अतीत की मनमानी और खतरनाक व्याख्या

राम पुनियानी

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आरएसएस की 100 से अधिक अनुषांगिक संस्थाएं हैं और इस सूची में नित नए नाम जुड़ते जा रहे हैं। संघ की अनुषांगिक संस्थाओं में से जो प्रसिद्ध हैं उनमें भाजपा, विहिप, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और बजरंग दल शामिल हैं। परंतु इनके अतिरिक्त भी संघ से जुड़े दर्जनों ऐसे संगठन और संस्थाएं हैं जिनके बारे में हम बहुत नहीं जानते परंतु जो देश के अलग-अलग हिस्सों में उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारियों को बखूबी रहे हैं। जब भाजपा शासक दल नहीं थी तब भी आरएसएस से जुड़ी संस्थाएं उतनी ही सक्रिय थीं। 1980 के बाद से देश में आरएसएस की गतिविधियों में तेजी से इजाफा हुआ है और पिछले आठ सालों से तो ये संस्थाएं दिन-रात काम कर रही हैं। इन सभी संस्थाओं के लिए आरएसएस के मुखिया के वचन वेद वाक्य हैं जिनका पालन वे हर हाल में करते हैं।

मोहन भागवत के हालिया (3 जून 2022) बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। भागवत ने कहा कि संघ काशी और मथुरा में मस्जिदों के स्थान पर मंदिरों का निर्माण करने की मांग को लेकर कोई आंदोलन नहीं चलाएगा। उन्होंने कहा कि वे अदालतों के निर्णय को स्वीकार करेंगे। जो लोग समाज में शांति और सद्भाव चाहते हैं उन्हें संघ प्रमुख का यह बयान चिंता हरने वाला लगा। जैसा कि हम देख रहे हैं, ज्ञानवापी मुद्दे के उठने के बाद से देश भर में सैकड़ों मस्जिदों के बारे में यह दावा किया जा रहा है कि वे मंदिरों के मलबे पर बनी हैं। जो संस्थाएं और व्यक्ति इस तरह के दावे कर रहे हैं वे कहीं न कहीं संघ परिवार से जुड़े हुए हैं।

सन 2018 में दिल्ली के विज्ञान भवन में भागवत के तीन भाषणों से कुछ लोगों को लगा था कि आरएसएस की दिशा में मूलभूत परिवर्तन आ गया है। यह कयास एकदम गलत सिद्ध हुए। अब, जबकि जिन्न बोतल से बाहर आ गया है भागवत यह कोशिश कर रहे हैं कि हालात एक सीमा से ज्यादा न बिगड़ें। परंतु इसके बाद भी संघ की मूलभूत समझ तो यही है कि विदेशी आक्रांताओं ने हमारे मंदिर गिराए और तलवार की नोंक पर लोगों को मुसलमान बनाया।

इसका एक उदाहरण कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री केएस ईश्वरप्पा हैं जिन्होंने कहा है कि मंदिरों को तोड़कर 36,000 मस्जिदें बनाई गईं हैं और इन तोड़े गए मंदिरों पर पुनः कब्जा प्राप्त करने के लिए कानूनी उपाय किए जा रहे हैं। ईश्वरप्पा इस तरह की सोच और समझ रखने वाले नेताओं का एक नमूना भर हैं। शायद भाजपा के प्रमुख नेताओं और आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत को उपासना स्थल अधिनियम 1991 के बारे में पता नहीं है। यह अधिनियम देश में स्थित सभी उपासना स्थलों के रूपांतरण को प्रतिबंधित करता है और कहता है कि ऐसे सभी स्थलों का स्वरूप वही रहेगा जो 15 अगस्त 1947 को था। इसके अतिरिक्त, एडवर्स पजेशन (प्रतिकूल कब्जे) से संबंधित कानून भी है। जिन मस्जिदों की बात की जा रही है वे सैकड़ों साल पुरानी हैं। जाहिर है कि संघ परिवार के लोगों को यह पता तो होगा ही कि जब तक वर्तमान कानून लागू हैं तब तक कानूनी रूप से किसी उपासना स्थल के स्वरूप और चरित्र को नहीं बदला जा सकता।

भागवत का दावा है कि ‘यह केवल आस्था का मामला है। हिन्दुओं का मुसलमानों से कोई बैर नहीं है। केवल उन स्थानों पर दावे किए जा रहे हैं जिनमें हिन्दुओं की विशेष श्रद्धा है….’ इस बयान में बहुत दम नहीं है। हिन्दुओं के सैकड़ों उपासना स्थल हैं जिनमें केदारनाथ, हरिद्वार, द्वारिका, जगन्नाथपुरी, रामेश्वरम आदि शामिल हैं। जब मैं छोटा था तब मेरे दादाजी हम लोगों को तीर्थयात्रा पर ले गए थे। मुझे याद है कि उस समय हम लोग हरिद्वार और प्रयागराज गए थे और मेरे दादाजी ने वायदा किया था कि अगली बार वे हमें कुरूक्षेत्र ले जाएंगे।

