Friday, March 1, 2024
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किसानों और किसान आंदोलनों के प्रतिरोध को दर्ज़ करता बॉलीवुड सिनेमा

आंदोलन बड़ी संख्या में लोगों द्वारा समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये जाने वाला कार्य है। किसान आंदोलनों के कारण पिछले साल भर से उनसे जुड़े मुद्दे अहम हो गए हैं। खेती-किसानी के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों के दौरान कई अप्रत्याशित परिवर्तन हुए हैं। गांवों से रोजगार की तलाश मे बड़ी संख्या में […]

आंदोलन बड़ी संख्या में लोगों द्वारा समान उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किये जाने वाला कार्य है। किसान आंदोलनों के कारण पिछले साल भर से उनसे जुड़े मुद्दे अहम हो गए हैं। खेती-किसानी के क्षेत्र में पिछले तीन दशकों के दौरान कई अप्रत्याशित परिवर्तन हुए हैं। गांवों से रोजगार की तलाश मे बड़ी संख्या में नौजवानों का उत्प्रवास या पलायन हुआ है। किसान गाँव में हैं और संभावित कृषि मजदूरों के साथ छोड़ देने के कारण खेती करना आसान नहीं रह गया है। मशीनें बहुतेरी आयी हैं लेकिन हाल में जिस तरह की बरसात हुई, उस अवस्था में तो पकी फसल वहीँ कीचड़ में जमींदोज हो जाती है और उसको कोई मशीन बाहर नहीं निकाल सकती, केवल मानव श्रम से ही ऐसी दुर्गम स्थिति मे फंसी फसलों को बचाया जा सकता है लेकिन वह श्रम अब गांवों में नहीं रहा। वह खेत मजदूर से शहरी मजदूर हो चुका है। कुछ औरतें और वृद्ध लोग खेत और फसलों को नहीं संभाल सकते हैं। गाँव बाहरी दुनिया से इतने ज्यादा जुड़ चुके हैं कि अब वे चार्ल्स मेटकाफ के ‘लिटिल रिपब्लिक’ (1830) नहीं रहे जो बाहरी परिवर्तनों से अछूते रहते थे।

भारत एक कृषि प्रधान देश है यह बात सामान्य तौर पर कही जाती है। देश की सत्तर प्रतिशत आबादी लगभग गांवों में  रहकर कृषि और कृषि से जुड़े व्यवसायों में कार्य करके अपनी जीविका अर्जित करते हैं। गांवों मे अब विद्युत आपूर्ति, शिक्षा संस्थान, सड़कें, अस्पताल, मोबाइल इंटरनेट एवं परिवहन के साधनों की उपलब्धता ने अब उन्हें  बाहरी दुनिया से जोड़ दिया है। परंपरागत खेती अब घाटे का सौदा बन चुकी है। पुरुषों का शहरों की तरफ पलायन और मनरेगा योजना में बेहतर मजदूरी ने किसानों के लिए श्रम की समस्या को और गंभीर बना दिया है। कृषि कार्य वही किसान कर पा रहे हैं जिनके घर में बाहर से नगद पैसा कमाने वाले लोग हैं, कुछ सदस्यों की नौकरियां हैं, कोई दुकान या व्यवसाय है अन्यथा की स्थिति में किसानों का अस्तित्व संकट में पड़ता जा रहा है और सर्वाइवल मुश्किल होता जा रहा है।

[bs-quote quote=”प्रेमचंद्र के गोदान का नायक होरी और उस जमाने के किसान तमाम मुश्किलों के बावजूद आत्महत्या नहीं करते थे लेकिन 1990 के दशक से लेकर अब तक लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सन 2011 मे रिलीज डॉक्यूमेंट्री फिल्म नीरो’ज गेस्ट में पी साईनाथ बताते हैं कि विदर्भ और सौराष्ट्र के दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। रामन मैग्ससे पुरस्कार विजेता साईनाथ की किताब एव्रीबाडी लव्ज़ ए गुड ड्राट: स्टोरीज फ्राम इंडिआज पूअरेस्ट डिस्ट्रिक्ट्स (पेंगुविन बुक्स) में ग्रामीण भारत में फैली गरीबी, संरचनात्मक असमानता, जातीय भेदभाव एवं किसान आंदोलनों के बारे में  प्राथमिक स्रोतों के आधार पर अध्ययन प्रस्तुत किए गए हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

