Wednesday, February 28, 2024
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है सब्ज:जार हर दर-ओ-दीवार-ए-गमकद (डायरी 7 मई, 2022) 

मिर्जा गालिब अलहदा साहित्यकार रहे। उनकी रचनाएं संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं। हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि जो गालिब को पढ़ता-समझता हो, वह एकदम से अत्याचारी नहीं ही होगा। लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि गालिब को पढ़नेवालों में इंसानियत का पक्ष मजबूत होता है। बेशक कुछ अपवाद भी होंगे। दरअसल, गालिब की […]

मिर्जा गालिब अलहदा साहित्यकार रहे। उनकी रचनाएं संवेदनशीलता को बढ़ाती हैं। हालांकि मैं यह नहीं कह सकता कि जो गालिब को पढ़ता-समझता हो, वह एकदम से अत्याचारी नहीं ही होगा। लेकिन यह जरूर कह सकता हूं कि गालिब को पढ़नेवालों में इंसानियत का पक्ष मजबूत होता है। बेशक कुछ अपवाद भी होंगे। दरअसल, गालिब की रचनाएं मुझे बाजदफा द्रव के समान महसूस होती हैं। आप चाहे जिस बर्तन में डाल लें, वैसा ही आकार धारण कर लेती हैं। लेकिन उनकी रचनाएं अपना रंग नहीं छोड़तीं।
मेरे लिए तो गालिब सवाल भी हैं और जवाब भी। कल देर रात कुछ सवालों के बीच घिरा था तो गालिब की याद आयी। एक रचना पर नजर पड़ी–
है सब्ज:जार हर दर-ओ-दीवार-ए-गमकद:
जिसको बहार यह हो, फिर उसकी  खिज़ां न पूछ।
नाचार बेकसों की भी हसरत उठाइए,
दुश्वारि-ए-रह-ओ-सितम-ए-हमरहां न पूछ।

मिर्ज़ा ग़ालिब

गालिब मुझ जैसे अल्पज्ञ के लिए इतने सहज नहीं हैं। शब्दकोश की सहायता लेनी पड़ती है। मसलन, उपरोक्त रचना में ही पांच शब्द हैं, जिन्हें समझने के लिए मुझे शब्दकोश की सहायता लेनी पड़ी। फिर जो मतलब समझ में आया, उसमें मुझे अपना व्यक्तिगत जीवन और मुल्क के हालात दोनों नजर आए। आप भी उपरोक्त रचना को समझने का प्रयास करें। सब्ज:जार का मतलब हरियाली है और दर-ओ-दीवार-ए-गमकद का मतलब शोक गृह के दरवाजे और दीवार। वहीं खिज़ां का अर्थ है– पतझड़।
मैं यह बात इसलिए कह रहा हूं कि आज पूरे मुल्क में यही हालात हैं। अखबारों ने कसम खा रखी है कि उन्हें इस देश में जागरूक नागरिक समाज नहीं, बल्कि ऐसा समाज चाहिए जिसमें सबके सब गुलाम हों। अब जब जिस देश के अखबार ही ऐसे होंगे तो उस देश के समाज के पतन के बारे में क्या सोचना। कहने का मतलब यह कि पतन निश्चित ही है।

[bs-quote quote=”भारतीय मीडिया भारतीय हुकूमत की विफलता के बजाय विश्व स्वास्थ्य संगठन को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। मसलन, आजतक नामक न्यूज चैनल ने एक विशेष खबर का प्रसारण किया, जिसका शीर्षक रहा– ‘क्या चीन के दबाव में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में कोरोना से मौत के आंकड़े ज्यादा बता दिए?’ अमर उजाला जैसा अखबार भी इस मामले में रत्ती भर भी पीछे नहीं है। उसने तो एक खबर ही छप दी– ‘डब्ल्यूएचओ के दावों पर सवाल, भारत के आंकड़े हैं पुख्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस मॉडल से की गुणा-भाग।'” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

अब कल की ही बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि अमन-चैन के लिए विश्व के सारे देश बड़े भरोसे के साथ भारत की ओर देख रहे हैं। मोदी कल जैन अंतरराष्ट्रीय व्यापार संगठन के एक कार्यक्रम को वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए संबोधित कर रहे थे। उनका यह बयान तब आया है जब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है कि भारत में कोरोना के कारण 47 लाख लोग मारे गए हैं। इतना ही नहीं, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने यह भी कहा है कि हर तीसरा मृतक भारतीय था। जबकि भारत सरकार ने इस आंकड़े पर ऐतराज जताया है और उसने केवल 8 लाख लोगों के मारे जाने की बात कही है।
दिलचस्प यह है कि भारतीय मीडिया भारतीय हुकूमत की विफलता के बजाय विश्व स्वास्थ्य संगठन को ही कटघरे में खड़ा कर रही है। मसलन, आजतक नामक न्यूज चैनल ने एक विशेष खबर का प्रसारण किया, जिसका शीर्षक रहा– ‘क्या चीन के दबाव में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भारत में कोरोना से मौत के आंकड़े ज्यादा बता दिए?’ अमर उजाला जैसा अखबार भी इस मामले में रत्ती भर भी पीछे नहीं है। उसने तो एक खबर ही छप दी– ‘डब्ल्यूएचओ के दावों पर सवाल, भारत के आंकड़े हैं पुख्ता, विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस मॉडल से की गुणा-भाग।’
जबकि यह सभी जानते हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े झूठे नहीं हैं। यह सबने कोरोना के पहली और दूसरी लहर के दौरान श्मशानों और कब्रिस्तानों के दृश्यों को देखा है। यह भी देखा है कि कैसे गंगा में लाशें तैर रही थीं।

