साधु-संत हिन्दुओं का सबसे बड़ा बहुजन विरोधी तबका !

एच. एल. दुसाध

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 यदि कोई अपने विवेक को ठीक से सक्रिय रखते हुए यह जानने का प्रयास करे कि हिदुओं का सबसे बड़ा बहुजन विरोधी तबका कौन है तो उसे जवाब मिलेगा  साधु –संत ! जी हाँ, जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य का उच्च उद्घोष  करते रहने वाला  साधु -संत ही हिन्दुओं का वह खास तबका है, जिसे सबसे बड़े बहुजन विरोधी के रूप में चिन्हित किया जा सकता है। भांग- धतूरा, दूध–मलाई  का सेवन करते और सांसारिक समस्यायों से आखें मूंदे कथित मोक्ष के लिए हरि–भजन में लीन रहने वाला साधु-संत ही हिन्दुओं का वह सबसे शातिर व खतरनाक तबका है, जो बहुजनों की स्थिति बेहतर होने की सम्भावना मात्र से ही हरि-भजन से ध्यान हटाकर बहुजनों के खिलाफ अपनी क्षमता का इस्तेमाल करने में जुट जाता है। उसे इस बात का इल्म है कि उसके चरणों में लोटने का अवसर ढूँढने में ईश्वर-भीरू राष्ट्रपति से लेकर राज्यपाल, पीएम से लेकर सीएम और फिल्म से लेकर स्पोर्ट्स वर्ल्ड के बड़े से बड़े सेलेब्रेटीज सब समय व्यवस्त रहते हैं और जब राष्ट्रपति–राज्यपाल, पीएम-सीएम उसके कदमों में लोटने के लिए लालायित रहते है तो दैविक-दास (डिवाइन स्लेव्स) में तब्दील किये गए। आमजन, विशेषकर बहुजनों  की क्या बिसात जो उनके निर्देशों की अवहेलना कर दें। इस सबसे बड़े बहुजन विरोधी तबके को इल्म हो चुका है कि यूपी में 2022 में  जो ऐतिहासिक चुनाव होने जा रहा है, उसमें शुद्रतिशूद्रों के आशा और आकांक्षा का प्रतीक बन चुकी समाजवादी पार्टी विजय की ओर कदम बढ़ा दी है। और यदि सपा जीत जाती है तो न सिर्फ तीन उच्च वर्णों- ब्राह्मण-क्षत्रिय- वैश्यों- की निष्काम व पारिश्रमिक रहित सेवा के लिए बने शुद्रातिशूद्रों का आर्यावर्त की ह्रदय स्थली में राज हो जायेगा, बल्कि हिन्दू राष्ट्र का वह सपना भी काफी हद तक धूलिसात हो जायेगा, जिसमें सत्ता की लगाम साधु-संतों के हाथ में आना तय है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए पिछले कई सालों से हिन्दू राष्ट्र के लिए प्रयासरत यह तब काइस चुनाव में सपा के खिलाफ अपनी सारी ताकत झोंक दिया है, जिसकी शुरुआत इसने इन पंक्तियों के लिखे जाने के चार दिन पूर्व कथित धर्म नगरी अयोध्या से की है।

चार दिन पूर्व जब सपा के अखिलेश यादव चुनाव प्रचार के लिए अयोध्या पहुंचे साधु-संतों ने जमकर बवाल काटा और उनके दौरे को व्यर्थ करने में कोई कमी नहीं छोड़ा। यह बात और है कि उनके रोड शो में अन्य जगहों की भांति ही अयोध्या में भी जनसैलाब उमड़ा. लेकिन ऐसा न हो इसके लिए उनके आगमन के पूर्व  साधु -संतों ने उनके खिलाफ जबरदस्त माहौल बनाने का प्रयास किया था। इस क्रम में उनके विरोध के पीछे युक्ति खड़ी करते हुए राम वल्लभा कुंज के अधिकारी राजकुमार दास ने कहा था कि अखिलेश यादव के पिता ने जो किया है वह अयोध्यावासी भूल नहीं सकते है। उनके पिता श्री के द्वारा अयोध्या में रक्त की नदियां बहाई गई। अखिलेश को तो अयोध्या आना ही नहीं चाहिए. हिंदू समाज व पूरे विश्व में रहने वाला सनातन समाज इसे भूल नहीं सकता। अखिलेश यादव को तो अयोध्या आने से पहले पश्चाताप और प्रायश्चित करना चाहिए, उसके बाद अयोध्या आए. उन्होंने कहा कि संत और सनातन इसके बावजूद भी अखिलेश को स्वीकार नहीं करेगा। हनुमानगढ़ी के महंत राजू दास ने अखिलेश यादव  को अखिलेशुद्दीन कहते हुए कहा था कि मैं अखिलेशुद्दीन को चुनौती देता हूं कि यदि आप हिंदू हैं और सनातन धर्म को मानते हैं तो राम जन्मभूमि और हनुमानगढ़ी पर दर्शन करके दिखाएं.उन्होंने आगे कहा था कि अखिलेश यादव आप रोड शो करने जा रहे है लेकिन, अभी तक उन राम भक्तों से माफी नहीं मांगी है, जिनका कत्ल आपके पिता ने किया था।

