पानी उतरने के बाद कूड़ा-कचरा, गंदगी, बदबू और मच्छरों ने किया जीना मुहाल

सुशील मानव

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इलाहाबाद शहर के मोहल्लों और कछार के गंगा, यमुना, टोस नदी के तट पर गाँवों में भरा बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर गया है। लेकिन अपने पीछे छोड़ गया है भयावह गंदगी और कूड़ा कचरा, जिससे तमाम संक्रामक बीमारियां फैलने का ख़तरा पैदा हो गया है। शहर और आस-पास के ग्रामीण इलाकों में पहले से ही मच्छर जनित बीमारियों का प्रकोप है।

रसूलाबाद की छाया बताती है कि बाढ़ का पानी गलियों में भरने के बाद मल सीवर से निकलकर गलियों की सड़कों पर बिखर गये। पानी तो वापस चला गया लेकिन ये गलियों में फैले पड़े मनुष्य मल हैजा जैसी बीमारियों को न्योता दे रहे हैं। घर से बाहर क़दम रखने की सोचते ही अकुलाई आने लगती है। गोविंदपुरी शिवकुटी निवासी आनंद बताते हैं कि बाढ़ के बाद सबसे बड़ी समस्या ने तो अब जन्म लिया है। गोविंदपुर सलोरी की सड़कों पर कूड़े-कचरे का अंबार लगा हुआ है। गंदगी, और बदबू ने साँस लेना मुहाल कर दिया है। मच्छरों ने अलग तरह की दुश्वारियाँ खड़ी कर दी हैं।

वहीं बाढ़ग्रस्त ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे बड़ा संकट पीने के पानी को लेकर पैदा हो गया है। घूरपुर भीटा के करन बताते हैं कि बाढ़ के चलते जलस्तर बहुत ऊपर आ गया है। जिससे पीने के पानी से बास आ रही है। लेकिन उसे पीने के अतिरिक्त कोई और विकल्प भी तो नहीं है लोगों के पास। गंदे, प्रदूषित पानी पीने से ग्रामीणों में आंत्रशोध और तमाम जलजनित बीमारियों के पनपने का ख़तरा बढ़ गया है।

इलाहाबाद और वाराणसी के मध्य स्थित मीरजापुर जिले का गोसाईपुर गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। चार हजार आबादी वाले गोसाईपुर गांव में नाव चलानी पड़ी। गांव में क़रीब ढाई सौ बीघे फसल पानी में डूबने के चलते किसानों को भारी नुकसान हुआ है। कछार क्षेत्र में पैदा होने वाली सब्जियों की फसल चौपट हो गई है।

सूखते खेत, डूबते शहर

इलाहाबाद शहर से 10-15 किलोमीटर दूर स्थित खेतों में धान की फसलें बारिश बिना मुर्चहवा रोग की गिरफ़्त में है। गाँवों में तालाब सूखे पड़े हैं दूसरी ओर, गंगातटीय शहरी मोहल्लों व गंगातटीय गांवों में बाढ़ आई हुई है। शायद इसी को विकास की त्रासदी कहते हैं। गंगा-यमुना कछार में आये बाढ़ की जद में 5 लाख से अधिक परिवार आ चुका है। जिले की बात करें तो शहर के 40 मोहल्ले और जिले के 132 गांव बाढ़ की जद में हैं। लोग-बाग अपने मवेशियों संग पलायन को विवश हुए। इलाहाबाद शहर के सलोरी, बघाड़ा, जोंधवल, मेंहदौरी, अशोकनगर, गोविंदपुर, गंगानगर, म्योराबाद, गौसनगर, तेलियरगंज, बेली, राजापुर, करेली, करेलाबाद आदि क्षेत्रों में गंदैला पानी भरा हुआ है।

