क्या आपने गुलामगीरी पढ़ा है?

कल्पनाथ यादव

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क्या आपने गुलामगीरी  पढ़ा है? क्या आपके जीवन और चिंतन को इस किताब ने बिना विचलित किए छोड़ दिया? मुझे लगता है यह प्रश्न आज भारत के सभी श्रमजीवी समाजों में उठाया जाना चाहिए और गुलामगीरी  को पढ़ने के लिए एक ललक और गुलामी के विचारों तथा व्यवहारों का अहसास और उससे मुक्ति के लिए गहरी बेचैनी पैदा करनी चाहिए। यह कसक आज के हर उस प्रबुद्ध व्यक्ति के दिल में होनी चाहिए जो अपने समाज को बदलते धार्मिक और आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गुलामी से मुक्त होकर प्रगतिशील, नवोन्मेषशील और मानवीय देखना चाहता है। यह दायित्व पिछड़े, दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक समाज के हर उस व्यक्ति का है, जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्षम है। उसे बंदूक से भी तेज उन विचारों को समाज में बाँटना चाहिए जो गिरी हुई इंसानियत और इंसानी नस्लों में मुक्ति के लिए आग पैदा करते हैं। और इसके लिए उसे अपनी वैचारिक और सांस्कृतिक विरासत की पहचान करनी चाहिए और अपनी किताबों की पहचान करनी चाहिए और अपनी सभाओं में जोरदार ढंग से उन पर बात करनी चाहिए। उसे लोगों के बीच विचारों की शान की तरह जाना चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं करता तो वह गुलाम और ब्राह्मणवाद के सांस्कृतिक कुत्ते से ज्यादा कुछ नहीं है, जिसके काटने और चाटने दोनों से समाज का अहित है।

ज्योतिबा फुले के लेखन में गुलामगीरी भारतीय समाज में ब्राह्मणवाद द्वारा हजारों वर्षों से फैलाए घटाटोप पर तर्क और स्वतन्त्र चिन्तन की बेमिसाल रोशनी है। ब्राह्मणों द्वारा स्थापित आधारहीन अतार्किक मान्यताओं और झूठों पर गुलामगीरी  तर्क की कुल्हाड़ी चलाकर हमें यह मानने को बाध्य करती है कि मनुष्य की चेतना बहुत काल तक बंधक नहीं रखी जा सकती। मानव मस्तिष्क को बहुत समय तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ कर रखना असम्भव है। सृष्टि का निर्माण जिस भी प्रकार हुआ हो लेकिन वह ब्राह्मण के द्वारा बताए गए हास्यास्पद तरीके से तो नहीं ही हुआ है। गुलामगीरी  अपनी बात यहीं से शुरू करती है। धोंडीराव के उत्सुकतापूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने के क्रम में ज्योतिबा फुले ने ब्राह्मणवादी ‘सामाजिक संरचना’ एवं संस्कृति की पोल खोल दी है। धूर्ततापूर्ण विचारों और स्थापनाओं की धज्जियाँ उड़ाते हुए फुले ने उनके दूसरे पहलू के सत्य को उद्धृत किया है। फुले बातचीत के क्रम में अपने तर्कों को मजबूती से रखते हुए ब्राह्मण-मिथकों और अवधारणाओं के खोखलेपन को सहज तार्किक तीक्ष्णता से ध्वस्त कर देते हैं। ब्राह्मणों ने अपनी श्रेष्ठता और वर्चस्व को स्थापित करने के लिए इतिहास में झूठ और भ्रम का ऐसा संजाल बुना जिसमें उलझकर भारतीय समाज हजारों वर्षों से मानसिक गुलामी की अंधी खोह में भटक रहा है। गुलामगीरी  इसी मिथ्या और भ्रम के संजाल के रेशों को उधेड़ कर ब्राह्मणवादी धूर्तता की पोल खोलती है।