चार दिन पूर्व जब सपा के अखिलेश यादव चुनाव प्रचार के लिए अयोध्या पहुंचे साधु-संतों ने जमकर बवाल काटा और उनके दौरे को व्यर्थ करने में कोई कमी नहीं छोड़ा। यह बात और है कि उनके रोड शो में अन्य जगहों की भांति ही अयोध्या में भी जनसैलाब उमड़ा. लेकिन ऐसा न हो इसके लिए उनके आगमन के पूर्व साधु -संतों ने उनके खिलाफ जबरदस्त माहौल बनाने का प्रयास किया था।

दो दिन के बाद ही संतों ने अयोध्या काण्ड की पुनरावृति वाराणसी में किया। वहां 28 फ़रवरी को दुर्गाकुंड स्थित श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय में अखिल भारतीय संत समिति, उत्तर प्रदेश, गंगा महासभा वाराणसी, श्रीकाशी विद्वत परिषद्  एवं अखिल भारतीय विद्वान परिषद् न्यास के संयुक्त तत्वावधान में देश भर आये साधु–संतों की बैठक हुई, जिसमें पीएम मोदी और यूपी सीएम योगी की राम और लक्ष्मण से तुलना करते हुए भारतीय संस्कृति की रक्षा करने वाली पार्टी को ही वोट देने की अपील की गई। अखिल भारतीय संत समिति की ओर से संस्कृति विमर्श विषय पर आयोजित बैठक ने साधु-संतों ने बढ़-चढ़कर भाजपा सरकार के पक्ष में बातें कीं। इस कार्यक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान भी पहुंचे थे। उन्हें जब संत समाज के उद्घोषक की ओर से मंच पर बुलाया गया, तो उन्होंने ऊपर आने से साफ इंकार कर दिया। हालांकि कुछ देर बाद वह मंच पर आए और कहा कि हमारी सभ्यता इसलिए बची है, क्योंकि अच्छे हाथ में देश की बागडोर है। इस अवसर पर अपनी बात रखते हुए संगीत नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री पंडित राजेश्वर आचार्य ने कहा कि संस्कृति का रक्षक ही जीतेगा, क्योंकि देवासुर संग्राम में देवत्व की विजय होती है। व्यक्तिगत और स्वार्थगत, जातीयता और भ्रांतियों को छोड़कर हम भले व्यक्ति को चुनें। सुयोग्य व्यक्ति को मतदान करें, बाकियों को मत दान करें। कथा वाचक डॉ. पुण्डरिक महाराज ने कहा कि आज धर्म सापेक्ष राष्ट्र देखने को मिल रहा है। संतों का नियंत्रण काफी प्रभावपूर्ण होता है.अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जीतेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि हम सब का सौभाग्य है कि देश के शिक्षा मंत्री हमारे बीच में हैं। वह कोई आश्वासन देने नहीं, बल्कि संतों द्वारा आशीर्वाद देने के लिए बुलाया है। जीतेंद्रानंद ने कहा कि काशी में सनातन धर्म के 127 संप्रदाय हैं और सभी यहां रहते हैं।आगे कहा कि भारत के एयरबेस की निगरानी के लिए आजम खान ने हिंडन नदी के उस पार हज हाउस खड़ा कर दिया था। वहां से कोई भी  हाजी देख सकता था कि कौन सा सैनिक कब उड़ान भर रहा है। इसके विरोध में मैं दिल्ली में धरने पर बैठा था। आज उत्तर प्रदेश हज या कब्रगाह के लिए नहीं काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, राम मंदिर और धर्म-संस्कृति के लिए जाना जाता है.उन्होंने यह भी बताया कि बाबा विश्वनाथ ने रावण को सोने की लंका दान में दिया था, मगर अभी तक उनका गर्भ गृह ऐसे ही था। अब बाबा स्वर्णजड़ित हो चुके हैं। यह सरकार की देन है. इस कार्यक्रम में गंगा महासभा, श्रीकाशी विद्वत परिषद और अखिल भारतीय ब्राह्मण विद्वत परिषद न्यास के पदाधिकारी और शंकराचार्य कांची के प्रतिनिधि और श्रृंगेरी के प्रतिनिधि मंच के सामने बैठे थे।

