क्या बिना मजबूत गठबंधन के मोदी को हराया जा सकता है?

एचएल दुसाध

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6 अप्रैल भाजपा का स्थापना दिवस होता है। इस वर्ष उसके स्थापना दिवस पर बीबीसी के संवाददाता जुबैर अहमद ने बीजेपी के 42 वर्षों के सफ़र में मोदी-शाह के आठ वर्ष कितने अहम शीर्षक से भाजपा को लेकर एक दिलचस्प टिप्पणी की थी। उन्होंने लिखा था, अँधेरा छटेगा, सूरज निकलेगा, कमल खिलेगा। भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इसी दिन, 1980 में यानी 42 साल पहले, पार्टी की स्थापना के समय यह बात कही थी। शायद उन्होंने यह बात पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए कही होगी, लेकिन उस समय पार्टी कार्यकर्ताओं या फिर विपक्षी दलों में शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आने वाले दिनों में वाजपेयी की बातें सही साबित होगीं। आज 42 साल बाद पार्टी केंद्र के अलावा 20 से अधिक राज्यों में सत्ता में है और पार्टी के नेता कहते हैं कि अभी इसका विस्तार होना बाक़ी है। पिछले आठ साल में नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ने पार्टी को शिखर पर पहुँचा दिया है। आज बीजेपी भारत की सबसे अमीर, सबसे बड़ी और सबसे प्रभावशाली राजनीतिक पार्टी है। आज ख़ुद पार्टी गर्व से दावा करती है कि सदस्यता के हिसाब से यह विश्व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है। चुनाव एक युद्ध है, ये केवल एक चुनावी जुमला नहीं है। इस युद्ध के दो सबसे बड़े योद्धा नरेंद्र मोदी और अमित शाह इस पर अमल भी करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में पार्टी केवल हिंदुत्व के भरोसे न रहकर, उम्मीदवारों का चयन करते समय जाति, उप-जाति, सामाजिक संरचना और निर्वाचन क्षेत्रों की दूसरी बारीकियों पर गहराई से गौर करके रणनीति तैयार करती है। उन्होंने एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक को उद्धृत करते हुए यह भी लिखा था कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी ने ये साबित कर दिया कि राजनीति एक फुल टाइम जॉब है।अगर आप चुनाव से छह महीने पहले अपने एसी कमरों से निकलेंगे, लोगों के पास जाएंगे तो आप चुनाव नहीं जीत पाएँगे। अगर आप चुनाव जीतना चाहते हैं तो आपको लगातार काम करते रहना पड़ेगा।

ये छोटी-छोटी पार्टियाँ बहुजनों के बीच खुद को स्थापित करने और संसद- विधानसभाओं में अपना प्रतिनिधित्व दर्ज कराने की तीव्र लालसा के वशीभूत होकर यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट गठित करने के लिए सामने आ सकती हैं। ऐसे में जो लोग भाजपा से निजात पाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए छोटे-छोटे बहुजनवादी दलों से संवाद बनाना चाहिए!

बिना गठबंधन किये मोदी का मुकाबला नहीं कर सकते

इसमें कोई शक नहीं कि अपने अक्लांत परिश्रम और सूझ-बूझ से भाजपा को एक अप्रतिरोध्य पार्टी में तब्दील कर देने वाले मोदी- शाह के समक्ष विपक्ष आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ चुका है। कुछ क्षेत्रीय पार्टियों को अपवाद मान लिया जाए तो आज किसी पार्टी में इतना दम नहीं कि वह चुनावों में एकल तौर पर मोदी की भाजपा का मुकाबला करने का दुस्साहसपूर्ण सपना देखे। वे सिर्फ मोर्चा या गठबंधन बनाकर लड़ने का सपना देख सकते हैं, लेकिन ऐसा करके भी एकाधिक कारणों से विपक्ष मोदी के खिलाफ इच्छित परिणाम नहीं निकाल पाया। प्रायः हार और हार वरण करने वाला विपक्ष लोकसभा चुनाव 2024 को ध्यान में रखते हुए बहुत पहले से, शायद लोकसभा चुनाव 2019 के बाद से ही 2024 के लिए मोर्चा बनाने में जुट गया है। इस प्रयास में कई गठबंधन और मोर्चे बनते- बनते रह गए पर, कोई प्रभावी मोर्चा अब तक वजूद में नहीं आया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने के दो सप्ताह पूर्व बिहार के नीतीश कुमार के भाजपा से सम्बंध विच्छेद करने और आगामी सितम्बर के पहले सप्ताह से कांग्रेस के राहुल गाधी की भावी भारत जोड़ो यात्रा की घोषणा के बाद हमें मानकर चलना चाहिए कि विपक्ष के मोर्चे निर्माण की प्रक्रिया तीव्रतर होगी।

