Tuesday, August 18, 2026
Tuesday, August 18, 2026




Basic Horizontal Scrolling



पूर्वांचल का चेहरा - पूर्वांचल की आवाज़

होमविचार

विचार

किशन पटनायक के चिंतन में अच्छी राजनीति का विकल्प बचा हुआ था

किशन पटनायक विकास के विनाशकारी मॉडलों का विरोध करने वाले आंदोलनों में सक्रिय रहे, कभी अपने स्वास्थ्य की परवाह नहीं की। एक सच्चे दार्शनिक की तरह निरंतर लिखते और सोचते रहे। वे एक लोकतांत्रिक समाजवादी थे, इसमें कोई शक नहीं, लेकिन उन्होंने अपने लेखों या भाषणों में कभी किसी नेता का हवाला देते नहीं देखा। सच्चे अर्थों में एक स्वतंत्र विचारक थे। ‘विकल्पीन नहीं है दुनिया’ से लेकर ‘भारत शूद्रों का होगा’ तक, समाजवाद, किसानों के मुद्दे, सांप्रदायिकता, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और लैंगिक संबंधों को कवर करने वाली उनकी रचनाएँ, विचारों की मौलिकता को दर्शाती हैं। पढ़िये, उनके साथ बिताए लेखक के अनुभव और संस्मरण।

भाजपा शासन के ग्यारह वर्ष : संविधान और धर्मनिरपेक्षता का लगातार दमन

पिछले 11 वर्षों से केंद्र सरकार और कई राज्य सरकारों पर नियंत्रण रखते हुए, ये ताकतें संविधान के तीन स्तंभों..धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और संघवाद  को कमज़ोर करने और उसकी जगह समाज के एक अंधकारमय, मध्ययुगीन दृष्टिकोण पर आधारित एक फ़ासीवादी हिंदू राष्ट्र स्थापित करने के लिए जी-जान से जुटी हैं।

हिंदुत्ववादी राजनीति ने इतिहास के पाठ्यक्रम से गायब किया मुस्लिम शासन का पाठ

भारतीय शिक्षा प्रणाली पर हिंदू साम्प्रदायिक तत्वों के पहले भी आरएसएस के साम्प्रदायिक संस्करण के माध्यम से प्रतिभाओं, एकल संप्रदायों और शैक्षणिक संस्थानों को बढ़ावा दिया जा रहा था। एनसीईआरटी की इतिहास की किताब से कक्षा सात से मुगलकालीन शासकों का पाठ हटाकर कुम्भ मेला का पाठ शामिल किया गया।

पहलगाम त्रासदी : आतंकवाद के चलते क्या कभी कश्मीर में शान्ति संभव हो पाएगी

आतंकवाद का खात्मा कैसे हो सकता है? स्थानीय लोगों को राज्य के मामलों से दूर रखने का निरंकुश तरीका आतंकवाद से निपटने में सबसे बड़ी बाधा है। सुरक्षा में बार-बार विफल होना, पुलवामा और अब पहलगाम में सुरक्षा व्यवस्था का विफल होना गहरी चिंता का विषय है।

क्या नेहा सिंह राठौर पर एफआईआर से आतंकवाद की कमर टूट जाएगी

नेहा राठौर और लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रोफेसर डॉ माद्री ककोटी उर्फ डॉ मेडुसा के ऊपर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया गया। गोदी मीडिया और भाजपा के ट्रोल ने उनके खिलाफ ज़हर उगलना शुरू कर दिया है।न तो नेहा राठौर और न ही माद्री ककोटी ने इस मामले में कोई खेद व्यक्त किया बल्कि नेहा लगातार आलोचना जारी रखे हुये हैं। एक वीडियों में उन्होंने गोदी मीडिया को देश का गद्दार और अपराधी भी कहा।

सुप्रीम कोर्ट की नीयत में खोट- संदर्भ : बथानी टोला नरसंहार (डायरी 23 मई, 2022)

निस्संदेह देश जब विभाजत हुआ था तब बहुत कुछ हुआ। इस संबंध में खूब सारा साहित्य उपलब्ध है। दोनों तरफ के लोगों को परेशानियां...

अदालत-अदालत का फर्क या फिर कुछ और? (डायरी 22 मई, 2022)

यह कोई नई बात नहीं है कि सेवानिवृत्त हो चुके जजों के अलावा नौकरशाहों की अंतरात्मा जाग जाती है। उनके बयान ऐसे प्रतीत होते...

आंबेडकरवाद और एकजुट लड़ाई की जीत है प्रोफेसर रतनलाल की रिहाई

सत्ता का रवैया देखते हुए जिस बात की आशंका थी, वह सामने आ ही गयी। फेसबुक पर ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग, जिसे एक...

बकवास करने का अधिकार केवल ब्राह्मण वर्गों को है (डायरी 21 मई, 2022) 

ब्राह्मणों की भावनाएं बहुत जल्दी आहत हो जाती हैं। लेकिन 85 फीसदी दलित-बहुजनों की भावनाएं क्यों आहत नहीं होतीं? अब कल की ही बात जेएनयू की कुलपति शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित महोदया ने कहा है कि भारत को संविधान के दायरे में सीमित नागरिक राष्ट्र के रूप में नहीं रखा जाना चाहिए। कल वह दिल्ली विश्वविद्यालय की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं। उनका कहना है कि भारत को अपने अतीत की सभ्यता को माननेवाला राष्ट्र होना चाहिए।

अदालतों में कहानियां लिखी नहीं, गढ़ी जाती हैं (डायरी 20 मई, 2022) 

बीते 17 मई को सीनियर डिवीजन जज रवि कुमार दिवाकर ने एक आयुक्त अधिवक्ता अजय कुमार मिश्र को बर्खास्त कर दिया था और सर्वे की रपट दाखिल करने का निर्देश शेष दो आयुक्त अधिवक्ताओं को दिया था। लेकिन कल अजय कुमार मिश्र ने अपनी रपट पेश कर दी। मजे की बात यह कि अजय कुमार मिश्र ने अपनी रपट मीडिया को भी उपलब्ध करा दी, जिसमें कहा गया है कि ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे के दौरान हिंदू धर्म से जुड़ी कई चीजें मिली हैं। बाकायदा अजय कुमार मिश्र ने सूची दी है।

क्या इस देश का ओबीसी कृपा का पात्र है?, डायरी (19 मई, 2022) 

देश में अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग कितने हैं, इसका सटीक आंकड़ा भारत सरकार के पास नहीं है। वजह यह है कि वर्ष 1931...
Bollywood Lifestyle and Entertainment