बिहार में सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष (डायरी 4 मार्च, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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छह इंच छोटा करने का मतलब क्या है, यह बात तब समझ में नहीं आती थी जब मैं छोटा था। हालांकि यह एक ऐसा वाक्य था, जो तब आये दिन सुनाई दे ही जाता था। यह एक सवाल था मेरे लिए। पापा से पूछा तो उन्होंने जवाब देने के बदले मुझे डांट दिया कि यह तुमसे किसने कह दिया। जबकि गांव में रोज कोई न कोई यह बात कहता जरूर था। दरअसल, पापा मुझे गांव के लड़कों से दूर रहने की बात कहते थे। उन्होंने पूरी कोशिश की कि मेरा पूरा ध्यान केवल पढ़ाई करने पर बना रहे।

लेकिन ऐसा होता कहां था। गांव में रहने पर गांव के संगी साथियों से बातचीत तो होती ही थी। इस बीच गांव के बधार में नंदलाल सिंह के बोरिंग के पास ही एक आदमी की हत्या हो गई। किसी ने चितकोहरा के एक व्यापारी की हत्या करके लाश वहां ठिकाने लगा दी थी। उस दिन यह बात समझ में आयी कि छह इंच छोटा करने काम मतलब क्या होता है।

खैर, बिहार में तब वह दौर था जब सत्ता सवर्णों के हाथ से निकलकर दलित-पिछड़ों के हाथ में जा रही थी। मुख्यमंत्री थे लालू प्रसाद। पूरे सूबे के सवर्ण फ्रस्टेशन में थे और वे यह साबित कर देना चाहते थे कि पिछड़े वर्ग का कोई भी व्यक्ति शासन करने के योग्य नहीं है। इसके लिए तमाम तरह के तिकड़म किये जा रहे थे। जातीय संघर्ष के पीछे मुख्य कारण यही थी। दिलचस्प यह कि वामपंथी संगठन, जिसका नेतृत्व सवर्ण कर रहे थे, वे भी यही कर रहे थे। दलितों और पिछड़ों के कंधे पर बंदूक रखकर कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे थे। दक्षिणपंथी सवर्ण तो खैर थे ही अपनी साजिश को अंजाम देने में। उन दिनों ही रणवीर सेना का गठन ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किया था, जिसने दो दर्जन से अधिक नरसंहारों को अंजाम दिया और तीन सौ से अधिक लोगों को मौत के घाट उतारा।

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उन दिनों छह इंच छोटा करने की बात खूब कही जाती थी। रणवीर सेना के बारे में कहा जाता था कि उसके गुंडे लोगों से उसकी जाति पूछते और सवर्ण नहीं होने पर उसकी गर्दन उड़ा देते थे। मतलब यह कि छह इंच छोटा कर देते थे।

फिर रणवीर सेना की गतिविधियों पर अंकुश तब लगा उसका सरगना ब्रह्मेश्वर मुखिया पकड़ा गया। उसकी गिरफ्तारी भी अनोखे अंदाज में हुई थी। वह पटना शहर में गांधी मैदान के करीब एक अपार्टमेंट के बाहर पकड़ा गया था। वह अपार्टमेंट डा. सी.पी. ठाकुर (नाई नहीं, भूमिहार) का था। तब यह सबकी जुबान पर था कि मुखिया को राजनेताओं का संरक्षण हासिल था। इसकी जांच के लिए तत्कालीन सरकार ने जस्टिस अमीरदास के नेतृत्व में आयोग का गठन किया था।

फिर आया वर्ष 2005। बिहार के सवर्ण नीतीश कुमार जो कि स्वयं कुर्मी जाति से आते हैं, के सहयोग से बिहार की सत्ता पर दुबारा अधिकार करने में कामयाब हो गए। नीतीश कुमार ने उनका आदेश मानते हुए जस्टिस अमीरदास आयोग को तब भंग कर दिया जब उसकी रपट तैयार थी। इसका असर हुआ। ब्रह्मेश्वर मुखिया को जमानत दे दी गयी। कुछेक मामलों में निचली अदालतों ने उसे निर्दोष भी साबित किया। बाद में तो नीतीश कुमार के नाम का ऐसा डंका बजा कि पटना हाई कोर्ट ने नरसंहारों के सभी मामलों में रणवीर सेना के गुंडों को निर्दोष करार दे दिया।

