संसदीय और असंसदीय शब्दों के बीचों-बीच (डायरी, 15 जुलाई, 2022) 

नवल किशोर कुमार

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शब्द महत्वपूर्ण होते हैं। कितने महत्वपूर्ण होते हैं, यह एक सवाल हो सकता है। लेकिन इसका कोई पैमाना तय नहीं हो सकता। फिर चाहे वह कोई भी शब्द क्यों न हो। और ऐसा भी नहीं है कि शब्द केवल वक्ता और श्रोता के लिए ही महत्वपूर्ण हो। अक्सर शब्द तीसरे व्यक्ति के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसलिए भी हिंदी व्याकरण में तीन पुरुषों की व्यवस्था है। प्रथम पुरुष, मध्य पुरुष और अन्य पुरुष। हालांकि पुरुष शब्द का उपयोग क्यों किया गया, यह भी अपने आप में एक सवाल है। इसे प्रथम जीव, मध्य जीव और अन्य जीव भी कहा जा सकता था। लेकिन हिंदी में पुरुष प्रधान तत्व कुछ अधिक ही हैं।
खैर, मसला हिंदी व्याकरण का नहीं है। मसला शब्दों के उपयोग का है और यह कि कोई भी शब्द कब और कहां बोला-लिखा जा रहा है। कल की ही घटना है। मेट्रो में सवार होकर दफ्तर जा रहा था। कोच में दो व्यक्ति ऐसे थे, जो स्त्रीसूचक गालियों का उपयोग किये जा रहे थे। मैं यह गौर कर रहा था कि कोच में अनेक महिलाएं थीं। पुरुष तो खैर थे ही। किसी को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि दो लोग आपसी बातचीत में किस तरह के अमर्यादित शब्दों का उपयोग कर रहे हैं। मुझे लग रहा था कि पुरुष न सही, कम से कम महिलाएं इसका विरोध करेंगीं। वैसे भी मेट्रो में सवारी करनेवाली अधिकांश महिलाएं सक्षम होती हैं, ऐसा मुझे लगता है। लेकिन अधिकांश के कानों में ईयर-फाेन लगे थे और जिनके कान आजाद थे, उनकी जुबान खामोश थी।

शब्द महत्वपूर्ण होते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी होनी ही चाहिए। लेकिन इसका ध्यान भी रखा ही जाना चाहिए कि संसद के अंदर बोले गए शब्दों की खास अहमियत है और सभी को ऐहतियात बरतनी चाहिए फिर चाहे वह सदन के नेता यानी प्रधानमंत्री हों या फिर कोई और।

मेरी जुबान भी खामोश थी। वजह यह कि झगड़ा करना मेरी आदत नहीं है। और झगड़ा करने से हासिल भी क्या हो जाता, यही सोचकर चुप रह गया। परंतु नेहरू प्लेस मेट्रो से बाहर निकलने से पहले मैंने वहां कार्यरत एक मेट्रो कर्मी से शिकायत अथवा सुझाव देने हेतु व्यवस्था के बारे में पूछा। पहले तो उसे यह अजीब सा लगा। फिर उसने दिल्ली मेट्रो की वेबसाइट पर जाकर सुझाव देने की बात कही। परंतु, मैंने कहा कि मैं अपनी शिकायत व सुझाव लिखित में देना चाहता हूं। असल में मैं यह भी देखना चाहता था कि दिल्ली मेट्रो यात्रियों के हितों के लिए किस कदर संवेदनशील है। खैर, करीब दो मिनट बाद मुझे बक्से के बारे में बताया गया, जिसमें मैं अपना सुझाव व शिकायत लिखकर डाल सकता था। मैंने पन्ने में लिखा था कि अन्य तरह के उद्घोषणाओं में यह उद्घोषणा भी शामिल करें कि मेट्रो में अमर्यादित शब्दों का उपयोग न करें, यह दंडनीय अपराध है।
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एक सजग नागरिक होने के नाते यह मेरा काम था। मुझे नहीं पता कि दिल्ली मेट्रो के अधिकारी इस संबंध में कुछ करेंगे या नहीं।
संयोग ही कहिए कि कल मानसून सत्र के दौरान संसद में शब्दों को लेकर घमासान मचा। दरअसल, संसद में जो शब्द बोले जाते हैं, उसकी दो ही श्रेणियां हैं। एक तो संसदीय और दूसरा असंसदीय। इसे मर्यादित और अमर्यादित की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। इसे नैतिक और अनैतिक भी नहीं कहा जा सकता है। संसदीय और असंसदीय कहने के पीछे अनेक वजहें हैं। एक वजह तो यही कि मर्यादित और अमर्यादित के बीच बेहद महीन अंतर है। अब इसको ऐसे समझिए कि कोई विपक्षी सांसद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जुमलाजीवी कह दे, तो क्या हो। जुमलाजीवी जैसे शब्द पूर्व में नरेंद्र मोदी ने भी खूब प्रयोग किये हैं। उन्होंने तो किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आंदोलनजीवी की संज्ञा संसद के अंदर अपने संबोधन में दी थी। अब उनके लिए जुमलाजीवी का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, क्योंकि लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को यह शब्द नागवार लगता है। ऐसे ही अन्य शब्द भी हैं, जिनके बारे में कल बवाल काटा गया।