आंदोलन की अवधारणा

सामाजिक आंदोलनों का इतिहास सौ साल पुराना है। समाजशास्त्र और अन्य विज्ञानों में आंदोलन की अवधारणा को लेकर मतभिन्नताएं भी हैं। ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ऑफ सोशिओलॉजी में आंदोलन को एक सामूहिक प्रयास बताया गया है जिसके द्वारा समाज के एक महत्वपूर्ण हिस्से मे बदलाव संभव होता है। सामाजिक आंदोलन शब्द का प्रयोग पहली बार फ्रांस में सैंट साइमन ने 18 वीं सदी में किया था ताकि सामाजिक यथास्थिति के खिलाफ हो रहे विभिन्न प्रकार के आंदोलनों के बीच सामाजिक आंदोलनों को वर्गीकृत किया जा सके। बीसवीं सदी में इन आंदोलनों को न्यू सोशल मूवमेंट कहा गया। ग्रीम चेस्टर एवं इयान वेल्श अपनी किताब सोशल मूवमेंट्स: द की कॉनसेप्टस (2015:1) मे लिखते हैं: ‘the established terms ‘old social movements’ and ‘new social movements’ are valuable in terms of a sequential understanding. Old social movements originate in the social, economic and political dynamics of the 19th whilst new social movements originate within the dynamics of the latter part of the twentieth century’.

पुराने और नए सामाजिक आंदोलनों मे कोई मूलभूत अंतर हो ऐसा जरूरी नहीं है, हाँ इतना अवश्य है कि इससे समय का बोध आवश्यक रूप से जुड़ा है। इस संदर्भ मे नारीवादी आंदोलन, पर्यावरणीय आंदोलन एवं जानवरों के अधिकारों के आंदोलन बीसवीं सदी के नए आंदोलन हैं।

स्मिता पाटिल ने संजीदा सिनेमा को एक नया व्याकरण दिया था

किसान आंदोलन की नई उठान 

भारत मे कृषक आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है और देश के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने अपने पक्ष मे और कृषि नीतियों में परिवर्तन करने के लिये आन्दोलन किये हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके। बदलते हुए मौसम के कारण और अन्य कई कारकों के कारण किसानों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है जिसके कारण किसानों का असंतोष उभर आता है। विदर्भ, सौराष्ट्र और बुंदेलखंड मे विपरीत प्राकृतिक हालातों जैसे पानी की कमी के कारण किसान कर्ज के मकड़जाल में फंसकर आत्महत्या भी करने को मजबूर हो रहा था। वर्तमान मे चल रहे आंदोलनों के पहले भी विभिन्न मुद्दों को लेकर किसानों के आंदोलन चलते रहे हैं। जमीन अधिग्रहण से लेकर फसल बीमा और न्यूनतम समर्थन मूल्य आदि मुद्दों पर देश के कोने-कोने मे समय-समय पर छोटे-बड़े आंदोलन होते रहें हैं।

सन 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद अनेकों स्थानों पर एक के बाद एक कई किसान आन्दोलन हुए। इनमें से अधिकांश आन्दोलन अंग्रेज़ों की शोषणकारी नीतियों के ख़िलाफ़ किये गए थे। ये सारे आंदोलन इतिहास के पन्नों मे दर्ज हैं। इन आंदोलनों मे नील विद्रोह, पाबना विद्रोह, तेभागा आन्दोलन, चम्पारन सत्याग्रह, बारदोली सत्याग्रह और मोपला विद्रोह प्रमुख किसान आन्दोलन के रूप में जाने जाते हैं। सन 1918 ई. का खेड़ा सत्याग्रह गाँधीजी द्वारा शुरू किया गया, वहीं ‘मेहता बन्धुओं’ (कल्याण जी तथा कुँवर जी) ने भी 1922 ई. में बारदोली सत्याग्रह को प्रारम्भ किया था। बाद में इस सत्याग्रह का नेतृत्व सरदार वल्लभ भाई पटेल जी के हाथों में रहा। आजादी के बाद भी किसानों के कई बड़े आंदोलन देश के अलग-अलग क्षेत्रों में हुए। वर्ष 2020 से अब तक एक साल लगातार चले किसान आंदोलन और तीन कानूनों को वापस लेने के बाद किसान और उनसे जुड़े मुद्दों पर बहस और तेज हो गई है। किसान नेता अभी भी दिल्ली सीमा पर डेरा डाले हुए हैं और देश की सरकार से कई मांगो को लेकर दबाव बना रहे हैं जो इस प्रकार हैं: न्यूनतम समर्थन मूल्य का मुद्दा, किसान पेंशन, संवैधानिक किसान आयोग, किसान नेताओं के सुझाव से नीतियों का निर्माण।