अवतार ब्राह्मण का एक सफल और सर्वाधिक सम्भावनाओं से भरा हथियार सिद्ध हुआ। अपने नायकों को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्हें अपनी सारी कपोल कल्पनाओं को साबित करने का एक आधार और तरीका मिल गया। मछली, कछुआ, सुअर किसी भी रूप में अपने ईश्वर की स्थापना करते हुए ब्राह्मण वास्तव में अपने हर पाखंड की स्वीकृति हथियाता जा रहा था।

आज ब्राह्मणवाद अपने सबसे नंगे और घिनौने स्वरूप में सत्ता एवं समाज को अपनी जकड़न में ले चुका है। संस्कृति और इतिहास में झूठ, पाखंड और धूर्त विचारों की भारी मिलावट की जा रही है। धर्म को बाजार में खड़ा कर आस्था की बोली लगाई जा रही है। ऐसे समय में हमें गुलामगीरी के नजरिये से ब्राह्मणवादी पाखंडों का खुलासा करते हुए समाज में तार्किक एवं वैज्ञानिक चेतना का प्रसार करना बहुत जरूरी है। अपने को सबसे उच्च और श्रेष्ठ बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने सृष्टि के उद्भव को ही इतने धूर्ततापूर्ण तरीके से चित्रित किया कि हजारों वर्षों तक ज्ञान एवं शिक्षा से वंचित समाज उसे ही परम सत्य मानता रहा है और आज भी उसे सम्मान और श्रेष्ठता प्रदान करता है।

ब्राह्मण स्वयं को ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न बताता है और अन्य वर्णों को उसी क्रम में बाहु, उदर एवं पैर से उत्पन्न बताकर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करता है। इसके लिए वह अनेक ग्रन्थों की रचना करके अपनी स्थापना के मिथ्या तथ्यों की माटी रस्सी को हजारों सालों के लिए लोगों के गले में डाल देता है। हजारों साल तक ब्राह्मणों ने अपनी शिक्षा और ज्ञान को गोपनीय रहस्य बनाकर उसके आतंक को लोगों के मन-मस्तिष्क पर जमाए रखा और लोगों की तर्कशक्ति को कुन्द कर दिया। फुले इस गोपनीय और रहस्यमयी ज्ञान के आतंक को तर्क की तीक्ष्ण कुल्हाड़ी से टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं। ब्रह्मा के मुख से उत्पन्न ब्राह्मण की उद्भव-प्रक्रिया का मखौल उड़ाते हुए उन्होंने इस मिथक को बिल्कुल हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण सिद्ध कर दिया है।

‘सावित्री ब्रह्मा की पत्नी है फिर भी ब्रह्मा ने बच्चे को पैदा करने का बोझ नौ मास तक अपने मुख में थामने, उसे जन्म देने और पालन-पोषण करने का झंझट अपने सिर क्यों ले लिया? यह भी एक बहुत हैरत की बात है।’

इस दृष्टि से जब हम ब्राह्मणों द्वारा रचे गए पाखंडों की तह में जाने की कोशिश करते हैं तो यह साफ हो जाता है कि अपनी श्रेष्ठता की अनन्त झूठी कहानियों को रचते हुए उन्होंने चमत्कारपूर्ण झूठों का पुलिन्दा ही बाँधा है एवं तथ्य और तर्क से उसका दूर-दूर तक कोई सम्बंध नहीं है। लोग इन कपोल-कथाओं पर विश्वास करने लगे। यही उनका मूल ध्येय था और वे इसमें कालान्तर में सफल हुए। आक्रमणकारी के रूप में ईरान आदि देशों से आए ब्राह्मण यहाँ के मूलनिवासी मनुष्यों के प्रति घृणा और प्रकृति के विनाश की संस्कृति के वाहक बनकर आए थे। यही कारण है कि अपनी भूमि से खदेड़े जाने के बाद ये जहाँ बसे वहाँ अपने अमानवीय कृत्यों की पराकाष्ठा तक गए। गुलामगीरी का हर कथोपकथन ब्राह्मणवादी मिथकों, कथाओं की बखिया उधेड़कर यह तथ्य स्थापित करता है कि मानसिक गुलामी की औषधि तर्क और बहुआयामी दृष्टि ही है। इसी को औजार बनाकर मनुष्य अन्धी आस्थाओं और अज्ञानी भक्ति के दलदल से निकलने में सफल होगा।

