क्या उत्तराखंड में चिपको आन्दोलन फिर से जीवित हो रहा है

विद्या भूषण रावत

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उत्तराखंड में मंदोदरी देवी ने जल, जंगल और ज़मीन के सवाल को फिर से ज़िन्दा कर दिया है। कॉर्पोरेट द्वारा प्राकृतिक संपदाओं की लूट और विकास के नाम पर राज्य के मूलनिवासी जनजातियों द्वारा संरक्षित इलाकों को डंपिंग यार्ड में बदल देने की खुली साज़िशों का एकबारगी पर्दाफाश हो गया है। सच कहूं तो, इस घटना ने उन पहाड़ियों के मुद्दों की याद भी ताजा कर दी है जिन्हें अक्सर अभिजात वर्ग के बुद्धिजीवियों और राजनीतिक नेतृत्व द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता रहा है। राज्य की पहचान हैं पहाड़ यानी यहाँ के ऊंचे-ऊंचे पहाड़, हरी-भरी घाटियां और बेहद निर्मल एवं दर्शनीय हिमालयी नदियाँ। हिमालय और उसके लोगों का नदियों और पहाड़ों से एक मौलिक अंतर्संबंध है, जो एक-दूसरे पर आश्रित हैं। चिपको आंदोलन की रूमानियत ने पर्यावरण की रक्षा के लिए पहाड़ों के संरक्षण के रूप में इसका प्रचार किया, जिसके फलस्वरूप अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कुछ लोग बहुत बड़े हो गए लेकिन उस ख्याति के चलते ‘स्थानीय समुदायों’ के महत्वपूर्ण मुद्दों को नजरअंदाज कर दिया गया।

चालाक नेताओं ने बुनियादी सवालों को हमेशा गलत बनाया

जिन नेताओं को हमने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरते हुए देखा, वे वास्तव में आदिवासी समाज के नहीं थे, बल्कि  सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक विशेषाधिकार प्राप्त समुदाय से थे, जिन्होंने आंदोलन के संघर्षों और लोकप्रिय सफलता को विनियोजित किया। वास्तव में ‘लोगों’ की ओर से राज्य के साथ बातचीत की और राज्य द्वारा थोपे गए निर्णय को आसानी से स्वीकार भी कर लिया, क्योंकि जनता से कुछ भी पूछा ही नहीं गया था। राजनीतिक नेतृत्व ने बहुत चालाकी से अपनी ‘हार’ को जीत में बदल दिया। धौली घाटी के आस-पास रेनी गाँव में गौरा देवी और आदिवासी समुदायों की अन्य शक्तिशाली महिलाओं की ऐतिहासिक लड़ाई ने पूरे चिपको को देश-विदेश में विख्यात कर दिया। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री एच.एन. बहुगुणा, जो स्वयं उत्तराखंड के रहने वाले थे, ने बड़ी चतुराई से पूरे आंदोलन को पूरी तरह से कुंद कर दिया। 1973 में इंदिरा गांधी के मंत्रिमंडल में संचार मंत्री के रूप में बहुगुणा ने चिपको आंदोलन को संकीर्ण क्षेत्रवाद की अभिव्यक्ति करार दिया और कहा कि हिमालय पूरे देश का है न कि उत्तराखंड के कुछ गांवों का। लेकिन उत्तराखंड में उनकी इस बात का न तो कोई विरोध हुआ और न ही बहुगुणाजी ने कभी इसके लिए माफी मांगी।

मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में जनसंख्या के बीच भारी अंतर के साथ असंतोष और अशांति होना तय है, क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की सीटें ज्यादा होने से पर्वतीय क्षेत्रों में आक्रोश बढ़ना स्वाभाविक है। यदि राजनीतिक नेताओं ने इस सवाल पर ध्यान नहीं दिया तो यह स्थिति पूरे हिमालयी राज्य को उथल-पुथल में डाल सकती है।

9 नवंबर, 1973 को हेमवती नंदन बहुगुणा को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया और उस समय तक चिपको आंदोलन का स्वरूप बढ़ रहा था और पहाड़ों का शोषण करने वाली साइमंड कंपनी के विरोध के स्वर मुखर हो रहे थे। यह कंपनी इलाहाबाद की थी और पूरे उत्तराखंड में लकड़ी की कटाई का ठेका लेती थी। चिपको आंदोलन के प्रति हेमवती नंदन बहुगुणा की घृणा जगजाहिर था, लेकिन वे एक चतुर राजनीतिज्ञ थे। विरोधियों को तोड़ने में माहिर थे। इसलिए उन्होंने 13 दिसंबर, 1973 को लखनऊ में चिपको आंदोलन के कार्यकर्ताओं की सरकार के साथ बैठक बुलाई, जिसमें सुंदरलाल बहुगुणा जैसे नेता थे। चंडी प्रसाद भट्ट, देवकी नंदन पांडे और जंगी लाल शाह बंधु अन्य सदस्य थे।