बहरहाल, यह देखते हुए कि भविष्य में मोदी की भाजपा के खिलाफ बने तमाम मोर्चे विफल होने के लिए अभिशप्त रहे हैं और आज की तारीख में अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक जोर गले से 2024 में मोदी के वापसी की घोषणा कर रहे हैं, यह लेखक एकाधिक कारणों से यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट नामक एक नया मोर्चा बनाने का सुझाव दे रहा है! बहरहाल, मोदी-राज में अबतक बने विपक्षी मोर्चे यूँ ही नहीं विफल हुए। विपक्ष मोटा-मोटी यह मानकर अधिक से अधिक दलों को लेकर मोर्चा बनाने के लिए अग्रसर हुआ कि कई-कई पार्टियों के मिलित वोट प्रतिशत व सामाजिक समीकरण भाजपा पर भारी पड़ेंगे और वह चुनाव हार जाएगी। किन्तु 2019 में देश के राजनीति की दिशा तय करने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार में जिस तरह क्रमशः  सपा-बसपा तथा राजद-कांग्रेस गठबंधन भाजपा के समक्ष धड़ाम हुआ, उससे तय है कि सिर्फ गठबंधन के बूते भाजपा को मात नहीं दिया जा सकता। इन गठबंधनों ने चुनावी एजेंडा तय करते समय यह ध्यान ही नहीं रखा कि भाजपा की नीतियों से पीड़ित तबका कौन है और क्या है उसकी आकांक्षाएं! भाजपा विरोधी गठबन्धनों की सबसे बड़ी दिक्कत तो यह रही कि उन्होंने भारत में आरक्षण में क्रियाशील वर्ग-संघर्ष के इतिहास को ध्यान में रखते हुए अपना चुनावी एजेंडा ही स्थिर नहीं किया!

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भारत में वर्ग- संघर्ष

वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्तकर मार्क्स ने कहा है कि अब तक के विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है।एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात दूसरे शब्दों में जिसका शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक- पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है। पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है। मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित, ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता। नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है। प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है।

मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा। जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, वर्ग-संघर्ष किसी न किसी रूप में कायम रहेगा। किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि जहां भारत के ज्ञानी-गुनी विशेषाधिकारयुक्त समाज के लोगों ने अपने वर्गीय हित में तो वहीं आर्थिक कष्टों के निवारण में न्यूनतम रूचि लेने के कारण बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा मार्क्स के कालजई वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की बुरी तरह अनदेखी की गयी, जोकि हमारी ऐतिहासिक भूल रही।ऐसा इसलिए कि सदियों से ही विश्व इतिहास में वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठ चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था में क्रियाशील रहा है, जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है। जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही। चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों (सामाजिक समूहों) के पेशे/ कर्म तय रहे तथा इन तयशुदा पेशे/ कर्मों की विचलनशीलता (प्रोफेशनल मोबिलिटी) धर्मशास्त्रों द्वारा पूरी तरह निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली, जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है। वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तकों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए। इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित। वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन सवर्ण और दूसरा वंचित बहुजन।

