Friday, April 19, 2024
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कुप्रथा डायन की सूली पर एक और औरत का क़त्ल, क्रूरता ऐसी की ऑंखें भी निकाल ली

बिहार। अरवल में कुछ दबंगों द्वारा एक दलित महिला को पहले लाठी-डंडे से पीटा गया। दबंगों का मन मारने पीटने से नहीं भरा तब क्रूरता की हर सीमा लांघ कर उसकी आँखे निकाल ली गई और और उसी असहनीय पीड़ा से तड़पती उस महिला को डायन कहकर उसकी हत्या कर दी गई। किसी महिला को […]

बिहार। अरवल में कुछ दबंगों द्वारा एक दलित महिला को पहले लाठी-डंडे से पीटा गया। दबंगों का मन मारने पीटने से नहीं भरा तब क्रूरता की हर सीमा लांघ कर उसकी आँखे निकाल ली गई और और उसी असहनीय पीड़ा से तड़पती उस महिला को डायन कहकर उसकी हत्या कर दी गई। किसी महिला को प्रताड़ित करना या मार देना हमारे समाज के लिए कोई नई बात नहीं है। औरतों को डायन कहकर मार देने या फिर जबरन उत्पीडित करने, मैला खिलाने, निर्वस्त्र करके गाँव-समाज में घुमाने की शर्मनाक घटनाओं की खबरें आती ही रहती हैं। तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ता इस कुप्रथा के खिलाफ लंबे समय से आवाज उठाते रहते है बावजूद इसके यह कुप्रथा आज भी झारखंड, बिहार, छत्तीसगढ़ के साथ मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ जनपदों में बदस्तूर जारी है।

ताजे घटना क्रम में डायन कहकर जान लेने का मामला अरवल जिले के सदर थाना क्षेत्र के मलही पट्टी मोहल्ले की है। 65 वर्षीय मृतक महिला लाखिया कुवंर घर में अकेली रहती थी और उनका बेटा बाहर मजदूरी करता था।  घटना के दिन मृतक महिला का बेटा जमुनादास शादी में शामिल होने के लिए पटना गया था और बुजुर्ग माँ घर में अकेली थी। अगले दिन जब वह घर पंहुचा तो घर में माँ की लाश पड़ी थी और मृतिका की दोनों आँखे निकाल ली गई थी। जमुना दास ने उक्त घटना में शमशाद को आरोपी बनाते हुए कहा है कि, “शमशाद ने दो दिन पहले भी माँ से लड़ाई –झगडा किया था और उन पर डायन होने का आरोप लगाया था। उस समय लोगों के समझाने-बुझाने पर वह वापस चला गया था पर शुक्रवार को जब घर में माँ अकेली थी तब उसने घर में घुस कर उसे मारा-पीटा और आँख निकाल कर हत्या कर दी।

सूचना पर पंहुची सदर थाने की पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजकर जमुनादास के बयान के आधार पर शमशाद, मेहरूम समेत अन्य अज्ञात के खिलाफ मामले की विवेचना शुरू कर दी है। इस घटना की वजह से एकबार फिर इस सामजिक कुप्रथा पर नए सिरे से बात शुरू हो गई है। इस कुप्रथा के खिलाफ क़ानून बन जाने के बावजूद भी अब तक इस तरह की घटना पर लगाम ना लग पाना दुर्भाग्यपूर्ण है। इस तरह की घटनाओं के पीछे तमाम सामजिक कारण और सामजिक रूप से दलित और स्त्री समाज को दोयम दर्जे के रूप में देखने की मानसिकता भी काम करती है।

स्त्री ही डायन क्यों?

