधानमंत्री के सामने भी यह मसला रखा। लेकिन एमबीबीएस की 10 हजार ओबीसी सीटें  जनरल में रहेंगी। यह मोदी सरकार का फैसला है। उत्तर प्रदेश और बिहार में तमाम जाति के अपने अपने दल हैं। उनका मुख्य लक्ष्य अपने बाल बच्चों, बीवी, भाई आदि को सांसद, विधायक, मंत्री बनाने तक सिमट गया है। उसी को वह अपनी पूरी जाति का हित बताते हैं और अपनी जाति वालों को समझाने में सफल भी होते हैं कि वह उनके लिए काम कर रहे हैं। पता नहीं कब यह दौर आएगा जब जनता अपने नेता की कॉलर पकड़कर पूछेगी कि हमारे बाल बच्चों को शिक्षा से वंचित किया जा रहा है तो आपका क्या रुख है? क्या सत्ता, क्या विपक्ष। इस लूट पर कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है। मुद्दा आधारित राजनीतिक दल न होने के ये साइड इफेक्ट हैं। भारत में समतामूलक समाज अभी बहुत दूर की कौड़ी है।’ मा. नारायण चौधरी ने पूछा था, ‘नीट? मेडिकल एडमिशन! OBC आरक्षण खत्म?डॉक्टर कैसे बनेंगे? अब केशव प्रसाद मौर्या, अनुप्रिया पटेल और आरसीपी सिंह ही बता पायेंगे कि मेडिकल इंट्रेंस टेस्ट में मंडल कमीशन का 27% ओबीसी आरक्षण गया तो,गया कहाँ? यू.पी में 69000शिक्षक भर्ती में 5844 ओबीसी पद की डकैती तो हो ही गई,अब ऑल इंडिया मेडिकल टेस्ट में भी OBC कोटा गायब? देश में 27% ओबीसी आरक्षण है या बीजेपी राज में खत्म हो गया है? खैर ! मोदी सरकार द्वारा एक झटके में 11027 ओबीसी युवाओं को डॉक्टर बनने की सम्भावना पर विराम लगाने के कुत्सित प्रयास पर ओबीसी नेताओं की ख़ामोशी के मध्य जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पत्र लिखकर पीएम मोदी का ध्यान आकर्षित किया है, उससे ओबीसी बुद्धिजीवियों ने राहत की कुछ सांस ली है, जिसकी झलक 14 जुलाई के फेसबुक पर देखी गयी

“वास्तव में सापेक्षिक वंचना का अहसास जगाने लायक जो हालात भारत के शासक वर्ग ने पैदा कर दिए हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास के किसी भी दौर में किसी देश में नहीं रहे। आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के परम्परागत सुविधाभोगी जैसा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक) पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80-90 प्रतिशत फ्लैट्स जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हैं।  मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की हैं। चार से आठ-दस लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियां इन्हीं की होती हैं।  देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल व पोर्टल्स  प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है।”