वर्ण-व्यवस्था में वर्ग-संघर्ष की विद्यमानता को देखते हुए ही 19वीं सदी में महामना फुले ने वर्ण-व्यवस्था के वंचित शूद्र-अतिशूद्रों को ‘बहुजन वर्ग’ के रूप में जोड़ने की संकल्पना की, जिसे 20वीं सदी में मान्यवर कांशीराम ने ‘बहुजन-समाज’ का एक स्वरूप प्रदान किया। बहरहाल प्राचीन काल में शुरू हुए ‘देवासुर-संग्राम’ से लेकर आज तक बहुजनों की ओर से जो संग्राम चलाये गए हैं, उसका प्रधानत लक्ष्य शक्ति के स्रोतों में बहुजनों की वाजिब हिस्सेदारी दिलानी रही है।वर्ग संघर्ष में यही लक्ष्य दुनिया के दूसरे शोषित-वंचित समुदायों का भी रहा है।भारत के मध्य युग में जहां संत रैदास, कबीर, चोखामेला, तुकाराम इत्यादि संतों ने तो आधुनिक भारत में इस संघर्ष को नेतृत्व दिया फुले-शाहू जी-पेरियार–नारायणा गुरु-संत गाडगे और सर्वोपरी उस डॉ।आंबेडकर ने, जिनके प्रयासों से वर्णवादी-आरक्षण टूटा और संविधान में आधुनिक आरक्षण का प्रावधान संयोजित हुआ। इसके फलस्वरूप सदियों से बंद शक्ति के स्रोत सर्वस्वहांराओं (एससी/एसटी) के लिए खुल गए।

7 अगस्त,1990 के बाद सतह पर आया वर्ग-संघर्ष

हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी और वंचित बहुजन समाज: दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया। इसके बाद शुरू हुआ आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर। मंडलवादी आरक्षण ने एक ओर जहां परम्परागत सुविधाभोगी वर्ग को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित कर दिया, वहीँ दूसरी ओर उन्हें राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील कर दिया। मंडलवादी आरक्षण से हुई क्षति की भरपाई ही दरअसल मंडल उत्तरकाल में सुविधाभोगी वर्ग के संघर्ष का प्रधान लक्ष्य था। 7 अगस्त, 1990 को मंडल की  रिपोर्ट प्रकाशित होते ही सुविधाभोगी वर्ग के छात्र और उनके अभिभावक, साधु-संत, लेखक- पत्रकार, पूंजीपति तथा राजनीतिक दल आरक्षण के खात्मे की लड़ाई में कूद पड़े। इसी मकसद से खुद मोदी की पार्टी भाजपा ने मंदिर आन्दोलन का मुद्दा उठा दिया। आरक्षण खिलाफ शुरू किये गए मंदिर आन्दोलन के सहारे ही भाजपा के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त हुआ और आज वह अप्रतिरोध्य बन गयी है। बहरहाल जिस शख्स ने आरक्षण के खात्मे तथा शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के एकाधिकार को स्थापित करने की सबसे पहले व प्रबल परिकल्पना की, वह रहे कांग्रेस के नरसिंह राव। राव ने मुख्यतः अपनी परिकल्पना को मूर्त रूप देने के लिएही 24 जुलाई,1991 को ग्रहण किया नवउदारवादी अर्थनीति, जिसके जरिये देश में निजीकरण का फ्लड-गेट खोल दिया गया! राव की उस नीति में निजीकरण- विनिवेशीकरण इत्यादि के जरिये आरक्षित वर्गों के सफाया और अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग को और शक्ति संपन्न करने का निर्भूल डिजायन था।राव की उस नीति को आगे बढ़ाने में यूँ तो अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ। मनमोहन सिंह की भी विराट भूमिका रहीपर ,सबसे जोरदार तरीके से किसी ने उसे हथियार के रूप में इस्तेमाल किया तो वह प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ही रहे!

