Tuesday, February 27, 2024
होमसंस्कृतिभूमंडलीकरण से जाति-संकीर्णता कम हुई लेकिन काव्यात्मक रिश्ते खत्म हो गए

ताज़ा ख़बरें

संबंधित खबरें

भूमंडलीकरण से जाति-संकीर्णता कम हुई लेकिन काव्यात्मक रिश्ते खत्म हो गए

[कर्मेंदु शिशिर वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न और हर परिस्थिति में अपने उसूलों पर अडिग रहने वाले मार्क्सवादी आलोचक व कथाकार हैं। हिन्दी नवजागरण पर उनका विशेष काम है। नवजागरण और संस्कृति, राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण, हिन्दी नवजागरण और जातीय गद्य परंपरा, 1857 की राज्यक्रान्ति : विचार और विश्लेषण, भारतीय नवजागरण और समकालीन संदर्भ आदि उनकी […]

[कर्मेंदु शिशिर वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न और हर परिस्थिति में अपने उसूलों पर अडिग रहने वाले मार्क्सवादी आलोचक व कथाकार हैं। हिन्दी नवजागरण पर उनका विशेष काम है। नवजागरण और संस्कृति, राधामोहन गोकुल और हिन्दी नवजागरण, हिन्दी नवजागरण और जातीय गद्य परंपरा, 1857 की राज्यक्रान्ति : विचार और विश्लेषण, भारतीय नवजागरण और समकालीन संदर्भ आदि उनकी प्रमुख आलोचनात्मक पुस्तकें हैं। इसके अतिरिक्त उनके तीन कहानी संग्रह तथा बहुत लंबी राह शीर्षक से एक उपन्यास प्रकाशित है। शशांक कुमार ने उनसे उनके भारतीय ग्रामीण समाज पर भूमंडलीकरण के प्रभाव के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की।]

भूमंडलीकरण के दौर में ग्रामीण यथार्थ को आप किस तरह से देखते है? आपकी नजर में इसके सकारात्मक और नकारात्मक पहलु क्या हैं?

भूमंडलीकरण का असर समाज पर सुनामी की तरह पड़ा। यह पूंजीवाद का नया चेहरा था। आधुनिक विकास इस तरह से किया गया कि कंपनियों के उत्पाद गांवों तक पहुँचे। जो चीजें गांव के लोगों की ज़रूरत न थी, वे भी धीरे-धीरे अनिवार्य होती गईं। गांव के मध्यवर्गीय परिवार के लड़के आईटी या प्रबंधन से ऊंची तनख्वाह की नौकरियों में गये, विदेश गये और धीरे- धीरे गांव से कटते गये। गांवों में आर्थिक असमानता बढ़ी। अकुशल और पारंपरित शिक्षा पाये युवाओं की बेरोजगारी बेतहाशा बढ़ी। इस नई व्यवस्था में जाहिर है कुछ के लिए सकारात्मक तो कुछ के लिए नकारात्मक प्रभाव आये। कोई सुचिंतित स्वरूप न बन सका। गांव एकदम बदल गये। उनकी संस्कृति बदल गई। आर्थिक खाई बहुत चौड़ी हो गई। एक अच्छी बात यह हुई कि नयी पीढ़ी जाति को लेकर बहुत हठी न रही। अंतर्जातीय विवाह को स्वीकृति मिलने लगी। अगर जातिगत गठजोड़ की राजनीति न होती तो यह प्रक्रिया सामाजिक स्तर पर और सकारात्मक परिणाम लाती। इस पूंजीवादी सुनामी का सबसे चिंत्य पक्ष यह है कि इसने विचारधारात्मक सोच को खत्म कर दिया। अब बात ले-देकर प्रबंधन और अवसरवाद तक महदूद हो गई। आप माने या न माने लेकिन आधुनिक विश्व पूंजीवाद ने विकास का ऐसा स्वरूप खड़ा किया और इस तरह खड़ा किया जो अपरिहार्य था। यह तो होना ही था। इसे आप रोक नहीं सकते थे। उत्तर आधुनिकता की सोच केन्द्र में आ गई। अब चुनौती यह है कि आप दुनिया का नये सिरे से विश्लेषण करें और बेहतर बदलाव के लिए नये नैरेटिव के बारे में बारे में सोचे। यह बहुत मुश्किल काम है।