स्त्री ही डायन क्यों करार दी जाती है? स्त्री इतना व्यापक विषय है कि इससे  जुड़े किसी मुद्दे को केंद्रित कर कुछ कहना कठिन है बेशक असंभव नहीं फिर भी बहुत कठिन है क्योंकि जब हम स्त्री कहते हैं तब भले ही हमारे बिलकुल सामने का प्राणी हमारी बातचीत का केन्द्र हो लेकिन उसकी दुनिया प्राय: एक अनजानी-अनपहचानी दुनिया होती है। हिन्दी की वरिष्ठ कवियत्री अनामिका इस दुनिया के बारे में कहती हैं कि “पढ़ा गया हमें दूरदराज के रिश्तेदारों की चिट्ठियों की तरह, फिर भी ये चिट्ठियाँ बांचनी तो पड़ेंगी ही, चाहे कितनी ही कठिन क्यों न हो। स्त्रियों पर परंपरा के नाम पर जो कुप्रथाएँ और कुरीतियाँ समाज के ब्राह्मणवाद और पितृसत्ता द्वारा उन पर बातचीत की जानी चाहिए। हमारे देश में ही नहीं अपितु दुनिया भर में बहुत सी कुप्रथाएं और कुरीतियाँ प्रचलित है जिनकी भुक्तभोगी मात्र स्त्रियां ही हैं।

मनुष्य होने के नाते हम मानवीयता की बातें करते हैं और गर्व करते हैं लेकिन समाज में हमारे आसपास दिन-प्रतिदिन ऐसा कुछ घटित होता रहता है कि अपने मनुष्य होने पर संदेह होने के साथ शर्म भी महसूस होती है। जाति, वर्ग, वर्ण वर्चस्व और लैंगिक में असमानता अमानवीय होने के लैंगिक मुख्य कारण है। मार-पीट, शोषण, अमानवीय व्यवहार की घटनाएं कमजोर लोगों के साथ होती है इनमें भी सबसे ज्यादा बार माहिलाएं इसका शिकार होती हैं, गाली के तौर पर उन्हें अनेक अश्लील और सस्ते विशेषणों से नवाजा जाता है। इसमें डायन और चुड़ैल कहा ही नहीं जाता बल्कि उन्हें ऐसी ही साबित कर उनका बहिष्कार किया जाता है। एक प्रश्न सबको पॉइंट आउट करना चाहिए कि दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति की आर्थिक रूप से कमजोर महिलायें ही क्यों डायन करार दी जाती हैं? डायन या समाज में फैली अनेक कुप्रथायों और कुरीतियों में कभी सवर्ण या ऊँची जाति की स्त्री शामिल नहीं की जाती, (हालाँकि इनकी अपनी समस्याएं हैं)? इस पर गहन विचार किया जाना जरूरी है। साथ ही एक दूसरी बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि देश के किस हिस्से में डायन करार दिए जाने की घटनाएँ सबसे अधिक होती हैं? यदि इन दो सवालों का जवाब ढूंढा जाए तो बहुत हद तक मामले की तह तक पहुंचा जा  सकता है। डायन जैसी कुप्रथा समाज को गर्त की तरफ ले जा रही है साथ ही डायन घोषित की जाने वाली महिला से जिस तरह का वहशी और अमानुषिक व्यवहार किया जाता है वह समाज और व्यक्ति की मानसिक विकृति को सामने लाता है जो आने वाली पीढ़ी पर अस्वस्थ और बुरा असर डाल रही है। हम उन्हें कैसा समाज दे रहें हैं ? ये चिंता का विषय होना चाहिए।

मृतका के परिजन

आमतौर पर अंधविश्वास, लालच, आपसी विद्वेष, संपत्ति के झगड़े, एकतरफा प्रेम, छेड़छाड़ और घरेलू हिंसा, चिकित्सा सुविधा का अभाव  और अवैध संबंधों के कारण ही स्त्री पर डायन होने का आरोप लगाया जाता है और उस स्त्री को बेतहाशा शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी जाती है। इसके साथ इस बात का भी दुष्प्रचार किया जाता है कि ये स्त्री तंत्र-मन्त्र के द्वारा किसी की जान भी ले सकती है या किसी का कोई बड़ा नुकसान भी कर सकती है । ऐसे लोग अन्य लोगों को उकसाकर उसका और उसके परिवार का जीना मुहाल कर देते हैं एवं उसका सामाजिक बहिष्कार कर देते हैं। समाज में रहते हुए समाज से कट जाना एक मनुष्य जैसे सामाजिक प्राणी के लिए बहुत बड़ी सजा है।

