Monday, May 27, 2024
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वर्षों से जाति प्रमाण पत्र के अभाव में नौकरी के मौके गँवाते दलितों को राजस्व विभाग नहीं मानता दलित

जौनपुर। मेरा सवाल सुनकर कमैता के चेहरे का भाव उड़ गया। मासूम- सा दिख रहा यह चेहरा अब लाल सुर्ख हो गया। अभी तक भोला सा दिख रहा यह चेहरा जिस पर चिंता की लकीरें ही दिख रही थीं, अब इनके स्थान पर गुस्से का भाव आ गया। कड़क स्वर में कमैता बोली  ‘इन सरकारी […]

जौनपुर। मेरा सवाल सुनकर कमैता के चेहरे का भाव उड़ गया। मासूम- सा दिख रहा यह चेहरा अब लाल सुर्ख हो गया। अभी तक भोला सा दिख रहा यह चेहरा जिस पर चिंता की लकीरें ही दिख रही थीं, अब इनके स्थान पर गुस्से का भाव आ गया। कड़क स्वर में कमैता बोली  ‘इन सरकारी बाबू लोगों को क्या मालूम मैंने कितनी मेहनत से अपने बच्चों को पढ़ाया है। जब घर-घर मांगने के लिए जाया करती थी तो यह अनिश्चित ही रहता था कि आज कुछ खाने को मिलेगा भी या नहीं। मांगने के दौरान कोई देता था कोई दुत्कार कर भगा देता था। ऐसे में मन को बहुत कष्ट होता था और सोचती थी आज के बाद कभी मांगने नहीं जाऊँगी। भगवान हम लोगों की इतनी परीक्षा क्यों ले रहा है। लेकिन घर में खाली बर्तनों और बच्चों का मुंह भी देखना पड़ता था। मन में हमेशा यही चलता रहता, किसी तरह इन बच्चों को पाल-पोसकर बड़ा कर दूं। कुछ पढ़-लिख लेंगे तो शायद हम लोगों का भी जीवन बदल जाएगा। लेकिन आगे चलकर मंहगाई डायन बनकर ऐसी आई कि मैं अपने सभी बच्चों को चाहकर भी नहीं पढ़ा पायी। यही तीसरे नंबर का प्रेमचंद है जो बार-बार पढ़ने की जिद करता रहा, इसी पर हम सारी पूंजी खर्च करते रहे और इसकी पढ़ाई की इच्छाओं को पूरी करते रहे, यह सोचकर की शायद यह कुछ बन जाएगा तो बुढ़ापे में हमारी लाठी बनेगा। भगवान ने लेखपाल बनने का एक मौका भी दिया लेकिन इन अफसरों ने इसके पंखों को ही काट दिया। जाति प्रमाणपत्र के ऐसे भंवरजाल में फंसाया कि वह नौकरी तो हाथ से निकल ही गयी, आज भी मेरा बेटा जाति प्रमाण पत्र के लिए अधिकारियों के दरवाजे की कुंडी खटखटा रहा है।’

बेटे प्रेमचंद के साथ कमैता

यह कहानी है जौनपुर जिला मुख्यालय से लगभग 9-10 किलोमीटर दूर स्थित सिकरारा ब्लॉक के मलहनी विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले कुल्हनामऊ गाँव की दलित बस्ती की रहने वाली कमैता के बेटे प्रेमचन्द्र की।

इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि इस गाँव की दलित बस्ती के किसी भी व्यक्ति का जाति प्रमाण पत्र पिछले दस वर्षों से   नहीं बना। जब भी गाँव के लोग अपने बच्चों का जाति प्रमाण पत्र ऑनलाइन या ऑफ लाइन बनवाना चाहते हैं तो वह रिजेक्ट हो जाता है।