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मोदी की नीतियों से गुलामों की स्थिति में पहुंचे बहुजन

मोदी ने विगत आठ वर्षों से मंदिर आन्दोलन के सहारे मिली  सत्ता का अधिकतम इस्तेमाल आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने में किया है। इसके के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ। बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई और आज अग्निवीर जैसी योजनाओं की झड़ी लग गयी है ।कुल मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया है । बहरहाल जिस मोदी राज में आरक्षण को निरर्थक बना दिया गया, उसी मोदीराज में संविधान का मखौल उड़ाते हुए गरीब सवर्णों को दस प्रतिशत आरक्षण देने जैसा काम अंजाम दिया गया, जो एक तरह से भारतीय लोकतंत्र के साथ बलात्कार था।राव की नवउदारवादी नीतियों को हथियार बनाकर जिस तरह मोदी वर्ग संघर्ष का इकतरफा खेल खेलते हुए शक्ति के समस्त स्रोत जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हाथ में सौपने और बहुजनों को गुलाम बनाने की दिशा में आगे बढे,उसके फलस्वरूप आज की तारीख में दुनिया के किसी भी देश में भारत के परम्परागत सुविधाभोगी जैसा शक्ति के स्रोतों पर पर औसतन 80-90 प्रतिशत कब्ज़ा नहीं है। आज यदि कोई गौर से देखे तो पता चलेगा कि पूरे देश में जो असंख्य गगनचुम्बी भवन खड़े हैं, उनमें  80-90 प्रतिशत फ्लैट्स जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हैं। मेट्रोपोलिटन शहरों से लेकर छोटे-छोटे कस्बों तक में छोटी-छोटी दूकानों से लेकर बड़े-बड़े शॉपिंग मॉलों में 80-90 प्रतिशत दूकानें इन्हीं की है। चार से आठ-आठ, दस-दस  लेन की सड़कों पर चमचमाती गाड़ियों का जो सैलाब नजर आता है, उनमें 90 प्रतिशत से ज्यादे गाड़ियां इन्हीं की होती हैं। देश के जनमत निर्माण में लगे छोटे-बड़े अख़बारों से लेकर तमाम चैनल व पोर्टल्स  प्राय इन्हीं के हैं। फिल्म और मनोरंजन तथा ज्ञान-उद्योग पर 90 प्रतिशत से ज्यादा कब्ज़ा इन्हीं का है। संसद, विधानसभाओं में वंचित वर्गों के जनप्रतिनिधियों की संख्या भले ही ठीक-ठाक हो, किन्तु मंत्रिमंडलों में दबदबा इन्हीं का है। मंत्रिमंडलों में लिए गए फैसलों को अमलीजामा पहनाने वाले 80-90 प्रतिशत अधिकारी इन्हीं। शक्ति के स्रोतों पर जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के बेनजीर वर्चस्व के मध्य जिस तरह विनिवेशीकरण, निजीकरण और लैट्रल इंट्री को जूनून की हद तक प्रोत्साहित करते हुए रेल, हवाई अड्डे, चिकित्सालय, शिक्षालय इत्यादि सहित ब्यूरोक्रेसी के निर्णायक पद सवर्णों क सौपें जा रहे हैं, उससे संविधान की उद्द्येशिका में उल्लिखित तीन न्याय- आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक – पूरी तरह एक सपना बनते जा रहे है।

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राह दिखाने के लिए संविधान ज़रूरी है या मनुस्मृति

