कबीर को समग्रता में समझने की ज़रुरत है

प्रो. चन्द्रभान सिंह यादव

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संत कबीर अकादमी मगहर के सौजन्य से चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ में  दिनांक 23 अगस्त को आयोजित राष्ट्रीय सगोष्ठी कबीर का चिंतन और भारतीय समाज में बीज वक्ता प्रो. गोपेश्वर सिंह ने कहा कि कबीर को विभिन्न वर्गों में बाँटने की बजाए उन्हें समग्रता में समझने की जरूरत है। कबीर की आध्यात्मिकता कर्मकाण्डी नहीं है। देश का कोई प्रान्त ऐसा नहीं है जहाँ कबीर के अनुयायी न हों। कबीर के जीवन में उद्योग और आध्यात्म का संगम  है। महात्मा गाँधी के सर्वधर्म समभाव और श्रम के विचार पर कबीर का प्रभाव है, जिसका प्रमाण चरखा है। कबीर का काव्य श्रम, अध्यात्म (संन्यास) और ग्राहृर्स्थ की त्रिवेणी है। जिसे गाँधीजी के जीवन-दर्शन में भी देखा जा सकता है। कन्नड़ कवि वासवन्ना अपने शरीर को ही मंदिर बना लेने की बात करते हैं। कबीर अपने समय के सबसे अधिक सवाल उठाने वाले कवि हैं। यह सवाल असमानता, अत्याचार और अंधविश्वास के खिलाफ़ है। भक्त कवियों की कथन-करनी में एकता है। मुख्य वक्ता प्रो. अनिल राय ने कहा कि कबीर को समझने के लिए मध्यकलीन संस्कृति व समाज को समझना जरूरी है। निम्न जाति में गौरव का भाव जगाकर उन्हें भक्ति की उच्च श्रेणी के सोपान तक पहुँचाया। कबीर ऐसे समाज को महत्व देते हैं, जिसमें हिंदू व मुसलमान दोनों में प्रेम-समानता हो। वर्तमान दौर आदर्शहीनता का है। कबीर ऐसे समाज की कल्पना करते हैं जिसमें समता, भाईचारा हो। पूरी दुनिया में वर्चस्व की लड़ाई चल रही है, इसके मूल में माया है।

प्रो. सदानंद साही ने कहा कि पाखंड भारतीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गया था। कबीर की मौलिक देन इसी पाखंड पर प्रहार है। हिंदी आलोचना में कबीर को लेकर विसंगतियां दिखाई देती हैं। जिसका कारण कबीर द्वारा सुविधा संपन्न लोगों को प्रश्नांनकित करना हैं। कबीर केवल घर जलाने की बात नहीं करते, घर बनाने की भी बात करते हैं। कबीर की कविता आदमी को आदमकद बनाती है।

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डॉ. राजेश पासवान ने कहा कि गुरु समझने की दृष्टि प्रदान करता है। कबीर जातिवाद का विरोध करते हैं। श्रेष्ठता के कृत्रिम मानकों पर कबीर का विश्वास नहीं है। कामगार को हेय दृष्टि से देखने से समाज का विकास नहीं हो सकता। संत कवि कर्म को महत्व देते हैं, छुआछूत और भेदभाव का विरोध करते हैं। प्रो. शंभुनाथ तिवार ने कहा कि कबीर ज्ञानमार्गी एवं प्रेममार्गी दोनों हैं। ज्ञानमार्गी कहना कबीर को सीमित करना हैं। ढाई आखर प्रेम का कबीर की कविता के केंद्र में है। कबीर एक खांचे में फिट होने वाले कवि नहीं हैं। कबीर की भाषा ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। कबीर ने कविता को जनता से जोड़ा। प्रो. के. श्रीलता ने अपने रोचक संबोधन में कहा कि कबीर मध्यकलीन परिस्थितियों में जन्में थे, वे कई मतों से प्रभावित थे। इतना अधिक समय गुजरने के बाद भी कबीर की ध्वनी हमारे कानों में गूँजती है जो उनकी प्रासंगिकता सिद्ध करती है। द्वंद्व बड़े विचारक का प्रमाण हैं जो कबीर में देखा जा सकता है।

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प्रो. असलम ने  बताया कि उर्दू साहित्यकारोें ने कबीर को वह मकाम नहीं दिया, जिसके वे हकदार हैं। कबीर उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं के बड़े कवि हैं। धन्यवाद ज्ञापन करते हुए डीन प्रो. नवीन चंद लोहनी ने कहा कि भरतीय समाज की विशेषता विविधता में एकता है। कबीर का चिंतन इसी आदर्श को आगे बढ़ता है। कबीर के काव्य को वर्तमान युग की विडंबनाओं के परिप्रेक्ष्य में समझने की ज़रुरत है। सांस्कृतिक संध्या की अध्यक्षता प्रतिकुलपति प्रो. वाई. विमला द्वारा किया गया। जिसमें गजेन्द्र पांडेय ने कबीर के भजनों का गायन प्रस्तुत किया। संचालन मोनू सिंह तथा विद्या सागर सिंह ने किया। इस अवसर पर अनेक विश्वविद्यालयों के शिक्षक और शोधार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

प्रो. चन्द्रभान सिंह यादव, केजीके पीजी कॉलेज, मुरादाबाद में पढ़ाते हैं।

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