यह बीती हुई बात है। आज की बात करते हैं। कल ऊंची जाति के एक आदमी ने अपने लोगों के साथ मिलकर मछुआरा समाज के एक परिवार पर हमला बोला। इस घटना में दो सगे भाईयों की मौत घटनास्थल पर हो गई। तीसरा भाई अस्पताल में जीवन और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। मामला मुजफ्फरपुर के साहेबगंज थाने के बैरिया गांव का है। मिली जानकारी के अनुसार राजेश सहनी उर्फ भोला सहनी पैक्स अध्यक्ष था। वह अपने भाइयों मुकेश सहनी और रामनरेश सहनी के साथ मिलकर गांव के पोखर में मछलियां पकड़ रहा था। तभी मनीष सिंह नामक एक सामंती हरवे हथियार से लैस होकर अपले लाेगों के साथ पहुंचा और उसने गोलीबारी शुरू कर दी। अचानक हुए इस हमले में राजेश सहनी और उसके भाइयों के पास बचने का कोई रास्ता नहीं था। राजेश सहनी अपराधियों के निशाने पर था।

बिहार में तब वह दौर था जब सत्ता सवर्णों के हाथ से निकलकर दलित-पिछड़ों के हाथ में जा रही थी। मुख्यमंत्री थे लालू प्रसाद। पूरे सूबे के सवर्ण फ्रस्टेशन में थे और वे यह साबित कर देना चाहते थे कि पिछड़े वर्ग का कोई भी व्यक्ति शासन करने के योग्य नहीं है। इसके लिए तमाम तरह के तिकड़म किये जा रहे थे। जातीय संघर्ष के पीछे मुख्य कारण यही थी। दिलचस्प यह कि वामपंथी संगठन, जिसका नेतृत्व सवर्ण कर रहे थे, वे भी यही कर रहे थे। दलितों और पिछड़ों के कंधे पर बंदूक रखकर कार्रवाइयों को अंजाम दे रहे थे। दक्षिणपंथी सवर्ण तो खैर थे ही अपनी साजिश को अंजाम देने में। उन दिनों ही रणवीर सेना का गठन ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किया था, जिसने दो दर्जन से अधिक नरसंहारों को अंजाम दिया और तीन सौ से अधिक लोगों को मौत के घाट उतारा।

अब इस घटना के बारे में जो कुछ स्थानीय थानेदार ने मुझे दूरभाष पर जो कुछ बताया, उसके मुताबिक गांव का पोखर मनीष सिंह ने खरीदा था। लेकिन उस पोखर पर राजेश सहनी व उसके परिवार का कब्जा था। जीरा (छोटी मछलियां) राजेश सहनी ने ही पोखर में डाला था। उसका कहना था कि चूंकि जीरा उसने डाला है तो मछलियां उसकी हैं। वहीं मनीष सिंह का कहना था कि चूंकि पोखर उसने खरीदा है तो पोखर की सारी मछलियां भी उसकी हुईं।

हालांकि मैं थानेदार के इस कथन को अर्द्धसत्य समझता हूं। इस नरसंहार के पीछे जातिगत संघर्ष है। चूंकि राजेश सहनी राजनीतिक रसूख वाला आदमी था और पैक्स का अध्यक्ष था। यदि वह जिंदा रहता तो उसकी राजनीति और आगे बढ़ती। और इससे केवल वही नहीं बल्कि मछुआरा समाज के अन्य लोगों का हौसला भी बढ़ता। मनीष सिंह ने उसकी सरेआम हत्याकर स्थानीय मछुआरों को सशंकित कर दिया है कि यदि वे राजनीति में आगे बढ़ेंगे तो उनका भी वही हाल होगा।

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बहरहाल, सामाजिक न्याय के लिए मूल संघर्ष यही है जमीन पर। जमीन संबंधी संसाधनाें पर अभी भी सवर्णों का कब्जा है। दूसरी ओर राजनीतिक रूप से हिस्सेदारी बढ़ने के कारण दलितों और पिछड़ों ने सवर्णों के कब्जे को चुनौती दे रखी है। और पिछड़े वर्ग से आनेवाले नीतीश कुमार बिहार के ऐसे मुख्यमंत्री साबित हो रहे हैं, जिनके कारण सामंती ताकतों का हौसला बुलंद है। वे सामाजिक न्याय की जड़ को कमजोर कर रहे हैं।

नवल किशोर कुमार फॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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