सावित्री ब्रह्मा की पत्नी है फिर भी ब्रह्मा ने बच्चे को पैदा करने का बोझ नौ मास तक अपने मुख में थामने, उसे जन्म देने और पालन-पोषण करने का झंझट अपने सिर क्यों ले लिया? यह भी एक बहुत हैरत की बात है।

गुलामगीरी  में फुले ने ब्रह्मा के चार मुख, आठ भुजाओं और विभिन्न मिथकों को सीधे-सादे तर्क से खारिज करते हुए उसे एक हास्यास्पद परिघटना में बदल दिया है। इसी प्रकार आगे चलकर शेषशायी विष्णु की नाभि से कमलनाल का उद्भव और उसमें ब्रह्मा का चारमुखी आकार और भी विचित्र और मनगढ़न्त कपोल कल्पना है। फुले ने ब्राह्मणवाद द्वारा फैलाए गए गहरे अंधकार को काटते हुए उस मूल धारा की नष्ट हो चुकी अस्मिता को प्रकाश में लाने के लिए ब्राह्मणवादी स्थापनाओं पर जमकर प्रहार किया है और अपनी तर्क-दृष्टि से उन्हीं मिथकों को उल्टा टाँग दिया है जिनके बल पर ब्राह्मण अपने वर्चस्व की स्थापना करता है। मूल निवासियों की पराजय के बाद ब्राह्मण उन्हें बहुविधि अनेकानेक वर्जनाओं और निषेधों से घेर कर क्रमश: अशक्त कर देता है और श्रम पर आधारित पूर्णत: मानवीय संस्कृति का विनाश कर उसके ऊपर अपनी शोषण और हराम की खाने वाली संस्कृति का आरोपण करता है। सामाजिक संरचना में अपने को सर्वोच्च और सम्मानजनक पद पर स्थापित करने के लिए स्वयं को देवता के रूप में प्रतिष्ठित करता है और श्रमशील एवं शिल्पकार समूहों के श्रम के बल पर सारे सुख का प्रथम भोक्ता बन जाता है।

‘आगे चलकर कहीं कोई निर्धारित नियमों की उपेक्षा अथवा तिरस्कार न कर दे, इस भय से उन्होंने ब्रह्मा के बारे में बहुविधि नवीन कल्पित कथाएँ रच ली तथा दासजनों के मन पर छाप बिठा दी कि ये कपोल कल्पित कथाएँ ईश्वरेच्छा से निर्मित हुई हैं।’

अवतार ब्राह्मण का एक सफल और सर्वाधिक सम्भावनाओं से भरा हथियार सिद्ध हुआ। अपने नायकों को ईश्वर के अवतार के रूप में प्रस्तुत करते हुए उन्हें अपनी सारी कपोल कल्पनाओं को साबित करने का एक आधार और तरीका मिल गया। मछली, कछुआ, सुअर किसी भी रूप में अपने ईश्वर की स्थापना करते हुए ब्राह्मण वास्तव में अपने हर पाखंड की स्वीकृति हथियाता जा रहा था। पाखंड, चमत्कार और अमूर्त विचारों की धुंधभरी पगडंडियों पर भटकते समाज को इन कर्मकांडों और निरर्थक बातों पर विश्वास कर लेना अधिक सरल और सुविधाजनक था और ब्राह्मण के लिए यह स्थिति निरन्तर सुखद और शुभ-लाभ युक्त होती जा रही थी।

