देश के लिए जरूरी हैं शरद यादव, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का पराक्रम(डायरी, 27 नवंबर 2021) 

नवल किशोर कुमार 

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संविधान दिवस का फेसबुकिया सेलिब्रेशन कल देर रात चलता रहा। कल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संविधान को लेकर अपना ज्ञान बांटा। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एन. वी. रमण ने भी प्रवचन दिया। सबकुछ ऐसा लगा मानो पूरा देश संविधान में विश्वास करता है और देश में कुछ भी असंवैधानिक नहीं हो रहा है। सबसे ज्यादा उत्साहित वे लगे जो आरक्षित वर्गों (ईडब्ल्यूएस यानी गरीब सवर्णों को छोड़कर) के थे। दलितों का उत्साह तो ऐसा दिखा कि मैं सोच में पड़ गया। कइयों के पोस्ट में गजब का अहंकार दिखा। सब यह जताने की कोशिश में दिखे कि जो कुछ भी आज देश में हुआ है, उन सबके पीछे केवल और केवल डॉ. आंबेडकर ही हैं। हालांकि यह मैं भी मानता हूं कि संविधान निर्माण में उनकी अहम भूमिका रही। परंतु, संविधान किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है। इसके लिए देश में एक संविधान प्रारूप समिति का गठन किया गया था। इसमें अन्य लोग भी शामिल थे।
खैर, हमें उन सभी के प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, जिन्होंने हमें एक खूबसूरत संविधान दिया और इसमें इसकी संभावना रखी कि यह जड़ न हो। इसमें संशोधनों का प्रावधान है और इसमें संशोधन होते भी रहते हैं। यह काम देश की संसद करती है।
मैं तो संविधान दिवस के मौके पर एक असंवैधानिक कुकृत्य के बारे में सोचता रहा। मैं जिस असंवैधानिक कुकृत्य के बारे में बात कर रहा हूं, उसे अंजाम दिया है हरियाणा में सत्तासीन आरएसएस ने। वहां की मनोहरलाल खट्टर हुकूमत ने बीते 17 नवंबर, 2021 को एक अधिसूचना जारी किया है। इसके मुताबिक, उसने क्रीमीलेयर की सीमा को आठ लाख से घटाकर छह लाख कर दिया है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसकी सीमा बढ़ाने को लेकर मांग की जा रही है। दिलचस्प यह है कि गरीब सवर्णों के लिए आय की सीमा आठ लाख रुपए ही रखी गई है। इस अधिसूचना का मतलब यह हुआ कि अब हरियाणा में ओबीसी वर्ग के उन अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा, जिनके अभिभावक की वार्षिक आय सलाना छह लाख रुपए या इससे अधिक होगी। इसमें भी एक कुकृत्य यह कि हरियाणा सरकार ने साफ कर दिया है कि आय के निर्धारण में वेतन व कृषि से प्राप्त आय भी शामिल किए जाएंगे। जबकि पूरे देश में 1993 में केंद्रीय कार्मिक मंत्रालय द्वारा जारी कार्यालय आदेश के मुताबिक वार्षिक आय को वेतन व कृषि से प्राप्त आय को अलग रखा गया है।

दिलचस्प यह है कि जनसत्ता ने आज इसी मुद्दे पर अपना मुख्य संपादकीय आलेख भी प्रकाशित किया है। यह आलेख जनसत्ता के संपादक ने लिखी है। वह ईडब्ल्यूएस को लेकर चिंतित हैं और उन्हें उम्मीद है कि सरकार कोई ना कोई सकारात्मक फैसला लेगी। सकारात्मक फैसले का मतलब क्या हो सकता है? आइए, इसी पर विचार करते हैं।

 

