Monday, June 24, 2024
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रोज़मर्रा का संघर्ष करता गोंडा का बेहना समाज

बेहना जाति पसमांदा मुसलमानों में गिनी जाती है और पारंपरिक रूप से रुई धुनने का काम करती रही है लेकिन अब कोई भी यह काम नहीं करता। मशीनें आ जाने से उनको काम मिलना धीरे-धीरे बंद होता गया। जाड़ा शुरू होते ही अपनी धुनकी कंधे पर लिए वे दूर-दराज के इलाकों में निकल जाते और बसंत आते-आते अच्छी-ख़ासी कमाई करके वे वापस आते। बाकी के दिनों में मेहनत-मजदूरी के दूसरे काम भी करते। लेकिन बनी-बनाई रजाइयाँ आने और मशीनों की बढ़ती संख्या ने उन्हें खदेड़ दिया।

गोंडा। ‘सर क्या आप बेहना समाज के बारे में जानते हैं?’ गोंडा शहर के फारबिसगंज-पंतनगर वार्ड नंबर दो के निवासी अहमद वसी खान ने पूछा तो इनकार करने के पश्चात मेरा ध्यान सबसे पहले इस नाम पर गया- बेहना

बेहना तालाब के किनारे पैदा हो जानेवाला एक ऐसा पौधा है जिसे आम बोलचाल में बेहया भी कहते हैं। बेहया अपने आप पैदा होता है और अपने आप बढ़ता और उखड़ता रहता है। इसका तात्पर्य दुर्धर्ष भी होता है जो हर प्रकार की विपरीतताओं के बावजूद अपना अस्तित्व बचाए रखता है। इसका सकारात्मक अर्थ बहुत ताकत देता है और किसी को भी आत्महत्या करने की जगह हालात से लड़ने की प्रेरणा देता है लेकिन नकारात्मक रूप से यह नफरत और हिकारत का प्रतीक बना दिया गया है। बेहयाई शब्द इसी से निकला है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में सवर्ण अध्यापक पिछड़े और दलित विद्यार्थियों को बेहए के डंडे से बेरहमी से पीटते रहे हैं। अक्सर सवर्ण अध्यापक उसी विद्यार्थी से बेहये का डंडा मँगवाते और उसी से धुनने की शुरुआत करते और इतना धुनते कि विद्यार्थी स्कूल से तौबा कर लेते। वे अध्यापक चाहते ही यही थे। जो इस पिटाई को झेलकर भी स्कूल में बना रहता उसे वे बेहया कहते और अपमानित करते। पैंतालीस-पचास साल पहले का शायद ही कोई दलित और पिछड़ा विद्यार्थी होगा जिसकी पीठ पर बेहये के डंडे से इबारत न लिखी गई हो।

इसलिए जब अहमद वसी ने बेहना समाज के बारे में बताया तो मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ। कोई समाज बेहना कैसे हो सकता है? आखिर कौन लोग हैं? मुझे राही मासूम रज़ा के उपन्यासों हिम्मत जौनपुरी और ओस की बूँद की याद आ आई जिनमें इस बात का ज़िक्र है कि बड़े मियाँ लोग छोटे लोगों का पूरा नाम या तो लेते नहीं अथवा बिगाड़ कर लेते हैं। मुहम्मद हुसैन दर्ज़ी को वे कभी मुहम्मद हुसैन नहीं कहते बल्कि मसैन कहते हैं। नजीबुन्निशा चाहे कितनी सुंदर हो लेकिन जुलाहे की बेटी है तो उसे नजबुनिया ही कहा जाएगा।

जब हम बेहना मुहल्ले में पहुंचे तब सुबह के आठ बजे होंगे और अनेक लोग अपने दरवाजे पर बैठे थे। माहौल में जिस तरह से पेशाब और कूड़े की बदबू मिश्रित थी वैसे में सामान्यतः जाना अच्छा न लगता और खासतौर से तब तो बिलकुल नहीं जब कोई ऐसे माहौल में भी ठीक से बात करने को तैयार न हो। ऐसी स्थितियाँ प्रायः देखने में आती हैं जब लोग सोचते हैं कि हम किसी सरकारी योजना का सर्वेक्षण करने आए हैं तब वे दिलचस्पी लेते हैं और उम्मीद करते हैं कि उन्हें किसी योजना का लाभ मिलेगा। लेकिन यह बताने पर कि हम लोगों के जीवन का अध्ययन कर रहे हैं तो वे मुंह बिचकाते हुये इधर-उधर छिटक जाते हैं। वहाँ मौजूद कुछ महिलाओं से जब हमने नाम पूछा तो आपस में वे दूसरे से मुस्कराकर कहने लगीं- नाम बता द हो।