कच्छपावतार, नृसिंहावतार, मत्स्यावतार पर फुले का तर्क और समानान्तर प्रत्याख्यान ब्राह्मण-कथाओं के खोखलेपन को उजागर करते हैं और वे उनका विश्लेषण मानवीय दृष्टिकोण से करते हुए उनके गर्हित स्वरूप और सत्य को हमारे समक्ष खोलते हैं। ब्राह्मण वस्तुत: कुटिलता और धूर्तता के सहारे मूलनिवासी समाज के वर्चस्व और सम्मान का हरण कर उसे दास की भूमिका में लाता है और राजसत्ता एवं सम्पत्ति का मालिक बनता जाता है।

ज्योतिबा फुले के लेखन में गुलामगीरी भारतीय समाज में ब्राह्मणवाद द्वारा हजारों वर्षों से फैलाए घटाटोप पर तर्क और स्वतन्त्र चिन्तन की बेमिसाल रोशनी है। ब्राह्मणों द्वारा स्थापित आधारहीन अतार्किक मान्यताओं और झूठों पर गुलामगीरी तर्क की कुल्हाड़ी चलाकर हमें यह मानने को बाध्य करती है कि मनुष्य की चेतना बहुत काल तक बंधक नहीं रखी जा सकती। मानव मस्तिष्क को बहुत समय तक गुलामी की जंजीरों में जकड़ कर रखना असम्भव है। सृष्टि का निर्माण जिस भी प्रकार हुआ हो लेकिन वह ब्राह्मण के द्वारा बताए गए हास्यास्पद तरीके से तो नहीं ही हुआ है। गुलामगीरी अपनी बात यहीं से शुरू करती है।

वाराह की मृत्यु के बाद द्विज लोगों का नेता नृसिंह स्वभाव से लोभी, ढोंगी, विश्वासघाती, कपटी, घातक, निर्दय और क्रूर था। वह शरीर से अति सुदृढ़ और बलवान था।

अपने इन्हीं प्रभावशाली गुणों के सहारे नृसिंह ने हिरण्यकश्यप के राज्य का अपहरण किया। द्विज-अध्यापक की शिक्षाओं से हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रहलाद को भक्त बनाकर उसे पिता के विरुद्ध खड़ा कर दिया और उसी के माध्यम से उसके महल में घुस कर हिरण्यकश्यप की हत्या करता है। विप्र-वर्चस्व की यह लड़ाई हिरण्यकश्यप के पड़पोते बलि तक चलती रहती है। ब्राह्मणों का नेता वामन बलि के राज्य को हस्तगत करने के लिए खूब प्रपंच रचता है और सेना के साथ बलि के राज्य की सीमा पर आ जाता है। प्रजा को पीड़ित करता हुआ वामन बलि की राजधानी तक आ जाता है। वह बहुत ही लोभी, छली, साहसी और अड़ियल दिमाग का था। फुले ने इस धूर्त वामन की कारस्तानियों को तर्क के सहारे ध्वस्त करते हुए पूछा कि जब उसका सिर आकाश में था तो उसने जोर से बली से सवाल किया होगा तब क्या भारत के अलावा दूसरे देशों में उसकी आवाज सुनाई पड़ी थी? वह किस भाषा में बोला था? सारे ब्राह्मणवादी मिथकों और कथाओं की तार्किक मीमाँसा करने के साथ उसके महीन रेशों को एक पूर्ण लौकिक सामाजिक दृष्टि से उधेड़ती हैं। इसके फलस्वरूप उस आख्यान का एक प्रत्याख्यान रच दिया है जो सांस्कृतिक एवं यथार्थवादी साक्ष्यों से परिपुष्ट भी होता जाता है। इस सन्दर्भ में बलिराजा की सम्पूर्ण कथा विचारणीय है। इसी कथा के क्रम में फुले संस्कृति एवं परम्परा के सारे सूत्र जुटाकर एक वैकल्पिक और अधिक यथार्थ कथा प्रस्तुत करते हैं तथा ब्राह्मणों की अविश्वसनीय चमत्कारपूर्ण कथा की खिल्ली उड़ाते हुए उसे नितान्त कपोल-कल्पित और मूर्खतापूर्ण सिद्ध कर देते हैं।

