ये दृश्य बेहद सामान्य हैं, लेकिन हम नजरअंदाज नहीं कर सकते डायरी (15 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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बात कल की ही है। हालांकि यह ऐसी कोई बात नहीं है जो पहले मेरी जेहन में नहीं आयी हो। लेकिन जब दो बातें एक साथ सामने हों तो हमेशा सामान्य सी लगने वाली बात भी असामान्य हो जाती है और जेहन में सवाल उठने लगते हैं। कल यही हुआ। एक आलेख पढ़ने को मिला, जिसमें अफगानिस्तान और हिन्दुस्तान की परिस्थितियों को लेकर तुलनात्मक विचार किया गया है। इनमें से एक विचार महिलाओं को लेकर है। अफगानिस्तान में तालिबानी हुकूमत द्वारा वहां की महिलाओं के बारे में कुछ बातें कही गयी हैं। तालिबान ने कहा है कि महिलाओं को पढ़ने-लिखने की आजादी होगी। लेकिन उन्हें परदे में रहना होगा। उन्हें पुरुष छात्रों के साथ पढ़ने की आजादी नहीं होगी। विषयों को लेकर भी तालिबान ने घोषणा की है कि वह विषयों की समीक्षा करेगा।

कल जब यह आलेख पढ़ रहा था तब मैं दिल्ली मेट्रो में था। मुझे लगता है कि दिल्ली मेट्रो कई मायनों में खास है। एक खासियत तो यह कि जमीन से सौ मीटर अंदर भी एक खूबसूरत दुनिया का अहसास कराती है। मेट्रो के अंदर की तहजीब भी खूबसूरत तहजीब है। अपने से अधिक जरूरतमंद के लिए सीट छोड़ देने की खूबसूरत परंपरा को देख मन खुश हो जाता है। कई बार लोग महिलाओं और वृद्ध नागरिकों के लिए आरक्षित सीटों पर भी बैठ जाते हैं। लेकिन जैसे ही कोई महिला आती है तो वे सीट छोड़कर खड़े भी हो जाते हैं। वृद्धों के मामले में तो दिल्ली मेट्रो एक मिसाल है। कई बार मैंने वृद्ध नागरिकों के लिए सीट छोड़ा है।

असल में सभ्य समाज की कसौटी ही यही है कि लोग एक-दूसरे के प्रति किस तरह का व्यवहार करते हैं। मेट्रो एक समाज का निर्माण कर रहा है। इतना तो कहा ही जा सकता है। महिलाएं सुरक्षित यात्रा कर पाती हैं। वृद्ध नागरिाकों के लिए सहुलियतें हैं

तो कल मैं दिल्ली मेट्रो में था। कोच में भीड़ नहीं थी। कुछेक लोग थे जो अपनी मर्जी से खड़े थे। मैं जिस कोच में था, उसमें एक मुस्लिम दंपती था। उनके पास एक बच्चा था। बच्चे की उम्र अधिक से अधिक छह या आठ माह की रही होगी। शायद बच्चे को भूख लगी थी। वह रोए जा रहा था। उसकी मां उसे चुप कराने का पूरा प्रयास कर रही थी। उसका पिता भी कभी उसे गोद में लेकर मेट्रो के बाहर का नजारा दिखाता तो कभी हारकर वापस उसकी मां के हवाले कर देता। लेकिन बच्चे को न तो मेट्रो की जगमग में कोई दिलचस्पी थी और ना ही मेट्रो के बाहर के रंगीन नजारों से। वह तो भूखा था।

असल में सभ्य समाज की कसौटी ही यही है कि लोग एक-दूसरे के प्रति किस तरह का व्यवहार करते हैं। मेट्रो एक समाज का निर्माण कर रहा है। इतना तो कहा ही जा सकता है। महिलाएं सुरक्षित यात्रा कर पाती हैं। वृद्ध नागरिाकों के लिए सहुलियतें हैं

उसके माता-पिता यह समझ भी रहे थे। संभवत: महिला अपने घर से बच्चे के लिए दूध की बोतल लाना भूल गयी थी। उसका पति उसे डांट भी रहा था। महिला अपने पति की डांट खाती और फिर बच्चे को परेशान देख परेशान हो जाती। उसके पास अपना दूध था। वह चाहती भी थी कि अपने बच्चे को अपना दूध पिला दे ताकि वह चुप हो जाय। उसने प्रयास भी किया। अपना बुरका हटाया और किसी तरह दूध पिलाने की कोशिश करने लगी। लेकिन उसके पति को यह अच्छा नहीं लगा। उसने उसे फिर डांटा और शायद उससे कुछ ऐसा कहा, जिससे वह सहम गयी। उसने वापस अपना बुरका ठीक किया और हिजाब को दुबारा अपने चेहरे पर बांध लिया। लेकिन बच्चा रोए जा रहा था। यह उसका पिता भी देख-सुन रहा था और कोच में बैठे हम अन्य यात्री भी।

मेरे सामने यह दृश्य था। धर्म मातृत्व पर भारी पड़ रहा था। बच्चे की भूख पर मजहब का खौफ हावी था। पुरुषों के सामने एक महिला लाचार थी। उसका बच्चा रो रहा था और वह दूध नहीं पिला पा रही थी।

मुझे लगता है कि ऐसे सभी धर्मों को खारिज कर देना चाहिए जो ऐसी परिस्थितियों के कारक हैं। फिर चाहे वह कोई भी धर्म क्यों न हो? सार्वजनिक स्थल पर बच्चे को दूध पिलाने से यदि किसी धर्म की किसी मान्यता का उल्लंघन होता है तो ऐसे धर्म को नष्ट हो जाना चाहिए।

