होण्डुरास से लौटे हुये एक ज़माना बीत गया – दो

विद्या भूषण रावत

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भारतीय सभ्यता ढोंग का सबसे बड़ा उदाहरण है

सन दो हज़ार की उनतीस जुलाई की सुबह मैं एक इन्टरनेट कैफे गया क्योंकि बहुत दिनों से घर से कोई सम्पर्क नहीं हुआ था। फोन करने की कीमत बहुत ज्यादा है। अतः मैंने सोचा कि विस्तार से ई-मेल भेज दूँ और भारतीय समाचारों की जानकारी ले लूं। जब भी बाहर होता हूँ तो देश में अप्रत्याशित घटनाएं होती हैं। आंध्र प्रदेश में पाँच दलितों की हत्या का समाचार इतनी दूर पढ़कर मन खिन्न हो गया। क्या हमें संस्कृति और सभ्यता के विषय में कुछ कहने का हक है? हमने देश के एक विशाल वर्ग को अमानवीय स्थितियों में रखा है और मानवाधिकार की बात करते हैं। भारतीय सभ्यता ढोंग का सबसे बड़ा उदाहरण है।

अभी थोड़ी देर पहले हम भूमिहीन किसानों के एक गांव गये जो कि अपनी जमीन हेतु संघर्ष कर रहे हैं। करीब 2 घंटे के अंतराल के बाद हम इस गांव में पहुँचे हैं जहां लगभग 500 लोगों की भीड़ हमसे बात करने को उत्सुक है। हमारे सभी साथियों को बड़े सत्कार के साथ बैठाया जाता है। सभी के चहरे प्रसन्नचित्त हैं। बिप्लव दादा ने अपने भाषण में भारत की जनता की भावनाएं व्यक्त की है। वे लोगों से जोरदार नारा लगवाते है- वीवा केम्पोसिना यानी किसान की जीत हो। पूरी भीड़ के तन्मयता से रहने के कारण मुझे लगता है कि यहाँ पर कुछ कहना चाहिए। मैंने कहा- ‘मैं भारत के तमाम दबे-कुचले लोगों की ओर से आपका सम्मान करता हूँ। आप अपने संघर्ष को जारी रखें। यह मात्र ज़मीन की लड़ाई नहीं है। वैश्वीकरण के इस युग में हर चीज की बोली लगने लगी है। ज़मीन आपकी माँ है। क्या आप अपनी माँ को बेच देंगे? ज़मीन हड़पना आपकी संस्कृति पर हमला है। यह सब पेप्सी और कोला की सांस्कृतिक दुनिया में कुछ एक कार्पोरेशनों की दादागिरी बनाने के लिए है, इनसे बचिए।’ और फिर मैंने वहाँ के लोगों का आह्वान किया कि यदि वह यह चाहते हैं तो इसके लिए उन्हें भी घर के काम काज में हाथ बंटाना होगा। यकीन मानिए, पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। महिलाओं के चेहरे पर चमक थी। बाद में लोेगों ने नारियल पानी पिलाकर हमें विदा किया।

यह तीसरी दुनिया के सभी देशों की हालत है। चाहे वह बैंकाक हो, मनीला हो, विएतनाम हो, गोवा हो या लैटिनी अमरीकी देश। सभी में लड़की एक वस्तु बन गई है। वैश्वीकरण के बाजार में उत्पादक वस्तु। इसीलिए हम देखते हैं कि ’सुन्दरता का रोग‘ गरीब देशों को ज्यादा खा रहा है। यहां लड़कों में धूम्रपान व नशे की लत बढ़ रही है और लड़कियों को सेक्स का नशा या जुनून सवार है।

दूसरी सुबह उठने के बाद हमें पास के एक-दूसरे गांव में जाना है। यहां पर भी जमींदारों ने राजस्व अभिलेखों से हेराफेरी कर कागजों से करीब दस परिवारों का नाम गायब करा दिया है। ये दस परिवार यहां पर करीब बीस वर्ष से रह रहे हैं और जीविका के लिए पूर्णतया खेती पर निर्भर हैं। इन्होंने एक कोऑपरेटिव बनाया है और ये लोग मुख्यतः मक्का, केला, यूका, नींबू की खेती करते हैं।