मंडल के बाद वर्ग शत्रु बहुजनों को शेष करने के मकसद से मोदी राज में जो बहुजन विरोधी नीतियां ग्रहण की गईं,उसके फलस्वरूप आज अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी भारत की स्थिति निहायत ही शर्मनाक हो गयी है। विश्व असमानता रिपोर्ट, ऑक्सफाम रिपोर्ट, ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट और  हंगर ग्लोबल इंडेक्स, वर्ल्ड पावर्टी क्लॉक इत्यादि से पता चलता है कि भारत के नीचे की 50-60 प्रतिशत आबादी महज 5-6 प्रतिशत नेशनल वेल्थ पर जीवन निर्वाह करने के लिए अभिशप्त है, जबकि देश की आधी आबादी अर्थात 65 करोड़ महिलाओं को आर्थिक रूप से पुरुषो के बराबर आने में 257 साल लगेंगे। मोदी राज  में लैंगिक समानता के मोर्चे पर  बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार इत्यादि से भी पीछे चला गया भारत घटिया शिक्षा के मामले में मलावी नामक एक अनजान देश को छोड़कर विश्व में दूसरा स्थान अर्जित कर लिया है, जबकि जुलाई में यह गरीबी के मामले में नाईजेरिया को पीछे छोड़कर ‘वर्ल्ड पावर्टी कैपिटल’ बन चुका है अर्थात विश्व में जितने गरीब भारत में हैं,उतने और कहीं नहीं। कुल मिलाकर नीचे की जो 50-60 प्रतिशत आबादी 5-6 प्रतिशत धन-संपदा  पर जीवन निर्भर करने  के लिए मजबूर है, जिस आधी आबादी को आर्थिक समानता पाने में 257 साल लगने है,जिसके कारण भारत गरीबी और घटिया शिक्षा के मामले में वर्ल्ड टॉप बना है, वह और कोई नहीं भारत के दलित, आदिवासी,पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित अल्पसंख्यक तबका है, जो 7 अगस्त,1990 के बाद भारत के शासक वर्ग, विशेषकर मोदी द्वारा छेड़े गए वर्ग संघर्ष के फलस्वरूप गुलामों की स्थिति में पहुँच गया है।

भारत का बहुजन समाज गुलामों की स्थिति में पहुँच गया है पर, भारी आश्चर्य का विषय है कि बहुजनवादी दलों को शायद इसका इल्म ही नहीं है। शासक और गुलाम के बीच मूल पार्थक्य शक्ति के स्रोतों (आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर कब्जे में निहित रहता है। गुलाम वे हैं जो शक्ति के स्रोतों सेबहिष्कृत रहते हैं, जबकि शासक वे होते हैं,जिनका शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार रहता है। यदि विश्व इतिहास में पराधीन बनाने गए तमाम देशों के गुलामों की दुर्दशा पर नज़र दौड़ाईजाय तो साफ नजर आएगा कि सारी दुनिया में ही गुलाम बनाये गए मूलनिवासियों कीदुर्दशा के मूल में शक्ति के स्रोतों पर शासकों का बेहिसाब एकाधिकार ही प्रधान कारण रहा। अगर शासकों ने पराधीन बनाये गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में वाजिब हिस्सेदारी दियाहोता, दुनिया में कहीं भी स्वाधीनता संग्राम संगठित नहीं होते। शक्ति के समस्त स्रोतों परअंग्रेजों के एकाधिकार रहने के कारण ही पूरी दुनिया मे ब्रितानी उपनिवेशन के खिलाफमुक्ति संग्राम संगठित हुये।इस कारण ही अंग्रेजों के खिलाफ भारतवासियों को स्वाधीनतासंग्राम का आन्दोलन संगठित करना पड़ा ; ऐसे ही हालातों में दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासीकालों को शक्ति के स्रोतों पर 80-90% कब्ज़ा जमाये अल्पजन गोरों के खिलाफ कठोर संग्रामचलाना पड़ा। अमेरिका का जो स्वाधीनता संग्राम सारी दुनिया के लिए स्वाधीनता संग्रामियोंके लिए एक मॉडल बना, उसके भी पीछे लगभग वही हालात रहे।गुलामों और शासकों मध्यका असल फर्क जानने के बाद आज यदि भारत पर नजर दौड़ाई जाय तो पता चलेगा किमंडल उत्तर काल में जो स्थितियां और परिस्थितियां बन या बनाई गयी हैं, उसमें मूलनिवासीबहुजन समाज के समक्ष एक नया स्वाधीनता संग्राम संगठित करने से भिन्न कोई विकल्पही नहीं बंचा है। क्योंकि यहाँ शक्ति के स्रोतों पर भारत के जन्मजात सुविधाभोगी  वर्ग का प्रायःउसी परिमाण में कब्जा हो चुका है, जिस परिमाण में उन सभी देशों में शासकों का कब्जा रहा, जहां-जहां मुक्ति आंदोलन संगठित हुए। कुल मिलाकर देखा जाय तो विगत आठ वर्षों में मोदी की नीतियों का जिन पर कहर टूटा है वह और कोई नहीं, दलित, आदिवासी, पिछड़ों और इनसे धर्मान्तरित तबकों से युक्त  85 प्रतिशत जनसंख्या का स्वामी मूलनिवासी बहुजन समाज है, जिसको गुलामी से निजात दिलाना आज सबसे बड़ा मुद्दा है। भारी ताज्जुब की बात है कि प्रधानमन्त्री मोदी की नीतियों के कारण जो बहुजन समाज उत्तरोत्तर गुलामों की स्थिति में पहुचते गया, उसकी गुलामी और बदहाली विपक्ष, विशेषकर बहुजनवादी दलों के चिंता के दायरे में रहा ही नहीं, इनकी चिंता में रहा है गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण जैसे मुद्दे। जो आरक्षण बहुजनों की प्रगति और उन्नति का खास आधार, मोदी द्वारा उसके खात्मे का सर्वशक्ति से अभियान चलाये जाने पर भी विपक्ष चुनावों में कभी आरक्षित के लिए ऐसा मुद्दा नहीं उठाया जिससे उसे लगे कि मोदी सत्ता से बाहर होने पर उनका आरक्षण बहाल हो पायेगा। उनकी इस बेरुखी का बहुजनों ने सजा दिया और आज बहुजनवादी दलों के समक्ष वजूद का संकट खड़ा हो गया है। बहरहाल अतीत से सबक लेते हुए यदि विपक्ष, खासकर बहुजनवादी दल अपना वजूद बचाने के लिए बहुजनों की गुलामी को मुद्दा बनाने का मन बनाते हैं तो उन्हें आजादी की लड़ाई के विषय में एक खास बात याद रखनी होगी, वह यह  यह कि दुनिया में जहां- जहां भी गुलामों ने शासकों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ी, उसकी शुरुआत आरक्षण से हुई!