मैं कल जनसत्ता के पहले पन्ने पर प्रकाशित पहली खबर को देख रहा था। ख़बर ईडब्ल्यूएस यानी गरीब सवर्णों से जुड़ा था। खबर में बताया गया कि भारत सरकार दो महीने के भीतर कोई निर्णय ले लेगी कि ईडब्ल्यूएस की पहचान के लिए आय की सीमा क्या होगी। फिलहाल ईब्ल्यूएस और ओबीसी के लिए आय की सीमा लगभग एक रखी गई है।
दिलचस्प यह है कि जनसत्ता ने आज इसी मुद्दे पर अपना मुख्य संपादकीय आलेख भी प्रकाशित किया है। यह आलेख जनसत्ता के संपादक ने लिखी है। वह ईडब्ल्यूएस को लेकर चिंतित हैं और उन्हें उम्मीद है कि सरकार कोई ना कोई सकारात्मक फैसला लेगी। सकारात्मक फैसले का मतलब क्या हो सकता है? आइए, इसी पर विचार करते हैं।
मेरा अनुमान है कि भारत सरकार के पास केवल दो विकल्प होंगे। पहला तो यह कि वह ईब्ल्यूएस के निर्धारण के आय की सीमा में कमी करेगी। मुमकिन है कि वह इसे छह लाख रुपए कर दे और यह भी संभव है कि वह इसके निर्धारण में वेतन व कृषि से प्राप्त आय को बाहर रखे। इसके अलावा सकारात्मक कदम क्या हो सकता है!
लेकिन मैं अब भी कल के संविधान दिवस सेलिब्रेशन के बारे में सोच रहा हूं। मुझे इस बात का इंतजार रहा कि कोई तो हो जो भारत सरकार और हरियाणा सरकार के द्वारा किए गए/किए जा रहे असंवैधानिक कुकृत्य के बारे में लिखे। लेकिन मुझे कुछ भी नहीं दिखा। दलितों और आदिवासियों के जेहन में यह बात इसलिए भी नहीं आयी होगी, क्योंकि उन्हें आज भी सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर सरकारी नौकरियों एवं सरकारी उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिल जाता है। लेकिन खुद को सौ में 60 अथवा 54 का राग अलापने वाला ओबीसी वर्ग भी कान में तेल डालकर सोया रहा। उनके दिमाग में यह बात ही नहीं आयी। ऐसा क्यों हुआ? इस सवाल पर विचार करते हैं।
तो मेरा आकलन यह है कि इस देश की मीडिया ने सबसे पहले तो हरियाणा सरकार द्वारा जारी अधिसूचना संबंधी खबर को दबाकर रखा। हालांकि मैं चंडीगढ़ से प्रकाशित अमर उजाला को देख रहा हूं, जिसमें इससे संबंधित खबर का प्रकाशित है। परंतु, दिल्ली के अखबारों ने इससे परहेज किया। अन्य राज्यों में भी यह खबर नहीं ही पहुंची होगी। तो मेरे हिसाब से एक वजह यह हो सकती है। लेकिन मुझे लगता है कि मेरा ऐसा कहना बहानेबाजी जैसा है। आज की तारीख में सूचना जंगल में लगी आग के माफिक नहीं, बल्कि सूरज की रोशनी की गति से बढ़ती है। यह कैसे संभव है कि किसी की नजर ही नहीं पड़ी हो। हालांकि मैं अपनी बात कहूं तो मैं भी इसमें विफल रहा। जबकि मेरी नजर इस तरह की खबरों पर बनी रहती है। मेरे संज्ञान में यह ख़बर 20 नवंबर को आयी। लेकिन मैं इंतजर कर रहा था कि इस मामले में कोई विरोध तो दर्ज हो।