पशुओं में ये लोग सुअर और गाय पालते हैं, जो इनके खाने के लिए है। मुर्गी पालन भी ये लोग करते हैं। यहाँ पर मैं यह बात साफ कर देना चाहता हूँ कि भूमिहीन की यहाँ की परिभाषा और हमारी परिभाषाओं में बहुत अन्तर है। हमारे यहां भूमिहीन लगभग भूमिहीन हैं, परन्तु यहां पर लगभग 50 बीघा तक के लोग भूमिहीन की श्रेणी मे आते हैं। वैसे होंड्यूरास के लोगों का कहना है कि इन भूमिहीनों को सालाना आय लगभग 500 डालर है, जो लगभग 25,000 हजार रुपये के बराबर है।

हम लोगों ने इनके घर में बैठकर बातें की, घर मिट्टी का बना हुआ था। सामने सुअर, मुर्गियां और कुत्ते घूम रहे थे। मैंने देखा दो नवयुवतियां साढ़े तीन घंटे से कपड़े धो रही थीं और कुछ खाना बना रही थीं। यहां पर लोग मक्के की रोटी खाते हैं, क्योंकि यही यहाँ की मुख्य फसल है। सुअर के लिए यूका नामक जड़ होती है जिसे ये लोग भी बहुत खाते हैं। इसका स्वाद मीठे आलू की भांति होता है। हम लोगों ने बहुत से सवाल जवाब किये। मैंने इन लोगों को कवि पीवी शेली की पक्तियां सुनाई- हर अंधेरी रात के बाद चमकदार सुबह आती है। और फिर मैंने अपने प्रिय गीत की पंक्तियां इन्हें सुनाई (अंग्रेजी अनुवाद भी मैंने किया) – किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार, किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार, किसी के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार… जीना इसी का नाम है ‘… सारे लोगो ने खड़े होकर तालियां बजाकर इसे सराहा। अपनी बस में आते वक्त बिप्लव और मैंने हम होंगे कामयाब… गाया। दोपहर के खाने पर मैं स्पेन से आई दो मित्रों के साथ बैठा। सम्मेलन के दौरान उन्होंने मेरी बातों का स्वागत किया। मैंने उनसे उनके देश में महिलाओं की स्थिति पर व्यापक बात की। स्पेन में महिलाओं पर अत्याचार बढ़े हैं, लेकिन वहां पर महिलाएं भी बहुत ताकतवर हैं। स्पेन ने पूरे लातिनी अमेरिका में राज किया और इन महिलाओं के बातचीत के लहजे में राजसी खासियत थी।

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शाम को हम यहां के स्थानीय बाजार में गये। तिब्बती बाजारों की तरह यहां पर भी खुले बाजार प्रचलित है। अधिकांश सामान अमेरिका, पनामा, एलसल्वाडोर आदि से आता है। वैसे चीन का सामान हर जगह उपलब्ध है। जापान की टोयोटा गाड़ियां और कोरिया की हुंडई कारों और गाड़ियों की बहुतायत यह साबित करती है कि यहाँ एशिया का दबदबा बन चुका है। यहां पर बैग, प्लास्टिक का सामान बहुतायत में है लेकिन सबसे बड़ी संख्या में महिलाओं के भड़काऊ वस्त्रों की भरमार है। अमेरिकी संस्कृति ने यहां लड़की को केवल एक उत्पादक पदार्थ तक ही सीमित कर दिया है। यह तीसरी दुनिया के सभी देशों की हालत है। चाहे वह बैंकाक हो, मनीला हो, विएतनाम हो, गोवा हो या लैटिनी अमरीकी देश। सभी में लड़की एक वस्तु बन गई है। वैश्वीकरण के बाजार में उत्पादक वस्तु। इसीलिए हम देखते हैं कि ’सुन्दरता का रोग‘ गरीब देशों को ज्यादा खा रहा है। यहां लड़कों में धूम्रपान व नशे की लत बढ़ रही है और लड़कियों को सेक्स का नशा या जुनून सवार है।