बहरहाल ! तथ्य यह बताते हैं कि डायन करार दिए जाने की घटनाएं झारखण्ड, छतीसगढ़, असम, बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान में सुनाई देती हैं लेकिन सबसे अधिक डायन बनाई जाती हैं या कहें समाज द्वारा घोषित की जाती हैं झारखण्ड और छतीसगढ़ में। जहाँ आदिवासी समाज और दलित समुदायों की बहुतायत हैं और साथ ही ये दोनों ऐसे प्रदेश हैं जो खनिज और भू सम्पत्ति के अकूत भण्डार से पटे पड़े है। इन राज्यों पर प्रकृति की विशेष इनायात है।  ऐसे में सरकार हो या कार्पोरेट, दोनों ही विकास के नाम पर सैकड़ों प्रोजेक्ट और आदिवासी-दलित समुदाय को विकास की मुख्य धारा में जोड़ने के नाम पर उन प्राकृतिक संसाधनों, जमीन-खेतों को हडपना चाहते हैं,  जिनका इस पर जीवन निर्भर होता है। इसके लिए कॉर्पोरेट और पूंजीपति वर्ग सरकार को अपने चंगुल में लेकर उन्हें दलाल बनाकर उस पर कब्जा करने की चाल चल रहे हैं  और कामयाब भी हो रहे हैं। इसमें गाँव का ऐसा वर्ग शामिल है जो खाया पिया अघाया हुआ है।

कन्हर बाँध विरोध में शामिल कम से कम एक दर्जन महिलायों को डायन करार दिया जा चुका है।  किसी महिला को अपने काबू में रखने या सामाजिक बहिष्कृत करने के लिए डायन घोषित करना वैचारिक रूप से असहमति रखने वाले लोगों को अर्बन नक्सल घोषित किये जाने से भी ज्यादा आसान है।

ऐसी अनेक घटनाएँ  हैं  जिनमें आदिवासी दलित स्त्री द्वारा अपनी जमीन देने से मना करने पर  गाँव के सशक्त पुरुषों के समूह  द्वारा उसे डायन करार दिया गया और गाँव के सामने उसे इतना अपमानित और प्रताड़ित किया गया उसे मजबूरन अपना गाँव छोड़कर भाग जाना पड़ा।  तथाकथित सभ्य समाज में स्त्री ही ऐसी प्राणी है जिसे दुर्गा-काली-चंडी आदि देवियों के समान शक्तिस्वरूपा बताए जाने पर भी सबसे कमतर और कमजोर समझा गया क्योंकि प्रकृति द्वारा तय की गई शारीरिक संरचना एक प्रमुख कारण है। पुरुषों से भिन्न होने के साथ ही उनकी कार्यक्षमता भी कम होती है। दूसरा अधिकतर स्त्रियों का आर्थिक रूप से पुरुषों पर निर्भर होना। परंपरा के तहत समाज की संरचना ही ऐसी गढ़ी गई है जिसमें स्त्रियों को पुरुषों के अधीन रहना पड़ता है। परम्परागत रूप से देखे तो पितृसत्तामक समाज में घर हो या घर से बाहर काम करने वाला क्षेत्र हो, कभी भी स्त्रियों को समानता का अधिकार नहीं मिला उन्हें हमेशा दोयम दर्जे का समझा गया। पुरुष उसे हमेशा अपनी निगरानी और आदेश के अंदर रखना चाहा।  यदि इससे अधिक उसने  स्वतंत्रता  के लिए उसने प्रयास किया तो समाज द्वारा उसे ऐसे ही डायन घोषित कर प्रताड़ित किया जाता है। पिछले दो दशकों में 12-13 हजार स्त्रियों को डायन होने के अपराध में या तो मार डाला गया या अपमानित प्रताडित और बहिष्कृत कर दिया गया है।

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एक घटना सन दो हजार छ: की है, जिसमें झारखंड के हजारीबाग में एक स्त्री को उसके पड़ोसियों और गांव वालों द्वारा डायन घोषित कर दिया गया  और उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया। उसने बताया था कि पति की मौत के बाद अंत्येष्टि करने के लिए लोगों ने उससे एक लाख रुपए मांगे।  उसने कहा कि कहाँ से लाऊं? पास खाने को  कुछ नहीं है, इसके बाद उन लोगों ने उसे डायन बता कर गाँव से भगा दिया और ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया।