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बहरहाल 10 मार्च बाद आर्यावर्त की ह्रदय स्थली में बहुजन राज की सम्भावना देखकर जिस तरह साधु–संत सपा के खिलाफ उठा खड़े हुए हैं, उससे बहुतों को विस्मय हो सकता है कि जगत मिथ्या, ब्रह्म सत्य की माला जपने वाले संत इस मिथ्या की ओर क्यों ध्यान लगा रहे हैं। इसका खास कारण है स्व-जाति/ वर्ण के प्रति हिन्दुओं की दुर्बलता जिससे सूर-तुलसी इत्यादि भक्त कवियों से लगाये आधुनिक भारत में समाज सुधार के जनक राजा राममोहन राय तक मुक्त नहीं रहे। अब साधु -संतों की जाति लिया जाय। हिन्दू धर्म शास्त्रों के अनुसार एक मात्र ब्राह्मण ही संतई के लिए अधिकृत रहे। इसीलिए जब शूद्र विवेकानंद संत बने, बंगाल के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीध सर गुरुदास बंदोपाध्याय ने कहा था, ‘भारत में होता यदि हिन्दू-राज विवेकानंद को फांसी के फंदे पर लटका दिया, क्योंकि हिन्दू धर्म में एक शूद्र के लिए सन्यास ग्रहण करना अधर्म का कार्य है।’ संतई पर ब्राहमणों का ही एकाधिकार है इसलिए योगी आदित्यनाथ के पुरुखे विश्वमित्र ऋषित्व न प्राप्त कर सके और उन्हें त्रिशंकु की गति नसीब हुई। अब चूँकि साधु-संत मुख्यतया ब्राह्मण है, इसलिए 7 अगस्त, 1990 के बाद मंडल की रिपोर्ट से जब ब्राह्मणों पर सबसे बड़ा संकट आया, वे ब्राह्मणों द्वारा ब्राह्मणों के हित में गठित संघ के अभियान में साथ हो लिए। स्मरण रहे जब मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने बाद परस्पर कलहरत बहुजनों की जाति चेतना के लम्बवत विकास के चलते बहुजन–राज की सम्भावना उज्ज्वलतर हुई। संघ ने आरक्षण के खात्मे और बहुजन राज की संभावना को धूलिसात करने के लिए अयोध्या के राम जन्भूमि मुक्ति आन्दोलन के जरिये गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति का अभियान छेड़ दिया  जिसमे अग्रिम मोर्चे पर तैनात हुए, साधु -संत !

जीतेंद्रानंद ने कहा कि काशी में सनातन धर्म के 127 संप्रदाय हैं और सभी यहां रहते हैं।आगे कहा कि भारत के एयरबेस की निगरानी के लिए आजम खान ने हिंडन नदी के उस पार हज हाउस खड़ा कर दिया था। वहां से कोई भी हाजी देख सकता था कि कौन सा सैनिक कब उड़ान भर रहा है। इसके विरोध में मैं दिल्ली में धरने पर बैठा था। आज उत्तर प्रदेश हज या कब्रगाह के लिए नहीं काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, राम मंदिर और धर्म-संस्कृति के लिए जाना जाता है.उन्होंने यह भी बताया कि बाबा विश्वनाथ ने रावण को सोने की लंका दान में दिया था, मगर अभी तक उनका गर्भ गृह ऐसे ही था।