इस बारे में दलित बस्ती के प्रेमचन्द्र कहते हैं ‘पिछले 10 वर्षों से मैं लगातार अपना जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए प्रयासरत हूँ लेकिन मेरा जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है।’ आँखों में आँसू लिए निराशा कि पगडंडियों पर प्रेमचन्द चलते ही जा रहे थे ‘वर्ष 2014 में लेखपाल भर्ती परीक्षा में मेरा चयन हो गया था। मुझे आजमगढ़ जिला मिला था। उस समय मेरे पास नया जाति प्रमाण पत्र नहीं था। मैंने जाति प्रमाण पत्र के लिए कई बार अप्लाई किया। लेकिन मेरा जाति प्रमाण पत्र नहीं बन सका। मेरे हाथ में आई हुई नौकरी चली गई। तब से लेकर आज तक मैं जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए संघर्ष कर रहा हूं लेकिन अब भी मेरा जाति प्रमाण पत्र नहीं बन सका है। बीच में मेरा बीएड में हो गया तो मैंने इसे करने का निश्चय कर लिया। उस दौरान भी मैंने कई बार जाति प्रमाण पत्र बनवाने की कोशिश की लेकिन मुझे सिर्फ निराशा ही हाथ लगी। उस समय अगर मेरे पास जाति प्रमाण पत्र होता तो मैं कम पैसे में बीएड कर लेता और मुझे स्कॉलरशिप भी मिल जाती। मेरे लिए तो मेरी जाति ही अभिशाप बन चुकी है। दलित न होकर मैं किसी ऊंची जाति का होता तो आज मेरे साथ ऐसा नहीं होता। क्योंकि अगड़ी जतियों में से कुछ लोग आज दस प्रतिशत का लाभ नौकरियों में ले रहे हैं। लेकिन यहाँ तो अनुसूचित जाति का होने के बावजूद सरकारी लाभ से वंचित हूँ।  प्रेमचंद यहीं नहीं रुकते। इस दौरान उनके मन की पीड़ा आँखों से आंसू बनकर लगातार निकलती जा रही थी। अपनी बात को जारी रखते हुए वे आगे कहते हैं ‘यह पीड़ा सिर्फ मेरी अकेले की नहीं है बल्कि यह पीड़ा कुम्हलामऊ गांव की इस पूरी दलित बस्ती की है।’

प्रेमचंद

सवाल पूछने वाले अंदाज में प्रेमचंद कहते हैं ‘आखिर ऐसा कब तक चलता रहेगा ? समाज से सीखे अनुभवों को साझा करते हुए बोले ‘जिंदगी रूपी गाड़ी को चलाने के लिए पढ़ाई करना बहुत जरूरी है। दुनिया आज कहां से कहां चली गई, यह सिर्फ शिक्षा के कारण ही हो रहा है। जो लोग शिक्षा से दूर हैं या वंचित हैं, वे समाज की मुख्यधारा से कट जाते हैं और उनका विकास वहीं पर रुक जाता है। इसलिए समाज की मुख्य धारा में बने रहने के लिए, शिक्षा और रोजगार दोनों ही बहुत जरूरी हैं। इनमें से एक की कमी से समाज का संतुलन बिगड़ने लगता है। समाज में लोग अपने अधिकारों के लिए बगावत शुरू कर देते हैं। निरंकुश सत्ता के विरुद्ध इतिहास के पन्नों में देखा जाय तो बड़ी-बड़ी क्रांतियों का उल्लेख हुआ है। अगर इस गाँव के लोगों का जाति प्रमाण पत्र नहीं बनता है तो हम अपने अधिकारों को पाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं।’

प्रेमचन्द्र को बीच में रोकते हुए गांव का दलित युवा और दसवीं का छात्र अनंजय सवाल पूछने वाले अंदाज में कहता है- ‘अब तो हम जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करते-करते हार गए। अब हम किससे अपने दिल की बात कहें। मैंने कई बार जाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया लेकिन हर बार मेरा फॉर्म रिजेक्ट हो जा रहा है। ऑफिस के बाबू और लेखपाल साहब के हाथ-पैर जोड़कर, मिन्नतें करके हार गया हूँ लेकिन बात नहीं बनी। चुनावी माहौल में जब नेता लोग गांव में आते हैं तब उनके सामने भी हम यह समस्या रखते हैं। वे हमारी समस्या का समाधान शीघ्र ही निकालने की बात कह कर चले जाते हैं। और हमारी समस्या जस की तस बनी हुई है। धनंजय सवाल दागता है, क्या हमें भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों के तहत जीवन जीने का अधिकार नहीं है? जाति प्रमाण पत्र के अभाव में बताइए हम कैसे दसवीं का फॉर्म भरें? वजीफा के लिए हम कैसे अप्लाई करें? हम दलित जरूर हैं लेकिन अब अपने अधिकारों से वाकिफ हैं। गांव के 10-12 मित्र मेरे ऐसे हैं जिनके पास भी जाति प्रमाण पत्र नहीं है। इनमें से कोई आठवीं तो कोई नौवीं तो कोई दसवीं का छात्र है। हम लोग भी पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहते हैं। जब वोट लेने या देने की बात आती है तो उसमें किसी प्रकार की बाधा नहीं आती, वोटर कार्ड तुरंत बन जाता है। वोटर लिस्ट में नाम भी तुरंत जुड़ जाएगा। इससे साफ जाहिर है कि न ही अधिकारियों न ही देश के नेताओं को जनता की समस्याओं से कोई सरोकार है। जब उनकी गर्दन फँसती है तब वे सुनते हैं। किस तरह से माँ-बाप अपना पेट काटकर हमें पढ़ा रहे हैं,इस आस से की हम अपने पैरों पर खड़े हो सकें और उनका सहारा बन सकें, लेकिन उनकी सारी मेहनत और उम्मीदें जाति प्रमाण पत्र के न बनने से धूमिल हो जा रही हैं।’