[bs-quote quote=”रतीय मीडिया पर द्विजों का कब्जा है और यह वर्ग अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित रखने के तमाम प्रयास करता ही रहा है। लेकिन अब वह दौर नहीं है। अब खबरें द्विजों की बपौती नहीं हैं कि वे अपनी मनमर्जी कर सकें। खबरें तो लोगों तक पहुंचेंगी ही। इस देश के बहुसंख्यकों ने इसके उपाय खोज लिए हैं अैर निश्चित तौर पर इसमें सोशल मीडिया की अहम भूमिका है।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

 

दरअसल, यह दौर पत्रकारिता के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। दो तरह की पत्रकारिता हमेशा से की जाती रही है। एक जनपक्षीय पत्रकारता और दूसरी सत्ता पक्ष की पत्रकारिता। कल की ही बात है। हिंदी के जाने-माने साहित्य समालोचक कंवल भारती ने अपने एक लेख में गणेश शंकर विद्यार्थी की चर्चा की। भारत का द्विज समाज इन्हें पत्रकारिता के मामले में एक मिसाल के रूप में पेश करते हैं। अपने लेख में कंवल भारती ने अछूतानंद के द्वारा चलाए गए आदि धर्म आंदोलन के बारे में गणेश शंकर विद्यार्थी के एक आलेख को उद्धृत किया है। अपने आलेख में द्विजों के आदर्श विद्यार्थी अछूतानंद के आंदोलन पर सवाल उठाए। विद्यार्थी ने 27 अप्रैल, 1925 को ‘प्रताप’ में लिखा था–  ‘उत्तरी भारत में एक नए आंदोलन का जन्म हुआ है। उसे हम ‘आदि हिंदू आंदोलन’ के नाम से पुकार सकते हैं। उसका उद्देश्य यह है कि हिंदुओं में जो लोग नीच जाति के समझे जाते हैं, और इसलिए समाज के अनेक क्षेत्रों में आगे नहीं बढ़ पाते, उनके विकास और उन्नति के लिए उनका पृथक संगठन किया जाए। अभी तक उत्तरी भारत में भेद की यह रेखा नहीं खिंची थी। अब यहां भी इसका जन्म हुआ है। स्वामी हरिहरानंद, उर्फ अछूतानंद नाम के एक सज्जन इस काम के प्रधान सूत्रधार हैं। कुछ लोग कहते हैं कि स्वामी जी पहले चमार थे, फिर ईसाई हुए, और फिर शुद्ध होकर इस आंदोलन के कर्ता-धर्ता बने। लोग यह भी कहते हैं कि वे (अंग्रेज) अधिकारियों से मिले हुए हुए हैं, और उनके इशारे और सहायता पर हिंदुओं में फूट डाल रहे हैं और नीच जातियों को ऊंची जातियों से लड़ा रहे हैं।’
तो यह आज की केवल बात नहीं है। भारतीय मीडिया पर द्विजों का कब्जा है और यह वर्ग अपने वर्गीय हितों को सुरक्षित रखने के तमाम प्रयास करता ही रहा है। लेकिन अब वह दौर नहीं है। अब खबरें द्विजों की बपौती नहीं हैं कि वे अपनी मनमर्जी कर सकें। खबरें तो लोगों तक पहुंचेंगी ही। इस देश के बहुसंख्यकों ने इसके उपाय खोज लिए हैं अैर निश्चित तौर पर इसमें सोशल मीडिया की अहम भूमिका है।
बहरहाल, कल अछूतानंद जी और छत्रपति शाहूजी महाराज को याद करने का दिन था। शाहूजी महाराज ने 1902 में अपनी रियासत कोल्हापुर में 50 फीसदी पद शूद्रों व दलितों के लिए आरक्षित कर दिया था। भारतीय इतिहास में ऐसा करनेवाले वे पहले शासक हुए। उन्हें कविता के माध्यम से श्रद्धांजलि देने की ख्वाहिश हुई।
अलबेला था वह
बड़ा वीर वह मस्ताना था।
ब्राह्मणों की साजिश को जिसने
बहुत खूब पहचाना था।
शिवाजी का वंशज वह
सभी शूद्रों-दलितों का रक्षक था,
लागू कर आरक्षण जिसने
दूर धकेला जो समाज का तक्षक था।
आंबेडकर जिनका मान थे करते
वह महान फुलेवादी था,
लिया था समता का संकल्प जिसने
महान राजा वीर बड़ा फौलादी था।
दुनिया कहती शाहूजी महाराज जिन्हें
करते हम नमन शत बार उन्हें,
धन्य थे वे हमारे पुरखे
हम कृतज्ञ प्रकट करते सम्मान उन्हें।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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