इसी तरह की एक और घटना इलाहाबाद जिले की है, जहाँ करछना तहसील के उभारी गाँव की रहने वाली सोना देवी जब शादी होकर ससुराल आई तब पता चला कि उसके पति का सम्बन्ध उसकी जेठानी से है। जब उसने विरोध किया तो पति ने उसे मारा और मायके से ५० हजार रूपये लाने के लिए कहा।  मारपीट और प्रताड़ना का सिलसिला लगातार जारी रखा।  शोषण और मानसिक तनाव से  सर में दर्द रहने लगा इस बीच उसकी सास ने सोना को मायके छोड़ दिया गया। यहाँ भी उसके पिता ने इलाज न कराकर झाडफूंक, ओझाई का रास्ता ही पकड़ा पति के अत्याचार से असुरक्षा और मानसिक उलझने बढ़ती गईं और वह पूरी तरह से  बिस्तर पर आ गई। जब बनारस के सामाजिक संगठन के कार्यकर्ताओं ने  इलाहबाद के मनोचिकित्सिक से इलाज करवाया। तब कई वर्षों की जद्दोजहद के बाद सोना ठीक तो हो गई लेकिन अब भी वह  अपने मायके में हैं। यह मामला पूरी तरह घरेलू हिंसा का है। डायन होने के आरोप के बाद गाँव, परिवार और समाज में कहाँ ऐसी स्त्रियों के लिए सजह जीवन बचता है, ये तो बस साँसें चलती रहती हैं इसीलिए इन आरोप को ढोते हुए जीती हैं अकेलेपन में।

हमारे देश में घरेलू हिंसा को सामान्य रूप में देखा जाता है, घरेलू हिंसा केवल बाहरी आघात के रूप में ही नहीं होता बल्कि व्यवहार, बातचीत, उपेक्षा और अपशब्द द्वारा मानसिक प्रताड़ना भी घरेलू हिंसा में आता है और हर घर में आने-अनजाने ये नज़र आता है चूँकि अधिकतर  बार स्त्रियां परिवार की शांति, समाज के दबाव, डर और प्रतिष्ठा के चलते इसे सहती हैं लेकिन जहां इस बात का विरोध करती हैं वहाँ कई बार सजा के  तौर पर इसका भुगतान परिवार से काट  कर दिया जाता है।  ससुराल पक्ष अपने बचाव और अपने को सही सिद्ध करने के लिए  चरित्रहीन और डायन बता कर पूरे समाज में इस बात का प्रचार करते हैं फिर चाहे अपने अधिकार के लिए वह कोर्ट  में जाये या पंचायत में उस पर लगा डायन शब्द का ठप्पा जीवन का अभिशाप बन जाता है।

