पिछले दो महीने में भारत की राजनीति में विपक्ष ने जिस तरह से न्यूनतम शर्तों या अभी तक के परिदृश्य में बिना शर्तों के, एक साथ आगे बढ़ने का माद्दा दिखाया है, उसने विपक्ष को चुनाव में जाने से पहले चौकन्ना कर दिया है। विपक्ष जहां जमीनी मामले उठाकर देश के हर हिस्से में सरकार को घेरने का प्रयास कर रहा है वहीं सरकार अब, अपनी अब तक की नीतियों से अलग, चुनावी हथकंडे अपनाती दिख रही है।
गोदी मीडिया सत्ता के पक्ष में आज भी उसी आस्था के साथ खड़ी जरूर है पर उसे विपक्ष के आक्रामक हो जाने की वजह से उतना ताकतवर मौका नहीं मिल रहा है कि वह प्रधानमंत्री की इमेज बिल्डिंग पहले की तरह कर पाये। राहुल गांधी ने बहुत पहले कहा था कि नरेंद्र मोदी की ताकत उनकी मीडिया निर्मित झूठी इमेज है, जिसे मैं बर्बाद कर दूँगा। उस वक्त भाजपा के आईटी सेल ने गोदी मीडिया की मदद से राहुल की छवि और उनकी बौद्धिक चेतना पर इतने हमले किए कि राहुल की आवाज नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई थी पर अब हालत ऐसे नहीं हैं। पिछले एक साल में राहुल की इमेज देश और दुनिया दोनों जगह तेजी से बढ़ी है, जिसके सहारे राहुल गांधी ने हर जरूरी मसौदे पर प्रधानमंत्री को घेरने का काम किया और खोज-खोज कर प्रधानमंत्री के झूठ को उजागर किया या फिर उनके मंसूबों का पर्दाफाश किया। उनकी पादयात्रा ने भी उनकी इमेज को नया स्वरूप देने का काम किया है।
फिलहाल इस सबके बावजूद भाजपा के खिलाफ विपक्ष द्वारा बनाए जा चुके मोर्चे इंडिया (I.N.D.I.A.) में राहुल गांधी ने खुद को लो प्रोफाइल रखकर अपने कद को एक नई ऊंचाई और परिपक्वता दे दी है।
यही वजह है कि विपक्ष का गठबंधन दो महीने में काफी ताकतवर दिखने लगा है। 31अगस्त को मुंबई में हुई तीसरी बैठक में जिस तरह से विपक्ष के नेताओं ने चुनाव की रणनीति को लेकर और चुनाव में सींट बँटवारे को लेकर समिति गठित कर आगे बढ़ने का रास्ता अख़्तियार किया है वह अच्छा है। बड़े नेता शुरुआती चीजें तय करने बैठेंगे तो निश्चित रूप से अहम का टकराव होगा और छोटे हितों के लिए बड़े राजनीतिक मंसूबे बिखर जाएँगे। इसलिए विपक्ष के साझे हित के लिए यह बेहतर रास्ता हो सकता है कि साझी समिति के माध्यम से ही मसौदे तय करे और आगे बढ़े। फिलहाल समिति सिर्फ विपक्ष ही नहीं बना रहा है बल्कि विपक्ष के मंसूबों को ध्वस्त करने के लिए सरकार भी समिति बना रही है।
सरकार या फिर साफतौर पर कहा जाय तो भाजपा की पेशानी पर इस बार चुनाव से पहले बल पड़ते दिख रहे हैं। पिछले पाँच महीनों में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, लालप्रसाद यादव, नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, संजय सिंह, स्टालिन, जैसे नेताओं के सामूहिक हमले ने नरेंद्र मोदी की छवि की वास्तविकता से जनता से रूबरू कराने का काम किया है। राहुल गांधी ने अपनी यात्रा और संसद में अविश्वास प्रस्ताव जैसी गतिविधियों और अन्य जमीनी यात्राओं के माध्यम से देश के बड़े हिस्से के मन में यह स्थापित किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह से कारपोरेट घरानों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से काम कर रहे हैं। राजनीति से इतर भी कुछ लोगों ने नरेंद्र मोदी की गोदी मीडिया निर्मित महामानव छवि को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। इनमें दक्षिण भारतीय अभिनेता कमल हासन, प्रकाश राज, हिन्दी फिल्म अभिनेत्री काजोल के साथ-साथ शिक्षक करन सांगवान जैसे लोगों का एक बड़ा रोल है। करन सांगवान को सिर्फ इसलिए निकाल दिया गया कि उन्होंने अपने छात्रों को नैतिक शिक्षा का ज्ञान देते हुये यह कह दिया था कि ‘अगली बार जब वोट देना तो किसी पढ़े-लिखे आदमी को वोट देना।’ वैसे देखा जाय तो यह न तो किसी भी तरह अनुचित था ना ही प्रत्यक्ष रूप से किसी व्यक्ति विशेष पर हमला था। बावजूद इसके सत्ता के गलियारे में लोक लहर की तरह यह बात गूंज उठी की यह टिप्पणी प्रधानमंत्री के खिलाफ है। अनएकेडेमी नामक संस्थान जिसमें करन सांगवान पढ़ाते थे वहाँ से वह निकाल दिये गए। इस तरह की घटनाएँ प्रतिक्रियात्मक रूप से हमेशा नकारात्मक प्रभाव डालती हैं। यह महज कुछ घटनाएँ हैं। विगत साल भर में सोशल मीडिया पर इस तरह का ट्रेंड बढ़ा है। प्रधानमंत्री के रूप में पहले आठ साल तक नरेंद्र मोदी के नाम पर कम ही नकारात्मक खबरें और मीम्स देखने को मिलते थे पर अब धड़ल्ले से उनकी पुरानी बातों को लेकर उन पर हमले हो रहे हैं। यह देश के भीतर एक नए राजनीतिक सरोकार को बढ़ाती दिख रही हैं। सत्ता समर्थक ट्रोल आर्मी अब पहले जैसी ताकत से विपक्ष पर हमला नहीं कर पा रही है। जिसकी एक बड़ी वजह है प्रधानमंत्री का लगातार ट्रेंड बदलना और हर बार असफल या झूठा साबित हो जाना।
[bs-quote quote=”विपक्ष की बढ़ती ताकत और पार्टी के अंदर उभर रही चिंगारी से प्रधानमंत्री और उनके विशिष्ट सहयोगी अमित शाह अनभिज्ञ नहीं हैं। इसलिए अब चुनाव को नए तरीके से उलझाने का मसविदा तैयार करने में लगे हुए हैं। इसके लिए सबसे पहले चक्रव्यूह का जो मॉडल तैयार किया जा रहा है वह है वन नेशन वन इलेक्शन। इसके माध्यम से सरकार विपक्षी एकता को चुनौती देना चाहती है। सरकार चाहती है INDIA के रूप में बने गठबंधन में शामिल पार्टियां राज्य चुनाव के नाम पर एक दूसरे के सामने आ जाएँ या फिर सीट बँटवारे को लेकर उलझ जाएँ।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]
प्रधानमंत्री की फटती छवि पर रफू करते-करते उनके वह समर्थक भी थक गए या उकताए हुये से दिखते हैं। किसान आंदोलन में प्रधानमंत्री का पैर पीछे खींचना उनके समर्थकों के लिए किसी सदमे से कम नहीं थी। अब वह भी खोज रहे हैं कि नाले की गैस से चाय कैसे बनाएँ या फिर दरभंगा जिले में सरकार द्वारा निर्मित एम्स की बिल्डिंग खोजें। इस तरह की घटनाएं बहुलता में घटी हैं। चीन के खिलाफ लाल आँख देखने के लिए देश की जनता पिछले साढ़े नौ साल से इंतजार कर रही है। दूसरी ओर इस लाल आँख की डिमांड को राहुल गांधी साप्ताहिक चैलेंज की तरह सरकार के सामने रख देते हैं और प्रधानमंत्री के भक्तों को बता देते हैं कि चीन भारत की सीमा के अंदर कितना घुस आया है या फिर किस तरह से चीन ने अपने देश का नया नक्शा बनाकर उसमें अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चिन के हिस्से को अपना हिस्सा बता दिया है। चीन का मामला तो ऐसा होता जा रहा है कि राहुल गांधी उस पर ना बोलें तो देश को चीन सीमा की वास्तविक ख़बर ही नहीं मिले।
समर्थकों की एक बड़ी फौज आज भी नरेंद्र मोदी के साथ है जरूर पर वह अब इतनी ताकतवर नहीं है जितनी पहले थी। वह विपक्षी सवालों के सटीक जवाब नहीं दे पा रही है। दूसरी ओर इस बीच कांग्रेस ने अपने आईटी सेल को इतना मजबूत बना दिया है राहुल गांधी पर भाजपा आईटी सेल के हमले कमजोर पड़ जा रहे हैं। हालिया घटनाओं में एक वक्तव्य देते हुये राहुल गांधी ने बहुत सी चीजों मापक को लीटर में बताते हुये यह कह दिया कि आटा 35 रूपया लीटर। आईटी सेल कि शिकारी निगाहें तो जैसे इसी मौके का इंतजार कर रही थी। आनन-फानन में वीडियो रेडी किया और राहुल कि भद्द पीटने के लिए सोशल मीडिया के हवाले कर दिया। पहले इतना काफी हो जाता था पर अब कांग्रेस ने ईंट का जवाब पत्थर की तरह देना शुरू कर दिया। कांग्रेस ने छुपाने के बजाय उस घटना का पूरा वीडियो जारी कर दिया, जिसमें साफ दिख रहा था कि यह राहुल का अज्ञान नहीं बल्कि गलती से निकला हुआ शब्द था, जिसे उन्होंने अगले ही क्षण सुधार लिया था। कांग्रेस की आईटी सेल ने इतना ही नहीं किया बल्कि जैसे वह ऐसे ही किसी मौके के लिए पूरी तरह से तैयार बैठी थी, उसने बिना देर किए दो घंटे में प्रधानमंत्री के इस तरह के दसों वीडियो सोशल मीडिया पर उंडेल दिया। पहले इस तरह के वीडियो देखकर राहुल गांधी पर हंसने वाले इस बार नरेंद्र मोदी पर हंस रहे थे।

