Wednesday, May 22, 2024
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डॉ. अंबेडकर के मूल्यों पर हमला और उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाने वाले आज ताकत के चरम पर हैं

भारतीय जाति-व्यवस्था की घृणास्पद, रूढ़िवादी परंपरा के शिकार अस्पृश्य जातियों के लोगों के लिए मुक्ति का उत्सव है, भीमा कोरेगाँव उत्सव। हजारों सालों से मनुस्मृति के अनुसार शूद्र तथा अतिशूद्र (जिसमें स्त्रियों का भी समावेश है) के साथ जो अपमानजनक व्यवहार चले आ रहे थे, उससे मुक्ति के आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक है भीमा […]

भारतीय जाति-व्यवस्था की घृणास्पद, रूढ़िवादी परंपरा के शिकार अस्पृश्य जातियों के लोगों के लिए मुक्ति का उत्सव है, भीमा कोरेगाँव उत्सव। हजारों सालों से मनुस्मृति के अनुसार शूद्र तथा अतिशूद्र (जिसमें स्त्रियों का भी समावेश है) के साथ जो अपमानजनक व्यवहार चले आ रहे थे, उससे मुक्ति के आंदोलन का सबसे बड़ा प्रतीक है भीमा कोरेगांव का संघर्ष। 1 जनवरी, 1818 के दिन पुणे की पेशवाई को खत्म करने की लड़ाई में महार रेजिमेंट की जीत हुई थी। इसको उत्सव के रूप में मनाने की पहल बाबासाहब अंबेडकर ने 1 जनवरी, 1927 को की थी। उनका उद्देश्य था कि महार रेजिमेंट के बलिदान और पुणे की पेशवाई खत्म होने की खुशी मनाने की परिघटना से प्रेरणा लेकर शूद्र समाज आगे बढ़े। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद भीमा कोरेगांव जाकर उत्सव मनाने की शुरुआत की थी।

पेशवाई के अंतिम काल में पुणे और जहाँ-जहाँ पेशवा राज कर रहे थे, वहां पर छूआछूत और घोर जाति व्यवस्था की अपमानजनक पद्धति जारी थी। (उदाहरण के लिए, दलितों को रास्ते पर चलते समय कमर के पीछे झाड़ू बांध कर चलना पड़ता था, ताकि उनके पैर के चिन्ह जमीन पर ना रह जाएँ। गले में मटका लटका कर चलना होता था, ताकि वे जमीन पर न थूकें। दिन में जब-जब छाया लंबी होती है ऐसे समय में बाहर नहीं निकल सकते थे, ताकि इनकी छाया भी उच्च जातियों को ना छू सके। पानी के हौद भी अलग-अलग होते थे। इस तरह के बहुत से बंधनों के कारण अस्पृश्य समाज बुरी तरह से प्रभावित था।) इसलिए पेशवाई खत्म करने की 1 जनवरी, 1818 की भीमा कोरेगाँव की लड़ाई, जिसमें ढाई हज़ार पेशवा सैनिकों के मुक़ाबले सिर्फ पांच सौ की संख्या में महार रेजिमेंट के सैनिकों ने जिस शौर्य का प्रदर्शन किया, उससे अंग्रेजी सेना की जीत हुई और पेशवा को हार का सामना करना पड़ा। कुछ राष्ट्रवादी लोगों को यह बात आपत्तिजनक भी लग सकती है।

मेरी नजर में भारत में सदियों से विदेशी आक्रमणकारी आते रहे हैं। ‘मनुस्मृति’ के अनुसार, क्षत्रिय छोड़कर अन्य लोगों को शस्त्र धारण करने की मनाही थी, जिस कारण हजारों सालों से विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत में आकर अपना राज कायम किया और बहुजन समाज सिर्फ मूकदर्शक बना रहा या फिर आने वाले नए आक्रमणकारी शासकों का स्वागत भी इस उम्मीद से किया होगा कि शायद यह पहल के शासकों के तुलना में ठीक होगा। इतिहास में इतने आक्रमणकारी अन्य देशों में नजर नहीं आते हैं, जितने भारत में आते-जाते रहे हैं। हिंदू धर्म की जातीय व्यवस्था के कारण बहुजन समाज को हमेशा अपमानित जीवन जीना पड़ा है। महात्मा ज्योतिबा फुले और डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने इस अपमानित जीवन के खिलाफ, सम्मान और समानता के लिए प्रतिनिधि के रूप में काम किए हैं।

