Saturday, April 13, 2024
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साफ्ट से हार्ड होने के क्या होंगे सियासी मायने, 80 हराने के सपने के साथ चल पड़े हैं अखिलेश यादव

लोक जागरण यात्रा के माध्यम से सामाजिक न्याय का नायक बनने की राह पर बढ़ते अखिलेश यादव क्या कर सकेंगे 2024 में कोई उलटफेर अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को नए मुकाम पर पहुँचाने के अभियान पर लग गए हैं। इस बार उन्होंने लोक जागरण यात्रा निकलकर चुनावी मिशन का आगाज़ […]

लोक जागरण यात्रा के माध्यम से सामाजिक न्याय का नायक बनने की राह पर बढ़ते अखिलेश यादव क्या कर सकेंगे 2024 में कोई उलटफेर

अखिलेश यादव 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को नए मुकाम पर पहुँचाने के अभियान पर लग गए हैं। इस बार उन्होंने लोक जागरण यात्रा निकलकर चुनावी मिशन का आगाज़ किया है। बीते निगम और पंचायती चुनाव में भाजपा से मिली बड़ी पराजय का बदला लेने के मूड में दिख रहे हैं। अखिलेश अपनी इस यात्रा के माध्यम से जहाँ एक ओर जातीय जनगणना की बात उठाकर सामाजिक न्याय के मुद्दे को हवा देने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ बैठकर अपनी सांगठनिक ताकत का अंदाजा भी लगा रहे हैं। इस यात्रा के माध्यम से अखिलेश जिलाध्यक्ष और लोकसभा प्रभारी से लेकर बूथ प्रभारी लेवल तक पार्टी को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। 2024 के लिए 80 हराओ-भाजपा हटाओ का नारा देकर अखिलेश ने अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं कि आगामी चुनाव समाजवादी पार्टी के लिए करो या मरो का चुनाव होगा।

अखिलेश यादव 2009 के लोकसभा उपचुनाव में फिरोजाबाद सीट से चुनाव जीतकर राजनीति में आये थे। यह चुनाव उन्होंने पिता मुलायम सिंह यादव की छाँव में लड़ा और जीता था पर 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले सायकिल यात्रा निकालकर उन्होंने यह बता दिया था कि वह सिर्फ इसलिए राजनीति में नहीं बने रहना चाहते हैं कि वह मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं। अखिलेश यादव ने जिस वैचारिक प्रगतिशीलता के साथ यह यात्रा शुरू की थी उसका उत्तर प्रदेश की जनता ने लम्बे समय बाद दलगत और जातीय राजनीति से ऊपर उठकर स्वागत किया था। अखिलेश यादव ने लम्बी सायकिल यात्रा निकालकर जनता की आँखों में एक बेहतर और उम्मीद पूर्ण भविष्य का बीज बोने का काम किया। अखिलेश के युवा तेवर को जहाँ प्रदेश भर के युवाओं ने स्वीकार किया वहीं शेष समाज ने भी भरपूर समर्थन दिया। अखिलेश की मेहनत रंग लाई और 1989 में उत्तर प्रदेश की राजनीति में वजूद में आई समाजवादी पार्टी ने पहली बार 2012 में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया। उस समय मुलायम सिंह यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्होंने अखिलेश यादव की मेहनत से मिली जीत के प्रतिफल के रूप में उन्हें उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बना दिया।

[bs-quote quote=”2022 के विधान सभा से पूर्व अखिलेश यादव ने एक बार फिर से अपने उसी पुराने हथियार को आजमाया जिससे वह 2012 में सत्ता की कुर्सी तक पंहुचे थे। उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में समाजवादी रथ यात्रा निकाल कर समाजवादी पार्टी को मजबूत करने का काम शुरू किया। यह यात्रा अखिलेश को सत्ता तक भले ही नहीं पंहुचा सकी पर उनके खोये हुए जनाधार को पुनः उनसे जोड़ दिया।  2017 में जहाँ उनके हिस्से महज 47 सीटें आई थी वहीँ 2022 में वह 111 सीट तक पंहुच गए। इस बढ़त ने अखिलेश को विपक्ष में ताकतवर बना दिया। सत्ता तक ना पंहुचने के बावजूद समाजवादी कार्यकर्ता एक बार इस विश्वास से भर गए कि आगे वह सत्ता तक जा सकते हैं।” style=”style-2″ align=”center” color=”” author_name=”” author_job=”” author_avatar=”” author_link=””][/bs-quote]

अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए, समाजवादी पार्टी के समर्थक कार्यकर्ता भी अखिलेश यादव के युवा नेतृत्व को मुख्यमंत्री के रूप में पाकर उत्साहित थे पर पार्टी के तमाम बड़े नेता सहज भाव से अखिलेश यादव के नेतृत्व को स्वीकार नहीं कर पाये। अखिलेश के पास प्रदेश के विकास का एक नया नजरिया था। वह पूरी तरह से आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति पर फोकस करना चाहते थे और उत्तर प्रदेश को एक सुविधा और सौन्दर्य से संपन्न राज्य में तब्दील करने के लिए तैयार थे। बहुत सी योजनाओं को उन्होंने जमीन पर उतारा पर बहुत सी योजनायें इसलिए जमीन पर अपना रेखाचित्र नहीं बना पाईं क्योंकि पार्टी के कुछ पुराने नेता अपने से बहुत कम उम्र के नेता को अपना नायक मानने को तैयार नहीं थे। बड़े नेताओं ने अखिलेश यादव की कई योजनाओं को आगे नहीं बढ़ने दिया। अखिलेश यादव उस समय खुद को पिता की छाँव में खड़े मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे थे जिसकी वजह से वह पिता के मित्र नेताओं का ना तो विरोध कर पा रहे थे ना ही उन पर मुख्यमंत्री का चाबुक चला पा रहे थे। कमोवेश यह स्थिति साफ़ दिख रही थी कि अखिलेश दौड़ना तो चाहते हैं पर जब वह पैर आगे बढाते हैं तब कोई न कोई उनका पाँव खींच कर सड़क से उतार देता है। दो साल तक अखिलेश की सत्ता और सायकिल इसी उठा-पटक के साथ चलती रही।

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साल 2014 में केन्द्रीय राजनीति में संक्रामक दौर चला रहा था। कांग्रेस मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सत्ता के दस वर्ष पूरा कर चुकी थी और भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह अपने अस्तित्व को दांव पर लगाकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में सामने रखकर 2014 लोकसभा का चुनाव लड़ने जा रहे थे। नरेंद्र मोदी का चेहरा सामने आने से उत्तर भारत में हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण तेज हो गया। जिसकी बड़ी वजह थी 2002 में हुआ गुजरात दंगा। 2002 के गुजरात दंगे ने देश भर में नरेंद्र मोदी को कट्टर हिंदूवादी नेता के रूप में स्थापित कर दिया था। राजनाथ सिंह ने नरेंद्र मोदी को राष्ट्रीय राजनीति में लाकर भाजपा के सत्ता तक पंहुचने की राह आसान करना चाहते थे। इसका फायदा भाजपा को भरपूर मिला और नरेंद्र मोदी की इस हिंदूवादी लहर ने उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को जबरदस्त झटका देने का काम कर दिया। 2012 की प्रादेशिक राजनीति में अखिलेश यादव जहाँ केन्द्रीय भूमिका में आ गए थे वहीँ 2014 के चुनाव ने मुख्यमंत्री रहते हुए भी उनकी ताकत को क्षत-विक्षत कर दिया था। उत्तर प्रदेश की 80 लोक सभा सीटों में से समाजवादी पार्टी महज 5 सीटों पर सिमट गई थी। समाजवादी की इस शर्मनाक पराजय ने प्रदेश की सत्ता में रहते हुए भी अंदरूनी गुटबाजी की जगह पैदा कर दी। इस चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी का धरातल लगातार कमजोर होने लगा और समाजवादी पार्टी अप्रत्याशित रूप से अंतर्कलह का शिकार हो गई। सत्ता का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही समाजवादी पार्टी में हित और वर्चस्व का घमासान शुरू हो गया। अखिलेश यादव ने पार्टी के उस दाग धब्बे को साफ करने की मुहिम चलाई जिस पर भाजपा ने 2014 में सबसे ज्यादा हमला बोला था।

