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जूम करके देखिए गांधीवाद और गोडसेवाद (डायरी 30 जनवरी, 2022)

आज फिर 30 जनवरी है। यह मौका है भारत में भगवा आतंकियों के सबसे पहली कार्रवाई को याद करने का। वही आतंकी कार्रवाई, जिसमें नाथूराम गोडसे नामक एक भगवा आतंकी ने एक अति वयोवृद्ध गांधी के सीने में गोलियां दाग दी थी। हालांकि गोडसे को फांसी दे दी गई। लेकिन गोडसेवाद यानी भगवा आतंकवाद आज […]

आज फिर 30 जनवरी है। यह मौका है भारत में भगवा आतंकियों के सबसे पहली कार्रवाई को याद करने का। वही आतंकी कार्रवाई, जिसमें नाथूराम गोडसे नामक एक भगवा आतंकी ने एक अति वयोवृद्ध गांधी के सीने में गोलियां दाग दी थी। हालांकि गोडसे को फांसी दे दी गई। लेकिन गोडसेवाद यानी भगवा आतंकवाद आज भी जिंदा है। ठीक उसी तरह से जिस तरह से गांधी की हत्या करने के बाद भी भगवा आतंकी गांधी के विचारों को खत्म नहीं कर सके।

कहने का मतलब यह कि गोडसेवाद और गांधीवाद दोनों का अस्तित्व कायम है। यह अजीबोगरीब बात है। लालू प्रसाद के शब्दों में भारतीय समाज के लिए कुछ कहा जाय तो शायद कुछ ऐसा ही कहा जा सकता है कि गुड़ भी खाएंगे और गुलगुले से परहेज भी करेंगे। आखिर ऐसा क्यों है कि भगवा आतंकवाद का अस्तित्व आज भी कायम है?

[bs-quote quote=”मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आरएसएस इस देश का सबसे अधिक प्रतिबद्ध संगठन है। इस देश को ब्राह्मणों का देश बनाने की जो प्रतिबद्धता 1925 में थी, वही आज भी है। उतना ही हिंसक और शातिरपनई भी उतनी ही।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

मैं यह मानता हूं कि भगवा आतंकवाद, आरएसएस की स्थापना की तारीख 27 सितंबर, 1925 के पहले भी था। पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की पीठ में खंजर भोंकने की घटना से इसका प्रारंभ माना जाना चाहिए। और यह तो इतिहास में वर्णित है कि शुंग ने किस तरह से बौद्धों का नरसंहार किया। बाद के दिनों में और आक्रमणकारी भी आए और लगभग सभी ने जमकर रक्तपात मचाया, लेकिन जितना रक्तपात भारत में भगवा आतंकियों ने मचाया है, उतना किसी ने नहीं किया। दिलचस्प बात यह है कि अब इस देश में मुगलों का अस्तित्व नहीं है, अंगेजी हुक्मरान तो 1947 में ही अपने देश वापस लौट गए। लेकिन भगवा आतंकवाद आज तक फन उठा रहा है।

इससे भी दिलचस्प यह है कि आरएसएस जिसके उपर भगवा आतंकियों को तैयार करने व संरक्षण देने का आरोप लगता रहा है, उसे प्रतिबंधित भी किया गया। मसलन, 1948 में गांधी की हत्या के बाद तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने आरएसएस पर बैन लगा दिया था। लेकिन 15 दिसंबर, 1950 को उनके निधन के बाद एक जांच समिति रपट के आने के बाद नेहरू सरकार ने ही आएसएस को प्रतिबंध मुक्त कर दिया था। कमाल की बात यह भी कि पंडित नेहरू ने ही 1963 में आरएसएस को गणतंत्र दिवस के परेड में शामिल होने का न्यौता भी दिया।