बॉलीवुड फिल्मों ने चित्रित किया किसान जीवन 

दो बीघा जमीन (1953) फिल्म में औद्योगीकरण के उद्देश्य से किसानों की जमीन के अर्जन के मुद्दे को उठाया गया था। भारत में भूमि अधिग्रहण अधिनियम सन 1901 मे अंग्रेजों ने बनाया था। निदेशक बिमल रॉय की फिल्म दो बीघा जमीन सन 1953 मे रिलीज हुई थी। बलराज साहनी एक सीमांत किसान शंभू की भूमिका मे थे और निरुपा रॉय उनकी पत्नी की भूमिका मे थी। साहूकार का कर्ज न लौटा पाने के कारण शंभू को अपनी दो बीघा जमीन खोना पड़ता है। वह एक किसान से मजदूर/ रिक्शाचालक बन जाता है। इस फिल्म के अंतिम दृश्य को देखिए जब प्रवास से वापस लौट शंभू अपनी जमीन पर खड़ी फैक्ट्री के गेट के पास खड़े होकर नोस्टेलजिया से पुरखों की जमीन को निहारता है और जब वहाँ की मिट्टी को हाथ मे उठाता है तो गेट पर खड़ा चौकीदार उसे चोर समझकर डांटता है। कितना करूण दृश्य है उद्योगपति और साहूकार किसान को कर्जदार बनाकर अनाप-शनाप ब्याज वसूलकर बाद मे उनकी जमीन भी हड़प लेते हैं। किसान मजबूर होकर हल्कू (पूस की रात-प्रेमचंद) की तरह मजदूर बन जाता है और अपने गाँव-घर-खेत के लिए पराया या गैर हो जाता है। किसान की वह पीड़ा आज भी काम नहीं हुई है। इस फिल्म का गाना धरती कहे पुकार के आज भी किसानों की मुसीबतों को बयान करता है।

मदर इंडिया (1957) महबूब खान के निर्देशन में बनी मदर इंडिया फिल्म साल 1957 में रिलीज हुई थी। फिल्म में नरगिस, सुनील दत्त, राजेंद्र कुमार, राजकुमार ने लीड रोल निभाया था। फिल्म में दिखाया गया है कि खेती किसानी की परेशानियों से दुखी होकर जब एक किसान अपना गाँव-घर छोड़कर चला जाता है तो किस तरह पति की नामौजूदगी में एक मां बंजर जमीन में खेती कर अपने दो बच्चों की परवरिश करती है। किसान का छोटा बेटा (सुनील दत्त) स्कूल की औपचारिक पढ़ाई से दूर भागता है लेकिन उसे साहूकार लाला की लाल पोथी में लिखी विद्या पढ़नी हैं जिसके कारण हर साल सारा अनाज देकर भी उसका कर्ज खत्म नहीं होता। साहूकार धनी होता जाता है और किसान की हालत बदतर होती जाती है। हम यह देख सकते हैं कि सन 1957 से लेकर अब तक किसानों की हालत में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है।

प्रेमचंद्र के गोदान का नायक होरी और उस जमाने के किसान तमाम मुश्किलों के बावजूद आत्महत्या नहीं करते थे लेकिन 1990 के दशक से लेकर अब तक लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। सन 2011 मे रिलीज डॉक्यूमेंट्री फिल्म नीरो’ज गेस्ट में पी साईनाथ बताते हैं कि विदर्भ और सौराष्ट्र के दो लाख से ज्यादा किसान आत्महत्या कर चुके हैं। रामन मैग्ससे पुरस्कार विजेता साईनाथ की किताब एव्रीबाडी लव्ज़ ए गुड ड्राट: स्टोरीज फ्राम इंडिआज पूअरेस्ट डिस्ट्रिक्ट्स (पेंगुविन बुक्स) में ग्रामीण भारत में फैली गरीबी, संरचनात्मक असमानता, जातीय भेदभाव एवं किसान आंदोलनों के बारे में  प्राथमिक स्रोतों के आधार पर अध्ययन प्रस्तुत किए गए हैं। होरी नामक किसान के जीवन पर प्रेमचंद्र द्वारा लिखे उपन्यास गोदान पर सन 1963 में इसी नाम से फिल्म बनी। जमींदार, किसान और उभरते हुए साहूकारी व्यवस्था पर लिखा गया यह उपन्यास गाँव और शहर की ज़िंदगी को समेटते हुए यह उपन्यास किसान जीवन का महाकाव्य बन गया। ‘जिन पैरों के नीचे गर्दन दबी हो उन पैरों को सहलाने में ही अपनी भलाई’ का दर्शन देने वाला होरी को मरने के समय सवा रुपये का गोदान भी बमुश्किल नसीब होता है। असल में किसान का जीवन अभाव का ही जीवन है।

