यह किसी यक्ष का प्रश्न नहीं है (डायरी, 22 दिसंबर 2021)

नवल किशोर कुमार

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समय चक्र एक खूबसूरत शब्द है। समय को एक चक्र के रूप में देखने का विचार निश्चित तौर पर इस कारण से लोगों के जेहन में आया होगा कि यह धरती जिसपर हम सभी वास करते हैं, गोल है और अपने अक्ष पर घूमती है। इस कारण ही दिन और रात होते हैं। यही समय चक्र के फलसफे के आविष्कार का कारण रहा होगा। लोगों ने सोचा होगा समय लौटता है। फिर धीरे-धीरे लोगों को यह बात भी समझ में आयी कि समय लौटता नहीं। हर बीतने वाला पल अगले पल अतीत में बदल जाता है। यह सब सभ्यता के विकास के क्रम में हुआ होगा और लोगों ने समझा होगा कि इतिहास लिखा जाना चाहिए ताकि भविष्य में होने वाली किसी घटना के प्रारंभ की पड़ताल हो सके। यह इसलिए भी कि पूरी दुनिया में कोई भी बड़ी घटना कोई एक दिन में नहीं घटित हुई है। एक कहावत भी है कि रोम का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था। इसी तर्ज पर यह भी कहा जा सकता है कि हड़प्पा का निर्माण एक दिन में नहीं हुआ था। समय लगा ही होगा एक विकसित सभ्यता के बनने में।
खैर, मैं तो भारत के बारे में सोच रहा हूं। समय का चक्र निर्बाध चल रहा है। इतिहास की कसौटी पर वर्तमान को रखकर देखने की कोशिश करता हूं तो महसूस होता है कि देश 1970 की ओर अग्रसर है। यह वह दौर था जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में इंदिरा गांधी का दबदबा बढ़ने लगा था। 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्र होने के बाद तो इंदिरा गांधी का लोहा पूरी दुनिया ने मान लिया था कि कैसे एक महिला प्रधानमंत्री ने पूर्वी पाकिस्तान को इस्लामाबाद से आजाद करा दिया। यह था भी ऐतिहासिक। जब पाकिस्तान के हजारों सैनिकों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण किया तो पूरा विश्व अवाक रह गया था। वहीं देश में इंदिरा गांधी को आयरन लेडी भी कहा जाने लगा था।

मैं यह मानता हूं कि जब यह सब देश में हो रहा था तो वह स्वर्णिम युग था। इंदिरा गांधी एक के बाद एक सारी अवधारणाएं तोड़ रही थीं। वह भी उस देश में जो कि पुरूष प्रधान है। महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिकता हासिल है। फिर ऐसा क्या हुआ कि जयप्रकाश नारायण जैसे परिपक्व और गांधीवादी ने उनका विरोध किया? उन्हें इंदिरा गांधी के किस वाद से चोट पहुंची, यह बात मुझे आजतक समझ में नहीं आयी है। जहां तक मैंने पढ़ा है संपूर्ण क्रांति के बारे में, उससे मुझे तो यही लगता है कि यह तमाम पुरूषों का एक महिला के खिलाफ आंदोलन था।

 