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डायन घोषित महिला को पीट-पीट कर जान ले लेने की कई घटनाएं सुनने में आई हैं। ऐसा ही एक मामला सितम्बर 2019 में झारखण्ड के गुमला जिले का है जहाँ चार लोगों को इसलिए पीट पीटकर मार डाला गया क्योंकि कुछ दिनों से गाँव में कई लोग एक साथ बीमार पड़े थे और गाँव वाले अशिक्षा एवं चिकित्सा सुविधा के अभाव में डॉक्टर को दिखाने और दवा लेने  विकल्प में बैगा-ओझा के पास पहुंचे। ओझा ने इसे डायन-बिसाही द्वारा किया गया मामला बता कथित डायन का हुलिया भी बता दिया। ओझा द्वारा बताए गए हुलिए के आधार पर गाँव वालों ने चार लोगों को चिन्हित कर इतनी पिटाई की चारों की मौत हो गई। इसमें गाँव के 8 लोगों को गिरफ्तार कर 56 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और 16 पर एफआईआर की गई है।  इस मामले पर विचार करने पर एक बात सामने आती है कि पूरा गाँव इस काम में शामिल है, विचित्र विडंबना और त्रासदी है कि अशिक्षा के चलते गाँव के किसी भी एक आदमी के दिमाग में इस बात के विरोध में कुछ भी कहने की स्थिति नहीं बनी।  सरकारें शिक्षा के प्रतिशत का जो ढोल पीटती है उसकी असलियत इस तरह की घटनायों से सामने आ जाती है।  जो लोग पढ़े लिखे हैं उनमें भी वैज्ञानिक सोच समझ का अभाव होता है। जबकि कागजों पर स्कूलों की संख्या में बढोत्तरी हुई तो है लेकिन औपचारिक शिक्षा की स्थिति में लगातार गिरावट आई है। यदि शुरुआती शिक्षा के दौरान ही बचों को अन्धविशास और कुरीतियों से परिचित करवा कर उसके दुष्परिणामों के बारे में संवेदना के साथ पढ़ाया और समझाया जाए तो  निश्चित रूप से आने वाले समय में वे अंधविश्वासों के खिलाफ आवाज़ उठाने में समर्थ हो सकेंगे। यहाँ तो बच्चे स्कूल आये इसके लिए शिक्षा की बेहतर व्यवस्था की जानी चाहिए जबकि प्राथमिक शिक्षा को मौलिक अधिकार के अंतर्गत शामिल कर निशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अधिनियम 2009, 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के साभी बच्चों को स्कूलों में मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा का कानून बनाया और लागू किया गया है। लेकिन हमारे देश में मौलिक अधिकारों की जो धज्जियां उड़ाई जाति है वह किसी से छिपी नहीं है। त्रासद है कि शिक्षा सबके लिए जरूरी है लेकिन मजदूर, किसान और गरीब परिवार के बच्चे रोजी-रोटी और रोज़गार के चलते अपनी पढाई या तो शुरू ही नहीं कर पाते या फिर अधूरी ही छोड़ देते हैं। स्वस्थ और बेहतर समाज के लिए शिक्षित होने के साथ तर्क के साथ आसपास होने वाली घटनायों का विज्ञान से जोड़ विश्लेषण किया जाना जरूरी है।

इन्हीं अन्धविश्वास, कुरीतियों और कुप्रथा के बारे में लोगों में चेतना लाने के लिए नरेन्द्र अच्युत दाभोलकर ने महाराष्ट्र मे अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति की स्थापना की।  जिस तरह से चेतना और जागरूकता का प्रसार इनकी समिति कर रही थी ब्राह्मणवादियों और दक्षिण पंथियों को इस बात का खतरा लगा कि समाज मे स्त्रियों के लिए फैली कुप्रथाओं से इनकी दुकानें बंद न हो जाए और अगस्त 2013 में कुछ लोगों ने गोली मारकर इनकी ह्त्या कर दी।  इन बातों का ज़िक्र करना जरूरी है क्योंकि समाज में फैले ढोंग-दकोसले, जादू –टोना-टोटका, भूत-प्रेत-डायन जैसी कुप्रथाओं के बारे में वैज्ञानिक दृष्टि से बातें सामने रख समझाने में मदद की।  विश्वास और अंधविश्वास के बीच के अंतर के बारे में तर्कवादी बाबु गोगीनेनी कहते हैं, अगर कोई रिवाज उसके पीछे के तर्क को लेकर सवाल उठाए बिना माना जाता है तो उसे अंधविश्वास कहते हैं। अगर कोई व्यक्ति रिवाज के पीछे के।  तर्क को नहीं परख पाता तो वह खतरनाक हो सकता है।