गुलामी के प्रत्तीकों की  मुक्ति के अभियान से साधु -संतों का जुड़ना विश्व इतिहास का संभवतः सबसे बड़ा परिहास था। कारण, इन्हीं साधु-संतों के पूर्ववर्तियों ने वर्ण- व्यवस्था कानिर्माण कर देश को इतना कमजोर बना दिया था कि अतीत में मुट्ठी=मुट्ठी भर विदेशी आक्रान्ताओं को इस देश को लूट का निशाना और गुलाम बनाने में कोई दिक्कत ही नहीं हुई। पूर्ववर्ती संतों द्वारा बहुजनों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई की अधिकतम संपदा देवालयों में जमा करने तथा देवालयों को वेश्यालयों में तब्दील करने के कारण ही मुस्लमान आक्रान्ता भारत पर हमला करने के लिए ललचाये, जिससे शुरू हुआ गुलामी के प्रतीकों के निर्माण का सिलसिला. परवर्तीकाल में मुसलमान और ईसाई(अंग्रेज) आलीशान भवनों, सडकों, रेल लाइनों, शिक्षालयों तथा चिकित्सालयों एवं कल-कारखानों के रूप में भारत के चप्पे-चप्पे पर गुलामी के असंख्य प्रतीक खड़ा कर दिए। लेकिन मुसलमान और इसाई भारत में एक-एक करके खड़े होते गुलामी के उन प्रतीकों को देखकर भी उनका ध्यान कभी भंग नहीं हुआ और वे ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या में अपनी आस्था पूर्ववत जारी रखते हुए दूध-मलाई, भांग-धतूरों और देवदासियों का भोग लगाने में मस्त रहे। लेकिन जो परजीवी संत मुसलमन और इसाई काल में भारत की गुलामी और गुलामी के दौर खड़े होते गुलामी के प्रतीकों से निर्लिप्त रहे। मंडल उत्तर काल में बहुजन राज की सम्भावना देखकर चैतन्य हो गए।

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बहुजन राज की सम्भावना से खौफजदा हुए साधु–संत काल बिलम्ब किये बिना सूर, तुलसी, रामानुज स्वामी, भोलानाथ गिरी, बाबा गंभीरनाथ, तैलंग स्वामी, बामा क्षेपा, रामदास काठियाबाबा जैसे पूर्ववर्ती संतों की परम्परा त्याग कर मिथ्या जगत की ओर ध्यान किये और संघ के गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति के अभियान से जुड़ गए. बहुजन राज को रोकने के संघ के अभियान के अग्रिम मोर्चे पर तैनात इन्हीं साधु–संतों ने सबसे पहले निशाना बनाया गुलामी की प्रतीक बाबरी मस्जिद को। बाबरी मस्जिद के टूटने के परिणामस्वरुप देश-विदेश में टूटे असंख्य मंदिर  टूटा मुंबई शेयर मार्केट का भवन। लेकिन बड़ी टूटन राष्ट्रीय एकता की हुई। वास्तव में बाबरी ध्वंस से लेकर आजतक इन परजीवी साधु–संतों की सक्रियता से  राष्ट्र की जो विराट संपदा और प्राण-हानि उसके समक्ष देश  के बड़े से बड़े असामाजिक तत्वों के सभी गिरोहों का मिलित कुकृत्य भी फीका पड़ जायेगा। इतने बड़े पैमाने पर जान और माल की हानि कराकर जिस तरह साधु–संत सवर्णवादी सत्ता कायम करने में सफल हुए हैं, उससे उन्हें गुलामी के प्रतीकों की उपयोगिता का अहसास हो गया है। इसलिए साधु-संत के रूप में विद्यमान बहुजन द्रोही ब्राह्मणों का गिरोह भूख- बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, राष्ट्र की सुरक्षा इत्यादि की उपेक्षा कर गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति के न ख़त्म होने वाले संघ के अभियान में योगदान करने सोत्साह आगे आ जाता है। जिस दिन गुलामी के प्रतीकों की मुक्ति–आन्दोलन के जरिये  मिली सत्ता के जोर से संघ हिन्दू राष्ट्र की घोषणा और निजीकरण का लक्ष्य पूरा कर लेगा, शायद उस दिन ही यह चैम्पियन बहुजन-विरोधी  गिरोह चैन की सांस लेगा। लेकिन संघ अयोध्या से लेकर काशी तक गुलामी के प्रतीकों के ध्वंस का लक्ष्य जरुर पूरा कर चुका है, पर  मथुरा- वृन्दावन सहित अनेक  प्रतीकों के मुक्ति का लक्ष्य बाकी है, जिसमे ये अग्रणी भूमिका निभाएंगे। इसलिए बहुजन बुद्धिजीवी और नेतृत्व वर्ग को ऐसा कुछ करने की  परियोजना पर काम करना  चाहिए, जिससे बहुजन- शत्रु साधु-संत चिरकाल के लिए सभ्य समाज से दूर घने जंगलों और पहाड़ों में शरण लेने के लिए बाध्य हो जाएँ।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

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