नरेंद्र मोदी को हास्य के पर्याय तक ले जाना विपक्ष की बहुत बड़ी उपलब्धि है। इतिहास में आज भी चार्ली चैपलिन की वह हंसी प्रतिरोध की सबसे बड़ी ताकत के रूप में दर्ज है, जिसे उन्होने अपनी फिल्म द ग्रेट डिक्टेटर में हिटलर के खिलाफ इस्तेमाल की थी। इस फिल्म की अपनी आखरी स्पीच में वह अपनी पत्नी को संबोधित करते हुये कहता है तानाशाह सबकुछ बर्दाश्त कर सकता है पर यह वह कभी बर्दाश्त नहीं कर पाता कि लोग उस पर हंस रहे हैं।
फिलहाल उपरोक्त तमाम बातें यह साबित करती हैं कि चुनाव-24 में भाजपा के लिए उतना आसान नहीं रहने वाला है जितना आसान 2014 और 2019 का चुनाव था। यह बात विपक्ष जितनी ताकत से साबित करने में लगा हुआ है उससे ज्यादा शिद्दत से इस बात को भाजपा और एनडीए भी समझ रहा है। इस बार चुनाव महज प्रधानमंत्री के चेहरे पर लड़ने का जोखिम पार्टी कत्तई नहीं लेना चाहती है। भाजपा के अंदर भी अब एक ऐसा वर्ग तैयार हो चुका है जो पार्टी को गुजरात के हाथों से निकालने के लिए छटपटा रहा है पर अभी वाजिब मौका ना देखकर चुप है।
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बहरहाल विपक्ष की बढ़ती ताकत और पार्टी के अंदर उभर रही चिंगारी से प्रधानमंत्री और उनके विशिष्ट सहयोगी अमित शाह अनभिज्ञ नहीं हैं। इसलिए अब चुनाव को नए तरीके से उलझाने का मसौदा तैयार करने में लगे हुए हैं। इसके लिए सबसे पहले चक्रव्यूह का जो मॉडल तैयार किया जा रहा है वह है वन नेशन वन इलेक्शन। इसके माध्यम से सरकार विपक्षी एकता को चुनौती देना चाहती है। सरकार चाहती है I.N.D.I.A. के रूप में बने गठबंधन में शामिल पार्टियां राज्य चुनाव के नाम पर एक दूसरे के सामने आ जाएँ या फिर सीट बँटवारे को लेकर उलझ जाएँ। इस सोच पर काम करते हुये, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति बना दी है। इस समिति के अन्य सदस्य के रूप में गृहमंत्री अमित शाह, अधीर रंजन चौधरी, गुलाम नबी आजाद समेत आठ लोग हैं।

वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर विपक्ष जहां इसे संविधान विरोधी बता रहा है और कमेटी की आने वाली सिफ़ारिशों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहा है, वहीं सरकार इसे भविष्य के भारत का चुनावी मॉडल बता रही है और कह रही है कि बार-बार चुनाव होने से जहां देश को भारी व्यय बजट का सामना करना पड़ रहा है, वहीं राज्य की पूरी मशीनरी को बार-बार चुनाव में झोंकने से राज्य की तमाम व्यवस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं।
फिलहाल चुनावी शतरंज सज रहा है और हर पार्टी जल्द से जल्द अपना पाला भी चुन लेना चाहती है और एक दूसरे के रचे चक्रव्यूह को तोड़ देने के में अपना अप्रत्याशित योगदान देना चाहती है। सरकार के पक्ष में चुनावी नैरेटिव सेट करने के लिए गोदी मीडिया ने आने वाले चुनाव का परिणाम घोषित करना भी शुरू कर दिया है। चुनाव को लेकर अभी से आने वाले सर्वे उसी तरह से हैं, जिसके लिए कहा जाता है कि घर बना नहीं और लुटेरे सेंध लगाने आ गए। जो भी हो आने वाला लोकसभा चुनाव ना तो एनडीए के लिए आसान ना होगा ना ही इंडिया के लिए पर इतना तो तय है कि इस चुनावी परिणाम पर भारत का भविष्य तय होने जा रहा है।
कुमार विजय गाँव के लोग डॉट कॉम के एसोसिएट एडिटर हैं।