तीसरी कसम (1966) का हीरामन गाड़ीवान भी किसानों के गाँव का ही रहने वाला किसान था। बैल और बैलगाड़ी किसान के सबसे करीबी संगी और साधन थे और गरीबी के कारण प्रेम करना किसान के हक में नहीं होता यह इस फिल्म से पता चलता है। 1967 में मनोज कुमार की फिल्म उपकार में भी किसानों की दशा को बखूबी दिखाई गई है किसान पर‍िवार की एक महिला अपने दोनों बच्चों को पढ़ाने का सपना पूरा नही कर पाती इसलिए बड़ा भाई अपनी पढ़ाई छोड़कर अपने छोटे भाई को पढ़ने के लिए शहर भेजता है लेकिन वह मूल्यविहीन नौजवान (पूरन-प्रेम चोपड़ा) अनाज की तस्करी करके मोटा पैसा कमाने लगता है। भारत (मनोज कुमार) गाँव में सब कुछ छोड़ भारत-पाकिस्तान की लड़ाई मे सैनिक बनकर चला जाता है। किसान और सेना के जवान दोनों को एक साथ लाकर मनोज कुमार ने तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी के ‘जय जवान जय किसान’ के नारे को फिल्माने की कोशिश की थी। आज का सच भी यही है कि किसान का एक बेटा खेत में फसल उगा रहा है तो दूसरा सीमा पर लड़ रहा है और दोनों जगहों पर अथाह मुश्किलों से वह रोज ही वाबस्ता है।

आठवें दशक में सुलगते सवाल और किसानों को बेदखल करने के षड्यंत्र 

सन 1976 में रिलीज फिल्म मंथन में भारत के श्वेत क्रांति (सफेद आंदोलन) के दौरान गाँव मे रहने वाले अछूतों (तथाकथित) के जमींदारों द्वारा किए जाने शोषण और उनके माध्यम से उनकी मदद करने के मुद्दे को उठाया गया है। यह फिल्म किसानों से चन्दा लेकर उनके पैसे से बनाई गयी थी। परंपरागत प्रभु वर्ग किस तरह किसानों और दलितों को अपने चंगुल में फँसाये रखना चाहते हैं और गरीब लोग निर्धनता के दुष्चक्र मे फंसे रहते हैं, को दिखाया गया है। फिल्म में गिरीश कर्नाड का चरित्र श्वेत क्रांति के नायक डॉ वरगीज कुरियन से प्रेरित है। स्मिता पाटिल ने इस फिल्म मे एक दलित स्पष्टवादी महिला का किरदार निभाया है तो नसीरुद्दीन शाह ने दलित विद्रोही युवक का जो जमींदारों के शोषण के विरुद्ध अपनी दलित बस्ती के लोगों को एकजुट करता है। आगमन (1978) लखीमपुर के गन्ना किसानों और उनके बकाया भुगतान के मुद्दे को लेकर बनी यह फिल्म केन ग्रोवर्स सोसाइटी के कोआपरेटिव के पैसे से बनी थी। लखीमपुर के कोटवारा रियासत के फिल्मकार मुजफ्फर अली ने तराई क्षेत्र के गन्ना किसानों की समस्या को इस फिल्म में प्रमुखता से उठाया था।

