औरतें हैं, लड़ सकती हैं और जीत भी सकती हैं (डायरी 14 जनवरी, 2022)  

नवल किशोर कुमार

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जड़ता किसी भी समाज के लिए सबसे बड़ी बीमारी है। खासकर भारतीय समाज जो कि महिलाओं के मामले में जड़ता का शिकार भयंकर रूप से रहा है। हालांकि इस मामले में कुछ सुधार अवश्य हुआ है। लेकिन इसे अपेक्षा से बहुत कम माना जाना चाहिए। आज भी महिलाओं को इसी निगाह से देखा जाता है कि वह अपना घर संभाले और खुश् रहे। घर संभालने की परिभाषा भी कम विस्तृत नहीं है। दाई से लेकर मां और प्रेमिका तक की जिम्मेदारियां इसमें शामिल हैं। लेकिन इसके बावजूद उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी एकदम न्यून है। यह बात केवल घरों तक सीमित नहीं है। सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में भी यही हालात हैं।

मैं तो बिहार का रहनेवाला हूं तो पहले बिहार की ही बात करता हूं। आज बिहार विधानसभा में जितनी महिला सदस्य हैं, कुछेक अपवादों को छोड़ दें तो उनमें कोई ऐसा नहीं है, जिन्होंने अपने बूते राजनीतिक सफलता प्राप्त की है। सबके पीछे उनके पिता या पति की भूमिका है। अधिकांश को तो राजनीति में प्रवेश अनुकंपा के आधार पर मिला है।

सबसे बड़ा नाम निर्मला सीतारमण का है जो केंद्रीय वित्त मंत्री हैं। परंतु, मंत्रालय के कामकाज की बात करें तो वह शायद ही कभी कोई महत्वपूर्ण फैसला लेती दिखायी देती हैं। फिर चाहे वह आरबीआई के द्वारा रेपो रेट घटाने-बढ़ाने का मामला हो या जीएसटी में संशोधन का। स्मृति ईरानी भी केंद्रीय कैबिनेट की सदस्य हैं, परंतु उन्हें भी हाशिए पर रखा गया है।

उत्तर प्रदेश के हालात भी कुछ ऐसे ही हैं। मौजूदा विधानसभा में 44 महिलाएं हैं। हिस्सेदारी के हिसाब से देखें तो यह करीब दस फीसदी के बराबर है। बीते पांच सालों में उत्तर प्रदेश में राज कर रही भाजपा ने भी महिलाओं को बैक बेंचर बनाकर रखा है। ठीक केंद्रीय सरकार के जैसे। हालांकि केंद्र में कुछेक महत्वपूर्ण विभाग भले ही महिलाओं के पास हैं, लेकिन उनके भी काम पीएमओ से संचालित होते हैं। इस तरह मंत्री होने के बावजूद उनकी भूमिका अत्यंत सीमित है। यदि नाम के साथ उदाहरण की बात की जाय तो सबसे बड़ा नाम निर्मला सीतारमण का है जो केंद्रीय वित्त मंत्री हैं। परंतु, मंत्रालय के कामकाज की बात करें तो वह शायद ही कभी कोई महत्वपूर्ण फैसला लेती दिखायी देती हैं। फिर चाहे वह आरबीआई के द्वारा रेपो रेट घटाने-बढ़ाने का मामला हो या जीएसटी में संशोधन का। स्मृति ईरानी भी केंद्रीय कैबिनेट की सदस्य हैं, परंतु उन्हें भी हाशिए पर रखा गया है।

खैर, उत्तर प्रदेश में कांग्रेस ने इस बार जबरदस्त तरीके से इस जड़ता को तोड़ने की कोशिश की है। पार्टी ने 40 फीसदी सीटें महिलाओं को देने का निर्णय लिया है। यह एक क्रांतिकारी फैसला है, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। यह वही कांग्रेस है, जिसने इस देश को पहली महिला प्रधानमंत्री दिया। हालांकि वह भी अनुकंपा के जैसा ही था, लेकिन जिस समाज में महिलाओं को केवल घरों के भीतर चूल्हा-चौका करने और बच्चे जनने व सेक्स पार्टनर बने रहने के लिए मजबूर किया जाता हो, वहां राजनीतिक भागीदारी महिलाओं को चाहे जैसे भी प्राप्त हो, महत्वपूर्ण मानी जाएगी।

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लेकिन इस बार कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश की सियासत में एक अनूठा प्रयोग अवश्य किया है। हालांकि कांग्रेस को इसका कितना लाभ मिलेगा, अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी ही होगी। वजह यह कि कांग्रेस के पास दमखम वाले नेताओं का घोर संकट है। ले-देकर उसके पास सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ही हैं, जिनके नाम पर भीड़ जुट सकती है। इसके अलावा जिन महिलाओं को कांग्रेस ने टिकट दिया है, उनके पास पर्याप्त राजनीतिक अनुभव भी नहीं है। हालांकि इनमें पंखुड़ी पाठक जो कि नोयडा से उम्मीदवार घोषित की गयी हैं, अपवाद सरीखी हैं। वहीं उन्नाव बलात्कार पीड़िता की मां को उम्मीदवार बनाये जाने का मामला थोड़ा अटपटा है। यह इमोशनल कार्ड है। कांग्रेस को इससे बचना चाहिए था।

फिलहाल तो वहां भाजपा के खिलाफ माहौल बनता जा रहा है। जिस एंटी इंनकंबेंसी को दूर करने के लिए भाजपा और आरएसएस ने हिंदुत्व कार्ड खेला था, वह ताश के पत्तों से बना महल साबित हो रहा है।

इन सबके बावजूद कांग्रेस ने सकारात्मक रिस्क लिया है। इसे साहसपूर्ण निर्णय की संज्ञा दी जानी चाहिए। वैसे भी राजनीतिक और सामाजिक जड़ता को दूर करने के लिए जोखिम तो उठाने ही होते हैं। इस बार यह जोखिम प्रियंका गांधी की कांग्रेस ने उठाया है। यह मुमकिन है कि कांग्रेस को इसका सीधा लाभ चुनाव में ना मिले क्योंकि वहां की सियासत अब सीधे-सीधे एक बात पर टिक गयी है और वह यह कि या तो भाजपा के साथ या भाजपा के खिलाफ। फिलहाल तो वहां भाजपा के खिलाफ माहौल बनता जा रहा है। जिस एंटी इंनकंबेंसी को दूर करने के लिए भाजपा और आरएसएस ने हिंदुत्व कार्ड खेला था, वह ताश के पत्तों से बना महल साबित हो रहा है।

बहरहाल, कांग्रेस और विशेषकर प्रियंका गांधी को बधाई कि उन्होंने महिलाओं को 40 फीसदी उम्मीदवारी देने का निर्णय लिया है। उनकी यह कोशिश राजनीति को आनेवाले समय में बदलेगी और अन्य पार्टियों को भी महिलाओं को आगे लाने के लिए विवश होना पड़ेगा।

मैं तो इसमें विश्वास करता हूं कि भारत की महिलाएं कमजोर नहीं हैं। उन्हें कमजोर बनाकर रखा गया है। वे औरतें हैं, लड़ सकती हैं और जीत भी सकती हैं।

सभी महिला उम्मीदवारों को शुभकामनाएं!

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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