उस समिति के गठन को देखें, जिसमें आंदोलन का निर्माण करने वाले आदिवासी समुदाय या स्थानीय जनजातियों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं था। बहुगुणा ने लोगों के नाम पर चंडी प्रसाद भट्ट की बात सुनी और फिर राज्य की वन नीति को डिजाइन करने के लिए एक समिति बनाने का निर्णय लिया। 26 मार्च, 1974 को प्रसिद्ध गौरा देवी के नेतृत्व में रैनी गांव की बहादुर महिलाओं ने वास्तव में साइमंड्स कंपनी के कर्मचारियों को अपने गांव से बाहर निकाल दिया। इस बड़े प्रतिरोध ने आंदोलन को बहुत बड़ा नाम और मजबूती दी लेकिन यह स्वाभाविक रूप से उन राजनेताओं के लिए एक असुविधाजनक स्थिति थी जो अपनी बड़ी ‘राष्ट्रीय छवि’ बना रहे थे, क्योंकि वे लोगों को अपनी बड़ी राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं के लिए इस्तेमाल करना चाहते थे। हेमवती नंदन बहुगुणा एक अत्यधिक महत्वाकांक्षी राजनीतिज्ञ थे और लोगों ने पहाड़ों मे उन्हें हिमालय का वरद पुत्र कहकर भी संबोधित किया। विशेष रूप से उन ब्राह्मणों ने, जिन्हें उन पर बहुत गर्व था साथ ही उनमें भविष्य की राजनीतिक संभावनाए देख रहे थे। बहुगुणा ने अंत में उत्तर प्रदेश की नई वन नीति घोषित कर दी, जिसके अनुसार वन प्रबंधन करने के लिए एक सरकारी कॉर्पोरेशन बनाया गया, जिसे उत्तर प्रदेश वन निगम का नाम दिया गया। इस प्रकार पर्यावरण की रक्षा के नाम पर स्थानीय समुदायों को संसाधनों पर उनके अधिकार से वंचित कर दिया गया। जो लोग पहले वन उपज ले पाते थे आंदोलन के बाद वह भी बंद हो गया, जबकि निगम वनों का शोषण करते रहे।

चिपको आंदोलन बुनियादी वन अधिकारों का आंदोलन था 

चिपको’ आंदोलन के ग्लैमराइजेशन से आज की घटना का भी लगभग सीधा सम्बंध होने के कारण इसकी पृष्ठभूमि के बारे में जान लेना महत्वपूर्ण है। इसने कुछ लोगों को राष्ट्रीय अंतराष्ट्रीय बना दिया, जबकि स्थानीय लोगों को अलग-थलग कर दिया। यह एक संकट है जब पर्यावरणीय मुद्दों पर, विशेष रूप से एक विशेषज्ञ डोमेन के रूप में, चर्चा की जाती है जिससे समुदायों को पूरी तरह से बहस और चर्चा से बाहर कर दिया जाता है। लगता है जैसे उन्हें अपने विषय में या पर्यावरण के विषय में कोई जानकारी ही नहीं है।

उत्तराखंड में पर्यावरण, विशेष रूप से नदियों के लिए, सबसे बड़ी चुनौतियाँ स्थानीय समुदाय से नहीं हैं जो इसकी रक्षा करते हैं। वे नदी की पूजा करते हैं, लेकिन उसे प्रदूषित नहीं करते। असली चुनौती मैदानी इलाकों से आने वाले ‘तीर्थयात्री’ हैं जो धार्मिक आडंबरों के चलते इन नदियों में कूड़ा-कबाड़ डालते हैं। वे ही अपने पुराने कपड़े, पैकेट, थैलियाँ नदियों में डालकर उसे प्रदूषित करते हैं। गंगा के धार्मिक प्रदूषण का सबसे बड़ा काम हरिद्वार और ऋषिकेश में होता है क्योंकि मैदानी इलाकों से आने वाले भक्तों के लिए वहाँ पहुंचना आसान होता है इसलिए स्नानार्थियों की संख्या लाखों में होती है। पहाड़ी इलाकों में ऐसे स्नान की कोई अवधारणा भी नहीं थी और न ही नदी में फूल आदि बहाने की कोई परंपरा है। इसलिए आज भी पहाड़ों में नदियाँ बिल्कुल साफ दिखाई देती हैं। लेकिन अब बड़े राजमार्गों के कारण मैदानी भागों के लोगों की बड़ी संख्या पहाड़ों में पहुँच रही है और इसकी सुंदरता को निहारने के बजाए वह अपने कर्मकांडों पर ज्यादा समय देते हैं और फिर वही कूड़ा-कबाड़ यहाँ भी डाल रहे हैं।

