जो धर्म परिवर्तन करते हैं उनसे पूछो इसकी वजह

एलएस हरदेनिया

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भोपाल के एक स्कूल में कुछ लोग कथित तौर पर ईसाई धर्म स्वीकारते हुए पाए गए। पुलिस ने धर्म परिवर्तन करवाने के आरोप में कुछ लोगों को गिरफ्तार किया। यह आरोप भी लगाया गया कि इस तरह का धर्म परिवर्तन अनेक स्कूलों में कराया जा रहा है। इसके चलते गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने घोषणा की कि अब इंटेलिजेंस ऐसे स्कूलों पर नजर रखेगी।

जिस दिन यह खबर सामने आई उसके आसपास दो और महत्वपूर्ण खबरें पढ़ने को मिलीं। एक खबर का संबंध मध्यप्रदेश के राजगढ़ जिले से है। खबर का शीर्षक है- ‘बारात आने से पहले पथराव, पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े, 22 पर केस अनुसूचित जाति परिवार ने मांगी थी सुरक्षा, इससे गांव वाले थे नाराज‘। गांव वालों को नाराजी थी कि अनुसूचित जाति के परिवार ने बारात के लिए सुरक्षा मांगी। अनुसूचित जाति के परिवार ने सुरक्षा इसलिए मांगी होगी क्योंकि आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं कि अनुसूचित जाति की बारात जा रही थी। दूल्हा घोड़े पर बैठा था। उच्च जाति के लोगों को इस बात पर आपत्ति होती है कि अनुसूचित जाति के दूल्हे की घोड़े पर बैठने की हिम्मत कैसे हुई। उसे घोड़े से खींचकर उतार दिया गया। ऐसी घटना उनके साथ न हो यह सोचकर इस परिवार ने पुलिस सुरक्षा मांगी होगी। यह खबर दैनिक भास्कर के भोपाल संस्करण के दिनांक 17 मई, 2022 के अंक में पृष्ठ 8 पर छपी है। दलित दूल्हे को घोड़े से उतार देने की खबरें आए दिन पढ़ने को मिलती हैं।

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इसी तरह अंग्रेजी समाचार पत्र द इंडियन एक्सप्रेस के दिल्ली संस्करण के दिनांक 15 मई, 2022 के अंक में एक बड़ा लेख छपा है। लेखक हैं मुक्केकोटा। वे स्वयं एक बड़े संस्थान में प्रोग्राम डायरेक्टर हैं। प्रारंभ में उन्हें राजस्थान के भीलवाड़ा में एक नौकरी मिली। स्पष्ट है कि उन्हें रहने के लिए किराए पर मकान चाहिए था। परंतु लंबे प्रयास के बाद भी उन्हें मकान नहीं मिला। प्रारंभिक चर्चा के बाद जैसे ही मकान मालिक को यह पता लगता था कि वे दलित हैं, कोई न कोई बहाना बनाकर उन्हें मकान किराए पर देने से इंकार कर दिया जाता था।

आज भी दलितों के साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव होता है। मुझे स्वयं ऐसा अनुभव है। मैंने अपने कुछ सहयोगियों के साथ अनेक गांवों में दलितों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करने का प्रयास किया है। ऐसा ही एक गांव था मारेगांव। यह गांव मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले की गाडरवारा तहसील में है। इस गांव में जाने के लिए साले चौका रेलवे स्टेशन पर उतरना होता है।

डॉ. अम्बेडकर ने 15 अक्टूबर, 1956 को हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके साथ 5 लाख दलितों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। नागपुर में दीक्षा स्थल पर उन्होंने एक लंबा भाषण दिया। भाषण मराठी में दिया गया था। भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मेरे पास है। भाषण में उन्होंने विस्तार से बताया था कि वे हिन्दू धर्म क्यों छोड़ रहे हैं। अपने भाषण में उन्होंने उन कारणों का उल्लेख किया था।