लेकिन लोकतांत्रिक सत्ता का केवल एक रूप नहीं होता है। पाकिस्तान पर ऐतिहासिक जीत के बाद इंदिरा गांधी ने देश में बड़ी लड़ाई छेड़ दी। यह लड़ाई एकदम अलग थी। अलग इसलिए कि इंदिरा गांधी ने अपने ही देश के राजाओं को पेंशन देना बंद कर दिया। बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। फिर बजट में आदिवासी और दलितों के लिए उपयोजनाओं की शुरूआत कर दी। यह तो सीधे-सीधे बजट में इन वर्गों की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी थी। इंदिरा गांधी ने संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद शब्द जोड़ा।
मैं यह मानता हूं कि जब यह सब देश में हो रहा था तो वह स्वर्णिम युग था। इंदिरा गांधी एक के बाद एक सारी अवधारणाएं तोड़ रही थीं। वह भी उस देश में जो कि पुरूष प्रधान है। महिलाओं को दोयम दर्जे की नागरिकता हासिल है। फिर ऐसा क्या हुआ कि जयप्रकाश नारायण जैसे परिपक्व और गांधीवादी ने उनका विरोध किया? उन्हें इंदिरा गांधी के किस वाद से चोट पहुंची, यह बात मुझे आजतक समझ में नहीं आयी है। जहां तक मैंने पढ़ा है संपूर्ण क्रांति के बारे में, उससे मुझे तो यही लगता है कि यह तमाम पुरूषों का एक महिला के खिलाफ आंदोलन था। भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, गरीबी आदि के सवाल तब भी महत्वपूर्ण थे और आज भी हैं। फिर उस समय ऐसा क्या खास था कि जयप्रकाश नारायण ने आरएसएस से भी हाथ मिलाने में देर नहीं की, जिन्होंने गांधी को मारा था? कोई तो वजह रही होगी?
यह सवाल मेरे जेहन में कई बार आया। और जितनी बार आया, मैंने तथ्यों को खोजा। तथ्यों को खोजने के लिए पटना के सिन्हा लाइब्रेरी से लेकर गांधी संग्रहालय लाइब्रेरी और ए. एन. सिन्हा सामाजिक शोध व अध्ययन संस्थान की लाइब्रेरी में अखबारों को पढ़ा। उन पत्रिकाओं को पढ़ा जो उन दिनों प्रकाशित होते थे। इससे भी मन नहीं भरा तो बिहार विधानसभा की लाइब्रेरी में गया। वहां भी खोजा। लेकिन मुझे ऐसी कोई ठोस वजह नहीं मिली जिसके कारण संपूर्ण क्रांति आंदोलन हुआ। फिर वजह क्या रही?

 

एक महिला का लोकतांत्रिक रूप से ताकतवर होना? यह एक वजह हो सकती है। दूसरी वजह की चर्चा मैंने ऊपर में की है कि इंदिरा गांधी ने राजाओं का राजा मानने से इन्कार कर दिया था।
लेकिन मेरे सामने यह सवाल है कि आखिर वह आंदोलन इतना जोर कैसे पकड़ा? इस आंदोलन में कौन लोग थे? राजनीतिक दलों की गोलबंदी तो थी ही। क्या समाजवादी, क्या वामपंथी और क्या जनसंघी सब एक ही घाट पर पानी पी रहे थे। इसका असर तो मुमकिन था। लेकिन इसमें बड़ी बाधा रही होगी। साथ मिलकर चुनाव लड़ना अलग बात है और आंदोलन करना अलग बात। आंदोलन के लिए आग जलाना होता है। यह आग पटना विश्वविद्यालय के छात्रों, जिनका नेतृत्व लालू प्रसाद कर रहे थे, के बस की बात नहीं थी। मुझे लगता है कि इस आग को मिडिल क्लास ने लगाया और उसने ही इस आग को जलाये रखा।
मिडिल क्लास मतलब वह क्लास जो अच्छे से खाता-पीता है लेकिन अघाया नहीं है। उसके अंदर सारे संसाधनों पर कब्जा की भूख रहती है। वह गांव में खेत भी रखना चाहता है और शहर में नौकरी व दुकान भी करना चाहता है। यह वर्ग हमेशा दो नावों पर सवार रहता है। या यह कहिए कि यह वर्ग दो नावों के बीच रहता है। इसलिए इसे मिडिल क्लास कहा जाता है।

