Saturday, March 2, 2024
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कला के जरिए रीरूटिंग अर्थात अपनी जड़ों की ओर लौटना

दूसरा और अंतिम भाग  अम्मान मे घूमते-घूमते हमें एक दरात अल फनम नामक आर्ट गैलरी में ले जाया गया जिसे खालिद शोम फाउंडेशन नामक संस्था चला रही है। दरात अल फनम का मतलब दरअसल ‘कला का घर’ है। यहा खालिद शोम फाउंडेशन की राणा बेरुती एक आर्ट एक्जीबिशन को क्यूरेट कर रही है जिसमें 20 […]

दूसरा और अंतिम भाग 

अम्मान मे घूमते-घूमते हमें एक दरात अल फनम नामक आर्ट गैलरी में ले जाया गया जिसे खालिद शोम फाउंडेशन नामक संस्था चला रही है। दरात अल फनम का मतलब दरअसल ‘कला का घर’ है। यहा खालिद शोम फाउंडेशन की राणा बेरुती एक आर्ट एक्जीबिशन को क्यूरेट कर रही है जिसमें 20 कलाकारों की पेंटिंग्स हैं। इन कलाकारों में से 19 जोर्डन में ही रहते है और एक फिलिसतीन में रहते हैं। इस आर्ट प्रदर्शनी की मुख्य थीम बहुत मजेदार है, जिसे रीरूटिंग मतलब पुनः अपनी जड़ों की ओर लौटना या उन्हें मजबूत करना। कला प्रतिरोध का एक बहुत बड़ा हथियार भी है। हालांकि हथियार और कला दोनों विरोधाभासी भी है। कला युद्धोन्माद, भावनाओं के व्यवसायीकरण, संप्रादयिकरण आदि के विरुद्ध एक जबरदस्त बौद्धिक प्रतिरोध भी हो सकती है लेकिन यह कलाकारों पर निर्भर करता है। प्रतिरोध की कला शोषण के विरुद्ध जनमत बना सकती है और लोगों को जागृत कर सकती है।

यह प्रदर्शनी बहुत महत्वपूर्ण है जो हमें सोचने को मजबूर करती है। इसका विषय था जल, जमीन और संसाधनों के साथ जोर्डन का रिश्ता। आज जोर्डन एक आधुनिक राष्ट्र है जहाँ बड़े मॉल हैं, सुपर मार्केट हैं, अमेरिकन ब्रांड हैं और सब कुछ है जो आज के दौर में हमें चाहिए लेकिन कोविड के दो साल के लॉकडाउन से ही लोगों को दिककतें होने लगी थीं और सरकार की समझ में आ गया था। जोर्डन की ‘तरक्की’ का राज यह था कि यह अपने यहाँ ब्रेड और गेंहू के लिए पूरी तरह पर अमेरिका पर निर्भर हो गया। यह उस देश की कहानी है जो 1960 में दुनिया में सर्वाधिक गेंहू पैदा करता था और जहाँ ब्रेड बनाने की 14000 वर्ष पुरानी परंपरा के रिकार्ड आज भी मौजूद है। फिर अन्तरराष्ट्रीय वित्त संस्थानों के दवाब में विकास के नाम पर जोर्डन ने अपने किसानों को सब्सिडी देना बंद कर दिया। किसानों के खेत बेच बड़े-बड़े मॉल, होटल और लग्जरी की आइटम बने और अमेरिका ने गेहूँ भेजना शुरू किया। गेहू का सबसे बड़ा उत्पादक देश बिल्कुल अमेरिका पर निर्भर हो गया। जब बात समझ में आई तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आज जोर्डन अपनी आवश्यकता का 2% गेंहू भी उत्पादन नहीं करता जबकि 1960 में वह अपनी जरूरत से 200 प्रतिशत अधिक उत्पादन करता था।