[bs-quote quote=”बहुत लंबी राह ठीक भूमंडलीकरण के पूर्व भोजपुर के गांवों का यथार्थ है। इसमें विचार दृष्टि में विन्यस्त हैं। उसकी सुराख से उपन्यास को देखना ठीक नहीं। सामाजिक जीवन के ताने-बाने लोग सायास नहीं बुनते। यह सहज प्रक्रिया है। इसमें जो सवर्ण सामंती वर्ग है वह अपने ढहते मस्तूल को भरसक थामने की कोशिश करता है। जो मजदूर वर्ग है उसे उसकी धूर्तता का पता भी है और यकीन भी। गुलामी से वह निकल नहीं सकता। मुक्ति का बीड़ा उसके लड़के ने उठाया है। यह स्पष्ट है कि किसान-मजदूर रहकर वह मुक्त नहीं हो सकता। वह विद्रोह का रास्ता चुनता है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

भूमंडलीकरण के कारण भारत के गांवों में सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर क्या बदलाव आ रहे हैं?

इसका पहला असर तो साफ दिखता है कि लोक-संस्कृति खत्म हो गई। कोई नयी संस्कृति बनी नहीं। सामंती संस्कृति के अवशेष मानस में कायम थे। पूंजीवादी संस्कृति का मवाद बहकर गांव तक पहुँच चुका था। गांव के जो पारिवारिक और सामाजिक संबंधों के मूल्य थे वे समय में गतांक होते गये। मेरी निगाह में सामंतवाद और नये पूंजीवाद की लुंपन संस्कृति ने उसकी जगह ले ली। सामाजिक शीराजा छिन्न-भिन्न हो गया। नया बना नहीं। इसमें साहित्य, कला और संगीत के लिए स्पेस ही नहीं बचा। भोगवाद लक्ष्य बन गया। पैसा और पावर के अलावा लोगों के लिए और कुछ नहीं बचा। इसके अलावा उनको और कुछ चाहिए भी नहीं। सारे मूल्य स्वाहा हो गये। समाज तेजी से इस दिशा में मुड़ा और भागने लगा। पहले समाज के लिए बाजार होता था। अब बाजार के आगोश में ही समाज आ गया।

आपने अपने उपन्यास ‘बहुत लंबी राह’ में जिन आर्थिक व सामाजिक विसंगतियों को दिखाया है, उनके मूल कारण क्या हैं? क्या आपको लगता है कि ये विसंगतियां कथित भूमंडलीकरण के बाद जो उदारवादी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं हैं, उनके कारण पैदा हुईं हैं?

बिल्कुल नहीं। बहुत लंबी राह ठीक भूमंडलीकरण के पूर्व भोजपुर के गांवों का यथार्थ है। इसमें विचार दृष्टि में विन्यस्त हैं। उसकी सुराख से उपन्यास को देखना ठीक नहीं। सामाजिक जीवन के ताने-बाने लोग सायास नहीं बुनते। यह सहज प्रक्रिया है। इसमें जो सवर्ण सामंती वर्ग है वह अपने ढहते मस्तूल को भरसक थामने की कोशिश करता है। जो मजदूर वर्ग है उसे उसकी धूर्तता का पता भी है और यकीन भी। गुलामी से वह निकल नहीं सकता। मुक्ति का बीड़ा उसके लड़के ने उठाया है। यह स्पष्ट है कि किसान-मजदूर रहकर वह मुक्त नहीं हो सकता। वह विद्रोह का रास्ता चुनता है।