एक बड़े मकान के पास कुछ बेलदार बालू चाल रहे थे। सीढ़ियों की रेलिंग पर किसी ने लिख दिया था- मैं चोर हूँ। हर दरवाजे पर बकरियाँ बँधी थीं और कुछ बत्तखें व मुर्गियाँ चारे की खोज में एक-दूसरे से लड़-झगड़ रही थीं। एक महिला सफाईकर्मी मुहल्ले का कूड़ा उठा रही थी। नालियों में बहता पानी ओवरफ़्लो कर रहा था। इस बारे में एक स्थानीय नेता ने बताया कि ‘वार्ड नंबर दो के सभासद मोहित कुमार कनौजिया से हमने कई बार शिकायत की लेकिन यह आजतक ठीक नहीं हुआ।’

बसीदा

बेहना जाति पसमांदा मुसलमानों में गिनी जाती है और पारंपरिक रूप से रुई धुनने का काम करती रही है लेकिन अब कोई भी यह काम नहीं करता। मशीनें आ जाने से उनको काम मिलना धीरे-धीरे बंद होता गया। जाड़ा शुरू होते ही अपनी धुनकी कंधे पर लिए वे दूर-दराज के इलाकों में निकल जाते और बसंत आते-आते अच्छी-ख़ासी कमाई करके वे वापस आते। बाकी के दिनों में मेहनत-मजदूरी के दूसरे काम भी करते। लेकिन बनी-बनाई रजाइयाँ आने और मशीनों की बढ़ती संख्या ने उन्हें खदेड़ दिया। अब वे जीवन चलाने के लिए दूसरे कामों में लग गए हैं। मैंने एक बुजुर्ग स्त्री बसीदा से पूछा कि क्या किसी के पास धुनकी है? तो उन्होंने कहा पता नहीं किस ज़माने से ही वह अब कहीं नहीं है।

बसीदा के बड़े बेटे मुख्तार अली, जिनके साथ वे रहती हैं

बसीदा पचहत्तर साल की हैं और अब स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों से जूझ रही हैं। वह बताती हैं कि उनके बाप-दादा धुनिया थे लेकिन अब हमारे घर में धुनिया का काम कोई नहीं कर रहा है। वह कहती हैं कि ‘उन्हें दस हज़ार रुपये पेंशन मिलती है। सात दिन की मेरी दवा पंद्रह सौ रुपये में आती है। पाँच सौ रुपया डॉक्टर की फीस होती है। कैसे जिएंगे?’ बसीदा बेवा हैं। उनके पति चौकीदार थे। उनके दो बेटों में से एक अपने पिता की जगह पर चौकीदारी करता है और दूसरा मजदूरी करता है। बसीदा कहती हैं कि छोटा बेटा मुझे दस पैसा भी नहीं देता। उसकी औरत ऊपर से मारती और भगाती है।

दो साल पालने के बाद बकरीद में बकरे बेच दिए जाते हैं

उनके पास ही उनके बड़े बेटे मुख्तार अली खड़े हैं जो ठेला चलाते हैं। पान से रंगे होठों वाले मुख्तार बताते हैं कि हम पढ़े-लिखे नहीं हैं। चार-चार बेटियाँ हैं। सभी बच्चियाँ पढ़ रही हैं। लेकिन ठेला रोज नहीं लग पाता इसलिए गृहस्थी की गाड़ी खींचतान कर चलती है।

पास में ही सफिया बैठी थीं। उनके पास तीन बकरियाँ हैं जिन्हें वे चराती हैं। वह बताती हैं कि दो साल पालने के बाद उन्हें बेचने से प्रति बकरी पाँच-छः हज़ार रुपये मिल जाते हैं। लेकिन बकरीद में जब भाव ज्यादा होते हैं तब बेचने के लिए बकरियाँ ही नहीं होती हैं। उनके कुल सात बच्चे हैं जिनमें चार बेटियाँ और तीन बेटे हैं। सफिया कहती हैं हम तो और भी कुछ काम करना चाहते हैं लेकिन इस शहर में हमारे लिए कोई रोजगार नहीं है। चूल्हा-चौका इसलिए नहीं करतीं कि अपने ही घर में ढेरों काम करने होते हैं।

इस मुहल्ले में केवल धुनिया ही नहीं बल्कि हज्जामों के भी कई परिवार हैं। एक महिला ने बताया कि वह प्रसूता महिलाओं को तेल मालिश करने का काम करती हैं। इस काम से वे डेढ़-दो हज़ार रुपये महीने कमा लेती हैं। एक बार के लिए उन्हें पचास रुपये मिलते हैं। उनकी जजमानी पचास घरों की है।