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लेकिन खुशी इस बात की है कि इस पूरे इलाके में इस ’जुनून‘ के खिलाफ आवाजें आ रही हैं। लोग अपनी संस्कृति और अपने रहन-सहन पर विदेशी धोखाधड़ी नहीं बर्दाश्त करेंगे। महिला किसानों का आंदोलन यहां मजबूती पकड़ चुका है। हालांकि मैंने उन्हें बताया कि भारत में भी एक महिला आंदोलन है जो पुरुष प्रधान समाज के सीमित दायरे में है तो क्या आप लोगों का आंदोलन भी ऐसा ही है। हमारी स्थानीय मित्र ने बताया कि वे अपना आंदोलन किसी जाति के विरुद्ध नहीं करती हैं। उनके आंदोलन के लिए पुरुषों का साथ भी ज़रूरी है। अतः यह मानवाधिकारों की लड़ाई है, न्याय की लड़ाई है। इसमें न्याय का साथ हमें देना होगा। बजाय यह देखने के कि वह स्त्री है या पुरुष। मैंने उनसे पूछा कि क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी के सत्ता में आने से क्या परिवर्तन नजर आ रहे हैं? तो वह बोली कि स्पेन में बहुत लम्बे समय तक सोशल डेमोक्रेट सत्ता में रहे और उनका मुख्य सवाल सामाजिक सुरक्षा का था। उन्होंने महिलाओं के लिए कुछ विशेषाधिकार प्रदान किए जैसे तलाकशुदा महिला यदि गृहणी है और बच्चे की परवरिश कर रही है तो उसको मासिक भत्ते का अधिकार। लेकिन क्रिश्चियन डेमोक्रेट के सत्ता में आने पर चर्च की पुरातनपंथी ताकतें हावी होने की कोशिशें कर रही हैं। ये ताकतें महिलाओं के लिए वस्त्र कोड आदि लागू करने की कोशिश करती हैं, परन्तु चर्च के बाहर उनका कोई अस्तित्व नहीं है। यूरोप में, विशेषकर उत्तरी यूरोप में, चर्च का काफी प्रभाव है, लेकिन अन्य देशों खासकर पूर्वी यूरोप में कम्यूनिस्ट आंदोलन की मजबूती के कारण धार्मिक ताकतें बिल्कुल सीमित हैं। यूरोप की औद्योगिक क्रान्ति का सबसे बड़ा नुकसान चर्च की प्रभुसत्ता को हुआ।

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होण्डुरास से लौटे हुये एक ज़माना बीत गया – एक

31 जुलाई, 2000 आज रात भर नहीं सोया। प्रेरणा के लिए, सुबह 3.30 बजे उठकर नहाना-धोना किया और खूब गाने गाये। 5.00 बजे हमने होटल से विदा ली और वहां से एअरपोर्ट के लिए चल दिये। हमारी फ्लाइट 8.00 बजे चली है और इस समय फ्लाइट के अंदर सुबह का नाश्ता परोसा जा चुका हैं। मैं इस पूरे यात्रा वृतान्त को साथ-साथ लिख रहा हूँ। सारा लिखने के बाद मायामी से आने का वृतान्त भी दूंगा। लेकिन यहां पर सबसे महत्वपूर्ण बात को लिखना नहीं भूलूंगा। मेरी सहयोगी नमिता के सहयोग के बिना मेरी कोई भी सफलता सम्भव नहीं थी। यह उनकी ताकत और प्यार का परिणाम है कि आज मैं दुनियां के लिए ’जी‘ रहा हूँ। इतनी परेशानियों के बावजूद भी उन्होंने हिम्मत से काम लिया है। बिना किसी पर निर्भर होकर इस पूरी यात्रा में वह हमेशा साथ थीं। मेरी हर सांस में बसी खुशबू तेरी... हमारे लिए यही बड़ा सपना है कि हमारी बेटी हमारे इस काम को आगे बढ़ाये… मानवता की खिदमत से बड़ा कोई ज्ञान नहीं। कोई करियर नहीं। हम तो सिर्फ यही कहते हैं कि यदि निःस्वार्थ भाव से कोई काम होगा तो पृथ्वी से अच्छी कोई जगह नहीं। मैंने अपने परिवार की कीमत पर अपना सब कुछ समर्पित किया है। यह उस हवाई यात्रा से बहुत बड़ा है जिसे हमारे मित्र हमारा ’लक‘ समझते हैं। रिश्ता दिल से दिल के एतबार का, जिंदा है हमीं से नाम प्यार का, कि मर के भी किसी को याद आयेंगे किसी के आँसुओं….कहेगा फूल हर कली से बार-बार….जीना इसी का नाम है।

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मियामी हवाई अड्डे पर वापसी की बेला 