जब यह सब मेरे सामने था तभी मैं अफगानिस्तान और हिन्दुस्तान के बीच तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित आलेख पढ़ रहा था। तालिबान भी चाहता है कि अफगानी महिलाएं पर्दे में रहें। यहां हिन्दुस्तान के मुसलमान और हिंदू भी अपनी महिलाओं को पर्दे में रखना चाहते हैं। दोनों धर्मों में अब एक ऐसा वर्ग बन गया है जो पर्दा प्रथा को नहीं मानता और मेरे हिसाब से यह बेहद सकारात्मक बदलाव है। लेकिन ऐसा बहुत कम ही हुआ है। अब भी महिलाओं की हालत कमोबेश एक जैसी ही है। हिंदू महिलाओं की तुलना में मुस्लिम महिलाओं का जीवन अधिक कष्टमय है। यह मैं इस आधार पर कह सकता हूं कि अधिकांश मुस्लिम औरतें इस्लाम के महिला विरोधी मान्यताओं को मानने के लिए बेबस हैं।

कल ही देवबंद के मदनी का बयान पढ़ रहा था। मदनी ने तालिबान का समर्थन किया है। उसके मुताबिक तालिबान जो कर रहा है, वह एक तरह का धर्मयुद्ध है। मदनी ने मोहन भागवत के उस बयान का समर्थन किया है जिसमें भागवत ने कहा है कि भारत के अधिकांश मुसलमानों के पूर्वज पहले हिंदू थे। महिलाओं को लेकर मदनी ने टिप्पणी की। उसका कहना है कि महिलाओं को पर्दे में ही रहना चाहिए। उन्हें केवल अपनी आंखें खुली रखने की इजाजत है।

दिल्ली में गर्मी का असर भी खूब होता है। गर्मियों में मैं बेहद हलका कपड़ा पहनना पसंद करता हूं। अन्य पुरुष भी यही करते हैं। बदन पर एक भी अतिरिक्त कपड़ा नहीं रखते। लेकिन मुस्लिम महिलाओं को अतिरिक्त परदा पहनना ही पड़ता है। फिर चाहे चिलचिलाती गर्मी ही क्यों न हो।

खैर मैं अफगानिस्तान और हिन्दुस्तान की बात कर रहा था। कल ही देवबंद के मदनी का बयान पढ़ रहा था। मदनी ने तालिबान का समर्थन किया है। उसके मुताबिक तालिबान जो कर रहा है, वह एक तरह का धर्मयुद्ध है। मदनी ने मोहन भागवत के उस बयान का समर्थन किया है जिसमें भागवत ने कहा है कि भारत के अधिकांश मुसलमानों के पूर्वज पहले हिंदू थे। महिलाओं को लेकर मदनी ने टिप्पणी की। उसका कहना है कि महिलाओं को पर्दे में ही रहना चाहिए। उन्हें केवल अपनी आंखें खुली रखने की इजाजत है। मदनी इसकी वकालत भी करता है कि महिलाओं को पुरुषों के साथ बैठकर शिक्षा ग्रहण नहीं करनी चाहिए।

मैं यह सोच रहा हूं कि खुद को विश्वगुरु कहनेवाला यह देश जा किस दिशा में रहा है। भागवत ने जो बयान दिया है, वह बेहद महत्वपूर्ण है लेकिन अपूर्ण है। उसे यह स्पष्ट करना चाहिए था कि आखिर वे क्या कारण रहे जिनके कारण इस देश के लोगों ने इस्लाम कबूल किया? उसे यह बताना चाहिए था कि अकबर ने कब जोधाबाई के पिता के गर्दन पर तलवार रखी और कहा कि अपनी बेटी की शादी मुझसे करवाओ? मानसिंह के सामने अकबर ने कौन-सी शर्त रखी थी कि वह आजीवन उसका सेनापति बना रहा और अपने सेनापतित्व में उसने तमाम हिंदू राजाओं को हराया? क्या मुस्लिम शासकों ने या फिर अंग्रेजों ने तलवार व बंदूक के सहारे लोगों का धर्मांतरण किया? और क्या यह संभव है?

हिंदू धर्म ग्रंथों में तो इसके प्रमाण मिल जाते हैं। हिरण्यकशिपु की हत्या विष्णु ने मादा सिंह का रूप धर केवल इसलिए की क्योंकि हिरण्यकशिपु आर्य धर्म को नहीं मानता था। हिरण्याक्ष की हत्या भी इसी संदर्भ में की गयी। शंबूक की कहानी दूसरी है। उसे तो इसलिए मार दिया गया क्योंकि वह शूद्र होकर ब्राह्मणों के जैसे आर्य धर्म का पालन कर रहा था।

मेरे हिसाब से ये सब मिथक हैं। लेकिन ये कमाल के मिथक हैं। भारत का सच बताते हैं। एक ऐसा सच जो हिंदू समाज को नंगा कर देता है।

मैं मेट्रो से बाहर निकल रहा था। मेट्रो कोच में रो रहा वह बच्चा अब भी रो रहा था। उसकी मां उसे गोद में लेकर बेबस थी और मैं बस सोचे जा रहा था। अफगानिस्तान, तालिबान, हिन्दुस्तान, भागवत और हिंदू धर्म।

मेरे पास सोचने को कुछ और था भी नहीं? यदि होता तो भी मैं उसे खारिज कर देता।

 

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं। 

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