अलहदा इसलिए कि वहां खुद को मिडिल क्लास समझने वालों में दलित और पिछड़े वर्ग के लोग भी हैं। पहले इसमें अधिक भागीदारी सवर्णों की थी। बनिया वर्ग भी इसका बड़ा हिस्सेदार रहा है। आज पटना शहर की हालत यह है कि रोज हत्याएं होती हैं और शहर के लोग चुप्पी साधे रहते हैं। कल की ही बात है कि पटना सिटी के मंगल तालाब के पास 55 साल के एक विकलांग मो. ईदू की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। मृतक विकलांग होने के बावजूद स्वाभिमानी था और दर्जी का काम करता था। एक और हत्या को कल ही पटना में अंजाम दिया गया। अपराधियों ने सोनी नामक एक किन्नर को मार डाला। इसको लेकर किन्नरों ने विरोध प्रदर्शन किया और पुलिस के साथ नोंक-झोंक भी हुई। लेकिन पटना के मिडिल क्लास ने उफ्फ तक नहीं किया।

 

मैं तो अपने गृह शहर पटना को देख रहा हूं। वहां बीते 15 सालाें से सुशासन का दावा करनेवाले की सरकार है। वहां के मिडिल क्लास की बनावट ही अलहदा है। अलहदा इसलिए कि वहां खुद को मिडिल क्लास समझने वालों में दलित और पिछड़े वर्ग के लोग भी हैं। पहले इसमें अधिक भागीदारी सवर्णों की थी। बनिया वर्ग भी इसका बड़ा हिस्सेदार रहा है। आज पटना शहर की हालत यह है कि रोज हत्याएं होती हैं और शहर के लोग चुप्पी साधे रहते हैं। कल की ही बात है कि पटना सिटी के मंगल तालाब के पास 55 साल के एक विकलांग मो. ईदू की गोली मारकर हत्या कर दी गयी। मृतक विकलांग होने के बावजूद स्वाभिमानी था और दर्जी का काम करता था। एक और हत्या को कल ही पटना में अंजाम दिया गया। अपराधियों ने सोनी नामक एक किन्नर को मार डाला। इसको लेकर किन्नरों ने विरोध प्रदर्शन किया और पुलिस के साथ नोंक-झोंक भी हुई। लेकिन पटना के मिडिल क्लास ने उफ्फ तक नहीं किया।

संसद में लंपटता (डायरी 21 दिसंबर, 2021)  

बात केवल पटना की नहीं है। मुझे लगता है कि देश के हर शहर में कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। मिडिल क्लास को आज कोई फर्क नहीं पड़ता है कि खाद्य सामग्रियां कितनी महंगी हो चुकी हैं। पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमत भी उन्हें परेशान नहीं करती। सरकारी स्कूल और कॉलेजों में पठन-पाठन का स्तर गिरता चला जा रहा है। बेरोजगारी चरम की ओर अग्रसर है। लेकिन लोग हैं कि सुकून से है।
सचमुच गजब का है हमारे देश के मिडिल क्लास का सुकून! ऐसा क्यों है? न तो यह सवाल किसी यक्ष का सवाल है और ना ही इसका जवाब कोई अलहदा जवाब है।
कल एक कविता जेहन में आयी। यह भी उपरोक्त सवाल का एक जवाब ही है।
वह जो मेरे सामने है 
लेकिन जिंदा नहीं है
अभी-अभी उसे किसी ने
मार दी है गोली
और उसने 
अभी-अभी ही दम तोड़ा है।
पुलिस मौके पर पहुंची है
उसने मृतक के जेबों की तलाशी ली है
और उसे कुछ मिला है कागज पर
शायद खेसरा नंबर 92 बटा 3।
पुलिस वाले पूछ रहे हैं
खेसरा नंबर 92 बटा 3 का पता
लोग भी मृतक की पहचान नहीं 
पता खोज रहे हैं
कोई कहता है 
नदी के उस पार होगा शायद
इस पार का पता होता तो
मृतक भी परिचित होता।
कोई कहता कि
मृतक यदि नदी इस पार का होता
होता जनेऊ इसके शरीर पर
तब भी पहचाना जा सकता था
और यह तो कोई और है
शायद कोई धोबी, पासी या चमार है
नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।
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