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महात्मा ज्योतिबा फुले हों या डॉ. बाबासाहब अंबेडकर, दोनों की प्राथमिकता सामाजिक समता की लड़ाई में होने के कारण लोगों को लगता होगा कि वह आजादी के आंदोलन में शामिल नहीं थे। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा ज्योतिबा फुले तीस साल की उम्र के थे।उन्होंने उस संग्राम में हिस्सेदारी नहीं की, क्योंकि उनके जन्म होने के नौ साल पहले ही पेशवाओं का राज खत्म हुआ था, फिर भी डोरी जल गई लेकिन बल नहीं गया  वाली कहावत की तरह पुणे में छुआछूत और जाति-व्यवस्था की पद्धति बदस्तूर जारी थी। अंग्रेजी हुकूमत स्थानीय लोगों के भावनाओं को ठेस पहुँचाने की गलती नहीं करती थी। अंग्रेज़ समाज परिवर्तन करने के लिए नहीं आए थे। वे तो सिर्फ आर्थिक शोषण करने के लिए आए थे। इसलिए वे ऐसे किसी को नहीं छेड़ना चाहते थे, जो उन्हें या फिर उनकी सत्ता को चुनौती दे। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने बहुत ही सोच-समझकर अपने जीवन के लक्ष्य तय किए थे और उनकी भी प्राथमिकता सामाजिक स्वतंत्रता ही थी। उन्होंने, अपने जीवन का सबसे पहला लेख Caste System in India 9 मई, 1916 को (उम्र के 25वें साल में) डॉ. एएल गोल्डनवीज के एंथ्रोपॉलोजी सेमिनार में पढ़ा। इस निबंध का कुछ हिस्सा World’s Best Literature of the Month कॉलम में The American Journal of Sociology पत्रिका ने प्रकाशित किया।

डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने 1915 में एमए और 1916 में पीएचडी की। उस समय लाला लाजपत राय भी अमेरिका में थे। कोलंबिया विश्वविद्यालय की लायब्रेरी में पढ़ने के दौरान डॉ. अंबेडकर की उनसे मुलाकात हुई और उन्होंने उन्हें अपने गदर संगठन की गतिविधियों में शामिल होने का आग्रह किया। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर अपने भावी जीवन के प्रति कितने स्पष्ट थे। इसका एक बड़ा प्रमाण यह मिलता है कि 1916 के सितम्बर माह में, अमेरिका स्थित हिंदी विद्यार्थियों की एक बड़ी कांफ्रेंस में शामिल होने का जब उनसे आग्रह किया गया तो उन्होंने लालाजी को साफ-साफ शब्दों में कहा कि आप स्पृश्य हिंदू, हम अस्पृश्यों को गुलाम रखकर आजादी हासिल करना चाहते हैं, इसलिए अस्पृश्य आपकी आजादी के आंदोलन की कोशिश में शामिल नहीं होंगे। इसीलिये 1 जनवरी, 1927 को पहली बार डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने खुद भीमा कोरेगाँव जाकर, वहाँ के विजयस्तंभ को खोजकर, विजय दिवस मनाने की शुरुआत की। 1 जनवरी, 2018 के दिन दो सौ साल के उपलक्ष्य में जो कार्यक्रम भीमा कोरेगाँव में संपन्न हुआ था, उसको लेकर तथाकथित सवर्ण जातियों के लोगों ने देश भर से आए हुए लोगों की गाड़ियाँ जलाने से लेकर शारीरिक हमले तक किए। पूर्व नियोजित ढंग से हमला करने वाले गुनाहगार आज भी आराम से बाहर घूम रहे हैं। जिनके ऊपर हमले हुए थे, उन्हीं के ऊपर, दंगे भड़काने के आरोप लगाकर जेल में बंद कर दिया गया है। उस समय केंद्र से लेकर महाराष्ट्र तक बीजेपी की ही सरकारें थी, और अभी भी हैं। आज पाँच साल होने वाले हैं लेकिन भीमा कोरेगाँव के नाम पर लोग जेल में बंद हैं।