अब इस गंदगी से उठती दुर्गंध से रहवासी परेशान हो रहे हैं

चार दिन पहले सलोरी व शुक्ला मार्केट के रिहायशी गली में एक 10-12 फीट लंबा मगरमच्छ घुस आया था। दर्जनों मोहल्लों में पानी भरे होने के चलते लोगों व छात्रों को पलायन के लिये विवश होना पड़ा है। राहत शिविरों में 7 हजार से अधिक लोगों ने शरण लिया। वहीं अशोकनगर स्थित पत्रकार कॉलोनी व राजापुर के गंगानगर कॉलोनी में नाव से लोगों तक राहत सामग्री पहुंचाया गया।

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स्कूल-कॉलेज, पंचायत भवन बने शरणार्थी कैम्प

शहर के 17 शरणार्थी शिविरों में 1300 से अधिक परिवारों के क़रीब सात हजार लोगों ने शरण लिया। इनमें महिलायें व बच्चे भी शामिल थे। इलाहाबाद शहर में सेंट जोसेफ गर्ल्स कॉलेज ममफोर्डगंज, एनी बेसेंट स्कूल एलनगंज, ऋषिकुल उच्चतर माध्यमिक विद्यालय राजापुर, कैंट मैरिज हॉल सदर बाजार, स्वामी विवेकानंद विद्यालय अशोक नगर, वाईएमसीए इंटर कॉलेज, महबूब अली इंटर कॉलेज बेली, यूनिटी पब्लिक स्कूल करेली, माथुर वैश्य धर्मशाला ममफोर्डगंज, कैंट हाईस्कूल सदर बाजार, रीगल गेस्ट हाउस राजापुर, डीएवी इंटर कॉलेज मीरापुर, सहारा पब्लिक स्कूल करामत की चौकी को बाढ़ पीड़ितों के लिये राहत कैम्प के रूप में मुहैया करवाया गया। वाईएमसीए स्कूल में बने राहत शिविर में नेवादा, गंगानगर इलाके के 128 परिवारों के 600 लोगों ने शरण लिया है। दो दिन पहले यहाँ नशे में धुत कुछ लोगों ने हंगामा किया था। इसके अलावा जिले के सोरांव तहसील के तीन राहत शिविरों में क़रीब 700 लोग, बारा तहसील के अनंतराम डिग्री कॉलेज में बने राहत शिविर में 360 बाढ़ पीड़ितों ने शरण लिया। प्रशासन के तमाम दावों और प्रयासों के बावजूद राहत शिविरों में लोगों को भरपेट भोजन नहीं मिल पा रहा है। लोगों का कहना है कि जो भी फूड पैकेट्स सरकार और प्रशासन की ओर से बांटा जा रहा है, उसमें खाना कम विज्ञापन ज़्यादा है।

अंधेरे में ज़िंदग़ी

मंसूराबाद क्षेत्र के 8 गांव पीरदल्लू, झिंगहा, शहजादपुर, मोतीलाल का पूरा, बुद्धू का पूरा, महाराजपुर, नरहा, दादनपुर, अलीमपुर, दानिशपुर का संपर्क मार्ग बाढ़ के पानी में डूब गये। प्रयागराज-लखनऊ मार्ग को जोड़ने वाले सुल्तानपुर- ररुआ मार्ग पर भी पानी चढ़ गया। वहीं सिंघापुर, शहजादपुर, मटरू का पूरा, टिटिहिरियापुर, मकदूमपुर, गुलकइयापुर, पूरेघासी, भीखपुर, हुसैनपुर, आदि गांवों की हजारों एकड़ की ज़मीन डूब गई है। बिजली विभाग ने इन गांवों की बिजली की आपूर्ति काट दी। योगी सरकार पहले ही इनके हिस्से की मिट्टी का तेल पी गई है तो अब इनकी ज़िदग़ी अंधेरे में बीती। मोबाइल जैसे जीवन की अभिन्न चीजें कई दिनों तक बंद पड़ी रही।