एतवरिया देवी (बदला हुआ नाम)। रांची से करीब 60 किलोमीटर दूर सोनाहातू थाने के बोंगादार दुलमी गांव में रहती हैं।  गांव वालों ने उन्हें डायन करार देकर मैला पिलाया। उन्होंने बताया कि उनके रिश्तेदार अक्षय के घर में झरी देवी की 3 फ़रवरी को मौत हो गई थी।  जो लंबे समय से बीमार थीं। इसके बाद 14 फ़रवरी की रात अक्षय, उसके भाई विजय और माँ मालती देवी की भी तबीयत ख़राब हो गई।  लोगों ने डॉक्टर को नहीं दिखाया। एतवरिया देवी के ससुराल के गाँव से मिसिया ओझा को बुला लाए। उसने एतवरिया देवी और उनकी  माँ को डायन करार दे दिया। ओझा ने उनकी बीमारी और झरी देवी की मौत के लिए हमें ज़िम्मेदार करार दिया। इसके बाद 15 फ़रवरी की सुबह हमारे साथ ये घटना हो गई। 15 फरवरी की सुबह पड़ोसियों ने मां-बेटी पर डायन होने का आरोप लगा शमशान घाट लेकर गए। वहाँ उनलोगों ने इंसानी मल और पेशाब फेंका और मुंह में भी डाला। साथ ही उनसे ही गड्ढा खुदवा कर उनका मुंडन करवा निर्वस्त्र किया गया उसके बाद सफ़ेद साडी और ब्लाउज दिया गया,जैसे तैसे शरीर ढंककर पूरे गाँव में घुमाया गया।  इस गाँव के किसी व्याक्ति ने इस घटना का न तो विरोध किया न ही बचाव। (रविप्रकाश, बीबीसी फ़रवरी 2019 ) ये शर्मनाक घटना महानतम इक्कीसवीं सदी के उस देश की है जो विश्वगुरु होने का दावा करता है। जिस देश ने चंद्रमा और मंगल पर जीवन खोजकर वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है लेकिन इस खोखले वैज्ञानिक सोच वाले देश में आमजन तक सामान्य चिकित्सा सुविधा उपलब्ध नहीं है, जहाँ सामान्य बुखार होने पर उसके इलाज होने की कोई सुविधा  नहीं है।  बड़ी और भयंकर बीमारी तो छोड़ दीजिए जहाँ बुखार में आदमी की जान चली जा रही है। आज़ादी के सत्तर सालों में इस देश ने आधारभूत चिकित्सा का काम भी नहीं किया। सत्ता में रहने वाले लोग बड़ी-बड़ी योजनाओं पर बात करते हैं लेकिन नतीजा सिफ़र। अशिक्षित और अनपढ़ समाज बहुत सी  सुविधा से वंचित रह जाता हैं और अज्ञानता का एक भयानक परिवेश रचता है और इसका शिकार स्त्रियाँ ही होती हैं। जीवन और मृत्यु को लेकर यहाँ दैवीय आस्थाएं जितनी प्रबल होती हैं स्वास्थ्य को लेकर लापरवाही और अंधविश्वास भी उतना ही अधिक होता है। न्यूरोलोजिकल और मस्तिष्क ज्वर जैसी गंभीर बीमारियों का निदान प्राय: भूत-प्रेत बाधाओं के रूप में होता है बैगा-ओझा-गुनिया पर लाखों रूपये खर्च कर देते हैं जबकि ऐसे रोगी को किसी विशेषज्ञ को दिखाकर उसे ठीक किया जा सकता है। ये देखा गया है कि डायन प्रथा  की जहाँ अधिकता नहीं है वहाँ भी इस तरह की धारणाएं और व्यवहार आम बात है। इन मान्यताओं पर भरोसा करने वालों को इस बीमारी के इलाज के लिए बैगा-गुनिया-ओझा तक पहुँच ज्यादा आसान लागती है और इसी कारण डायन-भूत-प्रेत-चुड़ैल जैसी मान्यताओं को बल मिलता है।

सोनभद्र जिले के दुद्धि तहसील के गाँव बलियारिपुर की सोमरी देवी गोंड आदिवासी हैं। थोड़ा पढ़ी-लिखी और पति के साथ मिलकर खेती का काम कर परिवार चलाती हैं।  सोमारी अपने ही एक पड़ोसी की छेड़छाड़ और डायन कहकर आग में धकेल दिए जाने की शिकार हैं। पड़ोस में रहने वाला शिवनारायण गोंड उनके घर आया और उनसे छेड़छाड़ करने लगा। जैसे ही सोमारी ने उसकी हरकतों का विरोध किया इस पर शिवनारायण ने उन्हें पास  ही जलते  हुए अलाव में धकेल कर उसे डायन है, डायन हैं कहकर चिल्लाने लगा। पति ने दौडकर उसे बचाया।  थाने में रिपोर्ट के बाद शिवनारायण को पकड़ लिया गया और उसने अपना अपराध कबूल करते हुए कहा कि शराब के नशे में उसने ऐसा किया, उससे गलती हो गई।  सोमारी ने माफ तो कर दिया लेकिन डायन शब्द कलंक की तरह उस पर चिपक गया।