समायरा खातून

नई पीढ़ी के युवा भी अपने माँ-बाप की तरह अपनी सीमाएं जानते हैं। हालाँकि वे स्कूल जाते हैं लेकिन उनके पास पैसे के साथ ही नए सपनों का भी अभाव है जिसके कारण वे अपनी सही दिशा तय नहीं कर पा रहे हैं। इस मुहल्ले के आशिक अली 18 साल के हैं और पढ़ाई के साथ-साथ सिलाई का भी काम कर रहे हैं। वह बताते हैं कि ‘मैं लेडीज टेलर हूँ। पिछले साल ग्यारहवीं पास करके बारहवीं में गया हूँ। पढ़ाई के साथ काम करना बहुत जरूरी है नहीं तो गुजर नहीं होगी।

हर शहर में सबसे अधिक उपेक्षित होते हैं रिक्शेवाले

लेकिन आगे वे क्या करेंगे? इस सवाल का उनके पास कोई माकूल उत्तर नहीं है। वह कहते हैं कि अगर कोई नौकरी मिल गई तो ठीक है वरना सिलाई तो एक विकल्प है ही। मैंने जब पूछा कि तुमको मालूम है कि तुम पिछड़ी जाति में आते हो और अगर पढ़ाई पूरी करने पर तुम्हें सरकारी नौकरी पाने के लिए आरक्षण का लाभ मिल सकता है?’ उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है इसलिए उन्हें इंकार में सिर हिलाया।

रूबीना जो कागज का ठोंगा बनाकर मुश्किल से घर चला पाती हैं (पीछे उनका घर)

पचास वर्षीय रूबीना तो बात करना ही नहीं चाह रही थीं। किसी तरह उन्होंने अपना नाम बताया और कहा कोई काम नहीं है, बस ऐसे ही बैठे-रहते हैं।आदमी नहीं है और दो बेटियां हैं। जिसमें एक बेटी शादी के लायक है। कभी-कभी कागज का ठोंगा(लिफाफा)बनाने का काम करती हूँ। एक दिन में बीस-पचीस लिफाफा बना लेती हूँ लेकिन दुकान वालों को जब जरूरत होती है तब वे चालीस-पचास ले जाते हैं। तीस रूपये किलो अखबार कबाड़ी वालों से खरीदते हैं। ऐसे में घर का खर्च चलाना भी मुश्किल है। विधवा पेंशन मिलती है लेकिन हर महीने नहीं मिलती 6-7 महीने में आती है।

गरीब बस्तियों और मुहल्लों में रहनेवाली पिछड़ी और दलित जातियों को यह नहीं पता है कि शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करते हुये उन्हें आरक्षण की सुविधा दी गई है। अगर वे उच्चतर योग्यता हासिल करते हैं तो उन्हें अनारक्षित वर्ग में जाने से कोई नहीं रोक सकता लेकिन यदि वे सामान्य अर्हता हासिल करते हैं तो तय आरक्षण का लाभ उठा सकते हैं।

असल में ऐसी बस्तियों में जितनी शिद्दत से लाल कार्ड, पीला कार्ड और सफ़ेद कार्ड पर चर्चा होती है उस तरह किसी भी बुनियादी प्रश्न पर कोई बात नहीं होती। राजनीतिक विमर्श की यही सीमा है जिसके परिणाम स्वरूप जनता ने इसी चीज को अपनी नियति मान ली है। इसलिए राशन और दवाओं को लेकर जिस तरह की मारामारी और भ्रष्टाचार दिखता है ठीक उसी तरह राजनीतिक धोखेबाजियों पर किसी की नज़र नहीं जाती। मसलन सफिया का कहना था कि ‘मेरे पास सफ़ेद कार्ड है और कभी भी मुझे पूरा अनाज नहीं मिलता।’ कुछ और लोग नाली में बहते पानी को लेकर नाराज थे।

गंदगी और बदबू से पटे पड़े इस मुहल्ले में समस्याओं का कोई अंत नहीं है। लोग रोज़मर्रा की तंगहाली से जूझ रहे हैं। इसी मुहल्ले में बारह साल का सादिक़ भी मिला जो आठवीं में पढ़ता है और अंग्रेज़ी शब्दों का सही उच्चारण करता है। उसकी दिलचस्पी गणित और अंग्रेज़ी में है। मैंने पूछा कि आगे क्या करोगे तो उसने छूटते ही जवाब दिया ‘मैं जज बनने का सपना देखता हूँ!’

रामजी यादव कथाकार और गाँव के लोग के सम्पादक हैं। 

4 COMMENTS

  1. विकास के महापुरुषों को ऐसी जगह का भी संज्ञान लेना चाहिए और उनकी समस्यों को सुनते निराकरण करना चाहिए। सम्पूर्ण लेख में बेहया की सुंदर व्याख्या हुई हे।

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