अनंजय

इसी प्रकार से गांव की निशा भी अपने बच्चों को पढ़ा-लिखाकर कुछ बनाने की सपने संजोई हुई हैं। जाति प्रमाण पत्र के मेरे सवालों ने उनकी संजोए सपनों पर जैसे तुषारापात कर दिया हो, बोलीं ‘मेरी मायके प्रयागराज में सबका एससी (अनुसूचित जाति) का जाति प्रमाण पत्र बना है। मैं अपने बच्चों का जाति प्रमाण पत्र बनवाना चाह रही हूं लेकिन यहां हमारा जाति प्रमाण पत्र नहीं बन रहा है। मेरे पति ने बच्चों का जाति प्रमाण पत्र बनवाने के लिए कई बार अप्लाई किया लेकिन हर बार फॉर्म रिजेक्ट हो जा रहा है।’

अपने बच्चों के साथ निशा

 इस दलित बस्ती में आपको बहुत सारे ऐसे लोग भी मिल जाएंगे जो अपने बच्चों को ज्यादा पढ़ाना लिखाना नहीं चाहते। इसके पीछे का कारण एक तो गरीबी मानी जा रही है ऊपर से जाति प्रमाण पत्र का न बनना दाद में खाज वाली बात। गाँव की मंजू अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुये बोली ‘ मेरे बच्चों ने भी जाति प्रमाण पत्र बनवाने का काफी प्रयास किया लेकिन उनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बन सका। मेरे तीन लड़के और चार लड़कियां हैं। सोचती हूं ज्यादा पढ़ा लिखा कर क्या करूंगी, नौकरी-चाकरी तो मिलेगी नहीं। व्यर्थ में क्यों पैसा खर्च करूं। जब आम आदमी गलती करता है तो उसे दंड दिया जाता है लेकिन जब सरकार, नेता और मीडिया के लोग गलती करें तो क्या इन्हें सजा नहीं मिलनी चाहिए? अनिल राजभर मेरे इस गांव में आए थे और उन्होंने जाति प्रमाण पत्र बनवाने का आश्वासन दिया था, लेकिन उनका किया हुआ वादा आज तक पूरा नहीं हुआ।’

मंजू की बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी कि महेंद्र अपने दिल की आग निकलने वाले अंदाज में कहते हैं ‘मैं भी अपने बच्चों को ज्यादा नहीं पढ़ा सका। घर में एक तो पैसे का अभाव ऊपर से पढ़ाई करने के बाद जब बच्चे जाति प्रमाण पत्र  के अभाव में सरकारी योजनाओं के लाभ से वंचित हो जाएं तो क्या मतलब रह गया पढ़ाई लिखाई करवाने का। हां हमारे पास जब अतिरिक्त पैसा होता तो बच्चों को पढ़ने देते। यहाँ तो स्थिति रोज कुआं खोदो और पानी पीओ की है। यही नहीं कभी कभी तो राशन न होने के कारण चूल्हा ही नहीं जलता। इससे अच्छा है बच्चों को पहले से ही काम करने की आदत डलवा दो। रोज कुछ न कुछ कमा कर तो लाएंगे ही घर-परिवार भी ठीक से चलता रहेगा। हम नहीं चाहते कि हमारे बच्चों का हाल प्रेमचंद जैसा हो। जाति प्रमाण पत्र के अभाव में प्रेमचंद के हाथों में आई हुई नौकरी चली गई। तभी से यह बात लोगों के मन-मस्तिष्क में घर कर गई कि अब पढ़ाई-लिखाई करने से कोई फायदा नहीं है।’