लालू प्रसाद ने क्रीमीलेयर को गैर संवैधानिक बताते हुए कहा था– आरक्षण कोई भीख नहीं है। वहीं 18 मार्च, 1999 को उन्होंने कहा– आज भी सवर्ण लोग आरक्षण को अपने ऊपर आघात मानते हैं, जो कि बिल्कुल गलत बात है। यह तो वंचित समाज को आगे लाने का उपक्रम है। यह लालू प्रसाद का पराक्रम ही था कि संसद में महिला आरक्षण के सवाल पर 9 जून, 2009 को लोकसभा में हुई बहस के दौरान छाती ठोंककर कहा था– महिला आरक्षण में हम कलावती और भगवतिया देवी को देखना चाहते हैं।

 

खैर, दूसरी और सबसे बड़ी वजह यह है कि इस देश का ओबीसी वर्ग वास्तव में ऐसा वर्ग है, जो पढ़ने-लिखने में दिलचस्पी नहीं रखता है। इस वर्ग के युवा सवर्णों के माफिक कहने लगे हैं कि उन्हें आरक्षण की आवश्यकता नहीं है। उन्हें लगता है कि इस देश के दलित और आदिवासी उनका हक छीन रहे हैं। उन्हें सामाजिक न्याय के मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। लेना-देना है भी तो केवल अपनी-अपनी जातियों के नेताओं का झंडा ढ़ोने से। सोशल मीडिया पर ऐसे अनेकानेक उदाहरण मिल जाएंगे।
बहरहाल, जिस कारण को मैं सबसे महत्वपूर्ण मानता हूं, वह है इस देश के ओबीसी नेताअें की चुप्पी। मैं अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, नीतीश कुमार आदि ओबीसी नेता उन नेताओं में शामिल हो गए हैं, जिन्हें ब्राह्मण वर्ग सबसे महत्वपूर्ण लगता है और ओबीसी लोकतांत्रिक गुलाम। सामाजिक न्याय की बात करनेवाले पुराने नेता अब बहुत बूढ़े हो गए हैं। इन नेताओं में सबसे पहले मैं शरद यादव को रखता हूं। वे ऐसे शख्स रहे हैं जिन्होंने सामाजिक न्याय के हर सवाल पर संसद में सवाल उठाया है। लेकिन इन दिनों वे संसद में नहीं हैं। एक मुलायम सिंह यादव हैं भी तो मुंह से आवाज नहीं निकालते। लालू प्रसाद को तो पहले ही सवर्णों ने सामाजिक न्याय का युद्धबंदी बना रखा है। वे संसद में जा ही नहीं सकते।
मैं तो लालू प्रसाद के उन दिनों को याद कर रहा हूं जब वे सामाजिक न्याय के सवाल पर हुकूमतों को घुटनों पर खड़ा कर देते थे। मसलन, 12 जून, 1998 को लोकसभा में अपने संबोधन में लालू प्रसाद ने क्रीमीलेयर को गैर संवैधानिक बताते हुए कहा था– आरक्षण कोई भीख नहीं है। वहीं 18 मार्च, 1999 को उन्होंने कहा– आज भी सवर्ण लोग आरक्षण को अपने ऊपर आघात मानते हैं, जो कि बिल्कुल गलत बात है। यह तो वंचित समाज को आगे लाने का उपक्रम है। यह लालू प्रसाद का पराक्रम ही था कि संसद में महिला आरक्षण के सवाल पर 9 जून, 2009 को लोकसभा में हुई बहस के दौरान छाती ठोंककर कहा था– महिला आरक्षण में हम कलावती और भगवतिया देवी को देखना चाहते हैं।
बहरहाल, यह सच है कि शरद यादव, लालू यादव और मुलायम सिंह यादव जैसे नेता हर समय संसद में नहीं रह सकते। आज की पीढ़ी को उनके जैसा पराक्रम दिखाना ही होगा। नहीं तो मनाते रहिए संविधान दिवस का जश्न, बांटते रहिए मिठाई और प्रस्तावना का पाठ रटते रहिए। सवर्ण वर्ग ऐसे ही सारी मलाई खाते रहेंगे और आपको, हमको जातिवादी कह अघाते रहेंगे।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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