आमजन को अब दूसरी मुसीबतों का करना पड़ रहा है सामना

एक सप्ताह पूर्व शहर के सलोरी, बघाड़ा व कछार क्षेत्र के बाढ़ में डूबे तमाम गांवों के ट्रांसफॉर्मर से बिजली आपूर्ति काट दी गई थी। राजापुर के गंगानगर निवासी शिक़ायत करते हैं कि दो दिन पहले बाढ़ प्रभावित इलाके में ऊपर- ऊपर केबल बिछा दिया गया था। इससे पानी में करंट उतरने का ख़तरा है। लोग बताते हैं कि मोहल्ले से कुछ दूर स्थित एक पोल से केबल से जोड़कर मोहल्ले में कनेक्शन भी बांट दिया गया है। जिसमें एक बल्ब और एक ही सॉकेट का कनेक्शन है। ताकि लोग मोबाइल बैटरी व इमरजेंसी लाइट चार्ज कर सकें। टोंस नदी में जलस्तर बढ़ने से मेजा रोड स्थित 33 केवीए पॉवर हाउस से बिजली आपूर्ति पिछले चार दिनों से बंद है। इस पॉवर हाउस से मेजा व नेवढ़िया बिजलीघर को बिजली आपूर्ति होती है। आपूर्ति बंद होने से मेजा व नेवढ़िया के सैंकड़ों गांव अंधेरे में डूब गये हैं। फाफामऊ के बाढ़ प्रभावित मोहल्लों में बिजली आपूर्ति बंद की गई है।

गंगा नगर मोहल्ले की बिजली आपूर्ति बंद कर दिया गया है। बाढ़ से घिरकर अपने घरों में कैद लोगों का कहना है कि रात के अंधेरे में बिजली न होने से जलीय जीव-जंतुओं का ख़तरा बना हुआ था।

इन रास्तों की सफाई का इंतजार

आवागमन के लिए नाव ही सहारा

सड़कें पानी में डूबने से बाढ़ में फंसे लोगों को ज़रूरी सामानों के लेने ख़रीदने के लिये नाव ही एकमात्र आवागमन का सहारा था। इसके अतिरिक्त लोग निजी नावों का सहारा भी ले रहे हैं। मंसूराबाद क्षेत्र में बाढ़ में डूबे मोतीलाल का पूरा, बुद्धू का पूरा, महाराजपुर, नरहा, दादनपुर में नाव चल रही है। इसी तरह टोंस नदीं में आये बाढ़ के चलते टोंस नदी के किनारे स्थित धरवारा, बघेड़ा, अरई, तुरकहा, भस्मा आदि गाँवों में भी बाढ़ आई हुई है। धरवाड़ा व बघेड़ा गांव के संपर्क मार्ग जलमग्न होने से यहां नाव चल रही हैं। लोगों को बहुत तकलीफ़ों का सामना करना पड़ रहा है। गंगानगर गांव में लोगों के लिये नाव यातायात ही एक सहारा है।

जिला प्रशासन की ओर से 277 नावों के उपलब्ध कराने का दावा किया गया। प्रयागराज शहर के छोटा बघाड़ा में 16 नावें, सलोरी में 13, राजापुर में 17, बेली में तीन, मेंहदौरी में आठ, करैलाबाग, कीडगंज व बक्शीखुर्द दारागंज में तीन-तीन नावें उपलब्‍ध कराई गई है। फूलपुर के पालीकरनपुर, छिबैया, भदकार में तीन-तीन, नीबी कला में चार, बदरा सोनौटी में आठ व ढोकरी उपरहार में सात नावें चलाई जा रही हैं। मेजा के बरसैता व अमिलिया में दो- दो, झडिय़ाही व इसौटा में एक-एक नाव चलाई जा रही है। करछना में मनैया, महेवा पूरब व महेवा पश्चिम, मेडऱा, कटका में दो-दो, देहली भगेसर व महेवा तालुका मुंडा में तीन-तीन, बबुरा पनासा, हथसरा, रवनिका में एक-एक नाव चल रही हैं। बारा के मझियारी आमद चायल में तीन, हंडिया के बढ़ौली में दो, सोरांव के फाफामऊ लक्ष्मीनगर व गंगापुर में दो-दो नाव चलाई गई जो कि नाकाफी साबित हुई।