जोर्डन की यात्रा हालांकि छोटी थी और इतने कम समय में आप सभ्यताओं के इस महान देश को नहीं समझ सकते फिर भी दुनिया भर के मित्रों से मुलाकात और जोर्डन के साथियों के व्यवहार और सहयोग से मुझे बहुत संतोष मिला। इतने लोगों से मिलकर जो अपनत्व मिला उसे मैं भुला नहीं सकता क्योंकि उसने यह जाहिर किया दुनिया में अत्याचारों और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए अभी भी लोग संघर्षरत हैं और इससे हमें यह महसूस हुआ कि हम अपनी लड़ाई में अकेले नहीं हैं।

अब जोर्डन की समझ आ गया है कि विकास और तरक्की के नाम पर उससे उसकी संस्कृति छीन ली गई और इसकी अभिव्यक्ति कला के द्वारा भी अभिव्यक्त हो रही है। उसके अलावा देश में किसान भी अब खड़े हो रहे हैं और सरकार की भी समझ आ चुका है इसलिए अब अम्मान शहर के अंदर या तो ग्रीन पैच दिखाई दे रहे है या गेहूं की खेती। कई स्थानों पर भेड़ बकरियां भी चारागाहों मे चरती दिखाई देती हैं।

इस लिहाज से यह कला प्रदर्शनी महत्वपूर्ण थी कि इसमें कलाकारों ने जोर्डन के उस अतीत को जिंदा करने की कोशिश की है जब वहा गेहूँ का भंडार था। उसकी बहुत से किस्में थीं। और यह भी कि कैसे वर्तमान के पूंजीपरस्त देशों ने उनकी खाद्यान्न संप्रभुता को खत्म किया। जोर्डन का उदाहरण इस बात को सिद्ध करने के लिए काफी है कि कैसे विश्व बैंक के स्ट्रक्चरल ऐडजस्टमेंट प्रोग्राम ने अमेरिका और विकसित देशों का ही साम्राज्यवादी एजेंडा दुनिया में फैलाया और यह आज भी उतना ही खतरनाक है, जितना पहले। यह पहले मध्यवर्गीय लोगों को टारगेट करता है, उनकी चाहतें बदलता है। अचानक से हमें अपनी दिखने वाली वस्तुएं, भोजन कमतर नजर आने लगते हैं और विदेशी ब्रांड अच्छे लगने लगते हैं। खान-पान, रहन-सहन यदि हमारा ठीक भी हो तो भी हमारे अंदर एक कुंठा भरने लगती है। फलस्वरूप हम उनको फॉलो करना शुरू कर देते हैं। दरअसल, यही पूंजीवाद है, जो हमारी चाहत बदल देता है। जहाँ बाजार से आप अपनी जरूरत की वस्तुएं नहीं खरीदते, बल्कि बाजार उसको निर्धारित करने लगता है कि आपको क्या खाना है, क्या खरीदना है? यह एक प्रकार का जाल  है जिसमें हम फँसते चले जाते हैं और जब हमें समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

फिलिसतीन के एक साथी के साथ

रीरूटिंग लोगों को उनके मूल की तरफ ले जा रही है और आशा है कि जोर्डन फिर से अपनी खाद्यान्न संप्रभुता को हासिल कर लेगा।

डेड-सी या मृत सागर की ओर

अपनी फील्ड विज़िट पूरी कर हम लोगों को अम्मान से डेड-सी यानि मृत सागर की ओर प्रस्थान करना है, जहाँग्लोबल लैंड फोरम आयोजित किया जा रहा है। हम शाम चार बजे के करीब बस से प्रस्थान करते हैं तो पता चलता है कि गाड़ी ढलान की ओर जा रही है। गाड़ी बीच में  एक स्थान पर रुकती है जिसके विषय में हमें बताया गया कि वह जोर्डन के प्रमुख उत्पादों की दुकान है और वहा से आप अपने लिए सोवेनियर खरीद सकते हैं। हमें बताया गया कि 15 मिनट में गाड़ी चल देगी लेकिन हम जानते हैं कि यह बड़ी कंपनियों के ड्राइवर के खेल है जो आपको सस्ती और अच्छी चीजों के नाम पर महंगी दुकान में ले आया है। बहुत से लोग खरीदारी करते हैं। मैं भी जोर्डन के पुरुषों के सिर पर बांधे जाने वाला साफा खरीद लेता हूँ और उसे पास के व्यक्ति से सिर पर बँधवाता हूँ। लोग बहुत-सी खरीदारी कर रहे हैं, विशेषकर मृत सागर के प्रोडक्ट जो साबुन, तेल, लेप के तौर पर बहुत पॉपुलर हैं। लोग कहते हैं कि मृत सागर की मिट्टी शरीर पर लगा कर स्नान करोगे या फेसवाश करोगे तो स्किन अच्छी हो जाती है।

