हम हिन्दू नहीं, आदिवासी हैं…डायरी (8 अगस्त, 2021)  

नवल किशोर कुमार

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धरती और अंतरिक्ष में अंतर है। वैज्ञानिक स्तर पर तो अंतर यही है कि धरती पर गुरुत्वाकर्षण शक्ति का मान अलग होता है और अंतरिक्ष में कुछ और। एक अंतर यह भी कि धरती पर जीवन के लायक वातावरण है और अंतरिक्ष में नहीं है। हालांकि विज्ञान यह साबित कर चुका है कि पृथ्वी भी अंतरिक्ष का हिस्सा ही है। आकाशगंगा के अनंत ग्रहों के जैसा एक ग्रह। चार्ल्स डार्विन यह बता चुके हैं कि धरती पर मनुष्य कैसे आए। कोई ईश्वर इसका कारण नहीं रहा है। इस धरती पर रहने वाला हर इंसान का इतिहास रहा है। इतिहास का मतलब यह कि उसके पुरखे कौन थे? वे कहां से आए थे? वे क्या करते थे‍? मानव सभ्यता के विकास में उनका योगदान क्या था? और यह भी कि धरती को उपनिवेश बनाने में उनकी भूमिका क्या थी? कुल मिलाकर यह कि हमारी पहचान क्या है? हम आर्य हैं या अनार्य?
बचपन एकदम अलहदा होता है। आदमी कितना कुछ सोचता है बचपन में। मैं अपनी बात कहूं तो मेरे मन में कई सारे सवाल उठते थे। खासकर यह कि मेरे पुरखे कौन थे? दादा रूचा गोप से यह सवाल पूछ नहीं पाया। वजह यह कि तब मैं सात साल का ही था जब उनका निधन हो गया और यह सवाल मेरे जेहन में  आया था। बाद में पापा से पूछा तो उन्होंने भी पांचू गोप तक की जानकारी दी। वह अंतिम पीढ़ी है, जिसकी जानकारी मेरे पापा को भी है और मुझे भी। पांचू गोप के पांच बेटे थे। उनके एक बेटे थे भोला गोप जो मेरे परदादा थे। पांचू गोप का सारा कुनबा तब भोलाचक गांव में रहता था। यह बात 1914 के पहले की है। भोलाचक गांव वहीं था जहां आज पटना का लोकनायक जयप्रकाश नारायण अंतरदेशीय हवाई अड्डा का पश्चिमी हिस्सा है। यह गांव आमूकुड़ा गांव का हिस्सा था। आमूकूड़ा? यह कैसा नाम है? पापा से तब पूछा था जब मुझे वह उपरोक्त जानकारियां दे रहे थे। तब पापा ने कहा था कि यह तो गांव का नाम था। इसका क्या मतलब है, मैं नहीं जानता। इस प्रकार यह सवाल सवाल ही रहा। जब पत्रकारिता करने लगा तब जाकर यह सवाल फिर मेरे सामने आया। तब यह बात समझ में आयी कि आमूकूड़ा एक आदिवासी गांव था (यह गांव आज भी है)। यहीं बगल में एक गांव है महुआबाग।

असल में मेरा गांव भारत के उन गांवों में एक है जहां मूलनिवासी रहते हैं। हमारी अपनी परंपरा है और इसमें द्विजों का कोई स्थान नहीं है। जिस तरह की पिंडियां मेरे गांव में हैं, वैसी ही पिंडियां मुझे झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर ब्लॉक के सखुआपानी गांव में भी मिले थे। वहां असुर आदिम जनजाति के लोग रहते हैं। ऐसी ही पिंडियां मुझे महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में भी होने की जानकारियां मिली हैं। बुंदेलखंड के महोबा में तो एक जगह भैंसासुर का स्मारक भी है। वहां भी एक बड़ी सी पिंड है। ऐसा ही एक बड़ा पिंड मेरे गांव के पश्चिम दिशा में है। उसे ब्राह्मणों ने बह्म कहा है। शायद मेरे गांव के ब्रह्मपुर नाम के पीछे कारण भी यही है।

 