मियामी के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा पर हम स्थानीय समय के मुताबिक ठीक 11.30 एएम पर उतरे। अमेरिका में हवाई अड्डों पर चलना बहुत पड़ता है और प्रर्वतन मंत्रालय के लोग हर वक्त आप पर नजर रखे रहते हैं। लुफ्तहांसा के टिकट काउण्टर पर मुझे बोर्डिंग पास मिलता है। यहाँ पर मुझे 4 घंटे का इन्तजार करना पड़ रहा है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि कितनी लम्बी यात्रा होगी। अभी 3.35 पर यहाँ से चलेंगे और अगली सुबह 6.25 मिनट पर फ्रेंकफर्ट में होंगे, यानी पूरे साढ़े नौ घंटे के बाद और फिर वहां पर पुनः साढ़े सात घंटे का इंतजार। इस प्रकार यदि हिसाब लगाएं तो 5 बजे सुबह से शुरू हुई यात्रा दिल्ली में 12.45 पर खत्म होगी और घर आते-आते 2.30 बज चुका होगा। पूरे 36 घंटे का सफर। नींद आने का तो प्रश्न ही नहीं है। थोड़ा कोशिश करते हैं, लेकिन बिस्तर और कुर्सी में सोने में तो काफी फर्क है।

MIA operational update in response to COVID-19
मियामी हवाई अड्डा

मियामी मध्य अमेरिका में अटलांटिक महासागर के तट पर स्थित है अपनी समुद्री तटों के लिए प्रसिद्ध मायामी बीच में सैलानियों की भारी भीड़ देखी जा सकती है। अभी यहाँ पर भी बहुत गर्मी पड़ती है। तापमान करीब 35 डिग्री सेल्सियस है। अभी आसमान में बादल भी हैं। सुबह बारिस भी हुई थी, लेकिन अब चमकदार धूप है। मियामी से सेन पेड्रोसूला का डेढ़-दो  घंटे का सफर भी अटलांटिक के ऊपर से गुजरता है। जब कि मियामी  से हवाई जहाज फ्रैंकफर्ट, लंदन और पेरिस होते हुए जाता हैं तो साढ़े नौ घंटे में से साढ़े आठ घंटे हवाई जहाज अटलांटिक महासागर के ऊपर उड़ता है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है अटलांटिक की विशालता का।

अभी मैं फ्रैंकफर्ट प्रस्थान के लिए एन्ट्रीलाइन में बैठा हूँ। सीएनएन पर अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव पर लगातार चर्चाएं हो रही हैं। फ्रैंकफर्ट तक का विवरण फिर दूंगा। लेकिन आप की जानकारी के लिए होंड्यूरास और भारत के समय में 11.30 घंटे का फर्क है जबकि अमेरिका-भारत में 10.30 घंटे का। इस समय जब मैं चलूंगा आप सुबह की मीठी नींद में होंगे। इसलिए आपकी नींद खराब नहीं करूँगा।

अटलांटिक के ऊपर साढ़े आठ घंटे

कल सायं मायामी से हमारी उड़ान एक घंटा देर से शुरू हुई, परन्तु पायलट ने वादा किया कि वह ठीक 6.35 पर सुबह फ्रैंकफर्ट में उतार देगा और वास्तव में उसने अपना वादा निभाया भी। हम सुबह ठीक समय पर यहाँ उतर गये। हल्के बादलों के बीच चमकदार धूप थी। जैसे ही विमान ने हवाई पट्टी को छुआ, लोगों ने तालियाँ बजाकर इसका स्वागत किया। मैं समझ सकता हूँ कि फ्रांस के सुपरसोनिक कोनकाई विमान दुर्घटना से पूरा यूरोप स्तब्ध है और थोड़ा-बहुत सहमा हुआ भी।

Nonlinear effects of wind on Atlantic ocean circulation
अटलांटिक महासागर

ऊपर से अटलांटिक को देखने पर एक अजीब-सी सिहरन भी होती है। विशालकाय समुद्र, जिसे आप अन्तहीन कह सकते हैं। जब हवाई जहाज कम ऊँचाई पर उड़ रहा होता है तो अटलांटिक का हरा-नीला शांत दिखने वाला जल दिखाई देता है और उस पर चल रही नौकायें और बड़े-बड़े जहाज, किनारे का जल बिल्कुल हरा नजर आता है। जैसे-जैसे हम बादलों को चीरते हुए ऊपर जाते हैं तो पूरे समुद्र के ऊपर बादलों की सफेद चादर बिछ जाती है। उस पर सूरज की चमकती हुई किरणें एक बेहतरीन नजारा प्रस्तुत करती हैं। मायामी से फ्रैंकफर्ट के रास्ते में बोस्टन, न्यूयार्क, न्यूओरलेण्डो, नोरफोर, लंदन और पेरिस जैसे शहरों के ऊपर से विमान गुजरता है, पेरिस के तट तक अटलांटिक है। हालांकि पेरिस सीन नदी और लंदन टेम्स नदी की तट पर बसे हैं। सामने इंग्लिश चैनल भी दिखाई पड़ रहा है।