यह भी पढ़ें…

झूठ का पुलिंदा है वाय आई किल्ड गांधी

देखिए पूंजीवाद को इस यथार्थ का पता है। वह हालात के मुताबिक खुद को बदलता है। उसे पता था कि इस तरह काम नहीं चल सकता। पूंजी का स्वभाव चंचला होता है। वह किसी सीमा और बंधन को नहीं मानते। उसका चरित्र सार्वभौमिक होता है। इसलिए उसे पूरी दुनिया में हस्तक्षेप करना था। भूमंडलीकरण अचानक नहीं आया। यह लंबी तैयारी के बाद आया और उपयुक्त समय आया तो उसने लागू कर दिया। यह बहुत सोच समझकर लागू हुआ। दुनिया को मुट्ठी में करने का इसे लांचिंग पैड समझ लिया। आप सिर्फ आर्थिक विसंगतियों के माध्यम से इसे मत समझिये। यह सुनामी है। इसने समाज को आमूलचूल बदल दिया है। सोच, विचार, संवेदन, स्वप्न, संघर्ष। अर्थ और आचरण भी। पारिवारिक और सामाजिक रिश्ते भी।

मेरी योजना इसके अगले भाग के लिखने की थी। मेरे अनेक मित्रों का दबाव भी था। मगर मेरे जीवन के हालात ऐसे हुए कि मुझे गांव छोड़ना पड़ा। मुझे गांव से विलग किया गया। प्रपंच ही ऐसा था। यह बात अनेक स्तरों पर मुझे सालती रही।

भूमंडलीकरण के प्रभाव को दर्ज करने या प्रतिरोध करने में साहित्य और कला की क्या भूमिका हो सकती है?

साहित्य राजनीति निर्णयों को लेकर उस तरह रियेक्ट नहीं करता जैसा अमूमन हिन्दी में दिखता है। राजनीति या किसी अन्य इरादें या ताकतों के निर्णयों अथवा हस्तक्षेप का समाज और मनुष्य पर क्या भीतरी-बाहरी असर पड़ता हैं, उसके व्यवहार, सोच और मानसिकता में क्या बदलाव आता है- साहित्य और कला उसे उपजीव्य बनाता है। यह काम न राजनीति, न इतिहास और न ही समाजशास्त्र के वश की बात है। यहीं पर साहित्य मौलिक वैशिष्ट्य उभरकर सामने आता है।

यह भी पढ़ें…

अन्य पात्र के माध्यम से घटनाओं को व्यक्त करना हमेशा ही दोयम दर्जे का होगा

भूमंडलीकरण विश्वपूंजीवाद की आधुनिक रणनीति है। वह दुनिया में पूंजी के अबाध प्रवाह को आसान करती है। उत्पाद और बाजार का वैश्वीकरण करती है। इसलिए दुनिया की राजनीति को भी अपने अनुकूल करती है। मीडिया और अनेक साधनों से वह समाज के सोच को भी बदलती है या कहिये नियंत्रित करती है। अब दुनियाभर में इसके प्रतिरोध को संभव करना अत्यंत मुश्किल काम है। लेकिन ऐसे में विश्व की बहुसंख्यक जनता की ओर से प्रतिरोध का सशक्त स्वर साहित्य और कला की ओर से ही उठता है। इसकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है।

नगरीकरण के बारे में आपकी क्या राय है? क्या आप शहरों के जीवन को गांव के जीवन से बेहतर मानते हैं?

नगरीकरण एक स्वभाविक प्रक्रिया है। यह सुविधाओं के कारण है। यातायात, बिजली, पानी, आय के साधन, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज और ऐसी अन्य सुविधाओं के कारण लोग नगरीय जीवन पसंद करते हैं। दूसरी बात यह कि गांव सामंती दबाव में रहता है और नगर व्यापारिक या औद्योगिक पूंजीवाद के। दोनों की संस्कृति अलग-अलग होती है। सामंती समाज में अपेक्षाकृत धीमी गति से बदलाव होता है जबकि पूंजीवाद में बदलाव की गति तेज। इसलिए नगरीकरण को पसंद करने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है।

यह भी पढ़ें…

पौराणिक ग्रन्थों पर रोक लगनी चाहिए, जिनसे समाज में डर और विद्वेष पैदा होता है..