बहरहाल मोदी सरकार द्वारा मेडिकल में ओबीसी 11027 सीटें खा जाने के बाद जिस तरह इस समुदाय के बुद्धिजीवियों ने फेसबुक पर अपना रोष प्रकट किया, उससे कुछ खास सन्देश उभरें हैं। पहला यह कि ओबीसी समुदाय के युवाओं में बेहतर जिंदगी जीने की महत्वाकांक्षा(aspirations) दलितों के मुकाबले नहीं के बराबर है। अगर ऐसा नहीं होता तो निर्लिप्त भाव से कांवड़ लेकर दैवीय कृपा-लाभ अर्जित करने के लिए सडकों पर उतरने के बजाय वे 13 जुलाई को पत्रकार दिलीप मंडल के शब्दों में 2 अप्रैल, 2018 का रूप दे देते। अर्थात पूरे देश की सड़कों पर कब्ज़ा जमाकर राष्ट्र की तमाम गतिविधियाँ ठप्प कर देते। दूसरा, ओबीसी नेताओं में, विशेषकर हिंदी पट्टी के पिछड़े नेताओं में अपने समाज के प्रति नहीं के बराबर दायित्व-बोध है। अगर ऐसा नहीं होता तो इतनी बड़ी घटना के बाद वे सामूहिक इस्तीफा देने का मन बनाने में भले ही पीछे रहते किन्तु सोनिया जी की भांति कम से कम पत्र लिखकर मोदी सरकार का ध्यान तो आकर्षित करते ही। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि पत्रकार सत्येन्द्र पीएस के शब्दों में उनकी सारी महत्वाकांक्षा बाल-बच्चों, बीवी, भाई आदि को सांसद, विधायक, मंत्री बनाने तक सिमट गयी है। उसी को वह अपनी पूरी जाति का हित बताते हैं और अपनी जाति वालों को समझाने में सफल भी होते हैं कि वह उनके लिए काम कर रहे हैं। बहरहाल जिस तरह ओबीसी के ग्यारह हजार से अधिक युवाओं को डॉक्टर बनने से रोका गया है, उससे निजी तौर पर मैं विस्मित नहीं हूँ। मुझे पता है यह संघ की वर्ग संघर्ष से प्रेरित हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना का अंग है। और विगत 7 वर्षों से मोदी ओबीसी के अधिकारों पर इसलिए बेधड़क हमले करते जा रहे हैं क्योंकि उन्हें उनकी साईक की सही समझ है। वे जानते है, कुछ भी कर डालों ओबीसी के युवा और नेता उनके खिलाफ जाने वाले नहीं हैं।

हाल ही में केंद्र में हुए मंत्रिमंडल विस्तार में 27 ओबीसी मंत्री बनाए गए लेकिन इस मुद्दे पर किसी ने भी संज्ञान लेने और मुंह खोलने की जरूरत महसूस नहीं की

बहरहाल अब लाख टके का सवाल पैदा होता है कि मोदी संघ के हिन्दू राष्ट्र के सपने को मूर्त रूप देने के लिए शक्ति के समस्त स्रोत ब्रह्मा के गर्हित अंगों से जन्मे लोगों के हाथ में सौपने के लिए के लिए तेज कदमों से आगे बढ़े जा रहे हैं। उसमें ओबीसी के युवाओं को सम्यक भूमिका ग्रहण करने के लिए कैसे प्रेरित किया जाय! स्मरण रहे मैं ओबीसी युवाओं की बात कर रहा हूँ, नेताओं की नहीं! नेता समाज को बेचकर अपना साम्राज्य खड़ा करने या स्थापित साम्राज्य को किसी तरह बचाए रखने का मन बना चुके हैं। उससे उन्हें विरत करना कठिन है। इसलिए नेताओं को छोड़कर इस समाज के बुद्धिजीवी अपना सारा ध्यान-ज्ञान युवाओं को अधिकार चेतना से लैस करने में लगायें। लेकिन फिर वही सवाल खड़ा होता है कि जिस समाज के युवा मेडिकल की ग्यारह हजार से अधिक सीटें खोने के बावजूद मगन होकर कांवड़ यात्रा पर निकल जाते हैं, उन्हें अधिकार-चेतना से कैसे पुष्ट किया जाय? उसका एक ही उपाय है सापेक्षिक वंचना(Relative –deprivation ) की भावना जाग्रत करने का निरंतर प्रयास।

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सापेक्षिक वंचना का अहसास जरूरी है

