बेवकूफ नहीं हैं नरेंद्र मोदी (डायरी 11 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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धर्म और संस्कृति मानव सभ्यता के अभिन्न हिस्से हैं। इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता है। और इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि धर्म और संस्कृति दोनों को इंसानों ने बनाया है। मैं तो इसी बात को मानता हूं कि इस दुनिया में कुछ भी आसमानी बात नहीं है। कोई ईश्वर नहीं है, जो इस सृष्टि का संचालन करता है। लेकिन मेरे ऐसा मानने से बहुत कुछ नहीं बदलनेवाला। पेरियार भी ईश्वर को खारिज करते थे। उन्होंने तो अपनी पत्रिका कुदी आरसू में अनेकानेक आलेख लिखे और बुद्धिवाद की अवधारणा लेकर आए। वे हर चीज को तर्क की कसौटी पर परखे जाने के पक्षधर थे।
दरअसल, धर्म और संस्कृति की उपयोगिता ही यही है कि इसके जरिए समाज पर नियंत्रण रखा जा सके। ये दोनों सत्ता के लिए बहुत जरूरी हैं। यह बात मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कल कुछ ऐसा कहा है, जो कि प्रधानमंत्री को नहीं कहना चाहिए। वे रामकृष्ण परमहंस पर केंद्रित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन के दौरान नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के बजाय एक धर्म प्रचारक की भूमिका में नजर आए। उन्होंने काली को माता कहा और यह भी कि पूरी दुनिया काली माता के प्रभाव से ही संचालित है।

भारतीयों की अवैज्ञानिक मानसिकता का पर्याय अमरनाथ गुफा के पास बादल फटने से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 40 से अधिक अभी भी लापता हैं। इस बीच यह ऐलान किया गया है कि अगले एक-दो दिनों में यात्रा फिर शुरू की जाएगी।

अब ऐसी बकवास बातें केवल नरेंद्र मोदी ही कर सकते हैं। हालांकि वह बेवकूफ नहीं हैं। वह राजनीति के बड़े खिलाड़ी हैं। कल ही भाजपा ने ऐलान किया है कि वह पसमांदा समाज के नायकों का सम्मान करेगी तथा उनकी जयंती और पुण्यतिथि के मौके पर कार्यक्रमों का आयोजन करेगी। इसके क्रम में भाजपा ने परमवीर चक्र विजेता अबुल हमीद की जयंती व्यापक स्तर पर मनाने का निर्णय लिया है। वहीं केरल में भाजपा के एक बड़े नेता ने की बयान दिया है कि इस देश को केवल और केवल गोलवलकर के विचारों के जरिए ही आगे बढ़ाया जा सकता है।
परमवीर चक्र विजेता अबुल हमीद
अब हमारे पास तीन उदाहरण हैं। एक चौथा उदाहरण भी जोड़ लें। भारतीयों की अवैज्ञानिक मानसिकता का पर्याय अमरनाथ गुफा के पास बादल फटने से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 40 से अधिक अभी भी लापता हैं। इस बीच यह ऐलान किया गया है कि अगले एक-दो दिनों में यात्रा फिर शुरू की जाएगी।
उपरोक्त चारों उदाहरणों के आधार पर हम समझ सकते हैं कि कैसे धर्म और संस्कृति का उपयोग सियासत के लिए किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह चाहते हैं कि इस देश के हिंदू धर्मावलंबी अज्ञानी बने रहें। इसलिए वह यह कह रहे हैं कि यह विश्व काली के कारण है। जबकि काली कौन है, इसके बारे भारत के बाहर शायद ही कोई जानता हो। ब्राह्मणें के 33 करोड़ देवी-देवता में से किसी ने भी भारत के बाहर नहीं जन्मे। फिर चाहे वह राम हो, कृष्ण हो या फिर ब्रह्मा। ब्रह्मा को तो ब्राह्मण सृष्टि का निर्माता तक कह देते हैं।
नरेंद्र मोदी यह जानते हैं कि हिंदुओं को बेवकूफ बनाए रखने से ही उनकी सत्ता बनी रह सकती है। यदि हिंदुओं ने अंदर यह चेतना आ गई कि मौजूदा सरकार कैसे पूरे देश को एक व्यापारिक संस्थान में बदलती जा रही है, तो सरकार का हाल वही होगा, जो इन दिनों श्रीलंका में घटित हो रहा है। वहां के राष्ट्रपति अपना महल छोड़कर भाग खड़े हुए हैं। श्रीलंकाई जनता उनके महल में प्रवेश कर चुकी है। अब वहां सर्वदलीय अंतरिम सरकार के गठन की तैयारी चल रही है।
श्रीलंकाई राष्ट्रपति के महल में जनता का धावा
नरेंद्र मोदी धर्म का खूब इस्तेमाल करते हैं। अबुल हमीर को याद करने की योजना बनाने के पीछे भी उनकी सोच में धर्म है। वह यह जानते हैं कि पसमांदा समाज के लोगों को अशराफ मुसलमानों की बिरादरी ने कभी बराबर का दर्जा नहीं दिया। वे आज भी सामाजिक और आर्थिक रूप से उतनी ही पिछड़े हैं, जितने कि इस देश में दलित। तो भाजपा इसे एक मौके के रूप में ले रही है ताकि मुसलमानों के 70 फीसदी आबादी को अपने पाले में ला सके। यह सब किया भी इसलिए जा रहा है ताकि 2024 तक यदि देश के आर्थिक हालात और बिगड़े और विषम परिस्थितियां हुईं तो हिंदुओं से जो नुकसान होगा, उसकी भरपाई मुसलमानों से की जा सके। हालांकि यह महज एक प्रयास है, जिसमें सफलता भाजपा के लिए बहुत मुश्किल है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह चाहते हैं कि इस देश के हिंदू धर्मावलंबी अज्ञानी बने रहें। इसलिए वह यह कह रहे हैं कि यह विश्व काली के कारण है। जबकि काली कौन है, इसके बारे भारत के बाहर शायद ही कोई जानता हो। ब्राह्मणें के 33 करोड़ देवी-देवता में से किसी ने भी भारत के बाहर नहीं जन्मे। फिर चाहे वह राम हो, कृष्ण हो या फिर ब्रह्मा। ब्रह्मा को तो ब्राह्मण सृष्टि का निर्माता तक कह देते हैं।