‘बहुत लंबी राह’ उपन्यास ज़मींदारों, सवर्णों व बबुआन टोलों के पराभव एवं दलित चेतना के निरंतर हो रहे उभार की कहानी कहता है। जैसे कि भूमंडलीकरण के दौर में विविध विमर्शों (दलित, आदिवासी, स्त्री, ओबीसी आदि) का उदय हुआ है, इन विमर्शों का भूमंडलीकरण से सीधा रिश्ता बनता है, इन विमर्शों के प्रति आपकी क्या राय है?

देखिए, विमर्शों की बात आइडेंटिटी पालिटिक्स से जुड़ी है। यह उतना सकारात्मक और प्रगतिशील विचार नहीं है, जितना इसको बताया जाता है। यह अमेरिकी सोच है जो मार्क्सवादी सोच के विरुद्ध है। हिन्दुवादी, मुस्लिम, दलित, आदिवासी, पिछड़ावाद या स्त्री विमर्श एक ऐसा नरेटिव गढ़ता है जो शुरुआत में ही सरलीकरण का शिकार हो जाता है। एक समुदाय का हित उनकी एकता में निहित है। उस समुदाय के भीतर गरीब-अमीर, कमजोर-ताकतवर के बीच कोई अंतर्विरोध नहीं होता। इस तरह एक सीमा तक इसका सकारात्मक सुफल जरूर दिखता है लेकिन फिर उनके ही भीतर से एक वर्चस्ववादी वर्ग निकल आता है। किरदार बदल जाता है, हालात वही रह जाते हैं। मसलन वर्गीय विभेद बना रह जाता है। यह बात सही है कि भारत के वामपंथी अभी तक वर्ग और वर्ण की जटिलता को सुलझा नहीं पाये हैं। जब तक यह हल नहीं होता आप आइडेंटिटी पालिटिक्स का कुछ नहीं कर सकते। मेरी समझ में आखिरी हल वर्ग का खात्मा और समाजवाद में ही है। इसलिए आप पायेंगे इन विमर्शवादियों को विश्व पूंजीवाद की भूमंडलीकरण वाली व्यवस्था बहुत रास आती है।

कथाकार व आलोचक कर्मेंदु शिशिर

बहुत लंबी राह में विन्यस्त एक बात पर गौर कीजिए। सामंती मिसिर और प्रताड़ित उजागिर की सोच में विचार की कम भूमिका है। उनके आचरण में ताकत अधिक रोल कर रहा है। एक तरह से इनके भीतर लुंपन प्रवृत्ति है और आगे वही उसकी दिशा होती है। इस उपन्यास में नगर का समाज नहीं आया है। फिर भी आप पायेंगे पूंजीवाद और सामंतवादी समाज का लुंपन लोक आकार ले रहा है। आगे सत्ता उनकी ही होने वाली है और उनका ही वर्चस्व! व्यवस्था तो वही रह गई। सामंती और पूंजीवादी। चरित्र नहीं बदला। बस, सवर्ण की जगह गैर सवर्ण आ गये। क्या आपने विमर्शवाद के आधार पर आयी व्यवस्था में उस पूरे समुदाय के समान लाभ मिलने की बात स्वीकार कर सकते हैं? इसीलिए मैं स्थायी निदान वर्ग की सोच में ही पाता हूँ।

भूमंडलीकरण का ग्रामीण विकास पर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पहलुओं पर आपके विचार को जानना चाहूँगा।