उपर जिन घटनाओं का ज़िक्र मैंने किया है वह मात्र डायन करार दिये जाने की सूचना है लेकिन वास्तव में स्थिति बहुत ही भयानक है।  पिछले दो दशकों में बारह-तेरह हजार महिलाओं को डायन घोषित कर उन्हें मार डाला गया, प्रताड़ित किया गया या समाज से बहिष्कृत किया गया।  डायन करार दिए जाने के संबंध में तहकीकात किये जाने पर अनेक मामले सामने आये जिसमें जबरन छेड़छाड़, अवैध सम्बन्ध और एकतरफ़ा प्रेम एक बड़ा कारण है।  अपने उद्देश्यों में नाकाम पुरुष प्राय: महिलायों पर डायन होने का तोहमत लगाते हैं जिससे न केवल उनको सामाजिक समर्थन मिल जाता है बल्कि पीड़ित महिला की सामजिक स्थिति कमजोर हो जाती है जिससे उनपर आसानी से हमला किया जा सकता है।

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माहवारी पर गांवों में आज भी है संकुचित सोच

इन हालात के लिए जिम्मेदार किसे ठहराए? इसके लिए किसी बड़े अनुसंधान की आवश्यकता नहीं है अगर समझ और मान्यताओं को आर्थिकी से जोड़ दिया जाए। संपन्न और उच्च वर्ग में ऐसी घटनाएं सुनाई नहीं देंगी कि किसी पुरुष ने किसी माहिला को डायन का आरोप लगाकर बेरहमी से पीटा हो या प्रताड़ित किया हो या समाज से बाहर किया हो जबकि निम्नवर्गीय समाजों में यह आये दिन सुनाई देता है बिना किसी अवरोध के स्त्रियां लगातार सामूहिक हमले का शिकार होती रही हैं।  इसमें से ज्यादातर हमले समाज के तथाकथित बाहुबली और दबंगों की तरफ से किये जाते रहे हैं।  हालांकि कभी-कभी समान स्थिति में भी यह होता है लेकिन तब उत्पीडक समाज की मान्यताओं और धारणाओं का फायदा इस रूप में उठाता है कि ऐसे में उसे अधिसंख्यक लोगों का मूक समर्थन प्राप्त हो जाता है। अभी तक डायन के जितने भी मामले आये हैं उससे जुड़ी मान्यताओं को लेकर कोई सामाजिक प्रतिरोध या प्रतिकार दर्ज नहीं हुआ है। इससे पता चलता है कि समाज में जीवन व्यवहार में अंधविश्वास की जड़ें कितनी गहराई तक पैठ जमाए हुए हैं। और ऐसी झूठी मान्यताओं, मूर्खताओं और अंधविश्वास से कितने परिवार की जिन्दागियाँ तबाह और बर्बाद हुई हैं।

ये देश का दुर्भाग्य है कि देश का संविधान संप्रभुता, समानता और लोकतन्त्रत की बात करता है लेकिन आज़ादी के सालों बाद भी आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और मानसिक असमानता की जो स्थिति देख रहे हैं, विशेषकर दलित और आदिवासी स्त्रियों के खिलाफ वह एक भयानक त्रासदी है। एक वर्ग घोर पूंजीवाद, बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति का बेजोड़ हिस्सा बना हुआ है इसी का परिणाम इन स्त्रियों को भोगना पद रहा है। वहीं, एक तरफ अय्याशीपूर्ण जीवन है और दूसरी तरफ बामुश्किल एक समय का खाना, छत और जरूरी सुविधा मुहैय्या हो पा रही है।  शिक्षा और स्वास्थ्य तो उनके लिए दूर की कौड़ी है। एक तरफ विज्ञान की तर्कपूर्ण बातें हैं तो दूसरी तरफ घोर अन्धेरा। ऐसे में समाज में फैली ऐसी कुप्रथाओं के खिलाफ खड़ा होना और उनसे लड़ पाना कठिन है। लेकिन इसके बाद भी प्रयास जारी रखा जाना जरूरी है क्योंकि ये एक स्त्री की लड़ाई है और इसके लिए आवाज़ उठाना हम सबका नैतिक कर्त्तव्य बनता है।

