अपनी हिस्सेदारी का मतलब समझती हैं औरतें, उनका स्वागत किया जाना चाहिए डायरी (8 सितंबर, 2021)

नवल किशोर कुमार

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वैसे तो यह कोई असामान्य बात नहीं है। घर का मुखिया जो भी काम करे, उसके परिजन उसी हिसाब से सोचते-विचारते हैं। घर का मुखिया यदि पायलट होगा तो उसके बच्चे हवाई जहाज चलाने की सोचेंगे। नेता के बाल-बच्चे नेतागिरी सीखेंगे और वकील के बेटे-बेटी वकालत। इन सबमें कुछ भी खास नहीं। पत्रकार भी खास नहीं होते। यह तो कुछेक पत्रकारों को गुमान रहता है कि उनके सामने भारत का प्रधानमंत्री भी ठेहुनियां पर है और फलां सीएम उसके इशारे पर नाचता है। हालांकि एक पत्रकार के घर में भी पत्रकारिता अहम विषय माना जाता है और परिजनों की दिलचस्पी रहती है। मेरे घर में भी पत्रकारिता को लेकर अब दिलचस्पी बढ़ने लगी है। आज सुबह-सुबह जीवनसंगिनी रीतू ने निर्धारित समय से पहले जगा दिया। हाय-हैलो के बाद कहने लगीं कि छत्तीसगढ़ में तो गजब हो गया। नंदकुमार बघेल को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया है।

एक पत्रकार के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है कि उसके परिजन उसे खबर के बारे में बताएं। सामान्य स्तर पर तो घर की समस्याएं ही होती हैं हमारी बातचीत के विषय में। आज रीतू ने कहा कि नंदकुमार बघेल भी गजब बहादुर हैं 86 साल की उम्र में भी। बेल के लिए प्रयास ही नहीं किया। मानो यह ठान लिया हो कि जमानत के लिए कोई भीख नहीं मांगेंगे। यह तो वाकई एकदम बहादुरी वाली बात है।

मैंने कहा कि नंदकुमार बघेल बहुत साहसी इंसान रहे हैं। उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है और जिस कथन के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया है, वह तो वे बहुत पहले से कहते रहे हैं। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है जो पहले नहीं कहा गया है। राहुल सांकृत्यायन ने अपनी एक किताब में गंगा और वोल्गा का उल्लेख किया है। कोई उसको पढ़ ले तो समझ जाएगा कि ब्राह्मण कहां से आए हैं। वहीं भारत एक खोज में जवाहरलाल नेहरू ने ब्राह्मणों को विदेशी बताया है।

मेरी पत्नी का अध्ययन मुझे लगता है कि वास्तविक अध्ययन है। उसने जो भी जाना है, अपने अनुभवों से जाना है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उसने तमाम वैरिएबुल्स का परीक्षण किया है। मतलब यह कि सरसों का तेल लालू प्रसाद के राज में कैसे किलो था और अब कैसे है। वह तो साफ-साफ अंतर बताती है। 2014 के पहले गैस सिलिंडर 350 से 500 तक में मिल जाता था। और अब 900 रुपए लगते हैं। वह कल ही बता रही थी कि 300 रुपए लेकर गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार गयी थी, एक झोला तरकारी भी नहीं हुआ। पहले 100 रुपए में चलने भर सब्जी हो जाती थी।

सचमुच अच्छा लगता है रीतू के संग ऐसी बातें करने में। उसे राजनीति में भी दिलचस्पी रहती है। उसे नीतीश कुमार अच्छे नहीं लगते। कारण पूछने पर बताती हैं कि नीतीश कुमार का कैरेक्टर ढीला है। कभी जनता की नहीं सुनता। हमेशा अपने मन की करता रहता है। उसकी शिकायत वाजिब है। मेरे गांव जाने वाली सड़क काे अब कैंसर हो गया है। उसका कोई इलाज ही नहीं है। सरकार ने पीसीसी करवा दिया और वह भी छह महीने के अंदर टूट गया। कई जगहों पर तो सरकार ने ही तोड़वा दिया। एक तो समस्या यह है कि बिहार में सड़कों पर हर बार एक नयी परत चढ़ा दी जाती है। आदमी का घर नीचे होता जा रहा है और सड़कें ऊंची। जबकि कायदे से होना यह चाहिए कि सड़क का निर्माण यदि दुबारा हो रहा हो तो पहले की परत को खोदकर निकाल दिया जाना चाहिए। लेकिन बिहार में नीतीश की सरकार है, लूट की बहार है। मंत्री, इंजीनियर और ठेकेदार सब लूट कर खा रहे हैं।