इसी प्रकार, 1974 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आरएसएस को बैन कर दिया था। लेकिन इंदिरा गांधी ने ही 1977 में कन्याकुमारी जाकर आरएसएस के द्वारा स्थापित विवेकानंद मेमोरियल का उद्घाटन एकनाथ रानाडे के आमंत्रण को स्वीकार करने के बाद किया। जाहिर तौर पर इंदिरा गांधी जानती थीं कि एकनाथ रानाडे कौन थे। नहीं जानने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता है। फिर जयप्रकाश नारायण को इस आरोप से आनेवाली पीढ़ियां भी आरोपमुक्त नहीं करेंगीं कि उन्होंने आरएसएस रूपी जहरीले सांप को – जो भारत में गंगा-जमुनी तहजीब को खत्म कर देना चाहता है – न केवल आश्रय दिया, बल्कि उसे सत्ता में साझेदार भी बनाया। मोरारजी देसाई का अपना चरित्र भी संदेहास्पद रहा है।

[bs-quote quote=”भगवा आतंकवाद, आरएसएस की स्थापना की तारीख 27 सितंबर, 1925 के पहले भी था। पुष्यमित्र शुंग द्वारा मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की पीठ में खंजर भोंकने की घटना से इसका प्रारंभ माना जाना चाहिए। और यह तो इतिहास में वर्णित है कि शुंग ने किस तरह से बौद्धों का नरसंहार किया। बाद के दिनों में और आक्रमणकारी भी आए और लगभग सभी ने जमकर रक्तपात मचाया, लेकिन जितना रक्तपात भारत में भगवा आतंकियों ने मचाया है, उतना किसी ने नहीं किया।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

दरअसल, गोडसेवाद और गांधीवाद के बीच समानता के अनेक बिंदु हैं। सबसे अधिक तो यही कि दोनों के दोनों वर्णाश्रम व्यवस्था को जायज मानते हैं। स्वयं गांधी भी जातिगत व्यवस्था को जायज ठहराते थे। इसके लिए उनकी आलोचना तब डॉ. आंबेडकर ने भी की थी और आज भी गांधी आलोचना के केंद्र में रहते हैं। लेकिन गांधी प्रशंसा के पात्र भी रहे। उन्होंने भारतीय समाज की विविधता को स्वीकार किया था। उन्होंने कुछ भी नया नहीं किया। मसलन, करुणा और अहिंसा की बातें तो बुद्ध के समय से ही चली आ रही हैं। गांधी को श्रेय इस बात के लिए दिया जाना चाहिए कि उन्होंने बदली हुई परिस्थिति में अहिंसा को अपना हथियार बनाया और एक सक्षम कमांडर की तरह आजादी की लड़ाई में डटे रहे।

इन सबके बावजूद आरएसएस ने कभी भी गांधी की हत्या के लिए देश से माफी नहीं मांगी और वर्ष 2014 से देश में उनका ही राज है। यह आरएसएस की कामयाबी है।

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मैं तो अमित शाह को दाद देता हूं कि कैसे एक आदमी ने पश्चिम उत्तर प्रदेश जहां कि इस बार एक समय लग रहा था कि भाजपा के लिए कुछ भी शेष नहीं है, वहां भाजपा अब कुछ सीटें जीत सकती है। इसका श्रेय निस्संदेह अमित शाह को जाता है, जिन्होंने यह गुमान नहीं रखा कि वे देश के गृह मंत्री हैं और ना ही इसका भय कि उनके एक राज्य मंत्री के बेटे पर किसानों के उपर गाड़ी चढ़ाकर जान से मारने का आरोप लंबित है।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि आरएसएस इस देश का सबसे अधिक प्रतिबद्ध संगठन है। इस देश को ब्राह्मणों का देश बनाने की जो प्रतिबद्धता 1925 में थी, वही आज भी है। उतना ही हिंसक और शातिरपनई भी उतनी ही।

बहरहाल, एक कविता कल जेहन में आई थी–

कहानियां समाजवादी होती हैं

और वामपंथी-दक्षिणपंथी भी।

मैं तुमसे पूछता हूं मेरे हुक्मरान

तुम्हें कैसी कहानियां चाहिए?

चलो तुम हिटलर की कहानी सुनो कि

एक क्रूर शासक था

और उसने लोगों को 

गैस चैंबरों में मार डाला

और यह भी कि 

उसे अपने ही बंकर में

खुद को गोली मारनी पड़ी थी।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं ।

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