इसी प्रकार परशुराम के मिथकीय चरित्र की जाँच करते हुए फुले ने उसे स्वभाव से उपद्रवी, साहसी, दुष्ट, निर्दय मूर्ख तथा अधम कहा है जो अपनी जन्मदात्री माता का सिर काट देने में क्षणमात्र भी नहीं हिचकिचाया। उसका शरीर बहुत बलवान था और साथ ही वह कुशल धनुर्धारी भी था। ब्राह्मण परशुराम को आदिनारायण का अवतार सिद्ध करते हैं परन्तु फुले के अनुसार-

‘परशुराम का ऐसा पराभव हुआ कि वह बुरी तरह लज्जित हो उठा। इसी खीझ में उसने अपने परिवार और कुछ थोड़े से लोगों का साथ लिया और कोंकण प्रदेश की तलहटी में जा बसा। यहाँ उसे अपने पहले के कर्मों पर इतना पश्चात्ताप होने लगा कि अंत में उसने आत्महत्या कर ली।’

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इस प्रकार अपने अनेक क्रूर, दम्भी, कुटिल, अत्याचारी और मूर्ख नायकों के संरक्षण में ब्राह्मण निरन्तर पतन और दुर्गति की ओर ही अग्रसर हुआ। अहंकार और दम्भ के कारण वह निरंकुश सत्ता का वाहक बन गया और अपने शासित समाज पर घोर निन्दनीय अत्याचार किया। फुले ने गुलामगीरी  में यह संकेत किया है कि ईसाई धर्म के प्रादुर्भाव से न केवल स्थितियाँ बदली हैं बल्कि एक नई आशा की किरण के रूप में भारत में भी इस मत का प्रभाव बढ़ा और ब्राह्मण धर्म अलग-थलग पड़ने लगा तब इसे परिमार्जित और नएपन के साथ वेदान्त के रूप में शंकराचार्य ने बचाने की कोशिश की है।

परिणामत: उन सब दुष्ट कर्मों को कर्म मार्ग कहकर और नास्तिक मत को ज्ञान मार्ग नाम देकर इनके विषय में देश-भाषा के ढेरों-ढेर थोथे ग्रन्थ लिख डाले और इस भाँति अपनी स्वार्थी जाति को अवसर दे डाला कि वह अज्ञानी शूद्रों को लूट-खसोट कर खाती रहे। अपने युग में फुले ने औपनिवेशिक गुलामी के साथ-साथ ब्राह्मणवाद के भयानक चेहरे की वीभत्सता को बखूबी देखा था और यह महसूस किया था कि ब्राह्मणवाद अपनी सारी कुटिल चालों और धूर्तताओं के साथ अपना वर्चस्व हर क्षेत्र में बढ़ाए चला जा रहा है। शूद्र जातियों की जन्मजात प्राप्त अयोग्यताओं के पीछे का सच ब्राह्मणवाद की अन्यायी नियम विधान ही है, जिसे ध्वस्त किए बिना शूद्र और निम्नवर्ग की प्रजा का जीवन-स्तर सुधरने वाला नहीं है। सारे संसाधनों और अवसरों पर अधिकार जमाए बैठा ब्राह्मण-सवर्ण तबका शूद्र वर्ग को हेय दृष्टि से देखता है। श्रम और कौशल का भण्डार शूद्र वर्ग ब्राह्मण-सवर्ण की सुख-सुविधा और सेवा सुश्रूषा के लिए है और उसे ज्ञान, शिक्षा, जीवन-स्तर और सम्पत्ति से वंचित रखकर ही उसका शोषण सम्भव है। इस अमानवीय अन्यायपूर्ण सोच को ब्राह्मण ने प्रयत्नपूर्वक अपने आध्यात्मिक चिन्तन से सर्वग्राह्य और मान्य बनाने का निरन्तर प्रयत्न किया है। नियतिवाद, कर्म-फल पुनर्जन्म, पाप-पुण्य आदि धूर्ततापूर्ण सिद्धान्तों को बारम्बार लोगों के दिलो-दिमाग पर चस्पा कर दिया है। धरती पर उपलब्ध स्वर्ग को अपने कब्जे में लेने के लिए अज्ञानीजनों को आकाशीय स्वर्ग का लालच दिया है और अपने थोथे विचारों को उच्च आध्यात्मिक चिन्तन का नाम देकर उसे एक कृत्रिम भाषा में छिपाकर आमजन पर उसका आतंक पैदा किया है। सच तो यही है कि ब्राह्मण ने अपने सिवा दूसरों का कोई हित या कल्याण भी कभी नहीं किया है।