आरक्षण के जोर से ही लड़ी गईं हैं आजादी की लड़ाइयाँ!  

काबिलेगौर है कि आरक्षण और कुछ नहीं शक्ति के स्रोतों से जबरन दूर धकेले गए लोगों को शक्ति के स्रोतों में कानूनन  हिस्सेदारी दिलाने का माध्यम है। आरक्षण से स्वाधीनता की लड़ाई का सबसे उज्ज्वल मिसाल भारत का स्वाधीनता संग्राम है। अंग्रेजी शासन में शक्ति के समस्त स्रोतों पर अंग्रेजों के एकाधिकार दौर में भारत के प्रभुवर्ग के लड़ाई की शुरुआत आरक्षण की विनम्र मांग से हुई। तब उनकी निरंतर विनम्र मांग को देखते हुए अंग्रेजों ने सबसे पहले 1892 में पब्लिक सर्विस कमीशन की द्वितीय श्रेणी की नौकरियों में 941 पदों में 158 पद भारतीयों के लिए आरक्षित किया। एक बार आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखने के बाद सन 1900 में पीडब्ल्यूडी, रेलवे ,टेलीग्राम, चुंगी आदि विभागों के उच्च पदों पर भारतीयों को नहीं रखे जाने के फैसले की कड़ी निंदा कीकांग्रेस ने। तब उसने आज के बहुजनों की भांति निजी कंपनियों में भारतीयों के लिए आरक्षण का आन्दोलन चलाया था। हिन्दुस्तान मिलों के घोषणा पत्रक में उल्लेख किया गया था कि ऑडिटर, वकील, खरीदने-बेचने वाले दलाल आदि भारतीय ही रखे जाएँ। तब उनकी योग्यता का आधार केवल हिन्दुस्तानी होना था,परीक्षा में कम ज्यादा नंबर लाना नहीं।बहरहाल आरक्षण के जरिये शक्ति के स्रोतों का स्वाद चखते-चखते ही शक्ति के स्रोतों पर सम्पूर्ण एकाधिकार के लिए देश के सवर्णों ने पूर्ण स्वाधीनता का आन्दोलन छेड़ा और लम्बे समय तक संघर्ष चलाकर अंग्रेजो की जगह काबिज होने में सफल हो गए।