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घटना के हफ्ते भर के भीतर मैंने और राष्ट्र सेवा दल के अन्य सदस्यों ने मिलकर भीमा कोरेगाँव, वढु बुद्रुक तथा आसपास के इलाकों में जाकर वहां के लोगों से बातचीत करने के बाद इस पर रिपोर्ट लिखा था। 23 जनवरी, 2018 को मेनस्ट्रीम नाम की अंग्रेजी पत्रिका में यह रिपोर्ट प्रकाशित भी हुई थी, जिसे हमने महाराष्ट्र सरकार द्वारा गठित जांच आयोग को भी सौंपा था। सर्वोच्च न्यायालय में भीमा कोरेगाँव के केस की सुनवाई के दौरान वर्तमान मुख्य न्यायाधीश धनंजय चंद्रचूड ने अपने जजमेंट में हमारे रिपोर्ट को उद्धृत करते हुए जजमेंट दिया है। जबकि अन्य अन्य जजों ने इस मामले पर हर तरह से गलत फैसला दिया है।

वर्तमान समय में पिछले पांच सालों से कुछ लोग भीमा कोरेगाँव के मामले में तथाकथित देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हैं और विभिन्न जेलों में बंद हैं। हमारे देश की आज़ादी का अमृत महोत्सव भी चल रहा हैं। उसकी आड़ गुजरात दंगों की पीड़िता बिल्किस बानो के बलात्कारियों को अमृत महोत्सव आयोजन के दौरान सजा से पहले ही माफी देकर छोडा दिया गया है, जिसे लेकर बिल्किस ने कोर्ट में गुहार लगाई है। लेकिन भीमा कोरेगाँव के मामले में जांच के बावजूद जमानत नहीं दी गई है। भीमा कोरेगाँव के मामले में बंद लोगों में से एक फादर स्टेन स्वामी की जेल में ही मृत्यु हो गई। पार्किंसंस नामक बीमारी से ग्रस्त आदमी, पानी से लेकर, कोई भी पीने वाले पदार्थ के लिए सिर्फ एक स्ट्रॉ की मांग कर रहे थे, लेकिन हमारे महान न्यायालय की असंवेदनशीलता के कारण उन्हे स्ट्रा जैसी मामूली चीज तक नहीं दी गई। जबकि, आजादी के 75 साल के उपलक्ष्य में उन्हें रिहा किया जाता है, जिन्होंने नौ महीने की गर्भवती स्त्री के परिवार के सात सदस्यों और तीन साल की बच्ची को उसकी आँखों के सामने मारकर उसके साथ बलात्कार किया। हमारे देश के संविधान से लेकर मानवाधिकार के सभी मापदंडों का अपमान है और देश की न्यायिक व्यवस्था को बेआबरू करने वाली है।

भीमा कोरेगाँव के मामले में ज्यादातर लोगों की उम्र साठ साल से भी अधिक है। उसमें भी ज्यादातर ब्लडप्रेशर, शुगर तथा अधिक उम्र के कारण होने वाली विभिन्न बीमारियों के मरीज हैं, बावजूद इसके हमारे देश की न्यायपालिका के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। यह सभी के सभी डॉ. बाबासाहब अंबेडकर द्वारा शुरू किए गए उत्सव के बहाने सामाजिक बराबरी और भागीदारी की लड़ाई करने वाले आज अपराधियों की श्रेणी में पाँच साल से जेल में बंद हैं।

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राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार भी आज डॉ. बाबा साहब अंबेडकर के 67वें पुण्यस्मरण दिवस पर कार्यक्रम आयोजित करने का पाखंड कर रही हैं। इस तरह के दिखावे के कार्यक्रम करने की जगह डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के जीवन-मूल्यों के अनुसार भारत में किसी भी दलित के साथ अन्याय अत्याचार नहीं होना चाहिए। लेकिन देश आजाद होने के बाद 75 साल के बावजूद भारत के सभी प्रदेशों में दलित समुदाय के साथ होने वाले अत्याचारों में कमी आने की जगह और ज्यादा बढ़ोत्तरी हो रही है। डॉ. बाबासाहब अंबेडकर के पुण्यस्मरण दिवस के अवसर पर समस्त दलित, आदिवासी, महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों की जान-माल की सुरक्षा से लेकर उनके आत्मसम्मान के रक्षा के लिए विशेष रूप से भारतीय संविधान के अनुसार कारवाई होनी चाहिए।

डॉ. सुरेश खैरनार जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता और लेखक हैं। 

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