इस गांव के दलितों ने फैसला किया कि वे मृत पशुओं के शवों को नहीं उठाएंगे। दलितों के इस निर्णय के बाद गांव के उच्च जाति के लोगों ने उनका बहिष्कार प्रारंभ कर दिया। बहिष्कार के कारण दलितों का जीवन अत्यंत कष्टदायी हो गया। हम लोग कई बार गांव गए और हमने प्रशासन की सहायता भी ली। परंतु बहिष्कार समाप्त नहीं हुआ। बहिष्कार के चलते उन्हें काम नहीं दिया जाता, दुकानों से उन्हें सामान खरीदने नहीं दिया जाता, यहां तक कि उनके बच्चों को दूध तक नहीं दिया जाता था। हमने मध्यप्रदेश के दोनों प्रमुख राजनैतिक दलों – कांग्रेस व भारतीय जनता पार्टी से सहयोग करने का अनुरोध किया परंतु उसके बाद भी हमें सफलता नहीं मिली।

दलितों को सदियों से हिन्दू समाज में अपमानजनक ढंग से रहना पड़ रहा है। दलितों की इस दुरावस्था का विवरण स्वयं डॉ. अम्बेडकर ने अनेक स्थानों पर किया है। उन्हें बचपन में ही अनेक बार अपमान सहना पड़ा। स्कूल के दिनों को याद करते हुए वे बताते हैं कि वे एक ही कपड़े में (अर्थात उनके शरीर के कमर के ऊपर के भाग पर कोई वस्त्र नहीं रहता था।) स्कूल में प्यास लगने पर उन्हें बहुत मुश्किल से पानी मिल पाता था। हिन्दू समाज में दलितों की दुर्दशा को देखते हुए उन्होंने वर्षों पहले हिन्दू धर्म छोड़ने का निर्णय ले लिया था। डॉ. अम्बेडकर ने 15 अक्टूबर, 1956 को हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उनके साथ 5 लाख दलितों ने भी बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। नागपुर में दीक्षा स्थल पर उन्होंने एक लंबा भाषण दिया। भाषण मराठी में दिया गया था। भाषण का अंग्रेजी अनुवाद मेरे पास है। भाषण में उन्होंने विस्तार से बताया था कि वे हिन्दू धर्म क्यों छोड़ रहे हैं। अपने भाषण में उन्होंने उन कारणों का उल्लेख किया था।

यहां पर दो-तीन महत्वपूर्ण बातों का उल्लेख किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ‘बरसों पहले मैंने शपथ ली थी कि यद्यपि मैं एक हिन्दू के रूप में पैदा हुआ हूं परंतु मैं हिन्दू के रूप में नहीं मरूंगा। आज मैं वर्षों पहले की इस शपथ को पूरा कर रहा हूं। मैं आज अत्यधिक प्रसन्न हूं। मैं गदगद हूं।’ उन्होंने आगे कहा ‘मैंने कल हिन्दू धर्म त्यागा था। आज मुझे ऐसा लग रहा है जैसे मैं नर्क में था और आज मैं वहां से निकलकर आज़ाद हो गया हूं। मैंने सदा महसूस किया कि हिन्दू में रहकर कोई विकास नहीं कर सकता। वह धर्म ध्वंस का धर्म है। यह ऐसा धर्म है जिसमें विकास करने का मन ही नहीं होता है।’

स्वामी विवेकानंद भी दलितों की दयनीय स्थिति देखकर बहुत दुःखी थे। उन्होंने एक अवसर पर कहा था कि ‘उठो, आगे बढ़ो और इन्हें (दलितों को) गले लगा लो। नहीं तो वे आपकी लाशों पर नाचेंगे।’

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इस तरह यह साफ है कि यदि हम धर्म परिवर्तन की शिकायत करते हैं और यह कहते हैं कि इससे हमारा हिन्दू समाज नष्ट जाएगा। ऐसे लोगों को चाहिए कि जो धर्म परिवर्तन कर रहे हैं उनसे पूछें कि वे हिन्दू धर्म क्यों त्याग रहे हैं, उन्हें हिन्दू समाज में क्या तकलीफें हैं। क्या वे भी डॉ. अंबेडकर की तरह हिन्दू बने रहने पर ऐसा लगता है कि वे नर्क में हैं?

वरिष्ठ पत्रकार एलएस हरदेनिया भोपाल में रहते हैं।

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