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सदियों पुरानी कुप्रथा

देश में डायन प्रथा कब से शुरू हुई, इसका कोई प्रामाणिक इतिहास तो नहीं मिलता लेकिन यह सदियों पुरानी है। राजस्थान के ग्रामीण इलाकों में डाकन या डायन प्रथा कोई छह-सात सौ साल पहले से चलन में थी। इसके तहत अपनी जादुई ताकतों के कथित इस्तेमाल से शिशुओं को मारने के आरोप में महिलाओं की पीट-पीट कर हत्या कर दी जाती थी। उस दौर में वहां हजारों औरतें इस कुप्रथा का शिकार हुई थीं।  राजपूत रियासतों ने 16वीं सदी में कानून बना कर इस प्रथा पर रोक लगा दी थी। वर्ष 1553 में उदयपुर में पहली बार इसे गैर-कानूनी घोषित कर दिया गया था। बावजूद इसके यह बेरोक-टोक जारी रही।

 ख़त्म क्यों नहीं होती यह कुप्रथा 

कुछ जानकारों के मुताबिक, यह प्रथा असम के मोरीगांव जिले में फली-फूली।  इस जिले को अब काले जादू की भारतीय राजधानी कहा जाता है। दूर-दराज से लोग काला जादू सीखने यहां आते हैं। नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2000 से 2016 के बीच देश के विभिन्न राज्यों में डायन करार देकर 2,500 से ज्यादा लोगों को मार दिया गया। उनमें ज्यादातर महिलाएं थीं। इस मामले में झारखंड का नाम सबसे ऊपर है।  एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में वर्ष 2001 से 2014 के बीच डायन होने के आरोप में 464 महिलाओं की हत्या कर दी गई। उनमें से ज्यादातर आदिवासी तबके की थीं।  लेकिन सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि एनसीआरबी के आंकड़े तस्वीर का असली रूप सामने नहीं लाते। डायन के नाम पर होने वाली हत्याओं की तादाद इससे कई गुनी ज्यादा है। लेकिन ग्रामीण इलाकों में डायन के खिलाफ लोगों की एकजुटता की वजह से ज्यादातर मामले पुलिस तक नहीं पहुंच पाते।

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 कौन बनाता है और कैसे बनती है डायन

आखिर किसी को डायन करार देने का पैमाना क्या है? सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि ग्रामीण और खासकर आदिवासी लोग किसी प्राकृतिक विपदा या बच्चों की मौत किसी गंभीर बीमारी के फैलने की स्थिति में लोग पहले नीम हकीमों या ओझाओं की शरण में जाते हैं। जब उन झोला छाप डॉक्टरों और ओझाओं से कुछ नहीं हो पाता तो वह पास-पड़ोस की किसी महिला को इसके लिए जिम्मेदार बताते हुए उसे डायन करार दे देते है। मौजूदा दौर में भी गांवों में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं होने की वजह से ऐसे डॉक्टर और ओझा ही लोगों का सबसे बड़ा सहारा है। ओझा की ओर से डायन करार दी गई महिला का उत्पीड़न शुरू होता है जो उसकी जान के साथ ही खत्म होता है। ओझा के मुंह से निकला एक शब्द ही गांव के लोगों के लिए ब्रह्मवाक्य बन जाता है और लोग कानून हाथों में लेकर उस कथित डायन को उसके कर्मों की सजा दे देते हैं। ऐसी महिलाएं अक्सर किसी छोटी जाति की होती हैं।  ग्रामीण इलाकों में संपत्ति हड़पने या आपसी रंजिश के लिए भी इस कुप्रथा की आड़ ली जाती है।  खासकर किसी विधवा को डायन करार देकर मारने के बाद उसकी संपत्ति हड़पना आसान है।

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