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आज के परिदृश्य में यह स्थिति और साफ तथा अनावृत्त होकर हमारे समक्ष उपस्थित है। आजादी के आन्दोलन के गर्भ से कुछ हद तक प्रगतिशील मानवीय मूल्य की पोषक संस्कृति का जन्म हो रहा था जिसे तत्कालीन ब्राह्मणवादी अतीतजीवी संस्कृति के पैरोकारों ने चिन्हित कर लिया और अपने को आजादी के आन्दोलन से माफी माँगते हुए दरकिनार कर लिया। अपने अतीत की पुनर्वापसी के लिए उसे प्रतिष्ठित करने के लिए उन्होंने समाज में घृणा, वैमनस्य और द्वेष की चिरपरिचित शैली में हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के नाम पर षड्यन्त्र किया है। जिस हिन्दू राष्ट्र की स्थापना की घोषणा करते हुए उन्होंने देश में घृणा और विभाजनकारी ताकतों को पुनर्जीवित किया है वह वास्तव में ब्राह्मण वर्चस्व की स्थापना करने वाला ब्राह्मण राष्ट्र ही है। स्वतंत्रता पूर्व औपनिवेशिक सत्ता से संघर्ष करता भारतीय समाज अपने अन्दर विकास के बीजारोपण भी कर रहा था। लोकतांत्रिक समाज में जिस प्रकार की समानता, भाईचारे और स्वतन्त्रता की दरकार होती है उसके नवांकुर इस संघर्षरत समाज में विकसित हो रहे थे। ब्राह्मणवाद इस आधुनिक लोकतांत्रिक चेतना के उलट एक यथास्थितिवादी सवर्ण सोच है जो समाज को विभिन्न स्तरों में विभाजित कर उसे अपनी सेवा का औजार बनानी चाहती है। इसी बनते हुए लोकतांत्रिक भारत के विरुद्ध ब्राह्मणवाद, हिन्दू राष्ट्र के छलावा भरे नारे के साथ मैदान में उतरा और एक लम्बे समय तक मुसलमानों को शत्रु रूप में प्रस्तुत करते हुए भारतीय समाज में घृणा और अलगाव का बीजारोपण करता रहा। झूठ और पाखंड को प्रतिष्ठित करते हुए इतिहास को विकृत करने का खतरनाक काम किया। अपने से भिन्न सारे समुदायों को निम्तनर मानते हुए उन्हें हेय दृष्टि से देखना, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ एवं देवतुल्य मानते हुए बाकी लोगों के श्रम एवं निर्माण पर सारे सुख और ऐश्वर्य जुटाना ही ब्राह्मण की सबसे प्रमुख प्रवृत्ति रही है।