अखिलेश यादव चाहते थे कि समाजवादी पार्टी अब अपने पुराने लिहाफ से निकलकर नया जामा पहने। जिसके लिए अखिलेश यादव ने सबसे पहले पार्टी में शामिल उन लोगों को बाहर का रास्ता दिखाना शुरू कर दिया जो माफिया, बाहुबली या फिर हार्डकोर क्रिमिनल छवि वाले थे। इसी में मुलायम सिंह और शिवपाल सिंह यादव के करीबी गायत्री प्रजापति, जिन पर बलात्कार का आरोप लगा था, को मंत्रिपद से हटा दिया। इस मामले को लेकर शिवापाल सिंह यादव ने पूरी तरह से अखिलेश यादव की मुखालफत शुरू कर दी। मुलायम सिंह यादव को भी कहीं ना कहीं लगने लगा था कि अखिलेश यादव अब स्वतंत्र रूप से आसमान में उड़ने की कोशिश कर रहे हैं इसलिए वह भी पार्टी और अपने तमाम चहेते नेताओं के हित की सुरक्षा के लिए अखिलेश यादव पर अंकुश लगाने में लग गए। समाजवादी पार्टी में मुख्यमंत्री होते हुए भी अखिलेश यादव पार्टी में अलग-थलग पड़ने लगे थे पर पार्टी के महासचिव रामगोपाल यादव खुलकर अखिलेश यादव के साथ आ गए। इसी बीच उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव की तारीख घोषित हो गई। भाजपा जहाँ केंद्र में कब्जा करने के बाद उत्तर प्रदेश की विधानसभा जीतने की पूरी तैयारी में थी वहीँ सपा सत्ता में होने के बाद भी अंदरूनी लड़ाई में व्यस्त थी। शिवपाल उम्मीदवारों की अलग लिस्ट जारी कर रहे थे तो अखिलेश अलग। इस बीच रामगोपाल यादव ने बड़ी राजनीतिक चाल चलते हुए आनना-फानन में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाकर अखिलेश यादव को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनवा दिया। मामला चुनाव आयोग तक पंहुच गया। शिवपाल सिंह ने पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को मानने से इनकार कर दिया और पुरानी कार्यकारिणी वाली समाजवादी पार्टी को असली समाजवादी पार्टी बताया। फिलहाल चुनाव आयोग ने फैसला अखिलेश यादव के पक्ष में दिया और शिवपाल सिंह यादव समेत दर्जन भर से ज्यादा नेता जो शिवपाल सिंह यादव के करीबी थे या जिनकी वफादारी पर अखिलेश यादव को संदेह था पार्टी से बाहर हो गए।

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इस पूरी उठा-पटक में अखिलेश यादव भले ही पार्टी को अपने कब्जे में लेने से कामयाब हो गए पर कांग्रेस से मिलकर चुनाव लड़ने के बावजूद बुरी तरह से विफल हो गए। पिछली विधानसभा में पूर्ण बहुमत हासिल करने वाली सपा इस चुनाव में सिर्फ 47 सीटों पर सिमट गई। यह हार अखिलेश यादव के लिए भयावह थी पर अप्रत्याशित नहीं थी। आंतरिक लड़ाई की वजह समाजवादी पार्टी सही तरह से यह चुनाव लड़ ही नहीं सकी थी। कांग्रेस से गठबंधन करने की वजह से मुलायम सिंह यादव ने भी कुछ जगहों पर अखिलेश का विरोध किया था।  इस चुनाव के बाद मुलायम सिंह ने अपनी राजनीतिक भूमिका लगभग ख़त्म ही कर ली। अब अखिलेश यादव पार्टी के प्रमुख थे पर राजनीतिक रूप से कमजोर थे। 2019 में लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव ने राजनीतिक ताकत हासिल करने के लिए बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन किया पर इस बार भी अखिलेश की उम्मीद धराशाई ही हुई। सपा का साथ मिलने से बसपा ने जहाँ 10 सीटें हासिल कर लीं वहीँ अखिलेश यादव जहाँ के तहाँ ही रह गए। 2014 की तरह 2019 में भी सपा के हिस्से में सिर्फ पाँच सींटे आई। इस पराजय ने अखिलेश के नेतृत्व पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। पार्टी लगातार कमजोर होने लगी। शिवपाल सिंह यादव एक बार फिर से अखिलेश यादव के नेतृत्व को कमजोर नेतृत्व बताने लगे।