आजादी की लड़ाई के लिए बने यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट!

भारत के स्वाधीनता संग्राम से प्रेरणा लेते हुए यदि विपक्ष बहुजनो के मुक्ति की  लडाई में उतरना चाहता है तो उसे उस भाजपा के खिलाफ ‘यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट’ गठित करना पड़ेगा, जिस भाजपा के मोदी ने मंदिर आन्दोलन से मिली राज-सत्ता का अधिकतम इस्तेमाल बहुजनों के उन्नति और प्रगति का आधार आरक्षण के खात्मे में किया है। यूनिवर्सल रिजर्वेशन का अर्थ है सार्वभौमिक अर्थात सर्वव्यापी अर्थात चप्पे-चप्पे पर आरक्षण! यूनिवर्सल रिजर्वेशन के दायरे में आयेंगे मिलिट्री, पुलिस-बल, न्यायायिक सेवा सहित सभी प्रकार की सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों के साथ सप्लाई, डीलरशिप, ठेकदारी, पार्किंग, परिवहन, विज्ञापन निधि, फिल्म, मीडिया, पौरोहित्य इत्यादि शक्ति के समस्त स्रोतों में आरक्षण।सर्वव्यापी आरक्षण भाजपा के लिए काल साबित होगा। कारण, जब विपक्ष इस वादे के साथ चुनाव में उतरेगा कि सत्ता में आने पर हम चप्पे-चप्पे पर आरक्षण लागू करेंगे तब भाजपा का हिन्दू-मुस्लिम, मंदिर और राष्ट्रवाद  जैसा इमोशनल मुद्दा हवा में उड़ जायेगा। जिस तरह सांप और नेवले की लड़ाई में नेवला बराबर विजेता के रूप में उभरता है और सांप मरता है या भागता है, वही हाल बहुजनवादी दलों द्वारा आरक्षण का मुद्दा उठाने पर भाजपा का होता है, जिसका उज्जवल दृष्टान्त बिहार विधानसभा चुनाव- 2015 में कायम हुआ। उस चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण के समीक्षा वाले बयान  को आधार बनाकर जब लालू प्रसाद यादव ने चुनाव को आरक्षण पर केन्द्रित किया तो मोदी अपनी लोकप्रियता के शिखर पर रहते हुए भी अपने शानदार करियर की सबसे शर्मनाक हार झेलने के लिए अभिशप्त रहे। आज तो मोदी की पूरी तरह पोल खुल चुकी है। ऐसे में लोकसभा चुनाव- 2024 को यूनिवर्सल अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण पर केन्द्रित करने का क्या परिणाम सामने आ सकता है, इसकी निर्भूल भविष्यवाणी राजनीति के प्राइमरी लेवल का विद्यार्थी भी कर सकता है।

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यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट गठित करने के लिए कौन आ सकता है सामने!