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हिजाब पर बवाल के बहुआयामी निहितार्थ

धीरे-धीरे आधे घंटे बाद हम होटल हिल्टन की और बढ़ते हैं, जहाँ हमारे रहने की व्यवस्था है। दुनिया भर के डेलीगेट्स यहाँ  पहुंचना शुरू हो गए हैं। होटल के रीसेप्शन पर इंटरनेशनल लैंड कोऑलिशन की पूरी टीम मौजूद है। कोरोना काल के दो  साल बाद हम पहली बार मिल रहे हैं। सेक्रेटेरियट के निदेशक माइकेल टेलर गले मिलकर हमारा स्वागत करते हैं। सबको एक खुशी है कि साथ बैठने का अवसर मिलेगा और हम दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के कारण हो रहे खतरों पर ईमानदारी से विचार करेंगे। आदिवासियों, किसानों, घुमंतू समुदायों, पहाड़ों पर रह रहे लोगों के अधिकारों को बचाने की बात भी करेंगे, क्योंकि विश्व की पर्यावरण या जलवायु परिवर्तन संबंधी किसी भी समस्या का समाधान स्थानीय समुदायों की भूमिका के बिना संभव नहीं है।

शाम को नीदरलैंड आई  ‘बहिन’ बारबरा कोडिसपोती, जो ऑक्सफाम इंटरनेशनल के साथ काम करती है, ने  मुझे अपने होटल में खाने पर आमंत्रित किया। बहुत साल बाद बारबरा को देख रहा हूँ। उसके साथ दिल का ऐसा रिश्ता बना कि कहीं भी, हो बात जरूर करती है। उसके माता-पिता मुझे अपने बेटे की तरह देखते हैं और वो मुझे अपने बड़े भाई की तरह। दुनिया में ऐसे बहुत कम रिश्ते होते हैं। मैंने जिंदगी भर ऐसे रिश्ते बनाए जो रक्त-संबंधों से बड़े थे और मै उन्हें दिल का रिश्ता कहता हूँ। बारबरा कई बार भारत आई है और हमारे समाज के विषय में काफी कुछ जानती है।

एक अंदाज यह भी

 

डेड सी की मिट्टी का लेप

हिल्टन होटल में छठवीं मंजिल पर जो कमरा मुझे मिला था वहाँ से डेड-सी का खूबसूरत नजारा दिखाई देता था। अपने कमरे में दाखिल होते ही मैंने पहला काम पूरे डेड-सी को अपनी आँखों में कैद करने का किया। नीचे हिल्टन का स्वीमिंग पूल भी था जिसमें जाने की सुविधा हमें थी और फिर वहीं से हम डेड-सी बीच पर पहुँचकर किनारे बैठकर आनंद ले सकते हैं। हिल्टन ने अपने ग्राहकों के लिए डेड सी में मड बाथ या क्ले बाथ की व्यवस्था की है। उनके कर्मचारी यहाँ पर हैं जो आपको बताते हैं और आपके शरीर पर मिट्टी का लेप करते हैं। नियम यह है कि पहले आप डेड सी में 10 मिनट तक पानी में  रहेंगे। पानी आपकी गर्दन से ऊपर नहीं होना चाहिए क्योंकि यह पानी बहुत खारा होता है और आँख में जाने पर बहुत ज्यादा जलन हो सकती है। इसके अलावा यह भी समझना जरूरी है कियदि आपके शरीर पर कोई चोट या कट है तो फिर डेड सी का पानी उस कट पर लगने पर अधिक जलन कर सकता है।