मेरी याद में महुआ का महत्व रहा है। तब मैं एकदम छोटा था। भैया के साथ महुआ चुनने जाता था। गांव में महुआ के पांच पेड़ थे। हम लेकिन जाते एक ही पेड़ के पास थे। वह पेड़ गांव के दक्खिन में था बिल्कुल मेरे एक खेत के पास। हम महुआ चुनते जरूर थे, लेकिन घर नहीं लाते थे। वहीं चुनते और वहीं खा जाते थे।
असल में गांव में सबकुछ अलहदा होता है। लोगों के रहने-सहने का ढंग अपना होता है। यह नहीं कि शहर की तरह सभ्यता का लबादा ओढ़ने की जरूरत हो। लुंगी-धोती और अब तो हाफ पैंट में भी आदमी बड़े आराम से घरों से बाहर निकलते हैं। उपर से कुरता डालने की जरूरत नहीं। बस बनियान ही काफी है और बनियान नहीं भी हो तो कोई बात नहीं। यह अंतर केवल पहनावे का ही नहीं है। रिश्ते-नातों का भी है। गांव में हर आदमी अपना होता है। फिर चाहे वह दूसरी जाति का ही क्यों न हो। सभी के साथ एक रिश्ता होता है और सभी उसकी डोर में बंधे होते हैं। गांव में परंपराएं भी कम अनोखी नहीं होतीं। मेरे ही गांव में एक परंपरा है सलाना पूजा की। यह सावन के अंतिम दिन होता है।
बचपन से इस पूजा को लेकर दिलचस्पी रही। मेरे गांव का मंदिर बहुत पुराना है। इसका निर्माण 1914 में ही हुआ जब यह गांव बसा। गांव बसने के पीछे कारण यह रहा कि 1912 में बंगाल से बिहार के अलग होने के बाद पटना को राजधानी बनाया गया था और तत्कालीन हुकूमत ने मेरे पुरखों की जमीन का अधिग्रहण कर लिया था।

कल विश्व आदिवासी दिवस है। मुझे अपने गांव की वास्तविक संस्कृति और परंपराएं व इनमें निहित मूल्यों को दर्ज करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ये प्रमाण हैं कि हम सभी मूलनिवासी हैं और हम हिन्दू नहीं हैं। हिन्दू धर्म हम पर थोपा गया धर्म है।

 

खैर, उस समय मेरे गांव की मंदिर में लक्ष्मी,गणेश, हनुमान के अलावा शंकर जैसे देवी-देवता नहीं थे। यह तो 1982 की बात है जब मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया। ये देवी-देवता तब घुसपैठ कर चुके थे। लेकिन इन सभी की प्रतिमाएं मंदिर के बाहरी हिस्से में थीं। मंदिर के अंदर केवल सात देवियों की पिंडियां थीं। “सातों रे बहिनिया” शीर्षक से एक लोकगीत भी हुआ करता था। बचपन में हमेशा यह सवाल उठता था कि ये सातों बहिनियां कौन हैं? क्या इनका जिक्र रामायण और महाभारत आदि ग्रंथों में भी है।
दरअसल, बचपन में पापा और मां दोनों की इच्छा रहती कि मैं धार्मिक ग्रंथ पढ़ूं। दोनों निरक्षर रहे लेकिन धार्मिक बातों में दिलचस्पी थी। पापा हमेशा कहते कि मैं उन्हें रामायण पढ़कर सुनाऊं। इसलिए उन दिनों मेरे पास रामायण, महाभारत, गीता और सुखसागर जैसे ग्रंथ थे। तो होता यह था कि मैं इन ग्रंथों में सात देवियों की खोज करता और जब कुछ नहीं मिलता तो पापा से पूछता। जवाब मिलता कि ये बड़ी देवियां हैं। दुर्गा की तरह नहीं। इनकी लीला अपरंपरार है।
बचपन की बात बचपन में ही खत्म हो गई। वैज्ञानिक चेतना मेरे अंदर आ चुकी थी और धार्मिक ग्रंथों को एक दिन मैंने जला दिया। उस दिन घर के लोग बहुत नाराज हुए। लेकिन बात जल्द ही आयी-गयी हो गयी। परंतु, यह सवाल बना रहा कि आाखिर ये सात देवियां हैं कौन? और क्यों इनकी पिंडियां मेरे इलाके के हर गांव में हैं? साथ ही यह भी कि पिंडियां ही क्यों? क्या कोई आकृति नहीं है इनकी?
इन सवालों का जवाब मेरे गांव की संस्कृति में है। असल में मेरा गांव भारत के उन गांवों में एक है जहां मूलनिवासी रहते हैं। हमारी अपनी परंपरा है और इसमें द्विजों का कोई स्थान नहीं है। जिस तरह की पिंडियां मेरे गांव में हैं, वैसी ही पिंडियां मुझे झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर ब्लॉक के सखुआपानी गांव में भी मिले थे। वहां असुर आदिम जनजाति के लोग रहते हैं। ऐसी ही पिंडियां मुझे महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, गुजरात, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा आदि राज्यों में भी होने की जानकारियां मिली हैं। बुंदेलखंड के महोबा में तो एक जगह भैंसासुर का स्मारक भी है। वहां भी एक बड़ी सी पिंड है। ऐसा ही एक बड़ा पिंड मेरे गांव के पश्चिम दिशा में है। उसे ब्राह्मणों ने बह्म कहा है। शायद मेरे गांव के ब्रह्मपुर नाम के पीछे कारण भी यही है। लेकिन हमारे सबसे प्रमुख देवता का नाम नहीं है यह। पापा के मुताबिक, हमारे सबसे बड़े देवता का नाम है बख्तौर बाबा। पापा की बड़ी इच्छा रही कि हमारे घर में बख्तौर बाबा की पूजा हो। लेकिन इसमें बहुत खर्च होता है और पापा के सामने चुनौतियां बहुत बड़ी थीं।