[bs-quote quote=”साफ़ बात है कि गरीबी में चाँद भी रोटी भले नज़र आता हो लेकिन वह कभी रोटी नहीं बन पाया। ऐसे ही हम चाहे जितना भी गूगल सर्च करें वह रोटी नहीं दे सकता। हम कितनी भी प्रगति कर लें और कितने ही महंगे घरों में रहने लगें, कितने ही महंगे होटलों मे स्वादिष्ट भोजन करने लगें, बहुत ही अच्छे महंगे और ब्रांडेड कपड़े पहन लें जब इन वस्तुओं के मूल को खोजेंगे तो हमारे सामने किसान और मजदूर का ही चेहरा होगा, उनकी मेहनत होगी और उनकी सदा संगिनी प्रकृति होगी।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

लगान(2001)में रिलीज हुई फिल्म लगान अकेडमी अवॉर्ड की बेस्ट फॉरेन फिल्म केटेगरी में पहुंचने वाली तीसरी बॉलीवुड फिल्म थी। आशुतोष गोवारिकर द्वारा निर्देशित इस फिल्म में आमिर खान, ग्रेसी सिंह, रेचल शैली और पॉल ब्लैकथोर्न अहम किरदारों में थे। फिल्म को किसानों की जमीन के टैक्स के मुद्दे पर बनाया गया है। अंग्रेजों द्वारा किसानों की जमीन का दोगुना लगाना वसूला जाने लगता है जिसके विरोध में भुवन (आमिर खान) गरीब किसानों की आवाज बनते हैं। लगान माफ करवाने के लिए आमिर अंग्रेजों का चैलेंज स्वीकार कर उनसे क्रिकेट का मुकाबला करते हैं। यह एक रुचिकर पीरियड फिल्म थी जो ब्रिटिश जमाने मे किसानों के अंतहीन और मनमाने शोषण का बयान करती है। गबरिचा पाऊस (2009) मराठी भाषा की फिल्म है जिसका नायक किसान है जो वर्षा की कमी के कारण कोई फसल नहीं उगा पा रहा है। उसके घर के लोग डरे हुए हैं कि वह कही डिप्रेशन मे आत्महत्या न कर ले इसलिए उसे अकेला नहीं छोड़ते। समाजशास्त्री ईमाइल दरखाईम अपने आत्महत्या के सिद्धांत मे सच ही बताते हैं कि जब व्यक्ति अकेला होता है और उसके अन्य लोगों से सामाजिक संबंध कमजोर पड़ने लगते हैं तो वह आत्महत्या की सोचने लगता है। किसान के पास अपनी जमीन होना सम्मान की बात होती है। जब एक भूमिहीन मजदूर जमीन खरीदकर किसान बनने की इच्छा पालता है तो उसकी कहानी से मेरी थोडरची मलाई (2016) जैसी तमिल फिल्म बनती है। इन दो फिल्मों ने मराठी और तमिल भाषा मे किसानों के मुद्दों को जीवंत तरीके से परदे पर प्रस्तुत किया है।

किसान (2009)में रिलीज हुई मल्टीस्टारर फिल्म में जैकी श्रॉफ, सोहेल खान, दिया मिर्जा और अरबाज खान ने मुख्य भूमिकाएं की थीं। इस फिल्म को किसानों की आत्महत्या के विषय पर बनाया गया है। जहां एक भाई शहर जाकर सुविधा में रहता है तो वहीं दूसरा छोटा भाई पिता के साथ जमीन बचाने और खेती करने के लिए गांव में ही रहता है। पीपली लाइव (2010)फिल्म की विषय वस्तु बताती है कि किसानों के मुद्दे को मीडिया कितने सतही तरीके से प्रस्तुत करता है। आत्महत्या के कगार पर खड़े किसान के हालात को मीडिया टीआरपी और नेता अपने पॉलिटिकल फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं। कहानी नत्था नाम के एक गरीब किसान पर बेस्ड है जो जमीन खो देने के बाद परिवार को पालने में असफल हो जाता है और आत्महत्या करने की ठान लेता है। कड़वी हवा (2017) का अंधा बाप बुंदेलखंड के अपने सूखा प्रभावित गाँव मे अपने बेटे को आत्महत्या से बचाने के लिए बैंक कर्मचारी से साँठ गाँठ करके कुछ रुपये कर्ज के लौटाता है लेकिन उसी बेटे के कहीं चले जाने पर मायूस और बेहाल हो जाता है। किसानों के मुश्किलों की अंतहीन कथाएं हैं जिन्हे संवेदना, सहयोग और सहानुभूति की नितांत आवश्यकता है।