इस कार्यक्रम में आई अमेरिका की प्रसिद्ध ‘स्टोरी टेलर’ जो गुलड़ी के साथ कुछ समय सी बीच पर गया तो देखा हमारे नेपाली मित्र भी वहाँमौजूद थे। थोड़ी देर में मैंने देखा माइक टेलर भी कुछ साथियों के साथ घूम रहे थे। सभी के शरीर पर काली मिट्टी का लेप लगा था। माइक मेरे पास आकर बोले, वीबी तुम यहाँ बिना लेप लगाए नहीं जा सकते। डेड सी में  आकर यदि इसका आनंद न लिया तो बेकार है।

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी…

डेड सी दरअसल एक बड़ी झील है जिसका मुख्य स्रोत जोर्डन नदी है। इसका पानी समुद्री जीवों के लिए उपयोगी नहीं है इसलिए इसके अंदर कोई समुद्री जीव नहीं है। डेड सी, जोर्डन, वेस्ट बैंक और इस्राइल से घिरा हुआ है। यह समुद्र तल से करीब 430 मीटर नीचे है और पृथ्वी पर सबसे नीचे का स्थल माना जाता है । मेरे लिए यह एक अचरज और उत्साह का विषय था कि जो व्यक्ति अभी कुछ दिन पूर्व समुद्र तल से करीब 4000 मीटर ऊपर केदारनाथ में जा रहा हो, उसे उस स्थान पर भी घूमने का अवसर मिला जो समुद्र तल से नीचे है। डेड सी की औसत गहराई 304 मीटर है। यह 50 किमी लंबा और 15 किलोमीटर चौड़ा है। डेड सी भी जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहा है और आज दुनिया के इस महान आश्चर्य पर खतरा है। जैसे हम हिमालय पर खतरा देख रहे हैं वैसे ही इस पर भी आज खतरा है। 1930 में डेड सी का क्षेत्रफल 1050 वर्ग किलोमीटर था लेकिन आज यह घट कर मात्र 605 वर्ग किलोमीटर ही रह गया है। डेड सी पर इस खतरे का जिक्र ग्लोबल लैंड फोरम में भाषण करते हुए जोर्डन के राज परिवार की रानी बसमा बिन तलाल ने भी किया। बसमा जोर्डन के राजा की बहन हैं और अनेकों अन्तराष्ट्रीय संगठनों से जुड़ी हैं। वे यू एन पॉपुलेशन फंड की प्रमुख भी रह चुकी हैं।

अमेरिका का भेजा गेंहू जिसने जोर्डन की खाद्यान संप्रभुता को खत्म किया

आखिर मैंने भी डेड सी में नहाने और कलि मिट्टी का लेप लगाने का मज़ा ले ही लिया 

तीन चार दिन ऐसे ही देखने के बाद, एक दिन मैंने चुपचाप समय निकाला और बीच पर चला गया। मैंने वहाँ के कर्मचारियों से पूछा तो उन्होंने मुझे प्रक्रिया बताई। कहा, कि आप 10 मिनट तक पानी में रहिए और फिर यहाँ लेप लगाने आइए। में, अकेले ही 10 मिनट तक पानी में चहलकदमी करता रहा। तैरना तो मुझे आता नहीं था लेकिन उठने-बैठने का प्रयास कर रहा था। डेड सी की खास बात यह है कि आदमी इसमेंडूबता नहीं है। पानी आपको नीचे से ऊपर फेंकता है। मैंने यह महसूस किया और धीरे धीरे मज़ा भी आ रहा था। 15 मिनट के बाद मेरे शरीर पर भी पूरा काला लेप लगा दिया गया और मुझे बताया गया कि 25 मिनट तक धूप में घूमता रहूँ। दोपहर का समय था तो कम लोग वहाँ पर थे पर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा जब मैंने मंगोलिया के अपने मित्र हिजाबा को वहां देखा। हिजाबा 10 मिनट तक तैरते रहे और फिर उन्होंने मुझे बताया कि वह पिछले 4 दिनों से लगातार यहाँ आ रहे थे। हिजाबा मंगोलिया के घुमंतू समुदाय से आते हैं, बुद्धिस्ट हैं  और जब मैं उन्हें कुशीनगर और सारनाथ के विषय में बताता हूँ तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है। हिजाबा लगभग 70 वर्ष के होंगे लेकिन उनका दिल पूरा युवा है। हम लोग बहुत से फोटो खींचते हैं। मैं भी 25 मिनट होने के बाद पुनः डेड सी में हूँ और लेप मिटा रहा हूँ। थोड़ी देर में शॉवर लेने जाता हूँ तो वहाँ हिल्टन का सहायक मुझे एक और लेप लगाने के लिए कहता है। ये शायद नमक का लेप दिख रहा है। 10 मिनट के बाद मैं पुनः स्नान करता हूँ साफ पानी से और तरोताजा महसूस करता हूँ। फिर चुपचाप अपने कार्यक्रम स्थल पर पहुँच जाता हूँ।

