क्षमा कीजिये। हिन्दुत्व को प्रचलन में रखकर आप कोई भी स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकते

पेरियार-गाँधी संवाद

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सन 1927 में गांधी और पेरियार ई वी रामसामी नायकर के बीच एक बातचीत इस संदर्भ में बहुत दिलचस्प है। पेरियार ने हिन्दुत्व को पूरी तरह खारिज किया है। मैं हिन्दुत्व विरोधी क्यों हूँ शीर्षक यह बातचीत यहाँ दी जा रही  है–

पेरियार – हिन्दुत्व को बिलकुल ही समाप्त कर देना चाहिए।

गांधी – आप ऐसा क्यों सोचते हैं?

पेरियार – ऐसा कोई धर्म नहीं , जिसे ‘हिन्दुत्व’ कहा जाय।

गांधी – लेकिन यह तो है।

पेरियार – यह ब्राह्मणों का षड्यंत्र है। उन्होंने लोगों को यह विश्वास दिला दिया है कि हिन्दुत्व भी एक धर्म है।

गांधी – क्या हम यह नहीं कह सकते कि सारे धर्म ही विश्वास और कल्पना पर आधारित हैं?

पेरियार – नहीं, हम ऐसा नहीं कह सकते , क्योंकि अन्य सभी धर्मों के ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं। उन सभी धर्मों में ऐसे सर्वस्वीकृत सिद्धान्त हैं, जिनको उनके सभी अनुयायी समान रूप से स्वीकार करते हैं।

गांधी – क्या हिन्दू धर्म में ऐसे सिद्धान्त नहीं हैं?

पेरियार – कहाँ हैं ? इसने पूरे समाज को ब्राह्मण, शूद्र और वैश्य जैसी अलग-अलग इकाइयों में विभक्त कर दिया है। यह घोषणा करता है कि ब्राह्मण सर्वोच्च हैं एवं अन्य नीच। यह विभेद ही इस तथाकथित धर्म की एकमात्र उपलब्धि है। इस धर्म के वकीलों द्वारा किसी भी घोषित दावे की सच्चाई के लिए कोई पुख्ता सबूत उपलब्ध नहीं है।

गांधी – ठीक है! हिन्दू धर्म में कम से कम सिद्धान्त तो हैं!

पेरियार – हमारे लिए यह कितना उपयोगी है? इस सिद्धान्त के अनुसार सिर्फ ब्राह्मण ही उच्च जाति के हैं। आप , मैं और बाकी सभी निम्न जाति के लोग हैं।

गांधी – आपकी बात सही नहीं है। वर्णाश्रम धर्म में ऊंची-नीची किसी भी जाति का कोई उल्लेख नहीं है।

पेरियार – आप इससे संतुष्ट तो हो सकते हैं, किन्तु व्यावहारिकता इसके बिलकुल उलट है।

गांधी – इसे व्यवहार में लाया जा सकता है।

पेरियार – जब तक हिन्दुत्व का अस्तित्व है, तब तक यह असंभव है।

गांधी  – हिन्दू धर्म की मदद से यह संभव है।

पेरियार – इस सूरत में धर्म द्वारा समर्थित ब्राह्मण और शूद्र के जाति-विभाजन का क्या होगा?

गांधी –  अभी आपने कहा कहा कि हिन्दू धर्म में जाति-विभाजन सहित किसी भी सिद्धान्त के समर्थन के लिए कोई प्रमाण नहीं है।

पेरियार – मैं कहता हूँ कि हिन्दुत्व कोई धर्म ही नहीं है। इसीलिए इस धर्म के नाम पर समाज को उंच-नीच जातियों में विभक्त करनेवाले दावे एवं सिद्धान्त भी मान्य नहीं हैं। लेकिन यदि हम हिन्दुत्व को एक धर्म के रूप में स्वीकार कर लेते हैं तो फिर धर्म के नाम पर किए जाने वाले दावों पर भी विचार करना पड़ सकता है।

गांधी – हम लोग धर्म को स्वीकार कर सकते हैं और इसकी बुनियादी नीतियों के समर्थन में कुछ सिद्धान्त बना सकते हैं।

पेरियार – यह असंभव है। यदि हम किसी धर्म को स्वीकार कर लेते हैं तो उससे सम्बद्ध किसी भी चीज को बादल नहीं सकते।

गांधी – आपका यह कथन बाकी सभी धर्मों पर लागू होता है, किन्तु हिन्दू धर्म पर नहीं। इसे स्वीकार करने के बाद आप उसके नाम पर कुछ भी कर सकते हैं, आपको कोई रोकेगा नहीं।

पेरियार – आप यह कैसे कह सकते हैं? मुझे धर्म के नाम पर ‘कुछ भी’ करने की अनुमति कौन देगा? क्या मैं यह जान सकता हूँ कि इस धर्म का कौन सा सिद्धान्त मुझे यह करने की अनुमति देगा?