कछार क्षेत्र के गांवों में बाढ़ के पानी से आफ़त

गंगा, यमुना व टोंस नदी में आई बाढ़ की चपेट में कई गांव आ गये हैं। यमुना में बाढ़ का सबसे ज़्यादा ख़ामियाजा चायल तहसील के मल्हीपुर गांव को झेलना पड़ा है। जहां मनुष्यों के साथ साथ मवेशियों के लिये भी चारे का संकट पैदा हो गया है। उरुवा के जनवार गांव को बाढ़ से बचाने के लिए 85.77 लाख की लागत से बना पुल भी डूब गया है। जिससे ग्रामीणों का गांव से बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया है। इस पुल के निर्माण के समय ही लोगों ने इसकी कम ऊंचाई को लेकर विरोध किया था।

मदद और विज्ञापन साथ-साथ

मांडा तहसील के चौकठा नरवर में भी पानी भरने से कई परिवार विस्थापन को विवश हुए हैं। मेजा तहसील में टोंस नदी का जलस्तर बढ़ने से कोना गांव के 18 परिवार बेघर हो गये। लोगों ने एक बाग़ में डेरा डाला। प्रशासन की ओर से बेघर लोगों को तिरपाल बांटा गया है। लोग घर के सामानों की चोरी आदि के डर से घर से दूर जाने को तैयार नहीं थे। वहीं घूरपुर क्षेत्र के बसवार, बीकर, इरादतगंज, देवरिया, कंजासा, बिरवल, जगदीशपुर आदि गांवों में बाढ़ का पानी घुस गया है। कंजासा गांव के 180 परिवारों के लोग घर-बार छोड़कर कंजासा पंचायत भवन व माध्यमिक विद्यालय में बने राहत शिविर में शरण लिये।

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सैकड़ों मील दूर से पत्ते तोड़कर लाते हैं ये मुसहर परिवार

नवाबगंज, हथिगहां, व कौड़िहार क्षेत्र के चफरी, फतेहपुर, टेकारी, मलिकापुर, लखरैंया, डांडी, रसूलपुर, चांदी, ककरा आदि गांवों में भी पानी घुस गया। झूंसी व कोहना गांव में कई आश्रम व मठों में बाढ़ का पानी घुस गया। बदरा-सोनौटी गांव बाढ़ के चारों ओर से घिर गया है। गंगापार में हनुमानगंज के कछारी इलाकों में बाढ़ का पानी घुस गया। लीलापुर के यादव बस्ती में कई मकानों तक पानी पहुंच चुका है। फाफामऊ के तटीय इलाकों में बाढ़ से घिरे मोहल्लों में लोग घरों में फंसे हैं। लक्ष्मीपुरम, गंगा नगर मोहल्ले के अलावा तटीय इलाकों में बसे लोग अपना घर बार छोड़कर पलायन कर गए।

इलाहाबाद और वाराणसी के मध्य स्थित मीरजापुर जिले का गोसाईपुर गांव सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। चार हजार आबादी वाले गोसाईपुर गांव में नाव चलानी पड़ी। गांव में क़रीब ढाई सौ बीघे फसल पानी में डूबने के चलते किसानों को भारी नुकसान हुआ है। कछार क्षेत्र में पैदा होने वाली सब्जियों की फसल चौपट हो गई है। गाँवों से दूध लाकर शहरों में बेंचने वाले लोगों का कारोबार भी ठप हो गया है। जिसके चलते बाढ़ में फंसे लोगों के सामने दूध, सब्जी आदि रोज़मर्रा की चीजों का संकट पैदा हो गया है। जबकि बाढ़ग्रस्त ग्रामीण लोगों का संकट दूसरा है। उनका कहना है कि आदमी तो कैसे भी करके अपना पेट भर लेगा, लेकिन इस बाढ़ में मवेशियों के लिये चारा कहां से लायें।

सुशील मानव स्वतंत्र पत्रकार हैं।

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