इसके अतिरिक्त विभिन्न परियोजनाओं में लगी अधिकतर कम्पनियां विभिन्न नदियों में कूडा-करकट, कचरा आदि डंप कर रही हैं। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार ‘डंपिंग’ के लिए जगह बनाई है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह सब सिर्फ दिखावा है। डंपिंग ब्लॉक अंततः नदी में बह जाते हैं और बाहर नहीं निकाले जाते। उत्तराखंड के मूल निवासी के रूप में, हमने कभी भी ऐसी धूल या मक्खियों को नहीं देखा, जो उन मैदानी और शहरी क्षेत्रों में आम हैं, जिन्हें हम ‘विकसित’ क्षेत्र कहते हैं, लेकिन अगर आप इन दिनों पहाड़ों की यात्रा करते हैं, तो महसूस कर सकते हैं कि आजकल ‘विकास’ कैसे हो रहा है?  इसके क्या नतीजे निकल रहे हैं। एक दौर था जब भी हम पर्वतीय क्षेत्रों में जाते थे तो अपनी कार के एसी को बंद करके पहाड़ियों पर जाते थे और वहाँ की ताजी हवा को महसूस करते थे जो इतना सुखद होता था कि आप बयान नहीं कर सकते लेकिन आज आपको अपनी गाड़ी के अंदर रहना पड़ता है क्योंकि हर जगह कीचड़, धूल दिखाई दे रही है। श्रीनगर जैसा शहर आज उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाकों के किसी भी शहर की तरह ‘सीमेंटेड इंफ्रास्ट्रक्चर’ बन गया है।

राष्ट्रवादी राजनीतिक पार्टियों ने कभीभी संसाधनों पर अधिकार का मुद्दा नहीं उठाया

दो मुख्य राजनीतिक दल अर्थात कांग्रेस और भाजपा इन मुद्दों पर एक स्टैंड लेने से इनकार करते हैं। उनका ‘विकासात्मक’ एजेंडा बाहरी लोगों को पहाड़ की पहचान का शोषण करने के अलावा और कुछ नहीं है। जो लोग इसके खिलाफ लड़ रहे हैं उन्हें शायद ही कभी सत्ता के ढांचे में आने का मौका मिलता है। इस मुद्दे को दो बहादुर राजनीतिक सेनानियों अतुल सती और इंद्रेश मैखुरी द्वारा उजागर किया गया है। इस मुद्दे को हर जगह उजागर करने और लोगों को लामबंद करने के पीछे सीपीआई (एमएल) से ताल्लुक रखने वाले इन साथियों की ताकत थी। यह समझने की ज़रुरत है कि चिपको आंदोलन की सफलता के पीछे की कहानी उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों में वामदलों और इसके समर्पित नेतृत्व का मुख्य काम था। यह सर्वविदित तथ्य है कि उत्तराखंड के शीर्ष राजनीतिक नेताओं, जिन्हें जनता ने अपने सिर-आँखों पर रखा और बेहद सम्मान की दृष्टि से देखा, ने पृथक राज्य की मांग और प्राकृतिक संसाधन पर जनता के अधिकारों के मुद्दों का कभी भी समर्थन नहीं किया, क्योंकि वे अपनी ‘राष्ट्रीय’ छवि के बारे में अधिक चिंतित थे।

पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली_ Google

गोविंद बल्लभ पंत, एच.एन. बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी ने शायद ही कभी लोगों के मुद्दों को उठाया लेकिन उन्हें पहाड़ के कुलीन बुद्धिजीवी वर्ग से पूरी सहानुभूति मिली, जबकि पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने हमेशा इन मुद्दों पर लोगों का पक्ष लिया, फिर भी उन्हें कभी राजनीतिक समर्थन नहीं मिला। वह जिंदगी भर कोई चुनाव नहीं जीत पाए। कहीं न कहीं राज्य के लोगों को यह तय करना होगा कि क्या वे केवल ‘सेवा प्रदाता’ बनना पसंद करेंगे या संसाधनों पर अपनी भागीदारी और अधिकार भी चाहते है? क्या हमारी खूबसूरत नदियों और पहाड़ों के बिना कोई पहाड़ी या उत्तराखंडी हो सकता है? क्या हम वास्तव में उत्तराखंड के बारे में बात कर सकते हैं, यदि इन संसाधनों तक पहुंचकर हमारे अधिकार से हमें वंचित किया जाता है? अगर इन्हें ‘राष्ट्र निर्माण’ के नाम पर बड़े निगमों को सौंप दिया जाता है तो इसका परिणाम क्या होगा? हमारे पहाड़ और नदियाँ निश्चित रूप से राष्ट्र के लिए हैं लेकिन इसके लिए उनका ज़िन्दा रहना भी ज़रूरी है। तभी यह राष्ट्र के लिए मददगार होगा। सवाल उनके संरक्षण का है न कि नेताओं के निजी साथियों को अपने निजी लाभ के लिए इसका फायदा उठाने में मदद करने का। राष्ट्रवाद हमारे स्थानीय संसाधनों की रक्षा करना है जो हमारी पहचान हैं। इसे निजी कंपनियों की मुनाफाखोरी के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति देना उनका दोहन करना ही है। आज उत्तराखंड में यही प्रश्न सबके सामने खड़ा है। हम अपने जंगल और नदियों का दोहन होते देख रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार और अन्य सभी राजनीतिक दलों को उत्तराखंड के विकास के एजेंडे में लोगों के अधिकारों और भागीदारी से समझौता नहीं करना चाहिए। हेलंग की घटना ने दिखाया है कि कैसे लोगों की भावनाओं की परवाह किए बिना स्थानीय समुदायों को अपराधी बनाने के लिए कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है।

चमोली, चीन से लगा भारत का सीमावर्ती जिला है और यहां प्रवास कर रहे अधिकतर समुदाय जनजातीय हैं और वनों पर निर्भर हैं। 1964 तक, स्थानीय समुदाय अपने तिब्बती समकक्षों के साथ लगातार बातचीत करता था क्योंकि व्यापार खुला था। आदिवासी समुदाय ने वन और वनोपज का संरक्षण और पोषण किया। 1964 में चीन के साथ युद्ध के बाद सबसे बड़ा झटका इस समुदाय को लगा जब तिब्बत से लगी इस सीमा को बंद कर दिया गया था। कई गांवों से लोगों को कहीं और स्थानांतरित कर दिया गया और तिब्बत के साथ व्यापार पूरी तरह से बंद कर दिया गया। सरकार ने भी इन सीमावर्ती क्षेत्रों में अपने बुनियादी ढांचे को विकसित और सेना को सक्षम करने के लिए बेहतर सड़क नेटवर्क बनाने पर ध्यान केंद्रित किया, जिसके परिणामस्वरूप भूमि अधिग्रहण हुआ। उत्तराखंड में संकट यह है कि गढ़वाल मंडल के चमोली, रुद्रप्रयाग, उत्तरकाशी, टिहरी, पौड़ी जिलों के साथ-साथ कुमाऊं के पिथौरागढ़, बागेश्वर, नैनीताल, चंपावत जैसे जिलों में राजस्व की भूमि बहुत कम है और अधिकांश क्षेत्र वन विभाग के अंतर्गत आता है। ये जिले वास्तव में वन क्षेत्रों में स्थित हैं और इसलिए वन नौकरशाही के असहयोग के कारण लोगों का जीवन कठिन हो गया है। ये व्यवस्था वनों की रक्षा करने वाले स्थानीय लोगों को उस जंगल तक पहुँचने की अनुमति नहीं देती है जहाँ वे रहते हैं। लेकिन वह ऐसे बड़े क्षेत्र में कोई आपत्ति नहीं उठाती, जहाँ शक्तिशाली राजनीतिज्ञ लोगों द्वारा इसका अतिक्रमण किया गया है साथ ही निजी या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को ‘विकासात्मक’ उद्देश्यों के लिए दिया गया है।

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हेलंग की घटना के वास्तविक पेंच को भी समझिए