गांधी – आप ठीक कहते, हिन्दुत्व कोई धर्म नहीं है। मैं यह मानता हूँ मैं आपके इस कथन से भी सहमत हूँ कि हिन्दू धर्म में स्थिर सिद्धान्त नहीं हैं। इसी कारण मैं कहता हूँ कि सबसे पहले हम यह मान लें कि हम हिन्दू हैं । फिर हम हिन्दू धर्म के लिए सिद्धांतों का निर्माण कर सकते हैं। यदि हम चाहते हैं कि इस देश में ही नहीं, बल्कि सारी दुनिया में लोग अनुशासित और सम्मानित जीवन जीएन तो यह हिन्दुत्व की सहायता से ही संभव है। अन्य धर्म इसमें हमारी कोई सहायता नहीं कर सकते , क्योंकि वे ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक और विश्वसनीय हैं। उनके सिद्धांतों के लिए तर्क और सटीक प्रमाण भी उपलब्ध हैं। यदि हम वहाँ कोई चालाकी करते हैं तो फिर धर्म के अनुयायी हमें दंडित भी कर सकते हैं। ईसामसीह के शब्दों या फिर बाइबिल में उनके विचार के रूप में जो भी संकलित है, उसे मानने के लिए ईसाई बाध्य हैं। मुसलमानों को भी कुरान में विद्यमान मुहम्मद नबी के विचारों को मानना अनिवार्य है। यदि उसमें परिवर्तन के लिए कोई सुझाव रखा जाता है तो वह अधार्मिक कर्म माना जाएगा। यदि कोई ऐसा विचार रखता है तो सबसे पहले उसे उस धर्म से बाहर आना पड़ेगा। उसके बाद ही अपने विचारों को अभिव्यक्त कर पाने के लिए वह स्वतंत्र होगा , अन्यथा उसे भयंकर दंड मिलेगा। सभी प्रामाणिक धर्मों की यही प्रकृति है। किन्तु चूंकि हिन्दुत्व कोई वैसा धर्म नहीं है, इसीलिए इस धर्म के नाम पर कोई भी व्यक्ति महान के रूप में स्वीकृति पा सकता है। वह अपने विचारों को धार्मिक सिद्धान्त के रूप में व्यक्त कर सकता है। इस तरीके से कई महान व्यक्ति धर्म के नाम पर अपने बहुत से विचार व्यक्त कर चुके हैं। इसलिए हम भी इस धर्म में कुछ ऐसे सुधार ला सकते हैं, जो आज के समाज और समय के अनुसार जरूरी हो।

पेरियार – क्षमा कीजिये! यह असंभव है।

गांधी – क्यों?

पेरियार – हिन्दुत्व के स्वार्थी गिरोह हमें इसकी अनुमति कभी नहीं देंगे।

गांधी – यह आप कैसे कह सकते हैं? क्या इस धर्म के सभी लोगों ने यह स्वीकार नहीं कर लिया है कि हिन्दुत्व में छूआछूत नाम की कोई चीज नहीं है।

पेरियार – सैद्धान्तिक रूप से किसी भी विचार की स्वीकृति एक चीज है और उसे व्यवहार में लाना दूसरी चीज। इसलिए कोई सुधार हिन्दू धर्म में लागू करना बिलकुल असंभव है।

गांधी – मैं इसे संभव बना रहा हूँ। क्या आपने अनुभव नहीं किया कि विगत चार-पाँच वर्षों में समाज में कितना परिवर्तन आ गया है।

पेरियार – समाज में होने वाले इन परिवर्तनों का मुझे ज्ञान है, किन्तु ये वास्तविक परिवर्तन नहीं हैं । लोग आपके द्वारा सुझाए गए सुधारों को मानने का ढोंग कर रहे हैं, क्योंकि आप प्रभावशाली हैं और आपकी ख्याति की उन्हें सख्त जरूरत है और आपने उनकी बातों पर विश्वास कर लिया।

गांधी – (मुस्कराते हुये) आप किनकी बात कर रहे हैं?

पेरियार – ब्राह्मणों की।

गांधी – आपका मतलब है सभी ब्राह्मण?

पेरियार – हाँ , बिलकुल। सभी ब्राह्मण, वे भी जो आपके साथ हैं।

गांधी – इस स्थिति में, क्या आप किसी भी ब्राह्मण पर विश्वास नहीं करते?

पेरियार – किसी पर भी विश्वास करना मेरे लिए संभव नहीं है।

गांधी – क्या आप श्री राजगोपालाचारी पर भी विश्वास नहीं करते?

पेरियार – वे एक अच्छे और विश्वसनीय इंसान हैं। वे निःस्वार्थ और आत्मसमर्पित व्यक्ति हैं। ये सारे गुण उनके अपने समुदाय के कल्याण के लिए ही हैं। किन्तु मैं अपने लोगों, अब्राह्मणों के हितों को उनके सुपुर्द नहीं कर सकता।

गांधी – यह मेरे लिए विस्मय की बात है। क्या एक भी ईमानदार ब्राह्मण इस दुनिया में नहीं है?