क्रांति का अध्ययन करने वाले तमाम समाज विज्ञानियों के मुताबिक़ जब समाज में सापेक्षिक वंचना का भाव पनपने लगता है, तब आन्दोलन की चिंगारी फूट पड़ती है. समाज विज्ञानियों के मुताबिक़, ‘दूसरे लोगों और समूहों के संदर्भ में जब कोई समूह या व्यक्ति किसी वस्तु से वंचित हो जाता है तो वह सापेक्षिक वंचना है । दूसरे शब्दों में जब दूसरे वंचित नहीं हैं तब हम क्यों रहें !’ सापेक्षिक वंचना का यही अहसास बीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में अमेरिकी कालों में पनपा,जिसके फलस्वरूप वहां 1960 के दशक में दंगों का सैलाब पैदा हुआ, जो परवर्तीकाल में वहां डाइवर्सिटी लागू होने का सबब बना। दक्षिण अफ्रीका में सापेक्षिक वंचना के  अहसास ने ही वहां के मूलनिवासियों की क्रोधाग्नि में घी का काम किया, जिसमें भस्म हो गयी वहां गोरों की तानाशाह सत्ता। जिस तरह आज मोदी राज में सवर्णों का शक्ति के स्रोतों पर बेहिसाब कब्जा कायम हुआ है, उससे सापेक्षिक वंचना के तुंग पर पहुंचने लायक जो हालात भारत में पूंजीभूत हुये हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास में कहीं भी नहीं रहे। यहाँ तक कि फ्रांसीसी क्रांति या रूस की जारशाही के खिलाफ उठी वोल्शेविक क्रांति में भी इतने बेहतर हालात नहीं रहे।

जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग को बचाने वाली व्यवस्था और सत्ताओं को उखाड़ फेंकना होगा 

वास्तव में सापेक्षिक वंचना का अहसास जगाने लायक जो हालात भारत के शासक वर्ग ने पैदा कर दिए हैं, वैसे हालात विश्व इतिहास के किसी भी दौर में किसी देश में नहीं रहे। आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के परम्परागत सुविधाभोगी जैसा शक्ति के स्रोतों (आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक, धार्मिक) पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80-90 प्रतिशत फ्लैट्स जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हैं।  मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दुकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दुकानें इन्हीं की हैं। चार से आठ-दस लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा गाड़ियां इन्हीं की होती हैं।  देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल व पोर्टल्स  प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है। संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं वर्गों से हैं। न्यायिक सेवा, शासन-प्रशासन,उद्योग-व्यापार, फिल्म-मीडिया,धर्म और ज्ञान क्षेत्र में इनके जैसा दबदबा आज दुनिया में कहीं नहीं है। आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में परम्परागत विशेषाधिकारयुक्त व सुविधाभोगी वर्ग का शक्ति के स्रोतों पर ऐसा दबदबा कहीं नहीं है। शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के बेनजीर वर्चस्व से संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित तीन न्याय –  आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक – पूरी तरह एक सपना बनते जा रहे हैं । आर्थिक और सामाजिक विषमता की विस्फोटक स्थिति के मध्य जिस तरह विनिवेशीकरण, निजीकरण और लैट्रल इंट्री के जरिये शक्ति के समस्त स्रोतों से वंचित बहुजनों का  पूरी तरह से बहिष्कार करने का अभियान चल रहा है, उसके फलस्वरूप ऐसी स्थिति पैदा होती जा रही है। जिसके फलस्वरूप डॉ. आंबेडकर के शब्दों में, ‘विषमता से पीड़ित जनता लोकतंत्र के उस ढाँचे को विस्फोटित कर सकती है, जिसे संविधान निर्मात्री सभा ने बड़ी मेहनत से तैयार किया था।’ शक्ति-स्रोतों पर सुविधाभोगी वर्ग के बेहिसाब दबदबे ने बहुसंख्य लोगों के समक्ष जैसे विकट हालात पैदा कर दिए हैं , वैसे ही हालात में दुनिया के कई देशों में स्वाधीनता संग्राम संगठित हुए। ऐसे ही हालात में अंग्रेजों के खिलाफ खुद भारतीयों को स्वाधीनता संग्राम छेड़ना पड़ा था।

यदि ओबीसी बुद्धिजीवी सिर्फ ओबीसी ही नहीं, सम्पूर्ण बहुजन समाज के युवाओं को उपरोक्त तथ्यों से लगातार अवगत कराने का अभियान चलायें तो इस देश में बड़ी आसानी से लोकतान्त्रिक क्रांति घटित हो सकती है, जिसके जोर से कायम हो सकती है वंचित बहुजनों की तानाशाही सत्ता। इस तानाशाही सत्ता का इस्तेमाल कर शासक दलों के उन तमाम फैसलों को पलटा जा सकता है, जिसके कारण बहुजन गुलामों की स्थिति में पहुँच गए हैं।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

 

 

 

 

 

 

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