आज हमने अटलांटिक के ऊपर सुबह की लालिमा को देखा और सच पूछिए तो मजा आ गया। कन्याकुमारी की वह सुबह जब हम नमिता और विदिता को साथ लिए विवेकानन्द सेवा केन्द्र के तट पर सूर्य के दर्शन कर रहे थे। तेजस्वी सूर्य के समान तेजस्वी बनने की ख्वाहिश लिए।

फ्रैंकफर्ट यूरोप का दूसरा बड़ा हवाई अड्डा है। सबसे बड़ा हवाई अड्डा लंदन का हीथ्रो हवाई अड्डा है। वैसे पेरिस का चार्ल्स  डी गाल भी अपने विशाल आकार और खूबसूरती के लिए विख्यात है। यूरोप के हवाई अड्डों पर धूम्रपान निषेध है। हालांकि कुछ विशेष क्षेत्र हैं, जहाँ पर आप धूम्रपान कर सकते हैं। अभी एलीवेटर पर एक भारतीय परिवार के पुरुष मुखिया को स्थानीय अधिकारियों ने सिगरेट बुझा देने का आदेश दिया। क्या करें, हम भारतीयों की तो आदत ही ऐसी है कि लगातार माइक्रोफोन पर एनाउन्समेंट और हर स्थान पर विशेष सूचनाएं लिखे होने के बावजूद भी हम अपनी हरकतों से बाज नहीं आते।

हवाई अड्डों के विशाल स्वरूप के बावजूद जिन लोगों को चलने-फिरने में दिक्कत होती है, उनके लिए ट्रांजिट लाउन्ज के अन्दर छोटी गेट कारें हैं जिनमें उन्हें बैठाकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाया जाता है। वैसे एलीवेटर लगे होने के कारण भी कोई परेशानी नहीं होती।

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मोदी सरकार और गांधी-पटेल की दृष्टि

अभी सुबह के आठ बजे हैं और मैंने अपना ’सुबह का काम‘ निपटा लिया है। यहां पर पब्लिक टायलेट्स बहुत साफ और मुफ्त में हैं। जहां अपने देश के लोग और सरकारें हर काम का पैसे वसूलना चाहती हैं वहीं यूरोप में अधिसंख्य सरकारों का रवैया समाजवादी रहा है। उन्होंने अपने किसानों और उद्योंगों की रक्षा की और आने वाले समय में अमेरिकी प्रभुत्ववाद को सबसे बड़ी चुनौती यूरोप से मिलने वाली है। यह समाचार मिला है कि अमेरिका की एक बड़़ी टेलीफोन व्यवस्था को जर्मन टेलिकॉम ने खरीद लिया है और अमेरिकी सरकार इससे घबराई हुई है।

मानवाधिकारों की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुये जर्मनी की सरकार ने समलैगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता देने का फैसला किया है, हालांकि यहां पर स्पेन की भांति क्रिश्चियन डेमोक्रेट इसका विरोध कर रहे हैं। हमें एक व्यक्ति को उसकी जीवन शैली को चुनने के अधिकार का सम्मान करना होगा। यह मान्यता अमेरिकी सरकार पहले ही दे चुकी है और अन्य कई सरकारों के लिये यह मुख्य मुद्दा है।

जर्मनी की सरकार ने समलैगिकों के विवाह को कानूनी मान्यता प्रदान की

यहाँ से 1.30 मिनट अर्थात करीब 4 बजे भारतीय समय के अनुसार हमारी यात्रा शुरू होगी। देश वापसी के इतने दिनों बाद देश के सामाजिक-राजनीतिक माहौल से दूर रहने के बाद फिर वही दिनचर्या शुरू होगी। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि फ्रेंकफर्ट से हम बाकू, ताशकन्द, कन्धार, लाहौर के ऊपर से उड़ेंगे।

समाप्त 

vidhya vhushan

विद्या भूषण रावत जाने-मने लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

अगोरा प्रकाशन की किताबें किन्डल पर भी…

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