हर कोई समझ ले कि खेती ही जीवन का आधार है

साफ़ बात है कि गरीबी में चाँद भी रोटी भले नज़र आता हो लेकिन वह कभी रोटी नहीं बन पाया। ऐसे ही हम चाहे जितना भी गूगल सर्च करें वह रोटी नहीं दे सकता। हम कितनी भी प्रगति कर लें और कितने ही महंगे घरों में रहने लगें, कितने ही महंगे होटलों मे स्वादिष्ट भोजन करने लगें, बहुत ही अच्छे महंगे और ब्रांडेड कपड़े पहन लें जब इन वस्तुओं के मूल को खोजेंगे तो हमारे सामने किसान और मजदूर का ही चेहरा होगा, उनकी मेहनत होगी और उनकी सदा संगिनी प्रकृति होगी। किसानों और मजदूरों ने ही अपनी जिद और अपनी मेहनत से इस दुनिया को हरा भरा और रहने लायक बना रखा है। हमे उसकी जिद और मेहनत का सम्मान करना सीखना होगा।

संदर्भ :

चेस्टर्स, ग्रैमए, वेल्श, इयान (2015) सोशल मूवमेंट्स: द की कॉन्सेप्ट्स, राउटलेज पब्लिकेशन्स, लंदन.
स्कॉट, जॉन & गॉर्डन मार्सल (2009) ऑक्सफोर्ड डिक्सनरी ऑफ सोशिओलॉजी, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली.
साईनाथ, पी (2000) एव्रीबाडी लवस अ गुड ड्राट: स्टोरीज फ्राम इंडिआज पूरेस्ट डिस्ट्रिक्टस’, पेंगविन बुक्स, नई दिल्ली।

राकेश कबीर जाने-माने कवि, कथाकार और सिनेमा के गंभीर अध्येता हैं।

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8 COMMENTS

  1. बहुत ही सार्थक और बेहतरीन लेख। आपको साधुवाद??

  2. राकेश जी,
    आपका उपर्युक्त शोधपरक आलेख पढ़ा जिसमें आपने न केवल हमारे जैसे कृषि प्रधान देश के करोड़ों गरीब किसानों की दयनीय स्थिति और उनकी कठिनाइयों आदि का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है बल्कि किसान और किसानों की समस्याओं को केंद्र में रखकर बनी हिंदी फिल्मों तथा मराठी/तमिल भाषा की फिल्मों का लेखा जोखा भी सटीकता के साथ हमारे सामने रखा है। पूरा आलेख न केवल उपयोगी और महत्वपूर्ण जानकारियां/तथ्य पेश करता है बल्कि पाठकों, विशेष रूप से महानगरों में रहनेवालों, के लिए नई दृष्टि भी प्रदान करता है।

    आपका यह कहना भी बिल्कुल सही है कि किसान दोहरे मोर्चे पर संघर्ष कर रहा है। एक तरफ किसान कर्जों, बढ़ती लागत, मौसम की मार, ऊपज की अलाभकारी कीमत जैसी समस्याओं/आफतों से जूझकर आत्महत्या तक करने के लिए विवश हो जाता है वही उसके बेटे सेना/सुरक्षा बलों/पुलिस सेवा आदि में भर्ती होकर देश की बाहरी – भीतरी सीमाओं की रक्षा और कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अथक योगदान/बलिदान दे रहे हैं। किसान और खेती किसी भी देश और समाज के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं क्योंकि यही लोग दुनिया की अरबों की आबादी का पेट भरते हैं। लेकिन यह बेहद अफसोस की बात है कि हमारे देश में किसानों/मजदूरों की हमेशा से उपेक्षा की जाती रही है और उन्हें दोयम या तृतीय दर्जे का नागरिक समझा जाता है। कई फिल्मों ने किसानों की मूलभूत समस्याओं, अभावों और उनकी पीड़ाओं को परदे पर उतारकर सराहनीय कार्य किया है। किंतु किसानों की संख्या और उनके योगदान को देखते हुए यह कहना पड़ेगा कि कुछ अपवादों को छोड़कर हमारा बॉलीवुड भी इस मुद्दे पर खामोश ही रहता आया है। यह चिंतनीय और दुखद स्थिति है।