पेरियार – कुछ हो सकते हैं। किन्तु मुझे अभी तक ऐसा कोई ब्राह्मण नहीं मिला।

गांधी – ऐसा मत कहिए। मैं एक ऐसे ब्राह्मण को जनता हूँ। मैं उसे सम्पूर्ण ब्राह्मण मानता हूँ। वह हैं गोपाल कृष्ण गोखले।

पेरियार – चलिये संतोष हुआ। यदि आप जैसे महात्मा इतनी कोशिश करके सिर्फ एक ब्राह्मण तलाश कर सकते हैं, तो हमारे जैसा ‘पापी’ भला कोई सम्पूर्ण ब्राह्मण कैसे पा सकता है?

गांधी – (हँसते हुये) संसार हमेशा ज्ञानियों के अधीन रहेगा। ब्राह्मण शिक्षित हैं और वे हमेशा ही प्रभावी रहेंगे। इसके लिए उन्हें दोष देने से कोई लाभ नहीं है। दूसरों को भी ज्ञान और बौद्धिकता के उसी स्तर पर आना होगा।

पेरियार – हिन्दुत्व एक मायने में अन्य सभी धर्मों से भिन्न है। इस धर्म में सभी ब्राह्मण शिक्षित हैं और सिर्फ वे ही ज्ञान और बौद्धिकता की बागडोर संभाले हुये हैं । दूसरे लोगों में 90 प्रतिशत से भी अधिक अशिक्षित और मूर्ख हैं। एक ही धर्म को मानने वाले समाज में यदि सिर्फ एक समुदाय शिक्षित और प्रभावी बन सकने का अधिकार रखता है तो क्या हमें यह नहीं समझना चाहिए कि यह धर्म अन्य समुदायों के लिए अनिष्टकर है ? इसीलिए मैं कहता हूँ कि हिन्दुत्व एक घटिया धर्म है । इसका नाश हो जाना चाहिए।

गांधी – आखिरकार आपके विचार क्या हैं ? क्या हम यह मान लें कि आप हिन्दुत्व का नाश इसलिए चाहते हैं कि ब्राह्मणों से छुटकारा मिल जाये।

पेरियार – यदि हिन्दुत्व, जो हिन्दू धर्म का एक गलत रूप है, का नाश हो जाता है तो कोई ब्राह्मण नहीं होंगे। हमारे हिन्दू धर्म मानने के कारण ही ब्राह्मणों का अस्तित्व है और वे शक्तिसंपन्न हैं तथा हम और आप शूद्र कहे जाते हैं।

गांधी – ऐसा नहीं है। क्या ब्राह्मण मेरी बात नहीं सुनते? क्या इस वक्त हम सब एक साथ मिलकर हिन्दू धर्म में पाई जाने वाली बुराइयों को जड़ से खत्म नहीं कर सकते?

पेरियार – मेरा यह विनम्र विचार है कि आप ऐसा नहीं कर सकते। यदि आप ऐसा कर पाने में सफल हो भी जाते हैं तो आपके बाद किसी ऐसे ‘महात्मा’ का प्रादुर्भाव होगा जो आपके परिवर्तन को पूर्णतः बदल देगा और इस धर्म को पुनः उसी रूप में ला देगा, जिस रूप में आज हम इसे पाते हैं।

गांधी – वह ऐसा कैसे कर सकता है?

पेरियार – अभी आपने कहा कि लोगों को धर्म के नाम पर हम अपने विचार स्वीकार करा सकते हैं। क्या भविष्य में उत्पन्न होने वाला महात्मा धर्म के नाम पर ‘कुछ भी’ नहीं कर सकेगा?

गांधी – भविष्य में कोई भी व्यक्ति आसानी से धार्मिक रिवाजों को बदल नहीं सकता, जैसा हम आज तक अनुभव कर रहे हैं।

पेरियार – क्षमा कीजिये। हिन्दुत्व को प्रचलन में रखकर आप कोई भी स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकते। ब्राह्मण किसी को भी वहाँ तक जाने नहीं देंगे। उन्हें ज्यों ही यह लगेगा कि आपके विचार उनके हित के विरुद्ध हो रहे हैं, त्यों ही वे आपका विरोध आरंभ कर देंगे। अब किसी भी महात्मा ने कोई परिवर्तन नहीं किया। यदि कोई व्यक्ति करने की कोशिश करता है तो ब्राह्मण इसे कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे।

गांधी – ब्राह्मणों के संबंध में आपने गलत धारणा बना रखी है, जो आपके विचार पर हावी है। इतनी चर्चा करने के बाद मुझे नहीं लगता कि हम लोग किसी सहमति पर पहुँच पाये हैं। अभी भी हमें दो-तीन बैठकें करनी होंगी और तब फैसला करेंगे कि हम क्या कर सकते हैं।

(यह कहते हुये वे बिस्तर पर पूरी तरह लेट जाते हैं और अपना हाथ सिर पर रखकर धीरे-धीरे सहलाने लगते हैं!)

(सामाजिक क्रांति के दस्तावेज़, भाग दो , सं शम्भूनाथ , अनुवाद नागेंद्र सिंह , 2004)

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