मेरी पत्नी अब राजनीति समझने लगी है। वह शराबबंदी को भी नीतीश कुमार का खेला मानती है। पूछने पर बताती है कि गांव के दक्षिण में अब भी शराब बेची जाती है। सब चोर है यहां का थानेदार, दारोगा ओर सीएम। शराब के पैसा से तिजोरी भर रहा है।

नंदकुमार बघेल बहुत साहसी इंसान रहे हैं। उन्होंने ब्राह्मणवाद के खिलाफ लंबी लड़ाई लड़ी है और जिस कथन के कारण उन्हें गिरफ्तार किया गया है, वह तो वे बहुत पहले से कहते रहे हैं। उन्होंने ऐसा कुछ नहीं कहा है जो पहले नहीं कहा गया है। राहुल सांकृत्यायन ने अपनी एक किताब में गंगा और वोल्गा का उल्लेख किया है। कोई उसको पढ़ ले तो समझ जाएगा कि ब्राह्मण कहां से आए हैं। वहीं भारत एक खोज में जवाहरलाल नेहरू ने ब्राह्मणों को विदेशी बताया है।

मुझे लगता है कि मेरी पत्नी के कथन पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए। एक सामान्य गृहिणी है। अब जबकि मैं पटना में नहीं हूं, तो मेरे घर को वही देख रही है। नोन-तेल का भाव भी उसे ही पता होता है। महंगाई किस चिड़िया का नाम है, उसे अब समझ में आने लगा है। अब वह केवल मेरी पत्नी नहीं बल्कि बिहार की जागरूक नागरिक है जो बिहार की समस्याओं को जानती-समझती है।

असल में किसी भी समाज को समझने के लिए महिलाओं के दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण हैं। वैसे दृष्टिकोण तो जेएनयू में पढ़ने-पढ़ाने वालों के भी महत्वपूर्ण ही होते हैं। लेकिन सबके पास अपने कारण हैं। जेएनयू पास एक मित्र हैं। उन्हें नीतीश कुमार अच्छे इसलिए लगते हैं क्योंकि वह स्वयं कुर्मी जाति के हैं। एक परिचित को लालू प्रसाद पसंद हैं क्योंकि वह जाति के यादव हैं। एक परिचित को उपेंद्र कुशवाहा पसंद हैं क्योंकि वह स्वयं जाति के कुशवाहा हैं। वहीं कुछेक सवर्णों की नजर में नीतीशे कुमार ठीक है। वजह यह कि सवर्णों के पास लालू प्रसाद ने कोई विकल्प ही नहीं छोड़ा है। एक दलित प्रोफेसर हैं। देश-दुनिया में नामी हैं। उनके लिए तो बस मायावती नाम केवलम्।

हाय रे जेएनयू। जेएनयू में आने के बाद भी जाति बरकरार है। सब अपनी-अपनी जाति से बंधे हुए। अपनी कोई सोच नहीं। कोई समझ नहीं। लेकिन मेरी पत्नी का अध्ययन मुझे लगता है कि वास्तविक अध्ययन है। उसने जो भी जाना है, अपने अनुभवों से जाना है और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए उसने तमाम वैरिएबुल्स का परीक्षण किया है। मतलब यह कि सरसों का तेल लालू प्रसाद के राज में कैसे किलो था और अब कैसे है। वह तो साफ-साफ अंतर बताती है। 2014 के पहले गैस सिलिंडर 350 से 500 तक में मिल जाता था। और अब 900 रुपए लगते हैं। वह कल ही बता रही थी कि 300 रुपए लेकर गांव में लगने वाले साप्ताहिक बाजार गयी थी, एक झोला तरकारी भी नहीं हुआ। पहले 100 रुपए में चलने भर सब्जी हो जाती थी।

हर किसी के मानदंड अलग-अलग होते हैं। लेकिन मानदंड में केवल और केवल जाति हो तब यह खतरे की घंटी है। अन्य मानदंडों पर विचार करना जरूरी है। रही बात दुनिया को समझने की तो महिलाओं से बेहतर इस दुनिया को मर्द नहीं समझ सकते। यह पितृसत्ता का कहर भी है और महिलाओं के अपराजिता होने का कारण भी।

नवल किशोर कुमार फारवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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