    आपके इस पठनीय और प्रासंगिक आलेख के लिए साधुवाद और शुभकामनाएं।

  3. बढ़िया और वक्त जरूरी आलेख। अवध किसान आंदोलन का जिक्र भी गंभीरता से होना चाहिए था क्योंकि उससे बड़ा कोई किसान आंदोलन भारत में नहीं हुआ।

  4. बहुत बढ़िया समीक्षात्मक विश्लेषण, पठनीय और विचारणीय भी भारतीय कृषि बहुत हद तक मानसून पर निर्भर है तथा मानसून की असफलता के कारण नकदी फसलों नष्ट होना किसानों द्वारा की गई आत्महत्या का मुख्य कारण माना जाता है। ये वाकई अफसोस की बात है की किसान सबके लिए तो अन्न उगा रहे हैं लेकिन खुद भुखे मरने के लिए विवश है किसान अपनी फसलों से इतना नही कमा पाता है की वे अपने परिवार के लिए ठीक ठाक कपड़े और शिक्षा का प्रबंध कर सके।
    यह बिल्कुल साफ है की गरीबी में चांद भी रोटी भले नजर आता हो लेकिन वह कभी रोटी नही बना पाया ।ऐसे ही हम चाहे जितने भी गूगल सर्च करे वह रोटी नही दे सकता, महंगे होटल, स्वादिस भोजन ,ब्रांडेड कपड़े इन वस्तुओं का मूल हमारे सामने किसान और मजदूर का ही चेहरा है । इस बढ़िया और पठनीय आलेख के लिए आदरणीय जी आपको बधाई और शुभकामनाएं।

  5. राकेश कबीर जी के प्रस्तुत शोधपरक आलेख में न केवल भारत जैसे कृषि प्रधान देश के करोड़ों गरीब किसानों की दयनीय स्थिति और उनकी कठिनाइयों आदि का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया है बल्कि किसान और किसानों की समस्याओं को केंद्र में रखकर बनी हिंदी/मराठी/तमिल भाषा की फिल्मों का लेखा जोखा भी सटीकता के साथ हमारे सामने रखा है।
              भारत मे कृषक आन्दोलन का इतिहास बहुत पुराना है और देश के सभी भागों में अलग-अलग समय पर किसानों ने अपने पक्ष मे और कृषि नीतियों में परिवर्तन करने के लिये आन्दोलन किये हैं ताकि उनकी दशा सुधर सके। बदलते हुए मौसम के कारण और अन्य कई कारकों के कारण किसानों की हालत दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है जिसके कारण किसानों का असंतोष उभर आता है।
              राकेश जी का पूरा आलेख न केवल उपयोगी और महत्वपूर्ण तथ्य पेश करने वाला है बल्कि पाठकों, विशेष रूप से महानगरों में रहनेवालों, के लिए नई दृष्टि भी प्रदान करता है। लेखक के अनुसार किसान का संघर्ष दोहरा है । एक तरफ वह बैंक के कर्जों, बढ़ती लागत, मौसम की मार, ऊपज की अलाभकारी कीमत जैसी समस्याओं से जूझकर आत्महत्या तक करने के लिए विवश हो जाता है । वहीं दूसरी ओर उसके अपने ही परिजनों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति भी नहीं हो रही है । उसकी ही संताने सेना, सुरक्षा बलों, पुलिस सेवा आदि में भर्ती होकर देश की बाहरी भीतरी सीमाओं की रक्षा और कानूनी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए अथक योगदान दे रहे हैं।

             किसान और खेती किसी भी देश और समाज के सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं क्योंकि यही लोग दुनिया की अरबों की आबादी का पेट भरते हैं। लेकिन यह बेहद अफसोस की बात है कि हमारे देश में किसानों की हमेशा से उपेक्षा की जाती रही है और उन्हें दोयम या तृतीय दर्जे का नागरिक समझा जाता है। कई फिल्मों ने किसानों की मूलभूत समस्याओं, अभावों और उनकी पीड़ाओं को परदे पर उतारकर सराहनीय कार्य किया है। किंतु किसानों की संख्या और उनके योगदान को देखते हुए यह कहना पड़ेगा कि कुछ अपवादों को छोड़कर हमारा बॉलीवुड भी इस मुद्दे पर खामोश ही रहता आया है। यह चिंतनीय और दुखद स्थिति है। लेखक द्वारा लिखे गए इस पठनीय और प्रासंगिक आलेख के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

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