उत्तराखंड के पहचान की जड़ों की ओर लौटना होगा

हेलंग में मंदोदरी देवी और अन्य लोगों पर पुलिस कार्रवाई की जनता ने व्यापक निंदा कर राज्य सरकार को चेतावनी भेजी है कि वह वास्तव में उत्तराखंड के स्थानीय लोगों के साथ बातचीत कर उनके प्राकृतिक संसाधनों, जंगल और पानी के मुद्दों पर गौर करें। पहले से ही, सरकार की भूमि नीतियों के खिलाफ भारी आक्रोश है, क्योंकि भूमि-कानूनों में संशोधन के कारण कई क्षेत्रों में, विशेष रूप से तराई क्षेत्र में, भूमि की सीलिंग को हटा दिया है। इसके कारण बाहरी लोगों को प्रमुख स्थानों पर जमीन खरीदने में मदद मिलती है। पहाड़ों में जमीनों के अवैध लेन-देन की खबरें आ रही हैं और बाहरी लोगों ने मोटी रकम देकर अनेकों जगहों पर जमीनें खरीद ली है। होटल और रिज़ॉर्ट बनाने के नाम पर भी बेतहाशा जमीन की खरीद-फ़रोख्त हो रही है जिस कारण स्थानीय लोगों में नाराजगी है।

आने वाले दिनों में यह नाराजगी तब और बढ़ेगी जब निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन की कवायद शुरू होगी। पहाड़ी जिलों में पहले ही सीटों की संख्या कम हो गई है क्योंकि आबादी बहुत कम है। मैदानी और पहाड़ी क्षेत्रों में जनसंख्या के बीच भारी अंतर के साथ असंतोष और अशांति होना तय है, क्योंकि मैदानी क्षेत्रों की सीटें ज्यादा होने से पर्वतीय क्षेत्रों में आक्रोश बढ़ना स्वाभाविक है। यदि राजनीतिक नेताओं ने इस सवाल पर ध्यान नहीं दिया तो यह स्थिति पूरे हिमालयी राज्य को उथल-पुथल में डाल सकती है। उत्तराखंड राज्य के गठन का पूरा अर्थ शून्य हो जाएगा, यदि पहाड़ी जिलों की सीटों को सिर्फ इसलिए कम कर दिया जाए, क्योंकि उनकी आबादी कम है। आप परिवार नियोजन का पालन करने और राष्ट्र को मजबूत करने के लिए लोगों को दंडित नहीं कर सकते। उत्तराखंड भारत का एकमात्र सीमावर्ती राज्य है जहां उग्रवाद का कोई मुद्दा नहीं है और सैन्य बलों एवं स्थानीय लोगों में न केवल पूर्ण सामंजस्य है बल्कि एक-दूसरे के बीच आपसी सम्मान भी है। पहाड़ी राज्य में किसी भी तरह की राजनीतिक अशांति भारत के सुरक्षा हितों के लिए हानिकारक होगी और इसलिए सरकार को किसी भी चीज को हठपूर्वक नहीं करना चाहिए।

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अपने संसाधनों पर लोगों के अधिकार को स्वीकार करना चाहिए। खासकर जब वे इस पर निर्भर रहे हों। उत्तराखंड सरकार और अन्य सभी राजनीतिक दलों को उत्तराखंड के विकास के एजेंडे में लोगों के अधिकारों और भागीदारी से समझौता नहीं करना चाहिए। हेलंग की घटना ने दिखाया है कि कैसे लोगों की भावनाओं की परवाह किए बिना स्थानीय समुदायों को अपराधी बनाने के लिए कानूनों का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक तरफ आप करोड़ों ‘भक्तों’ को धार्मिक स्थलों पर आने देते हैं और राज्य के छोटे से बुनियादी ढांचे पर उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए भारी दबाव डालते हैं लेकिन स्थानीय लोगों की भावनाओं का सम्मान करने के लिए तैयार ही नहीं होते हैं। यदि सत्ताधारी दल सहित राजनीतिक वर्ग वास्तव में उत्तराखंड की भावनाओं का सम्मान करना चाहता है तो उसे हमारी पहाड़ी पहचान की रक्षा करनी चाहिए, जिसमें हिमालय, इसकी विविध वन श्रृंखलाओं, जैव विविधता और सुंदर नदियों की सुरक्षा, संरक्षण और सम्मान शामिल है, क्योंकि वे ही हमारी सभ्यता हैं और इनके बिना हम उत्तराखंड की कल्पना नहीं कर सकते।

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

 

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