महेंद्र

आंखों में निराशा का भाव लिए हुए कल्लू कहते हैं मेरी पांच लड़कियां हैं और एक लड़का। लड़कियों को तो मैं नहीं पढ़ा सका लेकिन लड़के को मैं पढ़ाना चाहता था। पांचवीं तक मैंने उसे पढ़ाया भी लेकिन एक तो गरीबी ऊपर से प्रेमचंद के साथ घटी घटना के बाद से मेरा मन भी बेटे को पढ़ाने से उचट गया। बेटे ने भी देखा कि घर की हालत भी ठीक नहीं है। मां के ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ है तो उसने भी अपनी सहमति दे दी।

 घर-परिवार की समस्याओं को बताते हुए वे आगे कहते हैं आमदनी का कोई जरिया नहीं है। इन बूढ़ी हड्डियों में अब पहले जैसी ताकत नहीं रह गयी है कि मेहनत मजदूरी करके पैसा कमाया जाय। पहले जो थोड़ा बहुत मेहनत मजदूरी करके कमाया था वह बेटियों की शादी में खर्च हो गया। अब हाथ में एक पैसा भी नहीं है। पत्नी को  ब्रेन ट्यूमर होने पर किसी तरह कर्ज लेकर ऑपरेशन कराया। मिट्टी का पुराना घर भी अब गिर चुका है। पुरानी झोपड़ी है उसी के ऊपर पॉलिथीन डालकर किसी तरह से दिन कट रहा है। रहने के लिए मकान और वृद्धावस्था पेंशन मिल जाए तो बुढ़ापा कट जाएगा। लेकिन इस सरकार से उम्मीद करना तो बेमानी होगी।

अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित दिख रहे 60 वर्षीय राजेंद्र भावुक मन से बोले मेरे चार लड़के और तीन लड़कियां हैं। गरीबी के कारण मैं अपनी तीन लड़कों और तीन लड़कियों को ज्यादा नहीं पढ़ सका। सबसे छोटा बेटा लड़का प्रीतम  पढ़ने के लिए बहुत जोर दे रहा था तो मैंने कहा चलो पढ़ लो। इस समय वह टीडी इंटर कॉलेज में पढ़ रहा है। जाति प्रमाण पत्र के अभाव में उसे स्कॉलरशिप भी नहीं मिल पा रही है। जैसे-तैसे मैं उसे पढ़ रहा हूं, लेकिन मुझे इस बात का सदा डर लगा रहता है कि इतना पढ़ने लिखने के बाद अगर उसका कहीं नहीं हुआ तो क्या वह ईंटा- गारा का काम करेगा? वह खाने के लिए मर जाएगा, लेकिन वह ईंटा-गारा वाला काम नहीं करेगा। ऐसे में उसका क्या होगा यही सोच मुझे खाए  जा रही है।’

राजेंद्र
राजेंद्र

रेनू अपना घर परिवार चलाने के लिए सुबह ही भीख मांगने के लिए निकल जाती हैं। शाम होते-होते घर लौटती हैं तो झोले में कुछ आटा-चावल और खाने के कुछ दूसरे सामान ली हुई थीं। बोलीं ‘पति लेबर गिरी का काम करके थोड़ा बहुत कमा लेते हैं जिससे घर परिवार का खर्च चल जाता है। मिट्टी का मकान कब गिर जाएगा कोई भरोसा नहीं। बच्चों को पढ़ाना  बड़ा मुश्किल का काम है। एक तो गरीबी ऐसी है, जिसमें रोटी नमक का चलना भी मुश्किल हो रहा है, ऊपर से पढ़ाई का बोझ मुझसे तो यह दोहरा भार वहन नहीं होगा। गाँव में कुछ लोगों को छोड़कर बाकी किसी को भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल रहा है। यदि लाभ मिल रहा होता तो मेरे घर कि यह हालत नहीं रहती। रही बात बच्चों के पढ़ाई-लिखाई की तो नाम लिखाने गई तो वहाँ जाति प्रमाण पत्र मांगने लगे। किसी तरह से नाम तो लिखा गया लेकिन पढ़ाई-लिखाई का खर्चा कहां से निकलेगा। प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिल जाता तो अच्छा था। लेकिन इस सरकार से ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। गरीबों की कौन सुनता है। जिसके पास पैसा होता है, वही इन योजनाओं का लाभ भी उठाता है।