इसके बाद 2022 के विधान सभा से पूर्व अखिलेश यादव ने एक बार फिर से अपने उसी पुराने हथियार को आजमाया जिससे वह 2012 में सत्ता की कुर्सी तक पंहुचे थे। उन्होंने पूरे उत्तर प्रदेश में समाजवादी रथ यात्रा निकाल कर समाजवादी पार्टी को मजबूत करने का काम शुरू किया। यह यात्रा अखिलेश को सत्ता तक भले ही नहीं पंहुचा सकी पर उनके खोये हुए जनाधार को पुनः उनसे जोड़ दिया।  2017 में जहाँ उनके हिस्से महज 47 सीटें आई थी वहीँ 2022 में वह 111 सीट तक पंहुच गए। इस बढ़त ने अखिलेश को विपक्ष में ताकतवर बना दिया। सत्ता तक ना पंहुचने के बावजूद समाजवादी कार्यकर्ता एक बार इस विश्वास से भर गए कि आगे वह सत्ता तक जा सकते हैं। इस बीच उत्तर प्रदेश की एक अन्य महत्वपूर्ण पार्टी बसपा के कमजोर होने से भी सपा को झटका लगा। बसपा के कमजोर होने से बसपा का कोर वोट बसपा से छिटककर भाजपा के साथ हो गया था। इस वजह से भाजपा दुबारा सरकार बनाने में सफल हो गई थी।

अब जबकि 2024 के लोक सभा चुनाव की आहट सुनाई देने लगी है तब एक बार फिर से अखिलेश यादव यात्रा पर निकल पड़े हैं। इस बार पूरा विपक्ष भाजपा को केंद्र की सत्ता से दूर करने की फिराक में लगा हुआ है तब अखिलेश की भूमिका महत्वपूर्ण होती दिख रही है। यदि इस बार अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश में भाजपा को कमजोर करने में कामयाब होते हैं तब ही विपक्ष के साझे सपने सच हो सकते हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश 80 संसदीय क्षेत्र वाला राज्य है। यह प्रदेश देश की सियासत को सबसे ज्यादा सांसद देता है। इस बार सपा मुखिया अखिलेश यादव ने सीतापुर से नई यात्रा का आगाज कर दिया है। इस बार अखिलेश यादव इसे “करो या मरो” का चुनाव मानकर मैदान में उतर चुके हैं और पार्टी कार्यकर्ताओं को भी इसी जज्बे के साथ अभी से चुनाव में डटने के लिए कह रहे हैं। इस बार संगठन के ढाँचे को भी वह ताकतवर बनाने में लगे हुए हैं। इस बार समाजवादी पार्टी का नया नारा “80 हराओ, भाजपा हटाओ” बन गया है। भाजपा द्वारा साफ्ट हिंदुत्व की बात कहे जाने को लेकर अखिलेश ने अपने कार्यकर्ताओं से कहा है कि अब तक हम साफ्ट थे, अब हार्ड होने का वक्त आ गया है। समर्थक उत्साहित जरूर हैं पर यह उत्साह क्या वोट में बदल पायेगा इसका तो इंतज़ार करना पड़ेगा। अखिलेश के साथ हर चुनाव में एक उत्साह भरी भीड़ खडी दिखती रही है पर यह भीड़ सामाजिक न्याय के उस विजन को लेकर आगे नहीं बढ़ पाती है जो समाजवाद की पक्षधरता कर सके।

कुमार विजय गाँव के लोग डॉट कॉम के एसोसिएट एडिटर हैं।

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