कोई विपक्षी सांसद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जुमलाजीवी कह दे, तो क्या हो। जुमलाजीवी जैसे शब्द पूर्व में नरेंद्र मोदी ने भी खूब प्रयोग किये हैं। उन्होंने तो किसानों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आंदोलनजीवी की संज्ञा संसद के अंदर अपने संबोधन में दी थी। अब उनके लिए जुमलाजीवी का इस्तेमाल करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, क्योंकि लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू को यह शब्द नागवार लगता है। ऐसे ही अन्य शब्द भी हैं, जिनके बारे में कल बवाल काटा गया।

दरअसल, संसद और मेट्रो ट्रेन के कोच में अंतर है। यह बात सभी को समझने की आवश्यकता है। संसद में सियासत की जाती है। बोलने वााला हर सदस्य यही काम करता है। हाल के वर्षों में आक्रामकता बढ़ी है और यह केवल लोकसभा व राज्यसभा में ही नहीं हुआ है, बल्कि अनेक राज्यों के विधानसभाओं में भी इसी तरह के उदाहरण मिलते हैं। बिहार विधानसभा में ही, संभवत: इसी वर्ष के बजट सत्र में, अपने संबोधन के दौरान नीतीश कुमार ने नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव को लक्ष्य बनाते हुए अपना आपा खो दिया था और तू-तड़ाक किया था। दिलचस्प यह कि तब विधानसभा के अध्यक्ष ने उनके द्वारा उपयोग किये गये शब्दों को असंसदीय नहीं कहा था और न ही उन शब्दों को सदन की कार्यवाही से बाहर निकालने का नियमन जारी किया था।
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बहरहाल, शब्द महत्वपूर्ण होते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी होनी ही चाहिए। लेकिन इसका ध्यान भी रखा ही जाना चाहिए कि संसद के अंदर बोले गए शब्दों की खास अहमियत है और सभी को ऐहतियात बरतनी चाहिए फिर चाहे वह सदन के नेता यानी प्रधानमंत्री हों या फिर कोई और।
शब्दों से ही एक बात याद आयी। कल गांव शब्द मिला। दरअसल, मेरा लक्ष्य एक हजार कविताएं लिखने का है। इसी संदर्भ में हर दिन एक शब्द जेहन में आता है। हालांकि अब शब्द देने की जिम्मेदारी मेरी प्रेमिका ने ले रखी है, जो दृश्य भी है और अदृश्य भी। वह मेरे अंतर्मन में है और बाहर भी।
खैर, उसके शब्द गांव के बारे में सोचा तो ख्याल आया–
शहर के बाहर एक नदी है
और नदी के उस पार गांव है।
पूरा का पूरा गांव
अब गांव में नहीं रहता
नदी पर बने पुल पर चढ़
गांव शहर आता है।
शहर गांव को देख हंसता है
गांव अपने खेतों की फसलों को
माथे पर लाद मजबूर अैर लाचार है।
गांव गांव और शहर शहर है
सरकार भी खूब समझदार है।
शहर के बाहर एक नदी है
और नदी के उस पार गांव है।

नवल किशोर कुमार फ़ॉरवर्ड प्रेस में संपादक हैं।

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