भूमंडलीकरण का सकारात्मक प्रभाव एक तो यह पड़ा कि हर जाति और समुदाय के युवक-युवतियों में जातिगत संकीर्णता कम हुई। अंतर्जातीय विवाह की स्वीकार्यता बढ़ी। शिक्षा और आधुनिकता के प्रति लगाव और झुकाव बढ़ा। खासतौर पर स्त्री और युवतियों की सोच में बहुत परिवर्तन हुआ। स्त्री और पिछड़े-दलित के भीतर आत्मसम्मान और आत्मविश्वास आया। वे अपने अधिकार को लेकर सचेत और मुखर हुए। स्थानीयता का मोह भी कम हुआ। वे इच्छित विस्थापन की ओर बढ़े। उन्होंने देश-दुनिया को देखा और रूढ़ सामंती जकड़न से आज़ाद हुए। नकारात्मक पक्ष यह है कि उनमें अपनी मिट्टी का मोह कम हुआ। परिवार और गांव के अथवा मनुष्य के काव्यात्मक रिश्तों का खात्मा हो गया। आपसी सहयोग, भाईचारा, एकता और मदद के भाव कमजोर पड़ गए। बाज़ार की पकड़ मजबूत हुई। पैसे की अहमियत मानवीय रिश्तों पर भारी पड़ी। पूंजीवादी विकृतियां, यौन विच्युति, सामान की हवस, बेईमानी, धोखा, परस्पर अविश्वास जैसी प्रवृत्ति बहुत ज्यादा बढ़ गई। जीवन का चैन और सुकून खत्म हो गया। दरअसल, पूंजीवाद के साथ ऐसे वायरस आते ही आते हैं। आप इसको रोक नहीं सकते।

“…देखना, देखना तुम! एक दिन उलटन होगी, बहुत भारी उलटन! सब कुछ एकदम से बदल जाएगा, उलट-पुलट हो जाएगा।” आपके अनुसार मुक्ति की यह राह बहुत लंबी है, उसकी प्राप्ति के लिए अनवरत रूप से लड़ना होगा, संघर्ष करना होगा। यह लड़ाई और संघर्ष आज के संदर्भ में कितनी प्रासंगिक रह गई है?

किसी समाज, कौम या देश की मुक्ति की राह लंबी होती ही है। जैसे-जैसे जनता अपने शोषण के तंत्र को समझेगी, उसका मोहभंग होगा, उसके भीतर परिवर्तन की आकांक्षा बलवती होगी। लेकिन परिवर्तन के लिए नेतृत्व, विचारधारा और पार्टी जरूरी है। आज देखने पर आपको लग सकता है कि बहुत गतिरोध और जटिलता है। यह कैसे संभव होगा? लेकिन हर समाज, कौम या देश में ऐसे ऐतिहासिक क्षण आते हैं जब अंदर का संचित आक्रोश फूट पड़ता है और क्रांति हो जाती है। इसलिए ऐसे विचारों की निरंतरता और जनता के भीतर परिवर्तन की आकांक्षा उस तेल-बाती दीये की तरह है, जो हमेशा एक चिंगारी की प्रतीक्षा में रहती है। इसलिए कभी निराशा का साहित्य श्रेष्ठ नहीं होता। यही मेरे उपन्यास बहुत लंबी राह का मुख्य भाव-सूत्र और संदेश है।

शशांक कुमार असम विश्वविद्यालय से ‘भूमंडलीकृत ग्रामीण यथार्थ और हिंदी उपन्यास’ विषय पर शोध कर रहे हैं।

गाँव के लोग
पत्रकारिता में जनसरोकारों और सामाजिक न्याय के विज़न के साथ काम कर रही वेबसाइट। इसकी ग्राउंड रिपोर्टिंग और कहानियाँ देश की सच्ची तस्वीर दिखाती हैं। प्रतिदिन पढ़ें देश की हलचलों के बारे में । वेबसाइट की यथासंभव मदद करें।

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

लोकप्रिय खबरें