अब लाख टके का सवाल है कि यूनिवर्सल रिजर्वेशन पर केन्द्रित जिस मोर्चे में मोदी – शाह की भाजपा को शर्तिया तौर पर शिकस्त देने की क्षमता है, उसे गठित करने के लिए विपक्षी दलों में कौन सामने आएगा। दावे के साथ कहा जा सकता है कि कांग्रेस और वाम दल तो इसमें किसी भी सूरत में शामिल नहीं होंगे। कारण, ये जितनी भी गरीब-गुरुबों की बात करें, इनका वर्गीय हित वही है जो भाजपा का है। ऐसे में अगर कांग्रेस और वामदल सर्वव्यापी आरक्षण मोर्चे से दूर रहेंगे तो क्या सपा- बसपा, राजद- जदयू- लोजपा  इत्यादि ऐसा मोर्चा बनाने में रूचि लेंगे? मोदी- राज में इनके चरित्र में आये बदलाव को देखते इनसे भी कोई उम्मीद नहीं।कारण, मोदी- राज में अज्ञात कारणों से इनमें सत्ता हासिल करने की चाह मर गयी है। यह जानते हुए भी कि चुनावों को आरक्षण पर केन्द्रित करने से भाजपा हार वरण करने के लिए विवश रहती है, 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव बाद से यूपी-बिहार के बहुजनवादी दलों ने चुनाव को आरक्षण पर केन्द्रित करने का कोई सबल प्रयास ही नहीं किया। 2015 के बाद यूपी-बिहार में चार चुनाव हुए: 2017 में यूपी विधानसभा चुनाव, 2019 में लोकसभा, 2020 में बिहार और 2022 में यूपी विधानसभा चुनाव! इन चारों चुनावों में किसी को भी आरक्षण पर केन्द्रित करने का रत्ती भर भी प्रयास नहीं हुआ। ऐसे में जो दल अज्ञात कारणों से विगत चार चुनावों में आरक्षण और सामाजिक न्याय की बात जुबान पर लाने से कतराते रहे, वे यूनिवर्सल रिजर्वेशन पर मोर्चा बनाने जैसा साहसिक कदम उठाएंगे, ऐसा सोचना खुद को विराट गलतफहमी का शिकार बनाने जैसा होगा।तो एक तरह से जब तय है कि भाजपा के हार की प्रबल सम्भावना देखते हुए भी स्थापित दल यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट खड़ा करने में रूचि नहीं लेंगे। फिर ऐसा मोर्चा गठित करने के लिए कौन दल सामने आ सकते हैं! उत्तर है छोटी-छोटी बहुजनवादी पार्टियां ,जिन्होंने सत्ता का स्वाद नहीं चखा है। ये छोटी-छोटी पार्टियाँ बहुजनों के बीच खुद को स्थापित करने और संसद- विधानसभाओं में अपना प्रतिनिधित्व दर्ज कराने की तीव्र लालसा के वशीभूत होकर यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट गठित करने के लिए सामने आ सकती हैं। ऐसे में जो लोग भाजपा से निजात पाना चाहते हैं, उन्हें इसके लिए छोटे-छोटे बहुजनवादी दलों से संवाद बनाना चाहिए!

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इसके लिए बीडीएम छोटे-छोटे बहुजनवादी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों को लेकर बनाएगा ‘यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट’ अर्थात सर्वव्यापी आरक्षण मोर्चा! चूँकि भारत में वर्ग संघर्ष का इतिहास आरक्षण पर केन्द्रित संघर्ष का इतिहास है तथा मंडल उत्तरकाल में सुविधाभोगी वर्ग के तमाम राजनीतिक दल, खासकर भाजपा आरक्षण के खात्मे के लिए ही निजीकरण, विनिवेशीकरण, लैटरल इंट्री इत्यादि विविध तरीके से संविधान के उद्देश्यों को व्यर्थ करने के साथ वर्ग शत्रु बहुजनों को गुलामों की स्थिति में पहुचाई है, इसलिए जिस तरह जहर की काट जहर से होती है, उसी तरह हमारे सामने बहुजनों की मुक्ति की लडाई को नए सिरे से आरक्षण पर केन्द्रित करने से भिन्न उपाय नहीं है। चूँकि यह लड़ाई वर्तमान सत्ताधारी दल के खिलाफ अकेले लड़ना कठिन है, इसलिए हम कई दलों/ संगठनों को लेकर यूनिवर्सल रिजर्वेशन फ्रंट बनाने जा रहे हैं।

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

 

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