आखिर कहाँ फँसा है पेंच

आखिर किन वजहों से इस दलित बस्ती के लोगों का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पा रहा है सवाल की जवाब में कुल्हनामऊ गाँव के लेखपाल जयप्रकाश यादव कहते हैं कुल्हनामऊ गांव की इस दलित बस्ती के लोग नोना चमार की श्रेणी में आते हैं। पुराना राजस्व नोना चमार को जनरल की श्रेणी में मानता है न कि अनुसूचित जाति में। इसीलिए जब कभी इस गांव के लोग अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करते हैं तो उनका आवेदन पत्र रिजेक्ट हो जाता है। कुछ वर्षों पहले इन लोगों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र दिया जाता था। इसी अनुसूचित जाति प्रमाण पत्र का लाभ उठाकर गांव के रामबली चमार 2007 में प्रधान बन गए। उनकी जाति को लेकर कुछ लोग हाई कोर्ट चले गए। मामला कुछ दिनों तक हाई कोर्ट में चला। फैसला रामबली प्रधान के खिलाफ आया। उनकी प्रधानी चली गई। इसीलिए अब इस गाँव के लोगों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र नहीं जारी हो रहा है।

जयप्रकाश अपनी बात जारी रखते हुए कहते हैं इसी दलित बस्ती से थोड़ा और आगे जाने पर एक दूसरी भी दलित बस्ती है लेकिन उन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी होता है। उस बस्ती के लोग इस बात के लिए सदा चौकन्ना रहते हैं कि कहीं इन्हें अनुसूचित जाति का प्रमाण जारी न कर दिया जाय। इसलिए वे कई बार आरटीआई के जरिए इस जानकारी को भी मांगे चुके हैं कि अब तक कितने नोना दलितों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र  जारी हुआ है।

भारतीय संविधान के प्रति लोगों को जागरुक करने के लिए सौहार्द फेलो प्राप्त जौनपुर के वरिष्ठ पत्रकार आनंद देव कहते हैं ‘कुल्हनमऊ दलित बस्ती के ये दलित भी अन्य दलितों की ही भांति हैं। चाहे उनका रहन-सहन देख लीजिए या फिर उनका जीवन स्तर। आज इस बस्ती में  200-250 युवा दलित रहते हैं जिनके सामने इस तरह की समस्याएँ  आ रही हैं  या  निकट भविष्य में आ सकती हैं। इनके परिवार के लोगों को रहने  को घर नहीं है। झोपड़ियाँ लगाकर किसी तरह ये लोग अपने जीवन का निर्वाह कर रहे हैं। खाने के लिए दाना नहीं। खेती के लिए जमीन नहीं है। माना जाता है कि चमारों में जो लोग पुराने समय में मरे पशुओं की खाल को निकालकर उन्हें बेचते थे या उससे पैसे कमाते थे वही लोग नोना चमार कहे गए। आज के दौर में देखा जाय तो नोना चमारों की स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। लेकिन राजनीति के मकड़जाल में फंसकर उनके बाल बच्चों का भविष्य खतरे में पड़ गया है। मैं तो सरकार से यही मांग करूंगा कि जितना जल्दी हो सके इन लोगों को अनुसूचित जाति का प्रमाण पत्र जारी कर दे क्योंकि सरकार जितना देर करेगी उनके बच्चों का भविष्य उतना ही अंधकारमय होता जाएगा।’

 वरिष्ठ पत्रकार आनंद देव गाँव के लोगो को संविधान के बारे में जानकारी देते हुए

बहरहाल जो भी हो इतना तो कहा ही जा सकता है कि जब एक ही जाति  होने के कारण एक आदमी को आरक्षण का लाभ मिल रहा है तो उसी जाति के व्यक्ति को दूसरा पेशा करने के कारण आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जा सकता। यह एक बड़ा सवाल है।

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