आर्ट गॅलरी मे रखी गेहू की विभिन्न किस्में

फिलिस्तीन का सवाल

ग्लोबल लैंड फोरम के एक विशेष सत्र का मॉडरेशन मुझे करना था। इसमें तीन  प्रमुख विशेषज्ञ थे। एक मध्यपूर्व में महिलाओं के प्रश्न पर कार्य करने वाली महिला, एनगोक फिलीपींस के डॉन मरकेज और दूसरे फिलिस्तीन में भूमि के प्रश्नों को काम करनेवाले मोहम्मद अलसलिमिया। अमेरिका की इतिहासकार-कहानीकार जो गुलड़ी को अंत में एक पूरे कार्यक्रम का सार और उस पर एक टिप्पणी करनी थी। जब मैं भारत से निकला था तो मुझे पता था कि फिलिस्तीन का प्रश्न यहाँ की जनता को सबसे ज्यादा उद्वेलित करता है, लेकिन मुझे बहुत से यूरोपियन मित्रों ने यह कहा कि आप क्योंकि मॉडरेट कर रहे हैं,  इसलिए संभल के रहिएगा क्योंकि कई बार बहुत ज्यादा संवेदनशील मुद्दे के कारण तनाव भी हो जाता है और बात एजेंडे से भटक जाती है। कार्यक्रम को समयनुसार चलाना बहुत मुश्किल होता है। मैं यह बात बखूबी जानता हूँ कि हम एशियाई, अफ्रीकी और लातिनी अमेरिकी लोग जब मौका मिलता है तो खूब बोलते हैं। हमारे इमोशन बात करते हैं। हमारी बात दिल से निकलती है। जो बड़े अन्तराष्ट्रीय संगठनों में काम करते हैं या यूरोप अमेरिका में  रहते हैं वे बिल्कुल टू द पॉइंट बात रखते हैं। उनकी बात सही हो सकती है लेकिन वे दिल से कम और दिमाग से ज्यादा होती हैं।

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हमारे यहाँ लड़कियां बारात में नहीं जाती हैं..

कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ही मोहम्मद मेरे साथ बैठे और बात कर रहे थे कि अचानक उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या इंटेरप्रेटेशन (अनुवाद) की सुविधा है। मैंने कहा कि हम सब लोग तो अंग्रेजी जानते हैं और 100 लोगों के ग्रुप के लिए अनुवाद की क्या जरूरत है? लेकिन मोहम्मद जो बेहद अच्छी अंग्रेजी जानते थे अपनी बात पर अडिग रहे और उन्होंने कहा कि वह औपनिवेशिक भाषा में अपनी बात नहीं रखेंगे। मैंने उन्हे मनाने की  बहुत कोशिश की लेकिन वह नहीं माने और हमें  उसके लिए हॉल बदलना पड़ा ताकि उस हॉल में रहें जहाँ अरबी अनुवाद की सुविधा थी। खैर, इस कारण हमारा कार्यक्रम 10-15 मिनट लेट हो गया। अब मेरी चिंता बढ़ गई थी कि मैं इतने विशेषज्ञों को हैन्डल कैसे करूंगा? लेकिन पहले दो साथियों ने तो 20 मिनट में अपनी बात रख दी। मोहम्मद ने पावर पॉइंट रखा और उनकी बात का अरबी से अंग्रेजी मे अनुवाद होता रहा। उनकी बातों में गुस्सा था, अफसोस था और पूरी दुनिया के ताकतवर लोगों के खेल के प्रति घृणा थी, जिसके कारण आज भी उनका देश पूर्णतः आजाद नहीं है। इजरायल अपनी मर्जी से कभी भी उनके देश पर हमला कर सकता है, उनके लोगों को बंधक बना सकता है और उनके घरों में घुसकर उन्हें उजाड़ सकता है। मतलब इसराइल के लिए कोई अंतराष्ट्रीय कानून नहीं है। दुनिया की सभी बड़ी शक्तियों की पूरी शह उसे मिली हुई है जिसके फलसरूप वह एक बेलगाम घोड़ा बन गया है। मोहम्मद एक के बाद एक महत्वपूर्ण बातें कह रहे थे और सभी बिल्कुल गंभीरता से उनकी बातें सुन रहे थे। कुल मिलाकर हमारा सेशन लंबा चला लेकिन अंत में मोहम्मद को इस बात की खुशी रही कि उनकी बातों को काटा नहीं गया और उन्हें जितना कहना था उसे कहने का उन्हें पूरा मौका मिला। मेरे लिए यह एक महत्वपूर्ण क्षण था।

जोर्डन की महिला किसान

 

ग्लोबल लैंड फोरम में अनेक देशों के साथियों से मिलने का मौका मिला। बहुत से पुराने मित्र भी मिले तो अंतराष्ट्रीय संगठनों में काम करने वाले लोग भी मिले जिन्हें अभी तक ऑनलाइन ही देखा था। दुनिया में प्राकृतिक संशधनों और जलवायु परिवर्तन के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर इतने लोग एक साथ थे और उन सब में मैं भी अपनी आवाज मिला सका, मेरे लिए बेहद यह संतोष का विषय था। एक और संतोष की बात यह थी कि यह वर्ष अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेरे 25 वर्ष पूरे होने का समय भी था और इंटरनेशनल लैंड कोऑलिशन की स्थापना के पहले से अभी तक लगभग सभी सम्मेलनों में  उपस्थित होने वाले गिनती के एक या दो लोगों में मैं शामिल था और इस बात को बहुत लोगों ने सराहा भी।

सम्मेलन के अंतिम दिन एशिया समूह की ओर से मुझे श्रीलंका के विषय में पाँच मिनट में अपनी बात रखने को कहा गया। वहाँ श्रीलंका का कोई प्रतिनिधि नहीं था और मैंने कहा कि आज इस मंच से श्रीलंका में जो आर्थिक संकट आया है हम सबको वहाँ की जनता के साथ एकता की बात कहनी चाहिए और जो भी अन्तराष्ट्रीय संस्थान हैं उनकी जिम्मेवारी है कि वे अपनी नीतियों का भी पुनरावलोकन करें कि कहीं उनकी नीतियों की ही सज़ा तो श्रीलंका को नहीं मिल रही?

जोर्डन की यात्रा हालांकि छोटी थी और इतने कम समय में आप सभ्यताओं के इस महान देश को नहीं समझ सकते फिर भी दुनिया भर के मित्रों से मुलाकात और जोर्डन के साथियों के व्यवहार और सहयोग से मुझे बहुत संतोष मिला। इतने लोगों से मिलकर जो अपनत्व मिला उसे मैं भुला नहीं सकता क्योंकि उसने यह जाहिर किया दुनिया में अत्याचारों और दुनिया को बेहतर बनाने के लिए अभी भी लोग संघर्षरत हैं और इससे हमें यह महसूस हुआ कि हम अपनी लड़ाई में अकेले नहीं हैं। यह जरूर है कि बिना विकल्प के लड़ाई नहीं जीती जा सकती और आज के संदर्भ में पर्यावरण, और जलवायु परिवर्तन के सवाल दुनिया के सामने सबसे बड़े सवाल होने चाहिए ताकि हम दुनिया को भयावहता से बचाकर एक बेहतर दुनिया बना सकें।

 समाप्त

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत जाने-माने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

गाँव के लोग
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