 

लेकिन मुझे बख्तौर बाबा की पूजा को देखने का मौका मिला है। मेरे गांव में ही मुकंद राय थे। रिश्ते में बड़का बाबू लगते थे। उन्होंने इसका आयोजन कराया था। तब एक भगत था और उसके साथ चार और लोग थे। मांदड़ की थाप से पूरा गांव झंकृत हो उठा था। वे गीत गा रहे थे। मुख्य भगत के पैरों में घुंघरू थे। पूजा की शुरुआत एक पेड़ को पूजने के साथ हुई थी। बहुत अधिक याद नहीं है लेकिन इतना जरूर कि चावल के लड्डू थे। उसमें गुड़ और मेवे थे। शुद्ध देसी घी में तैयार किए गए लड्डू। मुलायम इतने कि मेरी नन्हीं हथेलियों में भी टूट जाते थे। ऐसी ही पूजा मैंने कई बार आदिवासी इलाकों में देखे हैं।
कल विश्व आदिवासी दिवस है। मुझे अपने गांव की वास्तविक संस्कृति और परंपराएं व इनमें निहित मूल्यों को दर्ज करने की आवश्यकता महसूस हो रही है। ये प्रमाण हैं कि हम सभी मूलनिवासी हैं और हम हिन्दू नहीं हैं। हिन्दू धर्म हम पर थोपा गया धर्म है।
इस विषय पर बहुत लिख चुका हूं और आगे भी लिखने की इच्छा है। लेकिन विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर मैं अपने आपको इस वंचित और उत्पीड़ित समुदाय के साथ इसलिए जोड़ता हूं क्योंकि मेरे घर की परंपराएं आदिवासी परंपराओं के जैसी रही हैं। फिलहाल गांव को लेकर कविता मेरे जेहन में कल आयी।
कविता : गांव में रहती हैं भौजाइयां
गांव शहर की तरह कठोर नहीं होते,
उनमें होता है कच्चे बांस के जैसा मुलायमपन।
गांव में रिश्ते-नाते, अपने-पराये
सब घोषित होते हैं
शहर के माफिक नहीं कि
हर दूसरा चेहरा अंजान हो।
गांव की गलियां
जलेबी की तरह होती हैं
एक गली में घुसने पर
आदमी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पारकर
दूसरे छोर पर निकलता है।
गलियों में रहती हैं भौजाइयां
गलियों में हंसती हैं भौजाइयां
गलियों में जीवन जीती हैं भौजाइयां।
काका-काकी, चाचा-चाचाी और
भाई-भतीजों से अलग
सबसे खास होती हैं भौजाइयां।
भौजाईयां बताती हैं अतीत
देती हैं वर्तमान का प्रमाण और
करती हैं भविष्य के प्रति सचेत।
भौजाईयां बहुत खास होती हैं
गोया गांव में खिले हों असंख्य फूल।
हां,गांव शहर की तरह कठोर नहीं होते,
उनमें होता है कच्चे बांस के जैसा मुलायमपन।
एक कविता और जेहन में आयी। यह भी हमारी पहचान से जुड़ी है।
रहने दो शब्दों का पार्थिव संसार
मेरे हाथ में है हथौड़ा, कुदाल, फावड़ा
और मेरे सामने है पहाड़।
मुझे पहाड़ का सीना चीरना है
बाहर निकालनी है एक नदी
उगाने हैं खेत में धान
देखना है बच्चों का भरपेट खाया चेहरा।
रहने दो शब्दों का पार्थिव संसार
संकट में हैं मेरे जंगल
और खेतों पर है तुम्हारा कब्जा।
मुझे अपना जंगल बचाना है
छीन लेनी है तुमसे अपनी जमीन
पीना है अपने कुएं का मीठा पानी
और खाने के बाद बजाना है मांदड़।
हां, रहने दो शब्दों का पार्थिव संसार।

 

नवल किशोर कुमार  फारवर्ड प्रेस में सम्पादक हैं ।

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