अयोध्या, काशी और मथुरा भी पवित्र स्थल हैं परंतु उन्हें उनकी पवित्रता के लिए नहीं वरन् इसलिए चुना गया है क्योंकि उनका इस्तेमाल विवाद खड़ा करने के लिए किया जा सकता है। यह सोचना गलत होगा कि भागवत या आरएसएस अपनी नीति या लक्ष्य बदल रहे हैं। आरएसएस की विचारधारा कई दशकों से वही है- मुस्लिम अल्पसंख्यकों को निशाना बनाओ और भारत के स्वर्णिम अतीत का महिमामंडन करो। भागवत ने यह भी कहा है कि हमें हजारों मस्जिदों में शिवलिंग ढूँढने का प्रयास नहीं करना चाहिए। क्या यह कहकर वे इस आरोप की पुष्टि नहीं कर रहे हैं कि मुस्लिम राजाओं ने देश में सैकड़ों मंदिरों को तोड़ा है? रिचर्ड ईटन जैसे अध्येता हमें बताते हैं कि मुस्लिम शासकों द्वारा जमींदोज किए गए मंदिरों की संख्या बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताई जा रही है। उनके अनुसार हिन्दू शासकों ने भी हिन्दू मंदिर तोड़े हैं।

आरएसएस के मुखिया के बयान से इस धारणा की पुष्टि होती है कि भारत में इस्लाम का प्रसार हमलावरों ने किया। यह ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। हम जानते हैं कि इस्लाम, भारत में अरब व्यापारियों के जरिए आया और कई लोगों ने जातिगत दमन से बचने के लिए हिन्दू धर्म छोड़कर इस्लाम अपनाया। स्वामी विवेकानंद ने अपने दो पत्रों (खेतरी के पंडित शंकरलाल को 20 सितंबर, 1892 और बिटठलदास देसाई को नवंबर 1894 में लिखे गए) में धर्मपरिवर्तन के कारणों की व्याख्या करते हुए लिखा ‘धर्मपरिवर्तन ईसाईयों और मुसलमानों के अत्याचारों के कारण नहीं हुए। वे ऊँची जातियों के अत्याचारों के कारण हुए।’

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भागवत के अनुसार, ‘(मुसलमानों के) हमलों में सैकड़ों देवस्थानों को इसलिए ध्वस्त किया गया ताकि स्वतंत्रता हासिल करने की इच्छा रखने वालों के मनोबल को कुचला जा सके। हिन्दू समाज उन पर बहुत जोर देता है।’ भागवत की मूल सोच यही है और यही सोच एक स्तर से दूसरे स्तर तक जाते हुए अंततः नफरत में बदल जाती है, जिसका वमन नुपूर शर्मा ने टीवी पर और नवीन जिंदल ने सोशल मीडिया पर किया। यह सचमुच शर्मनाक है कि भाजपा ने इन दोनों के खिलाफ तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जब तक कि खाड़ी के देशों ने हमारे राजदूतों को बुलाकर लताड़ नहीं लगाई।

कुछ लोगों का मानना है कि भागवत ने जो कुछ कहा है वह संघ की सोच में बदलाव का संकेत है। इसमें कोई संदेह नहीं कि संघ प्रमुख के इस बयान से ‘अनुशासित’ आरएसएस कार्यकर्ताओं की मंदिर-मस्जिद विवादों से संबंधित गतिविधियों पर कम से कम अस्थायी रूप से ब्रेक लगेगा। इसके अतिरिक्त नफरत की राजनीति के चलते देश में कुछ नए तत्व उभर आए हैं जो आरएसएस के नियंत्रण में नहीं हैं परंतु जिन्हें पता है कि सरकार उनके खिलाफ कड़ी कार्यवाही नहीं करेगी। इसका एक उदाहरण धर्मसंसदों में दिए जा रहे जहर-बुझे भाषण हैं। धर्मसंसदें बिना किसी संकोच या डर के नफरत फैला रही हैं।

इसी तरह के तत्वों में से एक है तेजस्वी सूर्या। हाल में आस्ट्रेलिया में आयोजित उनके एक कार्यक्रम को स्थानीय लोगों के विरोध के कारण रद्द करना पड़ा। क्या भविष्य में भी विदेशी दबाव नुपूर शर्मा और तेजस्वी सूर्या जैसे लोगों को नियंत्रित करेगा? अगर ऐसा होता भी है तब भी यह एक अस्थायी उपाय होगा।

सन 2018 में दिल्ली के विज्ञान भवन में भागवत के तीन भाषणों से कुछ लोगों को लगा था कि आरएसएस की दिशा में मूलभूत परिवर्तन आ गया है। यह कयास एकदम गलत सिद्ध हुए। अब, जबकि जिन्न बोतल से बाहर आ गया है भागवत यह कोशिश कर रहे हैं कि हालात एक सीमा से ज्यादा न बिगड़ें। परंतु इसके बाद भी संघ की मूलभूत समझ तो यही है कि विदेशी आक्रांताओं ने हमारे मंदिर गिराए और तलवार की नोंक पर लोगों को मुसलमान बनाया।

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हिन्दुओं के आराधना स्थलों के ध्वंस की कोई भी तार्किक और तथ्यात्मक विवेचना, दुष्प्रचार की सुनामी के सामने ठहर ही नहीं पाती। हिन्दू समाज की ‘आहत भावनाएं’ राजनीति के अखाड़े में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। यह तो गनीमत है कि पुष्यमित्र शुंग और उसके जैसे अन्य राजाओं द्वारा बौद्ध विहारों को नष्ट करने की कहानियां इतिहास के पन्नों में ही कैद हैं वरना विध्वंस विशेषज्ञों को एक नई परियोजना मिल जाती।

(अंग्रेजी से रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

लेखक आईआईटी मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्माेनी अवार्ड से सम्मानित हैं।

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