रही बात अमरनाथ हादसे की तो, ऐसे हादसे आए दिन होते रहते हैं। पाखंड और अंधविश्वास में पागल लोगों की भीड़ ऐसे स्थानों पर जाती है और चूंकि यह सीधे-सीधे व्यापार का मामला है तो सरकारें भी इसे शह देते रहती हैं। अलबत्ता अब पहाड़ों पर अधिसंरचना के निर्माण के नाम पर वहां की पारिस्थितिकी को बिगाड़ा जा रहा है। वहां जानेवाले मूर्ख लोगों की सुरक्षा के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं होती है, तो लोग मारे ही जाते हैं।
बहरहाल, मैं इन दिनों पेरियार को पढ़ रहा हूं। यह किताब ओमप्रकाश कश्यप की है। हालांकि इसके अनेक अध्याय पूर्व में पढ़ चुका हूं। लेकिन लैपटॉप के स्क्रीन पर और अपने हाथ में किताब लेकर पढ़ने में बहुत फर्क है। कश्यप जी ने बड़ी मेहनत की है, इस किताब को तैयार करने में। वह ऐसा इसलिए भी कर पाए हैं क्योंकि वे न केवल अच्छे अनुवादक हैं, बल्कि एक बेहद संवेदनशील व वैज्ञानिक सोच रखनेवाले लेखक भी। इस किताब के एक अध्याय में कश्यप जी ने वह दिया है, जिसके बारे में जानने की इच्छा लंबे समय से रही। यह खास जानकारी है पेरियार के आत्मसम्मान आंदोलन से जुड़े महिलाओं के बारे में। यह कमाल का विवरण है। जल्द ही लिखूंगा इस बारे में।
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फिलहाल तो मैं अपनी खांसी से परेशान हूं। बहुत लंबे समय के बाद आया बुखार तो कब का जा चुका है। लेकिन आननफानन में ली गयी दवाओं ने मेरे शरीर को अस्त-व्यस्त करके रख दिया है। उम्मीद है कि जल्द ही इस विषमता से मुक्त होऊंगा।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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