कफनचोर (डायरी 6 नवंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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साहित्य को लेकर एक सवाल मेरी जेहन में हमेशा बना रहता है। सवाल यही कि उस साहित्य को क्या कहा जाय, जिसके पात्र और साहित्य में शामिल घटनाएं काल्पनिक होती हैं? क्या उन्हें काल्पनिक साहित्य कहा जाएगा? और एक सवाल यह भी कि क्या वाकई में कल्पनाएं कल्पना मात्र होती हैं? मतलब यह कि एक आदमी मन में कोई बात सोचता है और लिख देता है? मुझे लगता है कि साहित्य में कल्पनाएं नहीं होतीं। इसका जुड़ाव असल समाज से होता ही है।

मेरी अपनी मान्यता है कि राजनीति और साहित्य में समानताएं हैं। एक समानता मुझे बहुत अच्छी लगती है। यह समानता है जनता के साथ इसके जुड़ाव की। मैं उन साहित्यों की बात नहीं कर रहा जो पढ़े नहीं जाते। बहुत सारे लेखकगण हैं जो साहित्य अपने लिए रचते हैं और खुद ही उसके पाठक भी होते हैं। कई बार मुझे स्वयं लगा कि मैं इसी तरह के साहित्यकारों में शामिल हूं। लेकिन अपने लिए लिखना भी कम कठिन काम नहीं है। आदमी को विषय सोचने होते हैं, शब्दों को संजोना पड़ता है। तब जाकर आदमी कुछ लिख पाता है। वैसे भी लिखे हुए की फिक्र वही करते हैं जिनके लिखे में कोई दम नहीं होता। मेरा तो स्पष्ट मानना है कि यदि आप अच्छा लिखेंगे तो लोग समय आने पर आपके घर की आलमारी तोड़कर आपका लिखा ले जाएंगे।

सबने कितना संघर्ष किया है। कबीर तो संघर्ष की प्रतिमूर्ति हैं। जब वे दोहे रचते तब लोग उनकी रचनाओं को हवा में उड़ा देते थे। लेकिन अब देखिए। कबीर हिन्दी राज्यों के बहुसंख्यक बहुजनों की ताकत बन चुके हैं। कितना कुछ होता है लिखे में। इसलिए मैं तो यह मानता हूं कि हर साहित्यकार को लिखना चाहिए और बिना यह सोचे लिखना चाहिए कि कोई उसे पढ़ेगा अथवा नहीं पढ़ेगा।

अब आप मिर्जा गालिब को ही देख लें। बेचारे गालिब साहब ने कितना संघर्ष किया था अपने को शायर साबित करने के लिए। उनकी जटिल भाषा उनकी दुश्मन थी। किसी को उनकी बात समझ में ही नहीं आती थी। कुछ को समझ में आती भी थी, लेकिन संख्या बहुत कम थी। कद्रदान मिर्जा गालिब को उस समय नहीं मिले जब उन्हें कद्रदानों की आवश्यकता थी। मिर्जा गालिब को छोड़िए अपने यहां के प्रेमचंद को देख लें। महान कथाकार रहे। हिन्दी राज्यों में बड़ा नाम रहा। लेकिन जूते घसीटने पड़े। बेचारे बनारस से बंबई तक गए। अपने भिखारी ठाकुर को ही देखिए। कितना संघर्ष किया उन्होंने।

कबीर तो संघर्ष की प्रतिमूर्ति हैं। जब वे दोहे रचते तब लोग उनकी रचनाओं को हवा में उड़ा देते थे। लेकिन अब देखिए। कबीर हिन्दी राज्यों के बहुसंख्यक बहुजनों की ताकत बन चुके हैं। कितना कुछ होता है लिखे में। इसलिए मैं तो यह मानता हूं कि हर साहित्यकार को लिखना चाहिए और बिना यह सोचे लिखना चाहिए कि कोई उसे पढ़ेगा अथवा नहीं पढ़ेगा।

प्रेमचंद से एक बात याद आयी। उन्होंने एक कहानी लिखी थी– कफन। यह कहानी प्रेमचंद की अंतिम कहानी है जो चांद पत्रिका के अप्रैल, 1936 के अंक में प्रकाशित हुई थी। यह कहानी एक नजीर है कि रचा गया गद्य केवल कल्पनाओं पर आधारित नहीं होता। हालांकि अनेकानेक आलोचकों ने इस कहानी को लेकर अलग-अलग नजरिया रखा है। खासकर दलित-बहुजनों ने इस कहानी को लेकर प्रेमचंद की आलोचना की है। इस कहानी के दो पात्र बेहद गरीब हैं और शराब के इतने आदी कि वह कफन के पैसे से शराब पी जाते हैं।

