भीड़ जुटाकर हो रही हैं रैलियां फिर विश्वविद्यालय बंद क्यों?

भुवाल यादव, संवादाता, गाँव के लोग

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अभी कल ही 25 अक्टूबर को माननीय प्रधानमंत्री ने अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी, उत्तर प्रदेश में लाखों की भीड़ जुटाकर रैली को संबोधित किया था। केवल प्रधानमंत्री ही नहीं देशभर के सत्ताधारी दल और विपक्षी दलों के नेता रैली निकाल रहे हैं और चुनावी जश्न मना रहे हैं। हाट-बाजार सब खुल रहे हैं। शराब-भट्ठी से लेकर सिनेमाघर भी खुल रहे हैं। यहां तक कि प्राथमिक से लेकर महाविद्यालय तक खुल रहे हैं, वहां पर छात्र संघ के चुनाव भी हो रहें है। दो गज की दूरी, मास्क है जरूरी केवल कहने भर का स्लोगन रह गया है। फिर देश भर के विश्वविद्यालय क्यों बंद पड़े हैं? इस सवाल को लेकर कई विश्वविद्यालयों के छात्र आये दिन आन्दोलन कर रहे हैं लेकिन कोई जिम्मेदार पदाधिकारी दो टूक मुंह खोलने को तैयार नहीं हैं।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्र भी इस सवाल पर चुप नहीं बैठे हैं। यदि एक तरह से देखा जाए तो सबसे पहले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रों ने ही विश्वविद्यालयों को खोलने को लेकर ट्विटर पर ख़बरें ट्रेंड करवायी थीं। पिछले दो साल से अब तक चार बार बीएचयू के छात्र-छात्राओं ने बीएचयू के जिम्मेदार अधिकारियों से मुलाकात की है, लेकिन वे सब कोविड का हवाला देकर कन्नी काटते रहे हैं। आज भी बीएचयू के छात्रों ने उपर्युक्त सवाल के साथ अन्य समस्याओं को लेकर सेंट्रल लाइब्रेरी से लंका गेट तक मार्च निकाला। लंका पहुंचकर छात्रों ने गेट बंद करना चाहा, परंतु बीएचयू प्रशासन के लोगों ने प्रदर्शनकारी छात्रों को ऐसा करने से मना कर दिया। इससे आक्रोशित छात्र वहीं बैठ गये और बीएचयू प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। इस दौरान छात्रों के साथ धक्का-मुक्की भी हुई। कई छात्रों ने बीएचयू के एक-दो प्रोफेसरों पर बदतमीजी करने का आरोप भी लगाया और कहा कि प्रोफेसर लोग हम लोगों को झगड़ा करने के लिए उकसा रहे हैं, धमकी दे रहे हैं। एक प्रोफेसर ने तो हद ही पर कर दिया, वे बच्चों को गाली भी देने लगे। मीडिया के साथियों ने प्रोफेसरों पर लगे आरोप के संदर्भ में उनका पक्ष जानने के लिए जब उनसे बात करना चाहा, तो कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं हुआ। प्रोफेसरों के बीच से डॉक्टर हेमंत मालवीय ने कहा कि अभी बच्चे धरना दे रहे हैं, आप सब जाइए। शाम को मिलियेगा। बच्चों की समस्याओं को लेकर हम लोग मंत्रणा कर रहे हैं। इतना सुनने के बाद मीडिया के साथी वापस चले आये।

दोनों जगह धरना देने वाले छात्रों का कहना था कि कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं है। बीएचयू ही नहीं, देशभर के अधिकतर प्रोफेसर भेड़ों की चाल चल रहे हैं। उनका स्वविवेक मर गया है। ऊपर से जो आदेश आता है, उसी को माथे पर लेकर भेंड़ की चाल चलने लगते हैं। प्रोफेसर लोग यह भी नहीं सोच पाते हैं कि देश के लिए क्या जरूरी है, लोकतंत्र, आमजनता या छात्रों के लिए क्या सही है और क्या ग़लत।