अंग्रेजी राज में भी ब्राह्मण अपनी मीठी चालाकियों और खुशामदी ईमानदारी के बल पर सारे प्रमुख सरकारी पदों, शिक्षा विभाग, समाचारपत्रों के संपादक आदि पदों को हस्तगत कर सुख, ऐश्वर्य का जीवन का जीवन बिता रहे थे और शूद्र-अतिशूद्र अशिक्षा और अज्ञान की चक्की में पिस रहे थे। धोंडीबा का यह प्रश्न इस अन्यायपूर्ण स्थिति को बड़े व्यग्र भाव से अनावृत्त करता है-

आपके सारे कथन से यही सिद्ध होता है कि सारे ब्राह्मण अपने पाखंडी धर्म की आड़ में छिपकर हमारी भोली सरकार की आँख में धूल झोंक कर मिल-मिलाकर सारे शूद्र-अतिशूद्रों को अमेरिका के गुलामों से भी अधिक यातनाएँ देते हैं, लेकिन हम इन ब्राह्मणों के पाखंडी धर्म का धिक्कार करके अपने अज्ञानी भाइयों को जगाते क्यों नहीं?

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यह प्रश्न आज भी उतना ही बेधक और प्रासंगिक बना हुआ है। तत्कालीन अंग्रेजी सरकार भले ही अपने भोलेपन या गैरजानकारी के कारण भारत में ब्राह्मण वर्चस्व एवं शूद्र उत्पीड़न का निदान नहीं कर पाई किन्तु आज की तस्वीर इसके ठीक उलट है।

पहली बार भारत में ब्राह्मणवादी मनुवादी संस्कृति और भूमंडलीकृत पूँजीवादी संस्कृति का गँठजोड़ अपने पूर्णत: नग्न स्वरुप में सत्तासीन हुआ है। स्वतंत्रता आन्दोलन की स्वतंत्रता, समानता एवं बन्धुत्व की संस्कृति की आहट से सजग होकर ब्राह्मणवाद ने अपनी जिस अलोकतांत्रिक, पुरुष सत्तावादी, सवर्ण वर्चस्व और अपने से अलग समुदायों के प्रति घृणा का क्रमिक फैलाव भारतीय समाज में एक लम्बी अवधि तक किया उसका डरावना चेहरा सत्ता समर्थित समूहों की जनविरोधी, अलोकतांत्रिक, फासीवादी कार्यवाहियों में खुलकर सामने आ रहा है और भोली-भाली जनता को खौफजदा कर रहा है। दलित, अल्पसंख्यक पिछड़ा वर्ग, स्त्री और मजदूर वर्ग लगातार इनके निशाने पर हैं और देश इनके कुकृत्यों और बौखलाई कुंठाओं के पोषण का मैदान बन गया है। इस कठिन होते समय में धोंडीबा के प्रश्न के अंदर मौजूद उत्तर के अनुरूप एक बार फिर इस ब्राह्मणवादी मनुवादी संकट से टकराने का हथियार फुले, शाहूजी, पेरियार, अम्बेडकर तथा वाम वैचारिकी के स्रोतों से ही निर्मित होंगे। ब्राह्मणवाद, मनुवाद के समक्ष समर्पण कर चुके विचार इस लड़ाई के लिए अप्रासंगिक और भोथरे हो चुके हैं। जरूरत है एक साथ ब्राह्मणवाद, मनुवाद और निरंकुश राक्षसी कारपोरेट पूँजी दोनों मोर्चों पर साझा संघर्ष खड़ा हो और मनुष्य की अस्मिता और स्वाभिमान के साथ-साथ उसकी मनुष्य होने की गरिमा की रक्षा की प्रत्याभूति सुनिश्चित हो।

कल्पनाथ यादव आजमगढ़ में रहते हैं। अगोरा प्रकाशन वाराणसी से महात्मा जोतीराव फुले की पुस्तक गुलामगीरी  उनके द्वारा संपादित की गई है। यह लेख पुस्तक की भूमिका से लिया गया है।

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