प्रेमचंद की कहानी को अब करीब 9 दशक बीत चुके हैं। सच कहूं तो मुझे इस कहानी के पात्र हर रोज नजर आते हैं और आए दिन में इसके दुष्परिणाम नजर आते हैं। यह बात मैं बिहार के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है। आज दिल्ली से प्रकाशित जनसत्ता ने पहले पन्ने पर खबर प्रकाशित किया है कि बीते तीन दिनों में गोपालगंज में 18 और चंपारण में 16 लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हो गई है। इस प्रकार मृतकों की कुल संख्या 34 है, जिसकी पुष्टि बिहार सरकार के अधिकारियों द्वारा की गई है। अधिकारियों के मुताबिक 13 लोग अभी इलाजरत हैं। हालांकि अधिकारियों ने शराब की पुष्टि नहीं की है। राज्य के शराब मंत्री सुनील कुमार ने शराब का अंदेशा जताया है और बेसरा जांच की रिपोर्ट आने की बात कही है।

पटना से प्रकाशित दैनिक प्रभात खबर ने अपने पहले पन्ने पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का बयान छापा है। इस बयान में मुख्यमंत्री ने 16 नवंबर तक सूबे में शराबबंदी की विस्तृत समीक्षा करने की बात कही है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि शराबबंदी को लेकर फिर से अभियान चलाए जाने की जरूरत है। लेकिन कुल मिलाकर मुख्यमंत्री ने इस बात की जिम्मेदारी नहीं ली है कि सूबे में लचर कानून-व्यवस्था के कारण जहरीली शराब से लोगों की मौत हुई है।

मेरे सामने पिछले 5 सालों का आंकड़ा है। इस दरमियान 3500 से अधिक लोगों की मौत जहरीली शराब की वजह से बिहार में हुई है। क्या अब नीतीश कुमार को नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? या फिर उनकी अंतरात्मा में प्रेमचंद की कहानी के पात्रों की आत्मा प्रवेश कर गयी है और वे कफनचोर हो गए हैं?

मैं गैसल रेल दुर्घटना को याद कर रहा हूं। यह रेल दुर्घटना 2 अगस्त, 1999 को घटित हुई थी। इस दुर्घटना में करीब एक हजार लोग मारे गए थे। उल्लेखनीय है कि यह आंकड़ा सरकारी है और सरकारें ऐसे आंकड़ों को छिपाती भी है। इस रेल दुर्घटना के बाद तत्कालीन रेल मंत्री नीतीश कुमार ने नैतिक जिम्मेदारी ली और इस्तीफा दे दिया था।

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मेरे सामने पिछले 5 सालों का आंकड़ा है। इस दरमियान 3500 से अधिक लोगों की मौत जहरीली शराब की वजह से बिहार में हुई है। क्या अब नीतीश कुमार को नैतिक जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए? या फिर उनकी अंतरात्मा में प्रेमचंद की कहानी के पात्रों की आत्मा प्रवेश कर गयी है और वे कफनचोर हो गए हैं?

बहरहाल, आज पटना में अल्पप्रवास का अंतिम दिन है। कल देर शाम एक कविता जेहन में आयी–

सुकून और जिंदगी

एक-दूसरे को आरे की तरह क्यों काटते हैं?

मैं मील के पत्थरों से 

मंजिल की दूरी पूछता हूं

वे मुझे इतिहास बताते हैं

मैं इतिहास से अतीत पूछता हूं

वह मुझे खंडहर दिखाता है

मैं खंडहरों से अपने पुरखों पीठ पर 

जख्मों के निशान के बारे में पूछता हूं

वे खामोश रहते हैं

मैं उनकी खामोशी से पूछता हूं

वह वक्त की ओर इशारा करती है

मैं वक्त से पूछता हूं

वह मुझे भविष्य की बात बताता है

मैं भविष्य से पूछता हूं

वह मुझे सपने दिखाता है

मैं सपनों से पूछता हूं

वह ठहाके लगाता है

मैं ठहाकों से पूछता हूं

पेट में आग जलती है

मैं आग से पूछता हूं

वह मुझे लोरी सुनाती है।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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