छात्रों से यह जानने के लिए सवाल किया गया कि यह धरना-प्रदर्शन कब तक चलेगा तो उन्होंने कहा कि जब तक हमारी मांग नहीं मान ली जाती और गाली देने वाले प्रोफेसर माफी नहीं मांग लेते, तब तक हम सब यहीं बैठे रहेंगे। युनिवर्सिटी खुलवाने को लेकर धरना में मुख्य रूप से योगेश कुमार, विष्णु मिश्रा राहुल कुमार,अभिनव पांडे, अमन सिंह, अभिनाश सिंह, उमेश यादव, गुंजन पाठक, भूपेंद्र यादव, विवेक कुमार, अंकित पाल, कुंदन कुमार, राहुल कुमार, शिवगणेश शुक्ला, अभिषेक सिंह, विक्की कुमार, रवि यादव ,राहुल राजभर ,सत्यम विश्वकर्मा, विक्की जायसवाल, पीयूष सिंह, सुमित और शुभम आदि छात्र मौजूद थे।
वहीं दूसरी ओर ‘पुस्तकालय विज्ञान विभाग’ के ट्रेनी छात्र कल से विश्वविद्यालय के केन्द्रीय कार्यालय के सामने बैठकर धरना दे रहे हैं। ट्रेनी छात्रों का कहना है कि पीछले एक दशक में महंगाई अर्श से फर्श पर पहुंच गई है। इतने वर्षों में देश के हरेक कर्मचारियों का वेतन बढ़ा, भत्ताएं बढ़ी। यहां तक आम मजदूरों की मजदूरी में भी बहुत अधिक तो नहीं, लेकिन नाम भर का जरुर बढ़ोतरी हुई है। शोधार्थियों की अध्येतावृत्ति भी दो बार बढ़ चुकी है, लेकिन हम लोगों को जनवरी, 2014 से पांच हजार रुपए महीना दिया जा रहा है; बताइए हम सब क्या करें? हमारी मांग है कि हमें कम से कम 11000 ₹/प्रतिमाह दिया जाए, जिससे हम अपनी जरूरत की चीजें पुरा कर सकें। जानकारी के लिए आपको अवगत करा दें कि ट्रेनी भत्ता बढ़वाने के लिए पीछले सात साल में ट्रेनी छात्रों ने कई बार बीएचयू के वीसी से मिल चुके हैं, लेकिन हर बार वे सब छुछे हाथ लौटे हैं। धरना दे रहे छात्रों में से सतीश कुमार यादव ने बताया कि इस बार हम खाली हाथ नहीं लौटेंगे। भले इसके लिए हमें कुछ भी करना पड़े।
दोनों जगह धरना देने वाले छात्रों का कहना था कि कोई कुछ सुनने को तैयार नहीं है। बीएचयू ही नहीं, देशभर के अधिकतर प्रोफेसर भेड़ों की चाल चल रहे हैं। उनका स्वविवेक मर गया है। ऊपर से जो आदेश आता है, उसी को माथे पर लेकर भेंड़ की चाल चलने लगते हैं। प्रोफेसर लोग यह भी नहीं सोच पाते हैं कि देश के लिए क्या जरूरी है, लोकतंत्र, आमजनता या छात्रों के लिए क्या सही है और क्या ग़लत। प्रायः प्रोफेसरों का विवेक इस कदर मर गया है कि यदि सत्ता में बैठे लोग कहें कि आप अपने बच्चे को तालाब में फेंक दीजिए, तो वे सब फेंक सकते हैं; क्योंकि उनका चिंतन मर गया है। छात्रों का कहना था कि हम सब चाहते हैं कि किसी भी शिक्षण संस्था के जिम्मेदारों के अंदर भेंड़ की चाल चलने का विवेक मरे और वे सब छात्र, नौजवान, किसान और देश के विकास के लिए स्वविवेक एवं चिंतन को जीवित और जिंदा होने की पहचान बनाये रखें। सेंट्रल आफिस के सामने ‘ट्रेनी भत्ता’ बढ़वाने की मांग को लेकर धरना दे रहे छात्रों में सुधांशु सोनी, गिरीश तिवारी, जयेश सिंह, ट्विकल सिंह, अमित लाल, निधि, संध्या,नेहा,भव्या, शिवांगी, सरस्वती, महेश्वर, परमानन्द, राजेश, शुभम, हरेंद्र, कुणाल, सौरभ और सूरज आदि छात्र उपस्थित थे।
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